Question
Easy

निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के सबसे उचित विकल्प को चुनिए : काव्य में एक पथ के पान्थ हैं तुलसीदास और दूसरे के कालिदास। तुलसी शील की छाँह में छाँहाते चलते हैं, और कालिदास बिजलियों की कौंध से आँखें मिलाते चलते हैं। तुलसी में मलयज की तरह ताप-निवारण की क्षमता है, कालिदास में लोहित चन्दन की तरह उन्मादन राग-विवर्धन की शक्ति है। एक तीसरा भी पन्थ है, केशर या हल्दी के रंग में मलयज को संसक्त करके तिलक देने वालों का। रागात्मिका भक्ति के द्वारा दक्षिण और वाम पथ के बीच सहज समाधान प्राप्त करने वालों का। इनके तिलक में बंकिमा और सादगी दोनों होती है। सूरदास, हितहरिवंश, व्यास आदि इसी पन्थ के प्रणेता हैं। और एक चौथा चन्दन भी है, जिसको वैष्णव जन गोपी-चन्दन कहते हैं। मेरी एक परम वैष्णव चाची हैं, वे बतलाती हैं कि जिस सरोवर में गोपियों ने स्नान करके अपने प्रेष्ठ भगवान् का साक्षात्कार पाया, उस सरोवर की मिट्टी ही समर्पित गोपी के अंग से लगकर चन्दन बन गयी है। सम्भवतः जितने भी दुराव, आवरण और आत्मसंकोच आदि कृपणभाव हो सकते हैं, उन सबसे मुक्त होकर अपने को निश्शेष भाव से जो अपने सर्वश्रेष्ठ काम्य के लिए अर्पण करते हैं, तो मलयाचल की तरह अपने आश्रय-मात्र को चन्दन बनाने में समर्थ हो ही जाते हैं। हाँ, यह गोपी-चन्दन बहुत ही उच्चतर भूमिका वाले सिद्ध भक्तों के लिए ही है। पर मैं तो यह मानता हूँ कि चन्दन जो भी हो, किसी रंग में भी सना हो, वह हमारी विश्वभावना का ही एक शुष्कप्राय खण्ड है, जिसे रस-सिक्त करना हमारा सतत कर्त्तव्य है। जिस किसी भी शिला का हम होरसा बनवाएँ, वह धरती पर टिकी हो, संघर्षण में वह डगमगाने वाली न हो। हम जो कोई भी जल सींच-सींचकर चन्दन को आर्द्र करें; वह शुचि हो, स्वच्छ हो और अभिमन्त्रित हो। हम तिलक जो भी लगाएँ, वह अर्पित चन्दन का तिलक हो, स्वार्थ संघृष्ट न हो, सुविस्तृत विश्व को सुरभित करने से जो बचा हो, वही हम अपने सिर-आँखों लें, इसी में हमारी भव्य परम्परा की अभिवृद्धि और हम सभी के अन्तःकरणों का सौमनस्य सन्निहित है। तत्त्वतः हमीं चन्दन हैं, हमीं पानी हैं, हमीं होरसा हैं, हमीं कटोरी हैं जिसमें चन्दन रखा जाता है। हमीं अर्चनीय देवता हैं और हमीं अर्चक भक्त हैं; पर यह हमारा विस्तार बोध भी तभी जगता है, जब हम प्रभु को चन्दन और अपने को पानी मानकर चलते हैं। उदात्त रूपों का आकार सामने रखकर उनसे उनका सार ग्रहण करते हुए जीवन में उतारना है, यह ध्येय सामने रखकर चलते हैं और जो भी उदात्त गुण हम अर्जित करते हैं, उनको विश्वहित में विनियोजित करने का संकल्प लेकर चलते हैं। विस्तार भाव जगता है

1
प्रभु को चन्दन और अपने को पानी मानने से
2
ध्येय को सामने रखने से
3
वैष्णव भक्ति से
4
रस-सिक्त होने से
Question Details
Time to Solve: 12
Exam: HTET
Level/Paper: Level 1
Chapter: रचना कौशल
Topic: अपठित गद्यांश (गद्यांश तथा व्याकरण आधारित)
Correct Answer
Option A
Explanation

गद्यांश में विस्तार भाव के जागरण का उल्लेख किया गया है। सही उत्तर विकल्प 1 है: "प्रभु को चन्दन और अपने को पानी मानने से।" इस विकल्प को सही ठहराने के लिए निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किए जा सकते हैं: 1. प्रभु को चन्दन और अपने को पानी मानने से: गद्यांश में यह बताया गया है कि जब हम प्रभु को चन्दन और अपने को पानी मानकर चलते हैं, तब हमारा…Read More

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