HTET Exam Level 2 Tgt
HTET exam Level 2 Tgt preparation with Clear Cutoff
Verified Answers and Explanations
by Clear Cutoff
Showing 20 of 20 questions
Question 1
“बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय।
सौंह करै भौंहनि हसैं, दैन कहै नटि जाय।।”
उपर्युक्त पद्यांश में अनुभाव का कौन-सा भेद प्रयुक्त हुआ है ?
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
The correct option is 2:
पद्यांश बतरस लालच लाल की में वाचिक अनुभाव की प्रधानता है। वाचिक अनुभाव का तात्पर्य उस स्थिति से है जहाँ नायक या नायिका अपने मन के भावों को वाणी या वचनों के माध्यम से प्रकट करते हैं। इस पद्यांश में गोपियाँ श्रीकृष्ण के साथ बातचीत करने के आनंद यानी बतरस के लोभ में उनकी मुरली छिपा देती हैं। यहाँ मुख्य उद्देश्य कृष्ण के साथ संवाद स्थापित करना है। जब कृष्ण मुरली माँगते हैं, तो गोपियाँ वाणी का चतुर प्रयोग करते हुए शपथ लेती हैं और अंत में मना (नटि जाय) कर देती हैं। यह समस्त प्रक्रिया शब्दों के खेल और संवाद पर टिकी है, इसलिए इसे वाचिक अनुभाव माना गया है।
The incorrect option is 1:
कायिक अनुभाव का संबंध शरीर की उन चेष्टाओं से होता है जो जानबूझकर की जाती हैं, जैसे भौंहें नचाना या कटाक्ष करना। यद्यपि इस दोहे में भौंहनि हसैं जैसी शारीरिक क्रिया का उल्लेख है, किंतु यह क्रिया वाचिक संवाद को पुष्ट करने के लिए गौण रूप में आई है। यहाँ गोपियों का मूल लक्ष्य शारीरिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि बातों का सुख प्राप्त करना है। काव्यशास्त्रीय विवेचन में जब वाणी और शरीर दोनों की चेष्टाएँ हों, तो प्रधान उद्देश्य को ही अनुभाव का मुख्य भेद माना जाता है। चूँकि यहाँ बतरस यानी बातचीत का रस प्रधान है, इसलिए कायिक अनुभाव को मुख्य उत्तर नहीं माना जा सकता।
The incorrect option is 3:
आहार्य अनुभाव का अर्थ होता है कृत्रिम वेशभूषा, अलंकरण या आभूषणों के माध्यम से भावों का प्रदर्शन करना। जब नायक या नायिका के वस्त्र और सजावट रसोत्पत्ति में सहायक होते हैं, तब आहार्य अनुभाव घटित होता है। बिहारी के इस विशिष्ट दोहे में गोपियों या श्रीकृष्ण के पहनावे, मुकुट, वस्त्र या किसी भी आभूषण का कोई वर्णन नहीं किया गया है। यहाँ पूरा प्रसंग केवल उनकी क्रियाओं और आपसी बातचीत के इर्द-गिर्द घूमता है। अतः वेशभूषा संबंधी वर्णन के अभाव में आहार्य अनुभाव का विकल्प पूर्णतः तर्कहीन और असंगत सिद्ध होता है।
The incorrect option is 4:
सात्त्विक अनुभाव उन शारीरिक परिवर्तनों को कहते हैं जो बिना किसी बाह्य प्रयास के अंतःकरण की भावनाओं के कारण स्वतः प्रकट होते हैं। इनके आठ प्रकार होते हैं जैसे स्तंभ, कम्प, रोमांच और अश्रु, जिन पर व्यक्ति का वश नहीं चलता। प्रस्तुत पद्यांश में गोपियों की सभी क्रियाएँ अत्यंत सचेत और सोची-समझी योजना का हिस्सा हैं। वे जानबूझकर मुरली छिपाती हैं और जानबूझकर ही मना करती हैं। यहाँ किसी भी प्रकार का अनियंत्रित सात्त्विक विकार दिखाई नहीं देता है। इसलिए इसे सात्त्विक अनुभाव की श्रेणी में रखना सर्वथा अनुचित होगा।
Question 2
वह चिड़िया जो' कविता में कवि ने चिड़िया की कौन-सी विशेषता नहीं बताई है ?
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
The correct option is (3):
केदारनाथ अग्रवाल द्वारा रचित कविता वह चिड़िया जो में छोटी नीले पंखों वाली चिड़िया के माध्यम से मानवीय गुणों को दर्शाया गया है। कवि ने स्पष्ट किया है कि चिड़िया एकांत में अकेले रहने पर भी बहुत प्रसन्न और उमंग में रहती है। वह विजन (निर्जन स्थान) से बहुत प्यार करती है और वहाँ भी अपनी मधुर आवाज में रस उँडेलकर गाती है। कविता के अनुसार चिड़िया के जीवन में उदासी का कोई स्थान नहीं है, बल्कि वह तो अकेलेपन को आनंद के साथ जीने की कला जानती है। अतः यह कहना कि वह एकांत में उदास रहती है, कविता के मूल भाव के सर्वथा विपरीत है और यही वह विशेषता है जो कवि ने नहीं बताई है।
The incorrect option is (1):
कविता की शुरुआती पंक्तियों में ही कवि कहते हैं कि चिड़िया को अन्न से बहुत प्यार है। वह दूध भरे जुंडी के दानों को बड़े चाव और संतोष के साथ खाती है, जो उसकी प्रकृति के संतोषी होने का प्रमाण है। इसलिए यह विकल्प गलत है क्योंकि यह चिड़िया की एक वास्तविक विशेषता है।
The incorrect option is (2):
कवि ने बताया है कि चिड़िया पुराने घने वन में जाकर बूढ़े वन-बाबा की खातिर अपना कंठ खोलकर बिना किसी डर के गाती है। वह एकांत वातावरण में भी बेरोक-टोक अपनी मधुर तान छेड़ती है, जो उसकी स्वतंत्रता और वन के प्रति लगाव को प्रकट करता है। चूंकि यह विशेषता कविता में स्पष्ट वर्णित है, इसलिए यह विकल्प उत्तर नहीं हो सकता।
The incorrect option is (4):
चिड़िया को साहसी और गरबीली बताया गया है क्योंकि वह उफनती हुई नदी के बीच से जल का मोती (पानी की बूंद) ले आने की हिम्मत रखती है। वह छोटी होने के बावजूद नदी की लहरों से नहीं डरती और अपनी क्षमता पर गर्व करती है। यह उसके साहसी स्वभाव का सटीक चित्रण है, अतः यह विकल्प भी गलत है।
Question 3
भारतेन्दु युगीन साहित्यकारों के संबंध में अनुचित कथन चुनिए :
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
The correct option is 3:
विकल्प 3 अनुचित है क्योंकि 'हिन्दी प्रदीप' एक प्रसिद्ध मासिक पत्र था, जिसका संपादन और प्रकाशन बालकृष्ण भट्ट द्वारा किया जाता था, न कि प्रताप नारायण मिश्र द्वारा। बालकृष्ण भट्ट ने 1877 में प्रयाग से इस पत्र का शुभारंभ किया था और इसे लगभग 33 वर्षों तक विषम परिस्थितियों में भी जीवित रखा। प्रताप नारायण मिश्र स्वयं भारतेन्दु युग के एक दिग्गज साहित्यकार थे, लेकिन वे 'ब्राह्मण' नामक पत्र के संपादन के लिए जाने जाते हैं। 'हिन्दी प्रदीप' भारतेन्दु युग की एक प्रमुख पत्रिका थी जिसने हिंदी गद्य के विकास और राष्ट्रीय चेतना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अतः यह कथन तथ्यात्मक रूप से गलत है।
विकल्प 1 एक सही कथन है: बालकृष्ण भट्ट को भारतेन्दु युग का सबसे समर्थ और प्रभावशाली निबंधकार माना जाता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने उनकी लेखन शैली के कारण उन्हें 'हिंदी का स्टील' कहा है। उन्होंने सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यिक विषयों पर अपनी कलम चलाई। उनके निबंधों में तीखापन और नवीनता का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। उन्होंने तत्कालीन समाज की बुराइयों पर प्रहार किया और हिंदी गद्य को एक नई दिशा प्रदान की।
विकल्प 2 एक सही कथन है: ठाकुर जगमोहन सिंह भारतेन्दु युग के एक विशिष्ट लेखक थे जिन्हें उनकी प्रकृति चित्रण की अद्भुत कला के कारण सर्वश्रेष्ठ प्रकृति प्रेमी साहित्यकार माना जाता है। उनकी रचना 'श्यामा स्वप्न' में प्रकृति का जो वर्णन मिलता है, वह उस काल के अन्य लेखकों में दुर्लभ है। उन्होंने मानवीय भावनाओं को प्रकृति के साथ जोड़कर प्रस्तुत किया। उनकी शैली में एक प्रकार की काव्यात्मकता और संवेदनशीलता झलकती है। प्रकृति के विविध रूपों का सजीव चित्रण उनकी सबसे बड़ी विशेषता रही है।
विकल्प 4 एक सही कथन है: 'नवभक्तमाला' प्रसिद्ध साहित्यकार राधाचरण गोस्वामी की महत्वपूर्ण कृति है। इस ग्रंथ में उन्होंने भक्तिकालीन परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अपने समय के भक्तों और महापुरुषों का परिचय दिया है। राधाचरण गोस्वामी भारतेन्दु मंडल के सक्रिय सदस्य थे और उन्होंने नाटकों तथा निबंधों के माध्यम से भी हिंदी साहित्य की सेवा की। 'नवभक्तमाला' उनकी भक्ति भावना और शोधपरक दृष्टि का एक उत्कृष्ट उदाहरण पेश करती है। यह रचना ऐतिहासिक और धार्मिक दोनों ही दृष्टिकोणों से महत्वपूर्ण मानी जाती है।
Question 4
मैथिलीशरण गुप्त कृत 'साकेत' के संबंध में अनुचित विकल्प चुनिए :
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
प्रश्न 'मैथिलीशरण गुप्त कृत 'साकेत' के संबंध में अनुचित विकल्प' चुनने के लिए कहता है। हमें यह बताना है कि दिए गए विकल्पों में से कौन सा कथन 'साकेत' के बारे में गलत है।
आइए प्रत्येक विकल्प का विश्लेषण करें:
-
विकल्प 1: साकेत रामचरितमानस के बाद दूसरा बड़ा रामकाव्य है।
यह कथन सत्य है। हिंदी साहित्य में 'रामचरितमानस' को सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण रामकाव्य माना जाता है, और उसके बाद 'साकेत' को दूसरा प्रमुख रामकाव्य माना जाता है, जो अपनी विशालता, काव्य-सौंदर्य और रामकथा के नवीन प्रस्तुतीकरण के लिए प्रसिद्ध है। इसलिए, यह विकल्प उचित है। -
विकल्प 2: आ० रामचंद्र शुक्ल के अनुसार साकेत के नवम एवं दशम सर्ग उर्मिला के वियोग वर्णन में लिखे गए हैं।
यह कथन भी सत्य है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल सहित कई आलोचकों ने 'साकेत' के नवम सर्ग (और कुछ हद तक दशम सर्ग) में उर्मिला के वियोग वर्णन की मार्मिकता और उत्कृष्टता की विशेष रूप से प्रशंसा की है। नवम सर्ग तो पूरी तरह से उर्मिला के विरह-वर्णन को समर्पित है। इसलिए, यह विकल्प उचित है। -
विकल्प 3: डॉ० बच्चन सिंह के मत में गुप्त जी एक साधक कवि हैं, इनकी साधना की चरमोपलब्धि साकेत है।
यह कथन भी सत्य है। डॉ. बच्चन सिंह जैसे आलोचकों ने मैथिलीशरण गुप्त को एक 'साधक कवि' के रूप में देखा है, जिन्होंने अपनी काव्य-साधना के माध्यम से भारतीय संस्कृति और मूल्यों को अभिव्यक्त किया। 'साकेत' को उनकी काव्य-साधना की चरम परिणति और सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जाता है। इसलिए, यह विकल्प उचित है। -
विकल्प 4: गुप्त जी को साकेत रचना लिखने की प्रेरणा हजारी प्रसाद द्विवेदी के लेख 'कवियों की उर्मिला विषयक उदासीनता' से मिली है।
यह कथन अनुचित है। मैथिलीशरण गुप्त को 'साकेत' लिखने की प्रेरणा, विशेषकर उर्मिला के उपेक्षित चरित्र को काव्य में स्थान देने की प्रेरणा, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के प्रसिद्ध लेख 'कवियों की उर्मिला विषयक उदासीनता' से मिली थी, न कि हजारी प्रसाद द्विवेदी के लेख से। हजारी प्रसाद द्विवेदी एक अलग आलोचक और साहित्यकार थे। इस विकल्प में प्रेरणा देने वाले व्यक्ति का नाम गलत दिया गया है।
निष्कर्ष:
चूंकि प्रश्न में 'अनुचित विकल्प' चुनने के लिए कहा गया है, और विकल्प 4 में प्रेरणा स्रोत के रूप में गलत व्यक्ति (हजारी प्रसाद द्विवेदी की जगह महावीर प्रसाद द्विवेदी होना चाहिए था) का नाम दिया गया है, इसलिए विकल्प 4 ही अनुचित कथन है।
अतः, सही उत्तर है विकल्प 4।
Question 5
शब्द प्रकृति की दृष्टि से कौन-सा युग्म असंगत है ?
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
The correct option is 2:
उलूक – तद्भव शब्द वाला युग्म असंगत है क्योंकि व्याकरणिक दृष्टि से उलूक एक तत्सम शब्द है। तत्सम शब्द वे होते हैं जो संस्कृत भाषा से बिना किसी परिवर्तन के हिंदी में ज्यों के त्यों ग्रहण किए गए हैं। उलूक मूल संस्कृत का शब्द है, जिसका तद्भव रूप उल्लू होता है। तद्भव शब्द वे हैं जो संस्कृत से उत्पन्न होकर प्राकृत या अपभ्रंश के माध्यम से बदलते हुए हिंदी में आए हैं। चूँकि विकल्प में उलूक को तद्भव बताया गया है, जो कि इसकी वास्तविक प्रकृति के विपरीत है, इसलिए यह जोड़ा गलत या असंगत सिद्ध होता है। परीक्षा की दृष्टि से यह समझना आवश्यक है कि मूल संस्कृत ध्वनियाँ तत्सम की श्रेणी में आती हैं।
The incorrect option is 1:
छाया - तत्सम शब्द एक सही सुमेलित युग्म है। छाया शब्द संस्कृत मूल का है और हिंदी साहित्य में इसका प्रयोग उसी शुद्ध रूप में किया जाता है, इसलिए इसे तत्सम माना जाता है। यह शब्द अपनी वर्तनी और अर्थ में संस्कृत के समान बना हुआ है। इसमें कोई ध्वनि परिवर्तन नहीं हुआ है जो इसे तद्भव की श्रेणी में ले जाए। अतः यह युग्म प्रश्न की माँग के अनुसार असंगत नहीं है।
The incorrect option is 3:
हमेशा - विदेशज शब्द भी एक सही मेल है। हमेशा शब्द फारसी भाषा से हिंदी में आया है, जिसका अर्थ निरंतर या सदा होता है। हिंदी में प्रचलित ऐसे शब्द जो अरबी, फारसी या अंग्रेजी जैसी विदेशी भाषाओं से अपनाए गए हैं, उन्हें विदेशज शब्द कहा जाता है। यह शब्द हमारी बोलचाल की भाषा का अभिन्न अंग बन चुका है। अपनी व्युत्पत्ति के कारण यह शब्द विदेशी स्रोत को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।
The incorrect option is 4:
बीहड़ – देशज शब्द का युग्म भी पूर्णतः सही है। देशज शब्द वे होते हैं जिनकी उत्पत्ति किसी स्थानीय बोली या क्षेत्रीय प्रभाव के कारण हुई है और उनका कोई संस्कृत मूल नहीं मिलता। बीहड़ शब्द मुख्य रूप से अनुपजाऊ या ऊबड़-खाबड़ भूमि के लिए ग्रामीण अंचलों में प्रयुक्त होता है। यह शब्द भारतीय परिवेश और जनभाषा की अपनी उपज है। इसलिए, यह युग्म व्याकरण के नियमों के अनुसार संगत है।
Question 6
निम्न में से कौन-सा कथन अनुचित है ?
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
प्रश्न में पूछा गया है कि निम्न में से कौन-सा कथन अनुचित है। दिए गए विकल्पों में से विकल्प 3 अनुचित कथन है।
विकल्प 3 अनुचित क्यों है (सही उत्तर):
कथन "बुन्देली बोली को 'कोशली' नाम से भी जाना जाता है" अनुचित है। 'कोशली' नाम अवधी बोली का एक अन्य नाम है, न कि बुन्देली का। अवधी बोली को 'कौसली' या 'कोशली' भी कहा जाता है क्योंकि इसका मुख्य क्षेत्र प्राचीन कोशल राज्य का हिस्सा था। बुन्देली बोली का संबंध बुंदेलखंड क्षेत्र से है और इसे 'बुंदेलखंडी' भी कहा जाता है, लेकिन 'कोशली' नहीं। इसलिए, यह कथन तथ्यात्मक रूप से गलत है।
अन्य विकल्प उचित क्यों हैं (गलत उत्तर):
-
विकल्प 1: ब्रजभाषा को कुछ विद्वानों ने 'अन्तर्वेदी' नाम से अभिहित किया है।
यह कथन उचित है। ब्रजभाषा का क्षेत्र गंगा और यमुना के बीच का 'अन्तर्वेद' कहलाता है। इसी कारण कुछ विद्वानों ने ब्रजभाषा को 'अन्तर्वेदी' नाम से भी पुकारा है। -
विकल्प 2: डॉ० धीरेन्द्र वर्मा ने कन्नौजी को ब्रजभाषा की एक उपबोली माना है।
यह कथन उचित है। डॉ० धीरेन्द्र वर्मा जैसे भाषाविदों ने कन्नौजी को ब्रजभाषा की एक उपबोली के रूप में वर्गीकृत किया है। कन्नौजी और ब्रजभाषा में काफी समानताएँ हैं और वे एक-दूसरे से बहुत मिलती-जुलती हैं। -
विकल्प 4: डॉ० उदयनारायण तिवारी अवधी तथा बघेली में नाममात्र का अन्तर स्वीकार करते हैं।
यह कथन उचित है। डॉ० उदयनारायण तिवारी सहित कई भाषाविद् अवधी और बघेली को पूर्वी हिंदी की उपबोलियाँ मानते हैं और उनके बीच बहुत कम अंतर पाते हैं। बघेली को अक्सर अवधी की ही एक दक्षिणी शाखा या उपबोली माना जाता है क्योंकि उनमें व्याकरणिक और शाब्दिक समानताएँ बहुत अधिक हैं।
अतः, केवल विकल्प 3 ही तथ्यात्मक रूप से गलत है, इसलिए यह अनुचित कथन है।
Question 7
छायावाद के संबंध में असत्य विकल्प चुनिए :
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
दिए गए प्रश्न में छायावाद के संबंध में असत्य विकल्प का चयन करना है। सही उत्तर विकल्प 1 है, जिसका अर्थ है कि विकल्प 1 में दिया गया कथन असत्य है।
आइए प्रत्येक विकल्प की विस्तृत व्याख्या करें:
विकल्प 1: 'छायावाद' शब्द के प्रथम प्रयोक्ता रूपनारायण पाण्डेय हैं।
- यह कथन असत्य है। 'छायावाद' शब्द का प्रथम प्रयोगकर्ता रूपनारायण पाण्डेय नहीं, बल्कि मुकुटधर पाण्डेय हैं। मुकुटधर पाण्डेय ने 1920 में जबलपुर से प्रकाशित होने वाली पत्रिका 'श्री शारदा' में 'हिंदी में छायावाद' शीर्षक से एक लेखमाला प्रकाशित की थी, जिसमें उन्होंने इस शब्द का प्रयोग किया था। अतः, यह विकल्प असत्य है।
विकल्प 2: छायावादी काव्य अपनी लाक्षणिकता, व्यंजनात्मकता एवं प्रकृति के चैतन्यीकरण के लिए प्रसिद्ध है।
- यह कथन सत्य है। छायावादी काव्य की प्रमुख विशेषताओं में लाक्षणिकता (शब्दों का सीधा अर्थ न लेकर लक्ष्यार्थ ग्रहण करना), व्यंजनात्मकता (शब्दों से गूढ़ अर्थों की व्यंजना करना) और प्रकृति का मानवीकरण या चैतन्यीकरण (प्रकृति को सजीव प्राणी के रूप में चित्रित करना) शामिल हैं। ये सभी छायावादी कविता के सौंदर्य और शिल्प के अभिन्न अंग हैं।
विकल्प 3: रामविलास शर्मा ने सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' को ओज, औदात्य एवं विद्रोह का कवि कहा है।
- यह कथन सत्य है। प्रसिद्ध आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा ने सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' के काव्य में निहित ओज (तेजस्विता), औदात्य (महानता, उदात्त भाव) और विद्रोह (रूढ़ियों के प्रति विरोध) के स्वर को पहचानते हुए उन्हें इन विशेषताओं का कवि कहा है। निराला का काव्य अपनी सशक्त अभिव्यक्ति और क्रांतिकारी चेतना के लिए जाना जाता है।
विकल्प 4: सुमित्रानंदन पंत की प्रथम कविता 'गिरजे का घंटा' शीर्षक से प्रकाशित हुई।
- यह कथन सत्य है। सुमित्रानंदन पंत की प्रथम कविता 'गिरजे का घंटा' ही मानी जाती है, जो 1916 में प्रकाशित हुई थी। यह कविता उनकी प्रारंभिक काव्य-यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव है और इसके माध्यम से उन्होंने हिंदी साहित्य में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी।
उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि विकल्प 1 में दिया गया कथन गलत है, क्योंकि 'छायावाद' शब्द के प्रथम प्रयोक्ता मुकुटधर पाण्डेय हैं, न कि रूपनारायण पाण्डेय। इसलिए, प्रश्न के अनुसार असत्य विकल्प 'विकल्प 1' है।
Question 8
"मानुस हों तो वही रसखानि, बसौं ब्रज गोकुल गाँव कि ग्वारिन।
जो पसु हौं तो कहा बसु मेरो, चरौं नित नंद कि धेनु मँझारिन।।"
उपर्युक्त पद्यांश में सवैया छंद का कौन-सा भेद है ?
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
The correct option is 4:
किरिट सवैया एक महत्वपूर्ण वर्णिक छंद है जिसमें प्रत्येक चरण में 24 वर्ण होते हैं। इस छंद की शास्त्रीय संरचना में आठ 'सगण' (II S) का प्रयोग किया जाता है, जो इसे एक विशेष गति और लय प्रदान करता है। रसखान द्वारा रचित इन पंक्तियों में जब हम वर्णों की गणना करते हैं, तो कुल 24 वर्ण प्राप्त होते हैं, जो किरिट सवैया के लक्षणों को पूर्णतः चरितार्थ करते हैं। यह छंद भक्ति कालीन कवियों द्वारा ब्रज भाषा के सौंदर्य और कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम को व्यक्त करने के लिए अत्यधिक उपयोग किया गया है। इसकी लयबद्धता पाठक को काव्य के भाव में डुबो देती है।
The incorrect option is 1:
मदिरा सवैया में वर्णों की संख्या केवल 22 होती है। इसका गण विन्यास सात 'भगण' और अंत में एक 'गुरु' वर्ण के मेल से बनता है। चूंकि प्रस्तुत पद्यांश में वर्णों की संख्या 24 है, इसलिए यह मदिरा सवैया की श्रेणी में नहीं आ सकता। मदिरा सवैया की गति किरिट सवैया की तुलना में अधिक तीव्र और छोटी होती है। गणितीय आधार पर भी यह विकल्प इस पद्यांश के लिए अनुपयुक्त सिद्ध होता है। यह छंद उन पंक्तियों के लिए होता है जहाँ कम वर्णों में लय को सीमित करना हो।
The incorrect option is 2:
मालती सवैया, जिसे मत्तगयन्द सवैया भी कहा जाता है, में 23 वर्ण होते हैं। इसकी संरचना सात 'भगण' और अंत में दो 'गुरु' वर्णों पर आधारित होती है। यद्यपि रसखान ने अपनी अधिकांश रचनाएँ इसी छंद में लिखी हैं, किंतु यहाँ वर्ण गणना 24 होने के कारण यह विकल्प गलत है। मालती सवैया की यति और प्रवाह किरिट से भिन्न होता है। इसमें अंत में दो दीर्घ स्वर अनिवार्य होते हैं, जो यहाँ देखने को नहीं मिलते। अतः यह छंद इस विशिष्ट पद्यांश पर लागू नहीं होता है।
The incorrect option is 3:
सुमुखी सवैया भी एक वर्णिक छंद है जिसमें 23 वर्णों का विधान होता है। इसकी रचना सात 'जगण' और अंत में एक 'लघु-गुरु' के मेल से होती है। सुमुखी छंद का आरंभ 'लघु' वर्ण से होता है, जबकि प्रस्तुत पंक्तियाँ 'गुरु' (मा) से प्रारंभ हो रही हैं। इसकी वर्ण संख्या और गण विन्यास दोनों ही इस पद्यांश के विन्यास से मेल नहीं खाते हैं। यह छंद प्रायः श्रृंगारिक वर्णन में प्रयुक्त होता है। इसलिए, तकनीकी और संरचनात्मक कारणों से सुमुखी सवैया का चयन अनुचित है।
Question 9
डॉ० नगेन्द्र के मत में रीति-निरूपण का आरंभिक ग्रंथ है :
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
सही विकल्प 3 है:
डॉ० नगेन्द्र के अनुसार कृपाराम द्वारा रचित 'हिततरंगिणी' (1541 ई.) हिंदी में रीति-निरूपण का प्रथम ग्रंथ है। यद्यपि हिंदी साहित्य में रीति-परंपरा के व्यवस्थित प्रवर्तन का श्रेय प्रायः आचार्य केशवदास को दिया जाता है, किंतु कालक्रम की दृष्टि से डॉ० नगेन्द्र ने कृपाराम को वरीयता दी है। 'हिततरंगिणी' में रस और नायक-नायिका भेद का विवेचन संस्कृत की शास्त्रीय पद्धति पर किया गया है, जो रीतिकालीन प्रवृत्तियों का आधार बना।
विकल्प 1 गलत है:
केशवदास कृत 'कविप्रिया' (1601 ई.) एक अलंकार ग्रंथ है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने केशवदास को रीति-परंपरा का प्रवर्तक माना है क्योंकि उनकी रचनाओं से लक्षण-ग्रंथों की एक अखंड परंपरा शुरू हुई। हालाँकि, डॉ० नगेन्द्र के अनुसार केशवदास से पहले कृपाराम ने रीति-निरूपण का मार्ग प्रशस्त कर दिया था। अतः नगेन्द्र के विशिष्ट मत में 'कविप्रिया' प्रथम ग्रंथ नहीं ठहरता। यह ग्रंथ मुख्यतः इंद्रजीत सिंह की शिक्षा के लिए रचा गया था।
विकल्प 2 गलत है:
सूरदास कृत 'साहित्य लहरी' मुख्य रूप से 'दृष्टकूट' पदों का संग्रह है। इसमें यद्यपि कुछ पदों में नायिका भेद और अलंकारों के उदाहरण मिलते हैं, किंतु यह पूर्णतः रीति-निरूपण को समर्पित शास्त्रीय ग्रंथ नहीं है। डॉ० नगेन्द्र इसे रीति-निरूपण का आरंभिक ग्रंथ नहीं मानते क्योंकि इसका उद्देश्य भक्ति है, शास्त्रीय विवेचन नहीं। यह कृति सूरदास की भक्तिमयी काव्य-कला का एक विशिष्ट प्रयोग मात्र है।
विकल्प 4 गलत है:
चिंतामणि त्रिपाठी रचित 'कविकल्पद्रुम' (1650 ई.) रीतिकालीन सर्वांग निरूपण ग्रंथों की श्रेणी में आता है। आचार्य शुक्ल ने रीति-परंपरा का वास्तविक आरंभ चिंतामणि से माना है क्योंकि उनके बाद इस पद्धति का निरंतर पालन हुआ। डॉ० नगेन्द्र कालक्रम में चिंतामणि को कृपाराम और केशवदास के बहुत बाद का मानते हैं। इसलिए, इनके अनुसार यह रीतिकालीन परंपरा के मध्य का महत्वपूर्ण स्तंभ तो है, किंतु आरंभिक ग्रंथ नहीं।
Question 10
“संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी।” किस अनुच्छेद में वर्णित है ?
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
The correct option is 1:
भारतीय संविधान के भाग 17 में अनुच्छेद 343 से 351 तक राजभाषा संबंधी संवैधानिक प्रावधान दिए गए हैं। अनुच्छेद 343(1) स्पष्ट रूप से यह घोषित करता है कि भारतीय संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी। इसके साथ ही, यह भी प्रावधान किया गया है कि संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए उपयोग किए जाने वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतरराष्ट्रीय रूप होगा। यह अनुच्छेद भारत की भाषाई एकता और प्रशासनिक सुगमता को सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह देश के आधिकारिक कामकाज के लिए एक मानक भाषा और लिपि निर्धारित करता है।
The incorrect option is 2:
अनुच्छेद 344 राजभाषा के संबंध में आयोग और संसद की समिति के गठन से संबंधित है। यह अनुच्छेद राष्ट्रपति को संविधान लागू होने के पांच वर्ष बाद और फिर दस वर्ष बाद एक राजभाषा आयोग नियुक्त करने की शक्ति देता है। इस आयोग का कार्य राजभाषा हिंदी के आधिकारिक उपयोग को बढ़ावा देने के लिए सिफारिशें देना होता है। यह अनुच्छेद सीधे तौर पर राजभाषा की घोषणा नहीं करता, बल्कि उसके विकास और समीक्षा के लिए एक प्रशासनिक ढांचा प्रदान करता है। इसलिए, राजभाषा और लिपि की परिभाषा के संदर्भ में यह विकल्प गलत है।
The incorrect option is 3:
अनुच्छेद 345 किसी राज्य की राजभाषा या राजभाषाओं से संबंधित प्रावधानों को स्पष्ट करता है। यह राज्यों के विधानमंडलों को यह अधिकार देता है कि वे अपने राज्य के आधिकारिक कार्यों के लिए उस राज्य में बोली जाने वाली किसी भी भाषा या हिंदी को चुन सकें। जब तक कोई राज्य कानून बनाकर अपनी भाषा नहीं चुनता, तब तक अंग्रेजी का उपयोग जारी रहने का प्रावधान भी इसमें शामिल है। चूँकि यह अनुच्छेद राज्यों की शक्तियों के बारे में है न कि पूरे संघ की राजभाषा के बारे में, इसलिए यह सही उत्तर नहीं है।
The incorrect option is 4:
अनुच्छेद 210 राज्य विधानमंडलों में प्रयोग की जाने वाली भाषा से संबंधित है। यह अनुच्छेद निर्देश देता है कि राज्य विधानसभा या विधान परिषद में कार्य राज्य की राजभाषा, हिंदी या अंग्रेजी में किया जाएगा। यह भाग 6 (राज्यों) के अंतर्गत आता है और इसका कार्यक्षेत्र केवल स्थानीय विधायी प्रक्रियाओं तक सीमित है। इसका संघ की आधिकारिक राजभाषा की घोषणा से कोई सीधा संबंध नहीं है। संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार, संघ की भाषा के लिए अनुच्छेद 343 ही एकमात्र प्राथमिक स्रोत है।
Question 11
रचना तथा रचनाकार के संबंध में असंगत युग्म चुनिए :
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
The correct option is 3:
वाणी की व्यथा और त्रिलोचन शास्त्री का युग्म असंगत है क्योंकि यह कृति वास्तव में सुप्रसिद्ध कवि भवानी प्रसाद मिश्र द्वारा रचित है। त्रिलोचन शास्त्री हिंदी साहित्य में प्रगतिशील काव्य धारा के महत्वपूर्ण कवि माने जाते हैं जिन्हें सॉनेट लेखन के लिए विशेष रूप से जाना जाता है और उनकी प्रमुख रचनाओं में धरती, दिगंत तथा गुलाब और बुलबुल शामिल हैं। दूसरी ओर भवानी प्रसाद मिश्र गीत फरोश और बुनी हुई रस्सी जैसी रचनाओं के लिए विख्यात हैं और वाणी की व्यथा उनकी वैचारिक परिपक्वता को दर्शाती है। चूँकि प्रश्न में गलत युग्म की पहचान करनी थी इसलिए विकल्प 3 सही उत्तर है।
The incorrect option is 1:
युगधारा प्रगतिवादी साहित्य के प्रणेता बाबा नागार्जुन का एक मील का पत्थर माना जाने वाला काव्य संग्रह है। नागार्जुन ने इस कृति में समाज के शोषित और वंचित वर्ग की पीड़ा को बहुत ही बारीकी और ईमानदारी से उकेरा है। यह रचना 1953 में प्रकाशित हुई थी और इसमें राजनीतिक विद्रूपताओं पर करारा प्रहार किया गया है। नागार्जुन को जनकवि कहा जाता है और उनकी रचनाएँ अपनी सरलता और व्यंग्य के लिए प्रसिद्ध हैं। चूँकि यह युग्म साहित्यिक रूप से पूर्णतः सही है इसलिए यह उत्तर नहीं हो सकता।
The incorrect option is 2:
युग की गंगा प्रगतिशील कविता के सशक्त हस्ताक्षर केदारनाथ अग्रवाल का प्रथम काव्य संग्रह है जो 1947 में प्रकाशित हुआ था। केदारनाथ जी ने इस संकलन के माध्यम से ग्रामीण जीवन के यथार्थ और सामंतवादी व्यवस्था के विरुद्ध उठने वाले स्वर को पहचान दी थी। उनकी कविताएँ केन नदी के तट और प्रकृति की सुंदरता के साथ-साथ श्रमशील वर्ग की आशाओं को भी वाणी देती हैं। यह एक अत्यंत प्रामाणिक और सही मेल है इसलिए इसे असंगत नहीं माना जा सकता।
The incorrect option is 4:
अजेय खण्डर डॉ. रांगेय राघव की एक महत्वपूर्ण काव्य कृति है जो एक लंबी वर्णनात्मक कविता के रूप में जानी जाती है। रांगेय राघव एक बहुमुखी प्रतिभा संपन्न रचनाकार थे जिन्होंने बहुत कम आयु में ही विशाल साहित्य की रचना की थी। उनकी इस कृति में युद्ध और शांति के जटिल सवालों को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया गया है। यह रचना रांगेय राघव के प्रगतिशील दृष्टिकोण और उनकी अद्वितीय शब्द-सामर्थ्य का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह एक पूर्णतः सुमेलित युग्म है इसलिए यह विकल्प उत्तर के रूप में अमान्य है।
Question 12
"मैं सत्य कहता हूँ सखे, सुकुमार मत जानो मुझे।
यमराज से भी युद्ध में, प्रस्तुत सदा मानो मुझे।।"
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
सही विकल्प 1 है:
प्रस्तुत पंक्तियाँ मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित जयद्रथ वध से उद्धृत हैं, जिसमें अभिमन्यु के पराक्रम का वर्णन है। यहाँ अभिमन्यु अपने सारथि से कहते हैं कि युद्ध क्षेत्र में उन्हें केवल एक बालक न समझा जाए, क्योंकि वे यमराज से भी लोहा लेने का साहस रखते हैं। काव्य में जहाँ कठिन कार्यों को करने के लिए मन में उमंग और 'उत्साह' नामक स्थायी भाव जाग्रत होता है, वहाँ वीर रस की निष्पत्ति होती है। इन पंक्तियों में शत्रु के प्रति चुनौती और वीरता का भाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है, जो पाठक के मन में जोश भर देता है। इसलिए, उत्साह भाव की प्रधानता के कारण यहाँ वीर रस का सटीक प्रयोग हुआ है।
विकल्प 2 गलत है क्योंकि रौद्र रस का स्थायी भाव 'क्रोध' होता है। रौद्र रस में प्रतिशोध, अपमान या शत्रु के विनाश की प्रबल इच्छा के कारण उत्तेजना और गुस्सा झलकता है। हालाँकि इन पंक्तियों में चुनौती दी गई है, लेकिन यहाँ प्रतिशोध का क्रोध नहीं, बल्कि शौर्य का प्रदर्शन है। रौद्र रस के उदाहरणों में अक्सर आँखें लाल होना या कड़वे वचन कहना जैसे लक्षण मिलते हैं, जो यहाँ अनुपस्थित हैं। अतः यह वीर रस की श्रेणी में आता है, न कि रौद्र में।
विकल्प 3 गलत है क्योंकि करुण रस का स्थायी भाव 'शोक' होता है। करुण रस का प्रयोग वहाँ होता है जहाँ किसी प्रिय व्यक्ति के विनाश या अनिष्ट की आशंका से मन में दुख और वेदना उत्पन्न होती है। इन पंक्तियों में अभिमन्यु के संवाद में कहीं भी निराशा, रुदन या शोक की झलक नहीं मिलती है। इसके विपरीत, यहाँ आत्मविश्वास और युद्ध के लिए तत्परता का भाव है। चूँकि यहाँ दुख का कोई स्थान नहीं है, इसलिए इसे करुण रस नहीं माना जा सकता।
विकल्प 4 गलत है क्योंकि शृंगार रस का स्थायी भाव 'रति' या प्रेम होता है। शृंगार रस में नायक और नायिका के मिलन (संयोग) या विरह (वियोग) का सुंदर वर्णन किया जाता है। प्रस्तुत पंक्तियों का संदर्भ युद्ध क्षेत्र और रण-कौशल से जुड़ा है, जिसका प्रेम या सौंदर्य से कोई संबंध नहीं है। यहाँ कोमलता के स्थान पर ओज और पराक्रम की बात की गई है। इसलिए, यह शृंगार रस के लक्षणों के पूर्णतः विपरीत है और तर्कसंगत नहीं है।
Question 13
आ० विश्वनाथ के मत में रस की विशेषता नहीं है :
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
The correct option is 2:
आचार्य विश्वनाथ ने अपने ग्रंथ साहित्य दर्पण में रस के स्वरूप की विस्तृत व्याख्या की है। उनके अनुसार रस ब्रह्मास्वादसहोदर है, न कि साक्षात् ब्रह्मानंद। इसका अर्थ यह है कि रसास्वाद की प्रक्रिया ब्रह्मानंद (ईश्वर प्राप्ति के आनंद) के समान तो है, लेकिन वह वही नहीं है। ब्रह्मानंद चिरस्थाई और आध्यात्मिक होता है, जबकि काव्यानंद लौकिक आलंबनों के माध्यम से उत्पन्न होता है और वह कुछ समय के लिए ही सहृदय को सांसारिक बंधनों से मुक्त करता है। इसलिए, रस को ब्रह्मानंद कहना आचार्य विश्वनाथ के मत के विरुद्ध है, क्योंकि उन्होंने इसे केवल उसके समान (सहोदर) माना है।
The incorrect option is 1:
आचार्य विश्वनाथ के अनुसार रस सत्त्वोद्रेकमय होता है। इसका अर्थ है कि रस की प्रतीति तभी होती है जब रजोगुण और तमोगुण दब जाते हैं और सत्त्वगुण का उदय होता है। यह एक ऐसी मानसिक अवस्था है जहाँ चित्त एकाग्र और निर्मल हो जाता है। बिना सत्त्वगुण के प्रधान भाव के रसास्वाद संभव नहीं है। अतः यह रस की एक अनिवार्य और सही विशेषता है।
The incorrect option is 3:
विश्वनाथ रस को अखण्ड मानते हैं, जिसका तात्पर्य है कि रस के आस्वादन के समय विभाव, अनुभाव और संचारी भाव अलग-अलग प्रतीत नहीं होते। जैसे स्वादिष्ट शरबत में चीनी, पानी और नींबू का स्वाद मिलकर एक नया स्वाद देता है, वैसे ही रस भी एक समेकित आनंद है। इसे टुकड़ों में विभाजित करके नहीं देखा जा सकता। यह सहृदय की चेतना में एक संपूर्ण इकाई के रूप में प्रकट होता है। इसलिए, यह विशेषता उनके मत के पूर्णतः अनुकूल है।
The incorrect option is 4:
रस लोकोत्तर चमत्कार प्राण है, यह विश्वनाथ का प्रसिद्ध सिद्धांत है। उनके अनुसार रस लौकिक सीमाओं से परे एक अलौकिक (लोकोत्तर) आनंद है जो पाठक के मन में विस्मय या चमत्कार उत्पन्न करता है। यह साधारण सांसारिक अनुभवों से भिन्न होता है क्योंकि इसमें अलौकिकता का समावेश होता है। इस चमत्कार के बिना रस की पूर्णता नहीं मानी जा सकती। अतः यह कथन भी सत्य है और रस की वैध विशेषता है।
Question 14
निम्न में से कौन-सा उद्देश्य लेखन कौशल का नहीं है ?
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
सही उत्तर विकल्प 4 है।
विकल्प 4 सही क्यों है, इसका विस्तृत स्पष्टीकरण:
- बच्चों को रुचि के अनुसार छोटे-छोटे गीत सुनाना - यह गतिविधि मुख्य रूप से 'श्रवण कौशल' (सुनने की क्षमता) से संबंधित है। जब बच्चे गीत सुनते हैं, तो वे ध्वनियों, लय और शब्दों को समझते हैं, जो उनके सुनने के कौशल को विकसित करता है। यदि वे गीत गाते हैं, तो यह 'भाषण कौशल' (बोलने की क्षमता) से संबंधित होगा। लेखन कौशल का संबंध विचारों को लिखित रूप में व्यक्त करने, अक्षर, शब्द और वाक्य बनाने से होता है। गीत सुनाना या सुनना सीधे तौर पर लेखन कौशल के उद्देश्यों में शामिल नहीं है। इसलिए, यह लेखन कौशल का उद्देश्य नहीं है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं, इसका स्पष्टीकरण:
-
विकल्प 1: छात्रों को लिपि, शब्द, मुहावरों का ज्ञान कराना।
- यह लेखन कौशल का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है। जब छात्र लिखते हैं, तो उन्हें सही लिपि (जैसे देवनागरी), शब्दों के सही रूप और अर्थ, और मुहावरों के उचित प्रयोग का ज्ञान होना आवश्यक है ताकि वे अपने विचारों को प्रभावी ढंग से लिखित रूप में व्यक्त कर सकें। यह लेखन की शुद्धता और प्रभावशीलता के लिए मूलभूत है।
-
विकल्प 2: बालकों को सुन्दर, स्पष्ट और सुडौल अक्षर लिखने में निपुण बनाना।
- यह लेखन कौशल का एक प्राथमिक और प्रत्यक्ष उद्देश्य है। अच्छी लिखावट (सुन्दर, स्पष्ट और सुडौल अक्षर) लेखन की पठनीयता (पढ़ने योग्य होना) के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि अक्षर स्पष्ट नहीं होंगे, तो लिखे हुए को समझना कठिन होगा, भले ही सामग्री कितनी भी अच्छी क्यों न हो।
-
विकale 3: बालकों को वाक्य रचना के नियमों से परिचित कराना।
- यह लेखन कौशल का एक अनिवार्य उद्देश्य है। लेखन का अर्थ केवल अक्षर या शब्द लिखना नहीं है, बल्कि सार्थक वाक्य और अनुच्छेद बनाना भी है। वाक्य रचना के नियमों (जैसे व्याकरण, विराम चिह्न, शब्द क्रम) का ज्ञान होने से ही बालक सही, स्पष्ट और व्याकरणिक रूप से शुद्ध वाक्य लिख पाते हैं, जिससे उनके लिखित विचार दूसरों तक सही ढंग से पहुँचते हैं।
Question 15
किस विकल्प के सभी शब्द वार्तनिक दृष्टि से शुद्ध हैं ?
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
The correct option is 4:
विकल्प 4 में दिए गए दोनों शब्द 'मनोचिकित्सा' और 'रचनावलि' वर्तनी की दृष्टि से शुद्ध माने गए हैं। 'मनोचिकित्सा' शब्द विसर्ग संधि के नियमानुसार 'मनः + चिकित्सा' के योग से बना है, जहाँ विसर्ग का 'ओ' में परिवर्तन हिंदी के प्रचलित व्याकरणिक प्रयोगों में व्यापक रूप से स्वीकार्य है, जो मानसिक विकारों के उपचार की प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से व्यक्त करता है। वहीं 'रचनावलि' शब्द 'रचना + आवलि' के मेल से बना है। हिंदी और संस्कृत शब्दावली में 'आवलि' (पंक्ति या संग्रह) शब्द का प्रयोग इकारान्त (छोटी इ) के रूप में भी मानक माना जाता है, जो रचनाओं के व्यवस्थित संग्रह को सही रूप में दर्शाता है। विद्यार्थियों को ध्यान देना चाहिए कि परीक्षा में मानक वर्तनी के सूक्ष्म नियमों के आधार पर ही ऐसे विकल्पों का चयन किया जाता है।
The incorrect option is 1:
इस विकल्प के दोनों शब्द अशुद्ध हैं, जो संधि और रेफ के नियमों का उल्लंघन करते हैं। 'गत्यावरोध' शब्द यण संधि के नियम (गति + अवरोध) के अनुसार गलत है; इसका शुद्ध रूप 'गत्यवरोध' होना चाहिए क्योंकि 'इ' और 'अ' के मेल से 'य' बनता है, 'या' नहीं। दूसरा शब्द 'आशिर्वाद' भी गलत है क्योंकि इसमें 'र' (रेफ) का स्थान अनुचित है। शुद्ध शब्द 'आशीर्वाद' होता है, जहाँ 'र' का उच्चारण 'शी' के बाद होता है, इसलिए इसे अगले वर्ण 'व' के ऊपर लगाया जाता है। इन गंभीर व्याकरणिक त्रुटियों के कारण यह विकल्प चयन योग्य नहीं है।
The incorrect option is 2:
इस विकल्प में 'ज्योत्स्ना' शब्द की वर्तनी प्रायः भ्रम पैदा करती है, जो इसे अशुद्ध बना सकती है। मानक हिंदी वर्तनी के अनुसार 'ज्योत्स्ना' शब्द में 'त्' और 'स्' दोनों ही अर्ध-वर्ण (आधे) होने चाहिए। यदि इनमें से किसी भी वर्ण को पूर्ण रूप में लिखा जाए, तो वह शब्द अशुद्ध माना जाता है। यद्यपि 'शूर्पणखा' सही हो सकता है, परंतु प्रतियोगी परीक्षाओं में यदि एक भी शब्द अशुद्ध है, तो पूरा विकल्प गलत हो जाता है। अतः वर्तनी की पूर्ण शुद्धता न होने के कारण इसे सही नहीं माना गया है।
The incorrect option is 3:
विकल्प 3 में दी गई दोनों वर्तनियाँ अशुद्ध हैं और सामान्य लेखन की अशुद्धियों को दर्शाती हैं। 'दवाईयाँ' शब्द गलत है क्योंकि व्याकरण के नियमानुसार जब 'ई' पर समाप्त होने वाले शब्दों का बहुवचन बनाया जाता है, तो दीर्घ 'ई' लघु 'इ' में बदल जाती है; अतः शुद्ध रूप 'दवाइयाँ' होगा। इसी प्रकार 'दुरावस्था' शब्द भी अशुद्ध है क्योंकि यह 'दुर' उपसर्ग और 'अवस्था' के मेल से बनता है, जिससे 'दुरवस्था' शब्द निर्मित होता है। यहाँ 'रा' में आ की मात्रा का प्रयोग अनावश्यक और अशुद्ध है। इन स्पष्ट मात्रात्मक त्रुटियों के कारण यह विकल्प गलत है।
Question 16
जयशंकर प्रसाद के कृतित्व के संबंध में अनुचित विकल्प है :
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
प्रश्न का उत्तर सही विकल्प के अनुसार दिया गया है।
सही विकल्प की व्याख्या (विकल्प 4):
प्रश्न में पूछा गया है कि जयशंकर प्रसाद के कृतित्व के संबंध में कौन सा विकल्प अनुचित है। विकल्प 4 अनुचित है क्योंकि इसमें कामायनी के संबंध में दिया गया कथन डॉ० बच्चन सिंह का नहीं है, बल्कि यह प्रसिद्ध कथन आचार्य रामचंद्र शुक्ल का है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कामायनी के बारे में कहा था कि "यह बड़ी विशद् कल्पनाओं और मार्मिक उक्तियों से परिपूर्ण है।" डॉ० बच्चन सिंह ने कामायनी पर अपने विचार व्यक्त किए हैं, लेकिन यह विशिष्ट कथन उनका नहीं है। अतः, कथन का गलत श्रेय दिए जाने के कारण यह विकल्प अनुचित है।
अन्य विकल्पों की व्याख्या (ये विकल्प उचित हैं, इसलिए प्रश्न का उत्तर नहीं हैं):
-
इनकी प्रथम कहानी 'ग्राम' शीर्षक से प्रकाशित हुई।
यह कथन बिल्कुल सही है। जयशंकर प्रसाद की प्रथम कहानी 'ग्राम' सन् 1911 में 'इंदु' पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। -
इनकी 'आँसू' रचना विरहानुभूति का उत्कृष्ट काव्य है।
यह कथन भी पूर्णतः सत्य है। 'आँसू' (1925) जयशंकर प्रसाद का एक प्रसिद्ध विरह काव्य है, जिसमें वियोग और वेदना की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। इसे 'हिंदी का मेघदूत' भी कहा जाता है। -
इनकी 'झरना' रचना को आ० नंददुलारे वाजपेयी ने 'छायावाद की प्रयोगशाला का प्रथम आविष्कार' माना है।
यह कथन भी सही है। आचार्य नंददुलारे वाजपेयी ने जयशंकर प्रसाद की 'झरना' (1918) को छायावाद की प्रथम रचना मानते हुए उसे 'छायावाद की प्रयोगशाला का प्रथम आविष्कार' कहा है। यह छायावाद की प्रारंभिक और महत्वपूर्ण कृति मानी जाती है।
Question 17
निम्न में से एक श्रव्य सहायक सामग्री नहीं है :
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
सही विकल्प 4 है:
टेलीविजन एक दृश्य-श्रव्य सहायक सामग्री है, न कि केवल श्रव्य सामग्री। शिक्षण प्रक्रिया में जब हम ऐसी सामग्री का उपयोग करते हैं जिसमें ध्वनि के साथ-साथ चित्र या चलचित्र भी दिखाई देते हैं, तो उसे दृश्य-श्रव्य (Audio-Visual) श्रेणी में रखा जाता है। टेलीविजन के माध्यम से छात्र सूचनाओं को सुनने के साथ-साथ अपनी आंखों से देख भी सकते हैं, जिससे उनका अधिगम अधिक प्रभावी और स्थायी बनता है। यह शिक्षण का एक आधुनिक साधन है जो जटिल अवधारणाओं को सजीव चित्रण के माध्यम से समझाने में मदद करता है। चूंकि प्रश्न में 'केवल श्रव्य' (सिर्फ सुनने वाली) सामग्री के बारे में पूछा गया है, इसलिए टेलीविजन इस श्रेणी में फिट नहीं बैठता क्योंकि इसमें दृश्य तत्व भी अनिवार्य रूप से शामिल होता है।
विकल्प 1 गलत है:
रेडियो एक शुद्ध श्रव्य सहायक सामग्री है जिसका उपयोग केवल ध्वनि संदेशों को प्रसारित करने के लिए किया जाता है। कक्षा में रेडियो के माध्यम से छात्र समाचार, शैक्षिक वार्ताएं और कविताएं सुनकर ज्ञानार्जन करते हैं। इसमें कोई दृश्य तत्व नहीं होता, इसलिए छात्र केवल अपनी श्रवण इंद्रियों का उपयोग करते हैं। यह दूरस्थ शिक्षा और भाषाई कौशल सुधारने के लिए एक उत्कृष्ट साधन माना जाता है। चूंकि यह पूरी तरह से श्रव्य है, इसलिए यह प्रश्न की 'श्रव्य सामग्री नहीं है' वाली शर्त को पूरा नहीं करता।
विकल्प 2 गलत है:
टेप-रिकॉर्डर भी एक महत्वपूर्ण श्रव्य साधन है जो ध्वनि को रिकॉर्ड करने और उसे पुन: सुनाने की सुविधा प्रदान करता है। इसका उपयोग मुख्य रूप से भाषा शिक्षण में शुद्ध उच्चारण और गीतों के अभ्यास के लिए किया जाता है। शिक्षक इसके माध्यम से छात्रों के भाषणों को रिकॉर्ड कर उन्हें अपनी गलतियां सुधारने का अवसर प्रदान कर सकते हैं। इसमें केवल ध्वनि तरंगों का उपयोग होता है और देखने के लिए कोई स्क्रीन या चित्र नहीं होता। अतः, इसे केवल श्रव्य सामग्री की श्रेणी में ही रखा जाता है।
विकल्प 3 गलत है:
लिंग्वा फोन भाषा सीखने के लिए विशेष रूप से तैयार किया गया एक श्रव्य उपकरण है। यह छात्रों को किसी विदेशी या नई भाषा के सही उच्चारण, लय और प्रवाह को सुनने और सीखने में मदद करता है। शिक्षण संस्थानों में इसका उपयोग भाषाई शुद्धता और सुनने के कौशल को विकसित करने के लिए किया जाता है। इसमें छात्र हेडफोन या स्पीकर के माध्यम से पहले से रिकॉर्ड की गई ध्वनियों को सुनते हैं। इसमें भी दृश्य सहायता का अभाव होता है, इसलिए यह एक अनिवार्य श्रव्य सहायक सामग्री है।
Question 18
किस विकल्प में संधि - कार्य असंगत है ?
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
सही उत्तर विकल्प 1 है:
विकल्प 1 'मनः + कामना = मनोकामना' संधि-कार्य की दृष्टि से असंगत है क्योंकि विसर्ग संधि के नियमानुसार यदि विसर्ग से पहले 'अ' स्वर हो और बाद में 'क, ख, प, फ' में से कोई वर्ण आए, तो विसर्ग में कोई परिवर्तन नहीं होता है। अतः 'मनः + कामना' का शुद्ध संधि रूप 'मनःकामना' ही रहता है, न कि 'मनोकामना'। बोलचाल में हम अक्सर 'मनोकामना' शब्द का प्रयोग करते हैं, लेकिन व्याकरणिक दृष्टि से यह अशुद्ध माना जाता है। परीक्षा में शुद्ध वर्तनी और संधि नियमों का पालन करना अनिवार्य है, इसलिए 'ओ' की मात्रा का प्रयोग यहाँ नियम विरुद्ध है।
विकल्प 2 'यशः + भव = यशोभव' में संधि नियम पूरी तरह सही है। यहाँ विसर्ग से पहले 'अ' है और बाद में 'भ' (वर्ग का चतुर्थ वर्ण/घोष) आने के कारण विसर्ग 'ओ' में बदल गया है।
विकल्प 3 'शिरः + मणि = शिरोमणि' भी बिल्कुल सटीक है। विसर्ग के बाद 'म' (पंचम वर्ण/घोष) आने पर विसर्ग 'ओ' में परिवर्तित हो जाता है, जो एक मानक विसर्ग संधि प्रक्रिया है।
विकल्प 4 'अधः + गति = अधोगति' में विसर्ग का मेल 'ग' (तृतीय वर्ण/घोष) से हो रहा है। नियमानुसार विसर्ग 'ओ' में रूपांतरित होकर शब्द को 'अधोगति' बनाता है, जो व्याकरणिक रूप से शुद्ध है।
Question 19
निम्न में से 'नरेन्द्रदेव समिति' का संबंध है :
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
सही उत्तर विकल्प (2) है:
आचार्य नरेन्द्रदेव समिति का मुख्य संबंध नागरी लिपि में सुधार और सुझाव देने से है। उत्तर प्रदेश सरकार ने 1947 में आचार्य नरेन्द्रदेव की अध्यक्षता में इस समिति का गठन किया था ताकि देवनागरी लिपि के मानकीकरण और लेखन प्रणाली को अधिक सरल व सुसंगत बनाया जा सके। इस समिति ने बारहखड़ी, मात्राओं की व्यवस्था, अनुस्वार और अनुनासिक के प्रयोग जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा की और कई वैज्ञानिक सुझाव दिए। यह हिंदी भाषा के भाषाई विकास और लिपि सुधार के इतिहास में एक मील का पत्थर मानी जाती है, जिसका उद्देश्य मुद्रण और लेखन की बाधाओं को दूर करना था।
गलत विकल्प (1) है:
हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का मुद्दा संविधान सभा और राजनीतिक बहसों का हिस्सा था, जिसमें 'नरेन्द्रदेव समिति' की प्रत्यक्ष भूमिका लिपि सुधार जैसी विशिष्ट नहीं थी। हालांकि आचार्य नरेन्द्रदेव हिंदी के समर्थक थे, लेकिन इस विशेष समिति का कार्यक्षेत्र केवल लिपि के तकनीकी सुधारों तक ही सीमित रखा गया था। राष्ट्रभाषा का चयन एक संवैधानिक प्रक्रिया थी, जबकि यह समिति भाषाई शुद्धता और मानक लेखन पर केंद्रित थी। अतः इसे राष्ट्रभाषा के आंदोलन से जोड़ना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं है।
गलत विकल्प (3) है:
विद्यालयी पाठ्यक्रम का निर्धारण आमतौर पर शिक्षा बोर्डों या एनसीईआरटी जैसी शैक्षणिक संस्थाओं का कार्य होता है। नरेन्द्रदेव समिति का प्राथमिक उद्देश्य छात्रों के पाठ्यक्रम बनाना नहीं, बल्कि उस लिपि को सुधारना था जिसमें वे पुस्तकें लिखी जाती हैं। यह समिति मुख्य रूप से वर्तनी और लिपि के स्वरूप को लेकर कार्य कर रही थी। पाठ्यक्रम निर्माण एक अलग प्रशासनिक प्रक्रिया है, जिसका इस विशिष्ट लिपि सुधार समिति के उद्देश्यों से कोई सीधा संबंध नहीं पाया जाता है।
गलत विकल्प (4) है:
यह विकल्प पूरी तरह से असंगत है क्योंकि 'कुएँ में भाँग पड़ना' एक मुहावरा है जिसका अर्थ है 'सबकी बुद्धि मारी जाना'। किसी भी गंभीर शैक्षणिक या सरकारी समिति का संबंध मुहावरों की व्याख्या या भाषाई लोकोक्तियों से नहीं होता है। यहाँ यह विकल्प केवल छात्रों को भ्रमित करने के लिए दिया गया है और इसका किसी ऐतिहासिक समिति के साथ कोई तार्किक आधार नहीं है। एक गंभीर विषय में मुहावरे का प्रयोग उत्तर के रूप में सर्वथा अनुचित है।
Question 20
सामासिक पदों की दृष्टि से कौन-सा विकल्प सुमेलित नहीं है ?
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
The correct option is 2:
मंदाग्नि का विग्रह मंद है जो अग्नि होता है। इस शब्द में मंद विशेषण है जो अग्नि की विशेषता बता रहा है। व्याकरण के नियमों के अनुसार जहाँ पहला पद विशेषण और दूसरा पद विशेष्य होता है वहाँ कर्मधारय समास होता है। चूँकि विकल्प में इसे तत्पुरुष समास के साथ जोड़ा गया है जो कि मुख्य रूप से कारक चिन्हों के लोप पर आधारित होता है इसलिए यह युग्म गलत है और प्रश्न के अनुसार सही उत्तर है।
The incorrect option is 1:
हृषीकेश शब्द का निर्माण हृषीक और ईश के मेल से हुआ है जिसका शाब्दिक अर्थ इंद्रियों का स्वामी होता है। यहाँ दोनों पद मिलकर किसी तीसरे विशेष अर्थ अर्थात भगवान विष्णु की ओर संकेत कर रहे हैं। बहुव्रीहि समास की यही पहचान है कि इसमें कोई भी पद प्रधान नहीं होता बल्कि पूरा पद किसी अन्य संज्ञा का विशेषण बन जाता है। यहाँ हृषीकेश भगवान विष्णु का रूढ़ नाम है इसलिए यह बहुव्रीहि समास का सटीक उदाहरण है। यह विकल्प व्याकरणिक दृष्टि से सुमेलित है अतः यह उत्तर नहीं हो सकता।
The incorrect option is 3:
उचितानुचित शब्द उचित और अनुचित दो विपरीतार्थक शब्दों के मेल से बना है। जब इसका विग्रह किया जाता है तो उचित या अनुचित शब्द प्राप्त होता है जो वैकल्पिक द्वन्द्व समास की श्रेणी में आता है। द्वन्द्व समास में पूर्व और उत्तर दोनों ही पद प्रधान होते हैं और प्रायः एक-दूसरे के विलोम होते हैं। यहाँ दोनों शब्दों का अपना स्वतंत्र अस्तित्व और महत्व है जो इसे द्वन्द्व समास का उत्तम उदाहरण बनाता है। यह सही सुमेलित विकल्प है इसलिए इसे प्रश्न का उत्तर नहीं माना जाएगा।
The incorrect option is 4:
अनुरूप शब्द में अनु एक अव्यय या उपसर्ग है जो रूप शब्द के साथ जुड़ा हुआ है। अव्ययीभाव समास की प्रमुख विशेषता यह है कि इसका पहला पद अव्यय होता है और वही प्रधान होता है। अनुरूप का समास विग्रह रूप के योग्य होता है जहाँ अनु शब्द क्रिया विशेषण की भाँति कार्य करता है। यह शब्द रूप की योग्यता के भाव को प्रकट करता है जो अव्ययीभाव की परिभाषा पर पूर्णतः खरा उतरता है। व्याकरण के अनुसार यह जोड़ा सही है इसलिए प्रश्न की माँग के अनुसार यह उत्तर नहीं है।