निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्न में सही / सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प को चुनिए । अपने स्वार्थ या संस्कृति के कारण सामान्य व्यवहार में हम कितनी ही बार सबसे धन्यवाद बोलते हैं । तो यह कृतज्ञता सिर्फ उन्हीं तक सीमित क्यों ? हमें मानव जन्म देने वाले ईश्वर के लिए और जलवायु, भोजन, ऊर्जा जैसे बहुत सारे उपहार देने वाली प्रकृति के लिए भी क्यों नहीं ? हम ईश्वर से संवाद करें कि वह हमारे हृदय में पवित्रता, सद्गुणों के प्रकाश को आलोकित करे। दुखो के कारण तो हमारे विकार हैं, बुराइयाँ हैं। हर बुराई अज्ञान के अंधकार में फैलती है, प्रकाश होते ही उसका सामर्थ्य खत्म हो जाता है । सुख-दुख दोनों ही हमारे कर्मों के फल हैं। हमें समझना चाहिए कि बिना दुख भोगे, सुख नहीं पाया जा सकता है। मानवीय पुरुषार्थ करते रहें, मन की कोठरी को स्वच्छ रखें, जहाँ ज़रूरत हो, प्रायश्चित भी अवश्य करें। कौन जाने कब किस रूप में प्रभु किस माध्यम से सहायक हो जाएँ। ईश्वर के प्रति आभार प्रकट करना एक ऐसा अचूक तरीका है जो हमें असंतुष्टि और ईर्ष्या जैसी निकृष्ट बातों से ऊपर उठाता है और यही हमारे जीवन का मूलभूत लक्ष्य है। ‘स्वार्थ’ का विलोम है :
‘स्वार्थ’ का विलोम ‘निःस्वार्थ’ है। इसका कारण यह है कि ‘स्वार्थ’ का अर्थ होता है अपने निजी लाभ या हित की चिंता करना। इसके विपरीत, ‘निःस्वार्थ’ का अर्थ होता है बिना किसी निजी लाभ की चिंता किए दूसरों के हित के लिए कार्य करना। इसलिए, ‘स्वार्थ’ और ‘निःस्वार्थ’ एक-दूसरे के विपरीत अर्थ रखते हैं, और इस प्रकार ‘निःस्वार्थ’ सही विलोम शब्द है। अब हम अन्य विकल्पों पर विचार करते हैं:…Read More
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