निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्न के उत्तर दीजिए :
"फिर हिमालय का तो कहना ही क्या! पूर्व और अपर समुद्र-महोदधि और रत्नाकर दोनों को दोनों भुजाओं से थामता हुआ हिमालय "पृथ्वी का मापदण्ड" कहा जाए तो गलत क्या है? कालिदास ने ऐसा ही कहा था। इसी के पाद-देश में यह जो श्रृंखला दूर तक लोटी हुई है, लोग इसे 'शिवालिक' श्रृंखला कहते हैं। शिवालिक का क्या अर्थ है? "शिवालिक" या शिव के जटाजूट का निचला हिस्सा तो नहीं है? लगता तो ऐसा ही है। 'सपादलक्ष' या सवालाख की मालगुजारी वाला इलाका तो वह लगता नहीं। शिव की लटियाई जटा ही इतनी सूखी, नीरस और कठोर हो सकती हैं। वैसे, अलकनन्दा का स्रोत यहाँ से काफी दूर है, लेकिन शिव का अलक तो दूर-दूर तक छितराया ही रहता होगा। सम्पूर्ण हिमालय को देखकर ही किसी के मन में समाधिस्थ महादेव की मूर्ति स्पष्ट हुई होगी। उसी समाधिस्थ महादेव के अलक-जाल के निचले हिस्से का प्रतिनिधित्व यह गिरि-श्रृंखला कर रही होगी।"
'कठिन' शब्द में रेखांकित व्यंजन प्रयत्न के आधार पर भेद है -
'\underline{\text{कठिन}}' शब्द में रेखांकित व्यंजन 'क' है। इस व्यंजन का प्रयत्न के आधार पर भेद 'अघोष' है। आइए इसे विस्तार से समझते हैं: 1. अघोष: अघोष व्यंजन वे होते हैं जिनमें ध्वनि उत्पन्न करते समय स्वर यंत्र (वोकल कॉर्ड्स) नहीं कंपन करते। 'क' व्यंजन का उच्चारण करते समय स्वर यंत्र नहीं कंपन करता, इसलिए यह अघोष व्यंजन है। इस कारण से विकल्प 3 सही है। अब अन्य विकल्पों को देखते…Read More
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