हमें इस बात को समझना होगा कि युद्ध की अनुपस्थिति ही शांति की परिभाषा नहीं है। बुद्ध ने जिस शांतिपूर्ण समाज की परिकल्पना की थी, उसमें समानता का वह संदेश भी शामिल था, जो हमें इस बात का अहसास कराता है कि मनुष्य को मनुष्य से पृथक् दिखाने का हर प्रयास मनुष्यता का शत्रु है। ऐसे प्रत्येक प्रयास को विफल बनाना मनुष्योचित तो है, एक शर्त भी है मनुष्य के रूप में जीने की। हमारी चिंता यह होनी चाहिए कि हमें स्वयं को मनुष्य कैसे बनाएँ एवं कैसे मनुष्य बनाए रखें। मनुष्य बनने का अर्थ है - अपने भीतर दूसरे की पीड़ा को समझने का अहसास जगाना, अपने भीतर करुणा का वह भाव जगाना, जो हमें दूसरे से जोड़ता है। छोटे-छोटे पुल बनाने होंगे हमें दूसरे से जुड़ने के लिए - करुणा का पुल, मैत्री का पुल, समानता का पुल, विषमता मिटाने वाला पुल ......। ऐसा समझकर ही हम मानवोचित आचरण का मंत्र अपना सकते हैं, प्रबुद्ध बन सकते हैं। लेखक के अनुसार मनुष्य बनने का क्या अर्थ है ?
लेखक के अनुसार मनुष्य बनने का अर्थ है "दूसरे की पीड़ा को समझने का भाव जगाना" और यही विकल्प 3 को सही उत्तर बनाता है। लेखक ने इस बात पर जोर दिया है कि मनुष्य बनने का अर्थ है अपने भीतर करुणा का वह भाव जगाना, जो हमें दूसरे से जोड़ता है। यह करुणा और समझ ही हमें एक-दूसरे के करीब लाती है और मानवता का सही अर्थ समझने में…Read More
Source :
Source :
Source :
Source :