HTET परीक्षा - Level 1 Prt - अलंकार
Clear Cutoff के साथ HTET परीक्षा Level 1 Prt की तैयारी
Clear Cutoff द्वारा
20 में से 20 प्रश्न दिखाए जा रहे हैं
प्रश्न 1
इनमें से अर्थालंकार नहीं है
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उत्तर और व्याख्या
प्रश्न 2
हरिनी के नैंनानु तें हरिनी के ये नैन'
- उक्त काव्य पंक्ति में किन अलंकारों का प्रयोग हुआ है ?
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उत्तर और व्याख्या
'हरिनी के नैंनानु तें हरिनी के ये नैन' पंक्ति में यमक और प्रतीप अलंकार हैं। इसलिए विकल्प 4 सही है।
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यमक: यहाँ 'हरिनी' शब्द दो बार आया है। पहले 'हरिनी' का अर्थ हिरण है, जबकि दूसरे 'हरिनी' का अर्थ हिरणी के समान सुंदर नेत्रों वाली नायिका है। जब एक शब्द दो या दो से अधिक बार आए और हर बार उसका अर्थ भिन्न हो, तो यमक अलंकार होता है।
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प्रतीप: प्रतीप अलंकार में उपमान को उपमेय बना दिया जाता है। यहाँ हिरणी के नेत्रों को नायिका के नेत्रों के समान न बताकर, नायिका के नेत्रों को हिरणी के नेत्रों के समान बताया जा रहा है। अर्थात उपमान (हिरणी के नेत्र) को उपमेय (नायिका के नेत्र) के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसलिए यहाँ प्रतीप अलंकार है।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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विकल्प 1 (यमक - श्लेष): यमक तो है, लेकिन श्लेष नहीं है। श्लेष अलंकार में एक शब्द के कई अर्थ होते हैं, जो यहाँ नहीं है।
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विकल्प 2 (यमक - उपमा): यमक तो है, लेकिन उपमा नहीं है। उपमा अलंकार में दो वस्तुओं की समानता बताई जाती है, जबकि यहाँ उपमान को उपमेय बना दिया गया है, जो प्रतीप अलंकार का लक्षण है।
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विकल्प 3 (यमक - वक्रोक्ति): यमक तो है, लेकिन वक्रोक्ति नहीं है। वक्रोक्ति अलंकार में कहने वाला कुछ और अर्थ समझता है और सुनने वाला कुछ और, जो यहाँ नहीं है।
अतः, 'हरिनी के नैंनानु तें हरिनी के ये नैन' पंक्ति में यमक और प्रतीप अलंकार हैं, इसलिए विकल्प 4 (यमक - प्रतीप) सही उत्तर है।
प्रश्न 3
जहाँ कार्य और कारण के बीच संगति का अभाव हो, वहाँ कौन-सा अलंकार माना जाएगा ?
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उत्तर और व्याख्या
जहाँ कार्य और कारण के बीच संगति का अभाव हो, वहाँ असंगति अलंकार माना जाएगा।
असंगति अलंकार क्यों सही है:
असंगति अलंकार की परिभाषा ही यह है कि जहाँ कारण कहीं और हो और कार्य कहीं और हो, यानी कारण और कार्य में संगति या मेल न हो। प्रश्न में भी यही कहा गया है कि कार्य और कारण के बीच संगति का अभाव हो। इसलिए, असंगति अलंकार बिल्कुल सटीक बैठता है। उदाहरण के लिए, "हृदय घाव मेरे, पीर रघुवीरै" - घाव हृदय में है, लेकिन पीड़ा रघुवीर को हो रही है। यहाँ कारण (घाव) और कार्य (पीड़ा) अलग-अलग स्थानों पर हैं, इसलिए असंगति अलंकार है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं:
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विरोधाभास: विरोधाभास अलंकार में वास्तव में विरोध नहीं होता, बल्कि विरोध का आभास होता है। दो विरोधी बातें एक साथ कही जाती हैं, लेकिन उनका अर्थ गहरा होता है। प्रश्न में कार्य और कारण के बीच केवल संगति के अभाव की बात है, विरोध की नहीं।
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दीपक: दीपक अलंकार में एक ही शब्द या वाक्यांश का प्रयोग कई वाक्यों में किया जाता है, जिससे सभी वाक्य प्रकाशित हो जाते हैं। इसका कार्य और कारण के संगति या असंगति से कोई संबंध नहीं है।
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विभावना: विभावना अलंकार में कारण के अभाव में भी कार्य का होना दिखाया जाता है। जैसे, "बिनु पग चलै सुनै बिनु काना"। यहाँ बिना पैर के चलने और बिना कान के सुनने की बात है। प्रश्न में कारण का अभाव नहीं, बल्कि कारण और कार्य के बीच संगति का अभाव है।
इसलिए, स्पष्ट रूप से असंगति अलंकार ही सही उत्तर है क्योंकि यह कार्य और कारण के बीच संगति के अभाव को दर्शाता है, जैसा कि प्रश्न में पूछा गया है।
प्रश्न 4
निम्न में से किस अलंकार का उल्लेख भरतमुनि के 'नाट्यशास्त्र' में नहीं हुआ है ?
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उत्तर और व्याख्या
अतिशयोक्ति अलंकार का उल्लेख भरतमुनि के 'नाट्यशास्त्र' में नहीं हुआ है, इसलिए विकल्प 4 सही है।
विस्तृत स्पष्टीकरण:
भरतमुनि का 'नाट्यशास्त्र' नाट्यकला और साहित्य का एक प्राचीन और महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें उन्होंने नाटकों में प्रयुक्त होने वाले विभिन्न तत्वों, जैसे रस, भाव, अभिनय, और अलंकार आदि का विस्तृत वर्णन किया है। भरतमुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में केवल चार अलंकारों का उल्लेख किया है: उपमा, रूपक, दीपक और यमक।
- अतिशयोक्ति: अतिशयोक्ति अलंकार में किसी वस्तु या स्थिति का वर्णन बढ़ा-चढ़ाकर किया जाता है। हालांकि यह एक महत्वपूर्ण अलंकार है और बाद के आचार्यों द्वारा इसे मान्यता दी गई, लेकिन भरतमुनि ने अपने 'नाट्यशास्त्र' में इसका उल्लेख नहीं किया है। इसलिए, यह विकल्प सही है।
अन्य विकल्पों की व्याख्या:
- उपमा: उपमा अलंकार में दो वस्तुओं या व्यक्तियों के बीच समानता बताई जाती है। भरतमुनि ने 'नाट्यशास्त्र' में उपमा अलंकार का उल्लेख किया है। इसलिए, यह विकल्प गलत है।
- यमक: यमक अलंकार में एक ही शब्द दो या दो से अधिक बार आता है, लेकिन हर बार उसका अर्थ अलग होता है। भरतमुनि ने 'नाट्यशास्त्र' में यमक अलंकार का उल्लेख किया है। इसलिए, यह विकल्प गलत है।
- दीपक: दीपक अलंकार में एक ही शब्द या वाक्य से कई अर्थ निकलते हैं। भरतमुनि ने 'नाट्यशास्त्र' में दीपक अलंकार का उल्लेख किया है। इसलिए, यह विकल्प गलत है।
अतः, स्पष्ट है कि भरतमुनि के 'नाट्यशास्त्र' में अतिशयोक्ति अलंकार का उल्लेख नहीं है।
प्रश्न 5
"कोटिक ए कलधौत के धाम करील के कुंजन ऊपर वारौं।"
इस काव्य-पंक्ति में 'कलधौत के धाम' से क्या तात्पर्य है ?
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उत्तर और व्याख्या
'कोटिक ए कलधौत के धाम करील के कुंजन ऊपर वारौं।' इस काव्य-पंक्ति में 'कलधौत के धाम' से तात्पर्य सोने-चाँदी के आवास-स्थल से है।
Option 2 सही क्यों है:
'कलधौत' शब्द का अर्थ ही सोना-चाँदी होता है। 'धाम' शब्द आवास या स्थान को दर्शाता है। इसलिए, 'कलधौत के धाम' का सीधा अर्थ है सोने-चाँदी से बने आवास-स्थल। पंक्ति में कवि करील के कुंजों (कांटेदार झाड़ियों के झुरमुट) पर सोने-चाँदी के आवासों को भी न्योछावर करने की बात कर रहा है, जो यह दर्शाता है कि 'कलधौत के धाम' बहुमूल्य और कीमती आवासों को संदर्भित करता है, जो सोने-चांदी से बने हो सकते हैं।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
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Option 1: विशाल अट्टालिकाएँ: 'कलधौत' शब्द विशेष रूप से विशालता को नहीं दर्शाता है, बल्कि सोने-चाँदी के मूल्य को इंगित करता है। अट्टालिकाएँ विशाल हो सकती हैं, लेकिन 'कलधौत' शब्द का सीधा संबंध सोने-चाँदी से है।
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Option 3: पवित्र तीर्थस्थल: 'कलधौत' शब्द का धार्मिक या पवित्रता से कोई सीधा संबंध नहीं है। यह केवल सोने-चाँदी के मूल्य को दर्शाता है।
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Option 4: सुसज्जित भवन: सुसज्जित भवन किसी भी सामग्री से बना हो सकता है। 'कलधौत' शब्द विशेष रूप से सोने-चाँदी से बने भवनों को इंगित करता है, न कि केवल सजावट को। इसलिए, यह विकल्प सटीक नहीं है।
अतः, 'कलधौत के धाम' का सबसे सटीक अर्थ सोने-चाँदी के आवास-स्थल ही है।
प्रश्न 6
अलंकार से संबंधित कौन-सा विकल्प सुमेलित नहीं है ?
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उत्तर और व्याख्या
Option 4 सही है क्योंकि "निद्रा के उस अलसित वन में वह क्या भावी की छाया। दृग पलकों में विचर रही या वन्य देवियों की माया।।" में भ्रांतिमान अलंकार नहीं है। भ्रांतिमान अलंकार में किसी वस्तु को देखकर किसी दूसरी वस्तु का भ्रम हो जाता है, लेकिन यहाँ पर भ्रम नहीं है, बल्कि संदेह है। निश्चित रूप से यह तय नहीं हो पा रहा है कि वह भावी की छाया है या वन्य देवियों की माया। इसलिए यहाँ संदेह अलंकार है, भ्रांतिमान नहीं।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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"आग हूँ जिससे ढुलकते बिंदु हिमजल के" में विरोधाभास अलंकार है क्योंकि 'आग' और 'हिमजल' दो विरोधी बातें एक साथ कही गई हैं। आग गर्मी का प्रतीक है और हिमजल ठंडक का, इसलिए यहाँ विरोधाभास है। यह विकल्प सुमेलित है।
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"भूपति सोहत दान सों, फल-फूलन उद्यान" में दीपक अलंकार है क्योंकि 'दान' रूपी दीपक से राजा और उद्यान दोनों प्रकाशित हो रहे हैं। दीपक अलंकार में एक ही शब्द या वाक्य से कई अर्थ निकलते हैं। यह विकल्प भी सुमेलित है।
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"विरहिन के अँसुवानते भरन लग्यौ संसार। मैं जान्यों मरजाद तजि उमग्यौ सागर खार।।" में उत्प्रेक्षा अलंकार है क्योंकि विरहिणी के आंसुओं से संसार भर जाने की कल्पना की जा रही है और ऐसा लग रहा है मानो खारा सागर मर्यादा त्यागकर उमड़ रहा हो। 'मानों' शब्द उत्प्रेक्षा अलंकार का वाचक है। यह विकल्प भी सुमेलित है।
इसलिए, केवल Option 4 सुमेलित नहीं है, क्योंकि इसमें भ्रांतिमान अलंकार नहीं, बल्कि संदेह अलंकार है।
प्रश्न 7
"रीझि रीझि रहसि रहसि हँसि हँसि उठै
साँसै भरि आँसू भरि कहत दई दई।"
प्रस्तुत काव्य-पंक्तियों में अनुप्रास अलंकार का कौन-सा भेद है ?
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उत्तर और व्याख्या
छेकानुप्रास अलंकार इसलिए सही है क्योंकि इसमें वर्णों की आवृत्ति एक बार होती है और वह भी सार्थक रूप से। दी गई पंक्तियों "रीझि रीझि रहसि रहसि हँसि हँसि" में 'रि' और 'ह' वर्णों की आवृत्ति एक बार हुई है और यह आवृत्ति सार्थक है, जो छेकानुप्रास का लक्षण है। छेकानुप्रास में एक या अनेक वर्णों की क्रमानुसार आवृत्ति होती है, जो यहाँ स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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अन्त्यानुप्रास: अन्त्यानुप्रास में पंक्ति के अंत में वर्णों की समानता होती है। प्रस्तुत पंक्तियों में ऐसा नहीं है, इसलिए यह विकल्प गलत है।
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वृत्यनुप्रास: वृत्यनुप्रास में एक या अनेक वर्णों की आवृत्ति एक से अधिक बार होती है। जबकि दी गई पंक्तियों में वर्णों की आवृत्ति एक बार ही हुई है, इसलिए यह विकल्प गलत है।
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लाटानुप्रास: लाटानुप्रास में शब्दों या वाक्यों की आवृत्ति होती है, अर्थ में कोई विशेष परिवर्तन नहीं होता। प्रस्तुत पंक्तियों में वर्णों की आवृत्ति है, शब्दों या वाक्यों की नहीं, इसलिए यह विकल्प गलत है।
अतः, छेकानुप्रास अलंकार ही सही उत्तर है क्योंकि यह दी गई पंक्तियों में वर्णों की एक बार की आवृत्ति को सटीक रूप से दर्शाता है।
प्रश्न 8
"या अनुरागी चित्त की, गति समुझै नहिं कोय।
ज्यों-ज्यों बूड़ै स्याम रंग, त्यों-त्यों उज्ज्वल होय।"
- उक्त दोहे में प्रयुक्त अलंकार हैं :
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उत्तर और व्याख्या
विरोधाभास और श्लेष
व्याख्या:
यह दोहा विरोधाभास और श्लेष अलंकारों का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
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विरोधाभास: दोहे में स्पष्ट रूप से विरोधाभास दिखाई देता है। "ज्यों-ज्यों बूड़ै स्याम रंग, त्यों-त्यों उज्ज्वल होय" पंक्ति में, श्याम रंग (काला रंग) में डूबने पर उज्ज्वल (सफेद/चमकदार) होने की बात कही गई है, जो कि सामान्य अनुभव के विपरीत है। काला रंग किसी वस्तु को और गहरा करता है, न कि उज्ज्वल। यह विरोधाभास अलंकार का स्पष्ट उदाहरण है।
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श्लेष: "स्याम रंग" शब्द में श्लेष अलंकार है। "स्याम रंग" का एक अर्थ है काला रंग, और दूसरा अर्थ है भगवान कृष्ण का रंग (जो श्याम वर्ण के हैं)। जब कोई व्यक्ति कृष्ण के प्रेम में डूबता है, तो वह और अधिक उज्ज्वल (पवित्र, निर्मल) हो जाता है। इस प्रकार, "स्याम रंग" शब्द एक ही समय में दो अलग-अलग अर्थों को व्यक्त करता है, जिससे श्लेष अलंकार उत्पन्न होता है।
अन्य विकल्पों की अस्वीकृति:
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श्लेष और दीपक: श्लेष अलंकार तो है, लेकिन दीपक अलंकार इस दोहे में नहीं है। दीपक अलंकार में किसी एक स्थान पर धर्म (गुण) का उल्लेख करके उसे अन्य स्थानों पर भी लागू किया जाता है, जो इस दोहे में नहीं है।
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विरोधाभास और उत्प्रेक्षा: विरोधाभास अलंकार तो है, लेकिन उत्प्रेक्षा अलंकार नहीं है। उत्प्रेक्षा अलंकार में उपमेय में उपमान की संभावना व्यक्त की जाती है (जैसे 'मानो', 'जनु', 'मनु' आदि शब्दों का प्रयोग होता है), जो इस दोहे में नहीं है।
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श्लेष और भ्रांतिमान: श्लेष अलंकार तो है, लेकिन भ्रांतिमान अलंकार नहीं है। भ्रांतिमान अलंकार में किसी वस्तु को किसी अन्य वस्तु के रूप में भ्रमित किया जाता है, जो इस दोहे में नहीं है।
इसलिए, विरोधाभास और श्लेष अलंकारों की उपस्थिति के कारण विकल्प 4 सही है।
प्रश्न 9
अलंकारों से संबंधित कौन-सा कथन सही नहीं है ?
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उत्तर और व्याख्या
अलंकारों से संबंधित निम्नलिखित कथन सही नहीं है, इसका स्पष्टीकरण:
1. अर्थसाम्य यमक का आवश्यक तत्त्व है इसलिए समानार्थक शब्दों की आवृत्ति में यमक अलंकार होता है।
यह कथन सही नहीं है, और इसलिए यही सही उत्तर है। यमक अलंकार में शब्दों की आवृत्ति होती है, लेकिन आवश्यक नहीं कि वे समानार्थक हों। यमक अलंकार में शब्दों की आवृत्ति अर्थ-भेद के साथ होती है। यानी, एक ही शब्द दो या दो से अधिक बार आए और हर बार उसका अर्थ अलग हो। अगर समानार्थक शब्दों की आवृत्ति हो रही है, तो वह यमक अलंकार नहीं होगा। इसलिए, यह कहना कि अर्थसाम्य यमक का आवश्यक तत्त्व है, गलत है।
अन्य विकल्पों का स्पष्टीकरण:
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2. उपमेय में उपमान का संशय होने के कारण संदेह अलंकार में सत्यासत्य का निश्चय नहीं होता है। यह कथन सही है। संदेह अलंकार में उपमेय और उपमान के बीच समानता के कारण संशय बना रहता है और यह तय नहीं हो पाता कि वास्तव में क्या है।
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3. अनेकार्थवाची शब्दों द्वारा अनेक अर्थों के अभिधान में श्लेष अलंकार होता है। यह कथन भी सही है। श्लेष अलंकार में एक ही शब्द के कई अर्थ होते हैं, और उन सभी अर्थों को एक साथ व्यक्त किया जाता है।
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4. अपह्नुति अलंकार में वास्तविक (उपमेय) तथ्य को छिपाकर अवास्तविक (उपमान) तथ्य की स्थापना की जाती है। यह कथन भी सही है। अपह्नुति अलंकार में वास्तविक बात को नकार कर उसके स्थान पर किसी झूठी बात को स्थापित किया जाता है।
इसलिए, केवल पहला कथन गलत है, जो यमक अलंकार की गलत परिभाषा देता है।
प्रश्न 10
निम्न में से एक विकल्प सुमेलित नहीं है, उसे चुनिए :
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उत्तर और व्याख्या
चिरजीवौ जोरी जुरे, क्यों न सनेह गंभीर।
को घटि ए वृषभानुजा, वे हलधर के वीर।। - अभंग श्लेष - यह सुमेलित नहीं है, इसलिए सही उत्तर है।
व्याख्या:
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विकल्प 1 सही क्यों है: इस दोहे में श्लेष अलंकार तो है, लेकिन यह 'अभंग श्लेष' नहीं है। अभंग श्लेष में शब्द को भंग (तोड़े) किए बिना ही दो अर्थ निकलते हैं। यहाँ 'वृषभानुजा' और 'हलधर' शब्दों के दो अर्थ हैं:
- वृषभानुजा: वृषभानु की पुत्री (राधा) और वृषभ (बैल) की बहन (गाय)।
- हलधर: हल धारण करने वाला (बलराम) और हल को धारण करने वाला (बैल)।
हालांकि, इन शब्दों के दो अर्थ निकालने के लिए शब्द को तोड़ना नहीं पड़ता, लेकिन इस दोहे में श्लेष की प्रधानता होते हुए भी, इसे 'अभंग श्लेष' कहना सटीक नहीं है। 'अभंग श्लेष' की परिभाषा के अनुसार, शब्द को बिना तोड़े दो अर्थ निकलने चाहिए, जो कि यहाँ पूर्ण रूप से लागू नहीं होता। इसलिए, यह विकल्प सुमेलित नहीं है।
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अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
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विकल्प 2: खुले पलक, फैली सुवर्ण छवि, जगी सुरभि, डोले मधु-बाल। - लक्षणा शब्द शक्ति: यह सुमेलित है। यहाँ 'मधु-बाल' में लक्षणा शब्द शक्ति है, क्योंकि 'मधु-बाल' का सीधा अर्थ नहीं है, बल्कि यह किसी सुंदर, मादक वस्तु या व्यक्ति की ओर संकेत करता है।
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विकल्प 3: नील सरोरुह स्याम, तरुन अरुन बारिज नयन। करहु सो मो उर धाम, सदा क्षीरसागर शयन।। - माधुर्य गुण: यह सुमेलित है। इस पंक्ति में कोमल शब्दों का प्रयोग है, जो सुनने में मधुर लगते हैं और मन को शांति प्रदान करते हैं। यह माधुर्य गुण का उदाहरण है।
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विकल्प 4: चिक्करहिं दिग्गज डोल महि, अहि लोल सागर खरभरे। मन हरख सभ गंधर्ब-सुर-मुनि, नाग किन्नर दुःख टरे।। - ओज गुण: यह सुमेलित है। इस पंक्ति में कठोर वर्णों का प्रयोग है, जो वीरता और उत्साह का भाव उत्पन्न करते हैं। यह ओज गुण का उदाहरण है।
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प्रश्न 11
उदाहरण एवं अलंकार की दृष्टि से असंगत विकल्प चुनिए :
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उत्तर और व्याख्या
उदाहरण एवं अलंकार की दृष्टि से असंगत विकल्प विकल्प 3 है, और इसका कारण इस प्रकार है:
विकल्प 3 सही क्यों है:
विकल्प 3 में पंक्ति "बसन देहु, ब्रज में हमें बसन देहु ब्रजराज" दी गई है और इसे श्लेष अलंकार का उदाहरण बताया गया है। श्लेष अलंकार में एक शब्द के एक से अधिक अर्थ होते हैं, जो वाक्य में चमत्कार उत्पन्न करते हैं। इस पंक्ति में "बसन" शब्द दो बार आया है, लेकिन दोनों बार इसका अर्थ "वस्त्र" ही है। यहाँ "बसन" शब्द के दो भिन्न अर्थ नहीं हैं जो श्लेष अलंकार की विशेषता है। इसलिए, यह पंक्ति श्लेष अलंकार का सही उदाहरण नहीं है, और यही कारण है कि यह असंगत है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
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विकल्प 1: उर अंकुरित गर्व-तरु भारी – रूपक अलंकार: इस पंक्ति में "गर्व" को "तरु" (वृक्ष) के रूप में दर्शाया गया है। गर्व और तरु के बीच अभेद आरोपण है, यानी दोनों को एक ही मान लिया गया है। जहाँ उपमेय और उपमान में कोई भेद न रहे, वहाँ रूपक अलंकार होता है। इसलिए यह विकल्प सही है।
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विकल्प 2: कोमल कुसुम समान देह हा ! हुई तप्त अंगारमयी – उपमा अलंकार: इस पंक्ति में देह (शरीर) की तुलना "कोमल कुसुम" (कोमल फूल) से की गई है। "समान" शब्द का प्रयोग उपमा अलंकार का सूचक है, जो दो वस्तुओं के बीच समानता दर्शाता है। इसलिए यह विकल्प सही है।
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विकल्प 4: मुनि तापस जिन तें दुख लहहीं। ते नरेश बिनु पावक दहहीं।। – विभावना अलंकार: विभावना अलंकार वहाँ होता है जहाँ कारण के अभाव में भी कार्य का होना दिखाया जाए। इस पंक्ति में कहा गया है कि राजा बिना अग्नि (पावक) के ही जला देते हैं (दहहीं), जो कि कारण के बिना कार्य होने का उदाहरण है। इसलिए यह विकल्प सही है।
संक्षेप में, केवल विकल्प 3 में दिया गया अलंकार (श्लेष) पंक्ति के साथ मेल नहीं खाता, इसलिए यह असंगत है। अन्य सभी विकल्पों में अलंकार और उदाहरण सही ढंग से मेल खाते हैं।
प्रश्न 12
अलंकार के संबंध में असंगत युग्म चुनिए :
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उत्तर और व्याख्या
प्रश्न में असंगत युग्म (गलत मिलान) का चयन करना है, जिसका अर्थ है कि हमें वह विकल्प चुनना है जहाँ दिए गए उदाहरण के साथ अलंकार का सही मिलान नहीं किया गया है।
दिए गए विकल्पों का विश्लेषण:
विकल्प 1: "निरखत संतन के सीतल करत नैन। रामचंद्र जु को मुख चंद्र सो लसतु है।" - उपमा अलंकार
- विश्लेषण: इस पंक्ति में भगवान रामचंद्र के मुख (उपमेय) की तुलना चंद्रमा (उपमान) से की गई है, और तुलना के लिए "सो" (जैसा, समान) वाचक शब्द का प्रयोग किया गया है। उपमा अलंकार में उपमेय और उपमान की तुलना किसी समान धर्म के आधार पर की जाती है, और इसमें सा, सी, से, सम, सरिस, इव, जैसा, ज्यों, तुल्य आदि वाचक शब्दों का प्रयोग होता है। यह उदाहरण उपमा अलंकार का सटीक उदाहरण है।
- निष्कर्ष: यह एक संगत युग्म है।
विकल्प 2: "बीती विभावरी जाग री। अम्बर-पनघट में डुबा रही, तारा-घट उषा नागरी।" - रूपक अलंकार
- विश्लेषण: इस पंक्ति में उपमेय पर उपमान का अभेद आरोप किया गया है, अर्थात् उपमेय को उपमान का रूप दे दिया गया है। यहाँ "अम्बर" (आकाश) को "पनघट" (पानी भरने का स्थान), "तारा" (तारे) को "घट" (घड़ा) और "उषा" (सुबह) को "नागरी" (चतुर स्त्री) का रूप दिया गया है। यह रूपक अलंकार की परिभाषा के अनुरूप है।
- निष्कर्ष: यह एक संगत युग्म है।
विकल्प 3: "अजरामरता अयोध्या नगरी किसे प्रिय नहीं लगती।" - यमक अलंकार
- विश्लेषण: यमक अलंकार वहाँ होता है जहाँ एक ही शब्द या शब्द-समूह का एक से अधिक बार प्रयोग हो और प्रत्येक बार उसका अर्थ भिन्न हो। इस पंक्ति में "अजरामरता अयोध्या नगरी किसे प्रिय नहीं लगती" में किसी भी शब्द या शब्द-समूह की आवृत्ति नहीं हुई है जिसका अर्थ प्रत्येक बार भिन्न हो। यह पंक्ति एक सामान्य कथन या प्रश्न है जो किसी अलंकार विशेष का उदाहरण नहीं है, विशेषकर यमक अलंकार का तो बिल्कुल नहीं।
- निष्कर्ष: यह एक असंगत युग्म है, क्योंकि यह यमक अलंकार का उदाहरण नहीं है।
विकल्प 4: "लाखन ओट करो किन घूँघट। चंचल नैन छिपै न छिपाये।।" - विभावना अलंकार
- विश्लेषण: विभावना अलंकार वहाँ होता है जहाँ कारण के अभाव में भी कार्य हो जाए। इस पंक्ति में, नायिका के चंचल नैनों को लाखों घूँघटों (कारण) से भी छिपाया नहीं जा सकता (कार्य का न होना या विपरीत कार्य का होना)। यहाँ घूँघट रूपी कारण के होते हुए भी आँखों के छिपने का कार्य नहीं हो रहा है, बल्कि वे अप्रत्यक्ष रूप से दिख रही हैं। इसे विभावना अलंकार के एक रूप के रूप में देखा जा सकता है जहाँ अपेक्षित कारण के बावजूद अपेक्षित कार्य नहीं होता और एक अप्रत्याशित प्रभाव सामने आता है।
- निष्कर्ष: यह एक संगत युग्म है।
अंतिम निर्णय:
विकल्प 3 में दिया गया उदाहरण "अजरामरता अयोध्या नगरी किसे प्रिय नहीं लगती" यमक अलंकार का उदाहरण नहीं है, क्योंकि इसमें यमक अलंकार की मुख्य विशेषता (शब्द की आवृत्ति और भिन्न अर्थ) अनुपस्थित है। अतः, यह युग्म असंगत है।
इसलिए, सही विकल्प विकल्प 3 है।
प्रश्न 13
“चमचमात चंचल नयन, बिच घूँघट पट झीन।
मानहु सुरसरिता विमल, जल उछलत युग मीन।।”
उक्त दोहा किस अलंकार का उदाहरण है ?
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उत्तर और व्याख्या
प्रश्न 14
असंगत विकल्प चुनिए
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उत्तर और व्याख्या
प्रश्न 15
"नील सरोरुह स्याम, तरुन अरुन वारिज नयन।
करउ सो मम उर धाम, सदा छीर सागर सयन।।"
उक्त पंक्तियों में प्रयुक्त अलंकार है -
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उत्तर और व्याख्या
प्रश्न 16
असंगत कथन चुनिए -
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उत्तर और व्याख्या
प्रश्न 17
नन्हीं-नन्हीं' बूँदन मेहा बरसे।
रेखांकित पद में किस अलंकार का प्रयोग किया गया है ?
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उत्तर और व्याख्या
रेखांकित पद 'नन्हीं-नन्हीं' में 'विशेषण पुनरुक्ति' अलंकार का प्रयोग किया गया है। इस अलंकार में विशेषण शब्द का पुनरावृत्ति होती है, जिससे वाक्य में विशेष प्रभाव उत्पन्न होता है। यहाँ 'नन्हीं' शब्द का दो बार प्रयोग किया गया है, जो विशेषण है और बूँदों की विशेषता को दर्शाता है। इस प्रकार, यह विशेषण पुनरुक्ति का उदाहरण है।
अब अन्य विकल्पों पर विचार करते हैं:
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संज्ञा पुनरुक्ति: इस अलंकार में संज्ञा शब्द की पुनरावृत्ति होती है। चूंकि 'नन्हीं' एक विशेषण है, न कि संज्ञा, इसलिए यह विकल्प सही नहीं है।
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क्रिया पुनरुक्ति: इस अलंकार में क्रिया शब्द की पुनरावृत्ति होती है। यहाँ 'नन्हीं' शब्द क्रिया नहीं है, इसलिए यह विकल्प भी सही नहीं है।
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वीप्सा अलंकार: इस अलंकार में किसी क्रिया या विशेषण की अधिकता या तीव्रता को दर्शाया जाता है। 'नन्हीं-नन्हीं' में केवल विशेषण की पुनरावृत्ति है, न कि उसकी अधिकता या तीव्रता, इसलिए यह विकल्प भी सही नहीं है।
इस प्रकार, 'विशेषण पुनरुक्ति' ही सही उत्तर है क्योंकि यह विशेषण 'नन्हीं' की पुनरावृत्ति को दर्शाता है।
प्रश्न 18
भरतमुनि' के 'नाट्यशास्त्र' में कितने अलंकारों का उल्लेख मिलता है ?
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उत्तर और व्याख्या
भरतमुनि के 'नाट्यशास्त्र' में अलंकारों का उल्लेख एक महत्वपूर्ण विषय है। 'नाट्यशास्त्र' भारतीय नाट्यकला का एक प्राचीन ग्रंथ है, जिसमें नाट्यकला के विभिन्न पहलुओं का विस्तृत वर्णन किया गया है।
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Option 2: 4 अलंकार - यह सही उत्तर है। भरतमुनि के 'नाट्यशास्त्र' में चार प्रमुख अलंकारों का उल्लेख मिलता है। ये अलंकार नाट्यकला में सौंदर्य और अभिव्यक्ति को बढ़ाने के लिए उपयोग किए जाते हैं। ये अलंकार नाट्यकला के विभिन्न तत्वों को सजाने और दर्शकों के मन में गहरी छाप छोड़ने में सहायक होते हैं।
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Option 1: 3 अलंकार - यह विकल्प गलत है क्योंकि 'नाट्यशास्त्र' में तीन नहीं, बल्कि चार अलंकारों का उल्लेख मिलता है। तीन अलंकारों का उल्लेख नाट्यशास्त्र के संदर्भ में अधूरा होगा और यह भरतमुनि के द्वारा वर्णित संपूर्णता को नहीं दर्शाता।
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Option 3: 6 अलंकार - यह विकल्प भी गलत है। 'नाट्यशास्त्र' में छह अलंकारों का उल्लेख नहीं किया गया है। यह संख्या भरतमुनि के द्वारा वर्णित अलंकारों की वास्तविक संख्या से अधिक है और इस प्रकार यह विकल्प सही नहीं है।
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Option 4: 8 अलंकार - यह विकल्प भी गलत है। आठ अलंकारों का उल्लेख 'नाट्यशास्त्र' में नहीं मिलता है। यह संख्या भरतमुनि के द्वारा वर्णित अलंकारों की वास्तविक संख्या से काफी अधिक है और इस प्रकार यह विकल्प भी सही नहीं है।
इस प्रकार, 'नाट्यशास्त्र' में चार अलंकारों का उल्लेख होने के कारण Option 2 सही उत्तर है।
प्रश्न 19
निम्नलिखित में से 'काकु वक्रोक्ति' का उदाहरण नहीं है :
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उत्तर और व्याख्या
'काकु वक्रोक्ति' का अर्थ है वाणी की वह शैली जिसमें शब्दों के अर्थ को बदलकर या छिपाकर कुछ और ही अर्थ प्रकट किया जाता है। यह एक प्रकार की अलंकारिक शैली है जिसमें वक्ता अपने भावों को अप्रत्यक्ष रूप से व्यक्त करता है।
अब हम दिए गए विकल्पों का विश्लेषण करते हैं:
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विकल्प 1: "बल्लभ' विचारि कै सुनु री सयानी अली। ऐसे समय नाथ परदेस तें न आएँगे।।" - इस पंक्ति में वक्ता अपने प्रिय के आने की संभावना को नकारात्मक रूप में प्रस्तुत कर रहा है। यह एक प्रकार की वक्रोक्ति हो सकती है, क्योंकि यहाँ वक्ता अपने भावों को अप्रत्यक्ष रूप से व्यक्त कर रहा है।
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विकल्प 2: "भरतभूप सियराम लखन बन सुनि सानन्द सहौंगो। पुर परिजन अवलोकि मातु सब सुख सन्तोष लहौंगो।।" - इस पंक्ति में वक्ता अपने भावों को सीधे और स्पष्ट रूप से व्यक्त कर रहा है। यहाँ कोई वक्रोक्ति नहीं है, क्योंकि भाव सीधे और स्पष्ट रूप से व्यक्त किए गए हैं।
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विकल्प 3: "हैं री लाल तेरे ? सखी ऐसी निधि पाई कहाँ ? हैं री खगयान ? कह्यो हौं तो नहीं पाले हौं ?" - इस पंक्ति में वक्ता अपने भावों को प्रश्न के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, जो कि एक सामान्य संवाद शैली है। यहाँ कोई वक्रोक्ति नहीं है, क्योंकि भाव सीधे और स्पष्ट रूप से व्यक्त किए गए हैं। इसलिए, यह 'काकु वक्रोक्ति' का उदाहरण नहीं है।
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विकल्प 4: "मैं सुकुमारी नाथ बन जोगू। तुमहिं उचित तप मों कहँ भोगू।।" - इस पंक्ति में वक्ता अपने भावों को अप्रत्यक्ष रूप से व्यक्त कर रहा है, जो कि वक्रोक्ति का एक उदाहरण हो सकता है।
इस प्रकार, विकल्प 3 सही उत्तर है क्योंकि यह 'काकु वक्रोक्ति' का उदाहरण नहीं है। अन्य विकल्पों में वक्रोक्ति के तत्व मौजूद हैं, जबकि विकल्प 3 में भाव सीधे और स्पष्ट रूप से व्यक्त किए गए हैं।
प्रश्न 20
देह की पतली, कमर की है लचीली ।
नीले फूले फूल को सिर पर चढ़ाकर,
कह रही है, जो छुए यह दूँ हृदय का दान उसको ।'
उक्त काव्य-पंक्तियाँ किसका मानवीकरण कर रही हैं ?
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उत्तर और व्याख्या
उक्त काव्य-पंक्तियाँ अलसी का मानवीकरण कर रही हैं, जो कि विकल्प 4 है। आइए इसे विस्तार से समझते हैं:
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अलसी का मानवीकरण:
- "देह की पतली, कमर की है लचीली" - यह पंक्ति अलसी के पौधे की विशेषताओं का वर्णन करती है। अलसी के पौधे की पतली और लचीली शाखाएँ होती हैं, जो हवा में लहराती हैं।
- "नीले फूले फूल को सिर पर चढ़ाकर" - अलसी के फूल नीले रंग के होते हैं, जो पौधे के शीर्ष पर खिलते हैं। यह वर्णन अलसी के फूलों की विशेषता को दर्शाता है।
- "कह रही है, जो छुए यह दूँ हृदय का दान उसको" - यह मानवीकरण का एक उदाहरण है, जहाँ अलसी को एक जीवित प्राणी की तरह प्रस्तुत किया गया है, जो अपनी सुंदरता और आकर्षण के माध्यम से किसी को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।
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अन्य विकल्पों का खंडन:
- बाजरे का (विकल्प 1): बाजरे के पौधे की विशेषताएँ इन पंक्तियों से मेल नहीं खातीं। बाजरे के पौधे में नीले फूल नहीं होते और इसकी शाखाएँ भी पतली और लचीली नहीं होतीं।
- सरसों का (विकल्प 2): सरसों के पौधे के फूल पीले होते हैं, न कि नीले। इसके अलावा, सरसों की शाखाएँ भी अलसी की तरह पतली और लचीली नहीं होतीं।
- रींवा के पेड़ों का (विकल्प 3): रींवा के पेड़ बड़े और मजबूत होते हैं, जिनकी शाखाएँ पतली और लचीली नहीं होतीं। इसके अलावा, रींवा के पेड़ों के फूल नीले नहीं होते।
इस प्रकार, दिए गए काव्य-पंक्तियों का सही मानवीकरण अलसी के पौधे से ही मेल खाता है, जो विकल्प 4 को सही उत्तर बनाता है।