HTET परीक्षा Level 2 TGT
Clear Cutoff के साथ HTET परीक्षा Level 2 TGT की तैयारी
सत्यापित उत्तर और व्याख्याएँ
Clear Cutoff द्वारा
20 में से 20 प्रश्न दिखाए जा रहे हैं
प्रश्न 21
नादान दोस्त' कहानी में केशव की बहन का नाम है :
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उत्तर और व्याख्या
The correct option is 4:
मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित प्रसिद्ध कहानी नादान दोस्त बाल मनोविज्ञान पर आधारित एक मार्मिक रचना है। इस कहानी के मुख्य पात्र दो बच्चे हैं, जिनमें केशव बड़ा भाई है और उसकी छोटी बहन का नाम श्यामा है। कहानी की शुरुआत में ही बताया गया है कि केशव और श्यामा अपने घर की कार्निस पर एक चिड़िया के अंडों को लेकर अत्यंत जिज्ञासु रहते हैं। श्यामा अपने भाई केशव से लगातार सवाल पूछती है और अंडों की रक्षा के लिए उसके द्वारा किए गए प्रयासों में साथ देती है। पूरी कहानी इन दोनों भाई-बहन के निर्दोष प्रेम, कौतूहल और उनकी नादानी के इर्द-गिर्द घूमती है, जहाँ श्यामा का नाम स्पष्ट रूप से केशव की बहन के रूप में उल्लेखित है।
The incorrect option is 1:
अणिमा नाम इस कहानी के किसी भी पात्र का नहीं है, इसलिए यह विकल्प पूरी तरह से गलत है। साहित्य के संदर्भ में अणिमा निराला जी की एक प्रसिद्ध काव्य कृति का नाम है, जिसका प्रेमचंद की इस कहानी से कोई संबंध नहीं है। कहानी के मूल पाठ में केशव की बहन के लिए केवल श्यामा शब्द का ही प्रयोग हुआ है। किसी भी काल्पनिक नाम को मुख्य पात्र के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है। अतः परीक्षार्थियों को पात्रों के नामों को लेकर भ्रमित नहीं होना चाहिए। तथ्यात्मक रूप से यह नाम कहानी के कथानक में कहीं भी मौजूद नहीं है।
The incorrect option is 2:
मीरा नाम का उल्लेख नादान दोस्त कहानी के किसी भी प्रसंग में नहीं मिलता है। मीराबाई हिंदी साहित्य में कृष्ण भक्ति शाखा की एक महान कवयित्री के रूप में जानी जाती हैं, न कि इस कहानी की पात्र के रूप में। केशव की बहन एक छोटी बच्ची है जिसकी जिज्ञासाएं और संवाद श्यामा नाम के साथ दर्ज हैं। परीक्षा की दृष्टि से यह एक भ्रामक विकल्प है जो छात्रों की स्मृति की जाँच के लिए दिया गया है। कहानी के विवरणों के अनुसार, केशव की छोटी बहन का सही और एकमात्र नाम श्यामा ही है। इसलिए मीरा को सही उत्तर मानना तर्कहीन और पाठ के विरुद्ध होगा।
The incorrect option is 3:
अप्सरा नाम भी इस कहानी के संदर्भ में सर्वथा अनुचित और गलत विकल्प है। प्रेमचंद की कहानियों में पात्रों के नाम आमतौर पर साधारण और यथार्थवादी होते हैं, जैसे केशव और श्यामा। अप्सरा शब्द का प्रयोग पौराणिक कथाओं या सौंदर्य के विशेषण के रूप में किया जाता है, जो एक ग्रामीण या मध्यमवर्गीय परिवेश की इस कहानी के लिए फिट नहीं बैठता। कहानी के संवादों में केशव अपनी बहन को श्यामा कहकर ही संबोधित करता है। पाठ के गहन अध्ययन से यह स्पष्ट हो जाता है कि अप्सरा नाम का कोई भी अस्तित्व इस कहानी में नहीं है। अतः यह विकल्प तथ्यात्मक रूप से त्रुटिपूर्ण है।
प्रश्न 22
निम्न में से कौन-सा कथन सत्य नहीं है ?
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उत्तर और व्याख्या
प्रश्न का सही उत्तर विकल्प 4 है। यहाँ प्रत्येक विकल्प का विस्तृत स्पष्टीकरण दिया गया है:
विकल्प 4: संत कवियों में रज्जबदास सर्वाधिक शिक्षित थे। (यह कथन सत्य नहीं है)
- स्पष्टीकरण: रज्जबदास दादूदयाल के प्रमुख शिष्य थे और वे निश्चित रूप से एक विद्वान संत कवि थे। उन्होंने दादूदयाल की वाणियों का संकलन 'अंगवधू' नाम से किया और 'सर्वांगी' जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की। उनकी शिक्षा और पांडित्य प्रशंसनीय था।
- हालांकि, संत कवियों में 'सर्वाधिक शिक्षित' होने का दावा सही नहीं है। दादू पंथ के ही एक अन्य संत कवि सुंदरदास को संत कवियों में सबसे अधिक शिक्षित और शास्त्रीय ज्ञान से संपन्न माना जाता है। सुंदरदास ने संस्कृत, वेदांत, और अन्य भारतीय दर्शनों का गहन अध्ययन किया था। वे अपनी विद्वत्ता और परिष्कृत काव्य शैली के लिए प्रसिद्ध थे। इसलिए, यह कहना कि रज्जबदास सभी संत कवियों में सर्वाधिक शिक्षित थे, तथ्यात्मक रूप से गलत है।
अन्य विकल्पों का स्पष्टीकरण (जो सत्य कथन हैं):
विकल्प 1: कबीर की रचनाओं का सबसे प्रामाणिक संकलन 'बीजक' है। (यह कथन सत्य है)
- स्पष्टीकरण: कबीरदास की रचनाओं का सबसे प्रामाणिक और व्यापक रूप से स्वीकृत संकलन 'बीजक' ही है। इसका संकलन उनके शिष्य धर्मदास ने किया था। 'बीजक' में साखी, सबद और रमैनी जैसे कबीर के प्रमुख पद और दोहे संकलित हैं, जो उनके दार्शनिक विचारों और सामाजिक संदेशों को प्रस्तुत करते हैं।
विकल्प 2: गुरु नानक का 'नसीयतनामा' ग्रंथ खड़ी बोली में रचित है। (यह कथन सत्य है)
- स्पष्टीकरण: गुरु नानक देव द्वारा रचित माने जाने वाले ग्रंथ 'नसीयतनामा' (जिसे 'प्राण-संकली' भी कहा जाता है) की भाषा में खड़ी बोली के प्रारंभिक रूप के लक्षण मिलते हैं। इसमें पंजाबी और अन्य क्षेत्रीय बोलियों का मिश्रण है, लेकिन इसकी मूल प्रवृत्ति खड़ी बोली की ओर झुकी हुई है। यह उस समय की उत्तर भारत की सामान्य भाषा का प्रतिनिधित्व करता है।
विकल्प 3: निर्गुण भक्त कवि होते हुए भी दादूदयाल ने ईश्वर के सगुण स्वरूप को मान्यता दी है। (यह कथन सत्य है)
- स्पष्टीकरण: दादूदयाल मुख्य रूप से निर्गुण भक्ति धारा के संत कवि थे, जिन्होंने निराकार ब्रह्म की उपासना पर बल दिया। हालांकि, उनकी भक्ति और दर्शन में एक समावेशी दृष्टिकोण था। उन्होंने प्रेम और भक्ति को महत्व दिया, जो सगुण और निर्गुण दोनों धाराओं में समान रूप से पाए जाते हैं। दादूदयाल ने सगुण उपासना का खंडन नहीं किया, बल्कि उसे निर्गुण तक पहुँचने का एक मार्ग या एक प्रारंभिक सोपान माना। उनके काव्य में कई स्थानों पर सगुण प्रतीकों और अवधारणाओं का प्रयोग मिलता है, जो उनके सगुण स्वरूप के प्रति एक प्रकार की मान्यता या स्वीकार्यता को दर्शाता है। वे सगुण को निर्गुण से भिन्न नहीं मानते थे, बल्कि उसे उसी परम सत्ता का एक रूप मानते थे।
उपरोक्त विश्लेषण के आधार पर, विकल्प 4 ही एकमात्र कथन है जो सत्य नहीं है।
प्रश्न 23
किस विकल्प में मुहावरे का अर्थ सही नहीं है ?
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उत्तर और व्याख्या
दिए गए प्रश्न के अनुसार, सही विकल्प का चयन करना है जिसमें मुहावरे का अर्थ सही नहीं दिया गया है।
सही उत्तर: विकल्प 3
विकल्प 3 की विस्तृत व्याख्या (यह सही क्यों है):
मुहावरा है "डेढ़ चावल की खिचड़ी पकाना"।
इस मुहावरे का सही अर्थ होता है: "अपनी अलग राय रखना", "बहुमत से अलग होकर काम करना", या "अपनी मनमानी करना"। यह किसी के नियंत्रण में न होकर स्वतंत्र रूप से कार्य करने या सोचने का भाव व्यक्त करता है।
विकल्प में दिया गया अर्थ है: "किसी के वश में होना"।
यह अर्थ मुहावरे के वास्तविक अर्थ के बिल्कुल विपरीत है। "किसी के वश में होना" का अर्थ है किसी के नियंत्रण में रहना, जबकि "डेढ़ चावल की खिचड़ी पकाना" का अर्थ है स्वतंत्र रूप से कार्य करना या अपनी अलग राय रखना।
चूँकि दिया गया अर्थ मुहावरे के वास्तविक अर्थ से मेल नहीं खाता, इसलिए यह विकल्प सही है क्योंकि इसमें मुहावरे का अर्थ गलत दिया गया है।
अन्य विकल्पों की व्याख्या (ये गलत क्यों हैं):
-
विकल्प 1: कान खड़े होना – सतर्क होना
- "कान खड़े होना" मुहावरे का अर्थ वास्तव में "सतर्क होना" या "सावधान होना" ही होता है। जब कोई व्यक्ति किसी खतरे या असामान्य स्थिति को भांप लेता है, तो उसके कान खड़े हो जाते हैं।
- चूँकि यहाँ मुहावरे का अर्थ सही दिया गया है, इसलिए यह विकल्प प्रश्न के अनुसार गलत है (क्योंकि प्रश्न गलत अर्थ वाले विकल्प को पूछ रहा है)।
-
विकल्प 2: अंधे के हाथ बटेर लगना – बिना प्रयास के कोई चीज पा लेना
- "अंधे के हाथ बटेर लगना" मुहावरे का अर्थ होता है "अचानक या भाग्यवश कोई मूल्यवान वस्तु मिल जाना", या "बिना किसी योग्यता या प्रयास के कोई बड़ी सफलता मिल जाना"।
- विकल्प में दिया गया अर्थ "बिना प्रयास के कोई चीज पा लेना" इस मुहावरे के अर्थ के बिल्कुल अनुरूप है।
- चूँकि यहाँ मुहावरे का अर्थ सही दिया गया है, इसलिए यह विकल्प प्रश्न के अनुसार गलत है।
-
विकल्प 4: आठवीं अनुसूची में नवीन भाषाओं को शामिल करने से
- यह कोई मुहावरा नहीं है, बल्कि भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची से संबंधित एक तथ्यात्मक वाक्यांश है। इसका मुहावरे और उसके अर्थ से कोई संबंध नहीं है।
- इसलिए, यह विकल्प प्रश्न के संदर्भ में अप्रासंगिक है।
अतः, दिए गए विकल्पों में से केवल विकल्प 3 में मुहावरे का अर्थ सही नहीं दिया गया है।
प्रश्न 24
किस विकल्प के सभी शब्द वार्तनिक दृष्टि से शुद्ध हैं ?
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उत्तर और व्याख्या
सही उत्तर विकल्प 2 है:
इस विकल्प में दिए गए दोनों शब्द 'शूर्पणखा' और 'ज्योत्स्ना' वार्तनिक रूप से पूरी तरह शुद्ध हैं। 'शूर्पणखा' संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ 'सूप के समान नाखूनों वाली' होता है, जिसमें 'ण' का प्रयोग व्याकरण के नियमों के अनुसार सही है। इसी प्रकार 'ज्योत्स्ना' शब्द में 'त' और 'स' दोनों वर्ण आधे प्रयुक्त होते हैं, जो प्रकाश या चाँदनी का बोध कराते हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में ये शब्द अक्सर पूछे जाते हैं क्योंकि इनके वर्णों की बनावट में सामान्यतः अशुद्धि की संभावना अधिक रहती है।
विकल्प 1 अशुद्ध है:
इस विकल्प में 'गत्यावरोध' तो शुद्ध है (गति + अवरोध), लेकिन 'आशिर्वाद' शब्द अशुद्ध लिखा गया है। हिंदी व्याकरण के अनुसार, आशीर्वाद की सही वर्तनी 'आशीर्वाद' होती है। यहाँ 'र' (रेफ) का प्रयोग 'व' के ऊपर होना चाहिए क्योंकि उसका उच्चारण 'शी' के बाद हो रहा है। विद्यार्थी अक्सर 'र' की मात्रा को 'शि' पर लगा देते हैं, जो कि गलत है। अतः एक शब्द के अशुद्ध होने से यह विकल्प गलत हो जाता है।
विकल्प 3 अशुद्ध है:
यहाँ 'दवाईयाँ' और 'दुरावस्था' दोनों ही शब्द व्याकरणिक रूप से त्रुटिपूर्ण हैं। नियम के अनुसार, जब 'ई' अंत वाले शब्दों का बहुवचन बनाया जाता है, तो बड़ी 'ई' छोटी 'इ' में बदल जाती है, इसलिए शुद्ध शब्द 'दवाइयाँ' होगा। वहीं, 'दुरावस्था' शब्द में 'दुर' उपसर्ग के साथ 'अवस्था' जुड़ने पर 'दुरवस्था' बनता है न कि दुरावस्था। यहाँ 'र' में आ की मात्रा का प्रयोग अनावश्यक और अशुद्ध है। इन बारीक नियमों की अनदेखी के कारण छात्र यहाँ गलती कर बैठते हैं।
विकल्प 4 अशुद्ध है:
इस विकल्प में 'मनोचिकित्सा' तो सही है, परंतु 'रचनावलि' शब्द अशुद्ध है। 'रचना' और 'अवलि' (पंक्ति) के योग से दीर्घ संधि होकर शुद्ध शब्द 'रचनावली' बनता है, जिसमें अंत में बड़ी 'ई' की मात्रा आती है। छोटी 'इ' का प्रयोग इसे वर्तनी की दृष्टि से अमान्य बना देता है। चूँकि प्रश्न में सभी शब्दों के शुद्ध होने की शर्त है, इसलिए 'रचनावलि' की अशुद्धि के कारण यह विकल्प सही नहीं माना जा सकता। हमेशा याद रखें कि शब्दों के संधि विच्छेद से उनकी सही वर्तनी पहचानी जा सकती है।
प्रश्न 25
कहानीकार तथा कहानी के संबंध में असंगत
युग्म चुनिए :
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उत्तर और व्याख्या
सही विकल्प 3 है:
विकल्प 3 'भगवतीचरण वर्मा - मिठाईवाला' असंगत है क्योंकि 'मिठाईवाला' कहानी के वास्तविक लेखक भगवती प्रसाद वाजपेयी हैं, न कि भगवतीचरण वर्मा। भगवती प्रसाद वाजपेयी हिंदी के एक प्रतिष्ठित कहानीकार थे और यह उनकी सबसे लोकप्रिय कहानियों में से एक है, जो मानवीय संवेदनाओं और एक पिता के अपने बच्चों के प्रति प्रेम को मार्मिक ढंग से चित्रित करती है। भगवतीचरण वर्मा मुख्य रूप से 'चित्रलेखा' जैसे उपन्यासों के लिए जाने जाते हैं। नाम में समानता के कारण अक्सर प्रतियोगी परीक्षाओं में छात्रों को भ्रमित करने के लिए ऐसे विकल्प दिए जाते हैं।
विकल्प 1 'चंद्रधर शर्मा गुलेरी - बुद्धू का काँटा' एक सुमेलित युग्म है। गुलेरी जी ने अपने पूरे जीवनकाल में केवल तीन कहानियाँ लिखीं—'सुखमय जीवन', 'बुद्धू का काँटा' और कालजयी रचना 'उसने कहा था'। यह कहानी 1911 में प्रकाशित हुई थी और गुलेरी जी की विशिष्ट भाषा शैली को दर्शाती है। चूँकि यह युग्म ऐतिहासिक रूप से सही है, इसलिए यह प्रश्न के अनुसार असंगत नहीं हो सकता।
विकल्प 2 'जैनेन्द्र कुमार - नीलम देश की राजकन्या' भी पूर्णतः सही है। जैनेन्द्र कुमार हिंदी साहित्य में मनोवैज्ञानिक कहानी धारा के प्रवर्तक माने जाते हैं। 'नीलम देश की राजकन्या' उनकी एक प्रसिद्ध प्रतीकात्मक और मनोवैज्ञानिक कहानी है। इसमें व्यक्ति के मन की परतों और उसकी इच्छाओं का दार्शनिक चित्रण मिलता है। यह उनके महत्वपूर्ण कहानी संग्रह का शीर्षक भी है, अतः यह सुमेलित है।
विकल्प 4 'विश्वंभरनाथ शर्मा कौशिक - रक्षाबंधन' एक सुमेलित और सही युग्म है। कौशिक जी प्रेमचंद युग के महत्वपूर्ण कहानीकार थे जिन्होंने पारिवारिक और सामाजिक समस्याओं पर आधारित कहानियाँ लिखीं। 'रक्षाबंधन' उनकी पहली और अत्यंत प्रसिद्ध कहानी है जो 1913 में 'सरस्वती' पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। यह कहानी भाई-बहन के पवित्र प्रेम और कर्तव्य की भावना पर आधारित है। चूँकि लेखक और कहानी का संबंध सही है, यह विकल्प उत्तर नहीं है।
प्रश्न 26
लोकगीत' अध्याय में लेखक ने भोजपुरी के
किस लोकगीत का उल्लेख किया है ?
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उत्तर और व्याख्या
सही उत्तर विकल्प 2 है:
भगवतशरण उपाध्याय द्वारा रचित 'लोकगीत' अध्याय में लेखक ने भोजपुरी क्षेत्र के अत्यंत लोकप्रिय लोकगीत 'बिदेसिया' का विशेष उल्लेख किया है। बिदेसिया केवल एक गीत नहीं, बल्कि एक नाट्य शैली है जिसके जनक भिखारी ठाकुर माने जाते हैं। इन गीतों में वियोग और करुणा का मार्मिक चित्रण होता है, जिसमें एक पत्नी अपने परदेस गए पति (बिदेसी) के प्रति अपनी विरह वेदना व्यक्त करती है। लेखक के अनुसार, भोजपुरी में बिदेसिया का प्रचार इतना अधिक है कि गाँवों में इनके गायकों के समूह घूम-घूमकर लोगों का मनोरंजन करते हैं और श्रोताओं के मन में करुणा का संचार करते हैं।
विकल्प 1 गलत है:
परदेशिया शब्द का अर्थ भी परदेस जाने वाले व्यक्ति से होता है, लेकिन हिंदी साहित्य या इस विशिष्ट अध्याय में इसे किसी स्वतंत्र लोकगीत विधा के रूप में मान्यता नहीं दी गई है। लेखक ने भोजपुरी क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान के रूप में बिदेसिया शब्द का ही प्रयोग किया है, न कि परदेशिया का। अक्सर लोग बिदेसिया और परदेशिया में भ्रमित हो जाते हैं, परंतु शास्त्रीय और साहित्यिक दृष्टि से भिखारी ठाकुर की परंपरा बिदेसिया ही कहलाती है। यह विकल्प अध्याय के संदर्भ में तथ्यात्मक रूप से सटीक नहीं बैठता है।
विकल्प 3 गलत है:
रसिया मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के ब्रज क्षेत्र (मथुरा, वृंदावन) का प्रमुख लोकगीत है, जो भगवान श्रीकृष्ण और राधा की लीलाओं पर आधारित होता है। अध्याय में लेखक ने स्पष्ट किया है कि रसिया ब्रज की बोलियों में गाया जाता है और इसका संबंध होली के उत्सव से गहरा है। भोजपुरी क्षेत्र से इसका सीधा संबंध न होने के कारण लेखक ने इसे भोजपुरी लोकगीत के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत नहीं किया है। अतः, क्षेत्रीय भिन्नता के कारण यह विकल्प इस प्रश्न का उत्तर नहीं हो सकता।
विकल्प 4 गलत है:
जंगली शब्द किसी मान्य लोकगीत विधा या अध्याय में वर्णित किसी विशेष गीत का नाम नहीं है। यह शब्द सामान्यतः वनों या आदिवासियों से संबंधित हो सकता है, परंतु भोजपुरी लोक साहित्य में इस नाम का कोई प्रसिद्ध गायन प्रचलित नहीं है। लेखक ने लोकगीतों के वर्गीकरण में चैता, कजरी, बारहमासा और बिदेसिया जैसे नामों का उल्लेख किया है, जिनमें 'जंगली' जैसा कोई शब्द शामिल नहीं है। यह विकल्प केवल परीक्षार्थियों को भ्रमित करने के लिए दिया गया है और इसका कोई साहित्यिक आधार नहीं है।
प्रश्न 27
एक तिनका' कविता किस कवि द्वारा रचित
है ?
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उत्तर और व्याख्या
सही विकल्प 3 है:
'एक तिनका' कविता प्रसिद्ध कवि अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' द्वारा रचित है। यह कविता कक्षा 7 के पाठ्यक्रम में संकलित है और मनुष्य के अहंकार पर गहरा प्रहार करती है। इस कविता के माध्यम से कवि ने यह संदेश दिया है कि मनुष्य को कभी भी अपने ऊपर घमंड नहीं करना चाहिए, क्योंकि एक छोटा सा तिनका भी उसकी अकड़ ढीली करने के लिए काफी है। कविता में वर्णन है कि कैसे कवि अपनी छत की मुंडेर पर गर्व से भरा खड़ा था, तभी उसकी आँख में एक तिनका गिर जाता है। वह तिनका उसे इतनी पीड़ा देता है कि उसका सारा अहंकार समाप्त हो जाता है और उसे अपनी तुच्छता का आभास होता है। यह रचना 'हरिऔध' जी की सरल भाषा और शिक्षाप्रद शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है।
विकल्प 1 गलत है:
शिवमंगल सिंह 'सुमन' हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध प्रगतिवादी कवि हैं, लेकिन 'एक तिनका' उनकी रचना नहीं है। सुमन जी की कविताओं में अक्सर सामूहिक चेतना, संघर्ष और मिट्टी की महक देखने को मिलती है। उनकी प्रसिद्ध कृतियों में 'मिट्टी की बारात' और 'हिल्लोल' शामिल हैं। 'एक तिनका' की सरल और व्यक्तिपरक नैतिक शैली सुमन जी की ओजस्वी और क्रांतिकारी कविताओं से काफी भिन्न है। अतः यह विकल्प तथ्यात्मक रूप से गलत है क्योंकि यह कृति उनकी साहित्यिक सूची में नहीं आती।
विकल्प 2 गलत है:
मैथिलीशरण गुप्त को 'राष्ट्रकवि' के रूप में जाना जाता है और उनकी रचनाएँ मुख्य रूप से राष्ट्रीय गौरव और ऐतिहासिक गौरवगाथाओं पर आधारित होती हैं। यद्यपि उन्होंने बहुत सी नीतिपरक रचनाएँ की हैं, किंतु 'एक तिनका' उनके द्वारा नहीं लिखी गई है। गुप्त जी की भाषा शैली अक्सर प्रौढ़ और संस्कृतनिष्ठ होती है, जबकि यह कविता अत्यंत सरल खड़ी बोली में है। उनकी प्रमुख कृतियों में 'साकेत' और 'भारत-भारती' का नाम अग्रगण्य है। इस कविता का विषय और शिल्प गुप्त जी की प्रसिद्ध काव्यधारा से मेल नहीं खाता है।
विकल्प 4 गलत है:
रामनरेश त्रिपाठी हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण स्वच्छंदतावादी कवि हैं, जिन्होंने देशप्रेम और लोकगीतों पर विशेष कार्य किया है। त्रिपाठी जी ने 'पथिक', 'मिलन' और 'स्वप्न' जैसे प्रसिद्ध खंडकाव्य लिखे हैं। हालाँकि उन्होंने बाल साहित्य और सरल कविताएँ भी लिखी हैं, लेकिन 'एक तिनका' के वास्तविक रचयिता वे नहीं हैं। उनकी शैली में प्रकृति चित्रण और राष्ट्रीय भावना की प्रधानता रहती है। यह कविता पूर्णतः 'हरिऔध' जी की अपनी विशिष्ट नीतिपरक दृष्टि को व्यक्त करती है। इसलिए, रामनरेश त्रिपाठी को इसका लेखक मानना अनुचित होगा।
प्रश्न 28
प्रदत्त कथनों में से कौन-सा तुलसीदास के संबंध में असंगत है ?
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उत्तर और व्याख्या
प्रश्न में पूछा गया है कि प्रदत्त कथनों में से कौन-सा तुलसीदास के संबंध में असंगत है। असंगत का अर्थ है जो कथन सही नहीं है या जिसका attribution (किसने कहा) गलत है।
आइए प्रत्येक विकल्प का विश्लेषण करें:
विकल्प 1: रामस्वरूप चतुर्वेदी तुलसीदास ही राम साहित्य के सम्राट हैं।
- यह कथन तुलसीदास के महत्व को दर्शाता है कि वे राम साहित्य के सम्राट हैं, जो कि एक सर्वमान्य सत्य है।
- परंतु, यह विशिष्ट कथन "तुलसीदास ही राम साहित्य के सम्राट हैं" सीधे तौर पर रामस्वरूप चतुर्वेदी द्वारा कहा गया एक प्रसिद्ध उद्धरण नहीं है। रामस्वरूप चतुर्वेदी ने तुलसीदास को "हिन्दी के जातीय कवि" कहा है, जो उनका एक प्रसिद्ध कथन है। "राम साहित्य के सम्राट" जैसी उपाधि तुलसीदास को कई आलोचकों द्वारा दी गई है या यह एक सामान्य स्वीकारोक्ति है, लेकिन इसे सीधे रामस्वरूप चतुर्वेदी के विशिष्ट कथन के रूप में उद्धृत करना असंगत है। इसलिए, इस कथन का attribution (किसने कहा) गलत होने के कारण यह विकल्प असंगत है।
विकल्प 2: हजारी प्रसाद- तुलसीदास समन्वयकारी थे, उनका सारा काव्य द्विवेदी समन्वय की विराट् चेष्टा है।
- यह कथन आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का एक अत्यंत प्रसिद्ध और सटीक मूल्यांकन है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने तुलसीदास को भारतीय समाज और संस्कृति के विभिन्न विरोधी तत्वों का समन्वय करने वाला कवि माना है। उनका यह विचार सर्वमान्य है और सही रूप से हजारी प्रसाद द्विवेदी से संबंधित है। अतः यह कथन संगत है।
विकल्प 3: डॉ० बच्चन- कबीर का भक्ति आंदोलन विद्रोहमूलक है तो गोस्वामी का प्रतिरोधात्मक।
- डॉ. बच्चन सिंह ने अपने आलोचनात्मक लेखन में कबीर और तुलसीदास के भक्ति आंदोलन की प्रकृति का विश्लेषण किया है। यह कथन डॉ. बच्चन सिंह का एक प्रसिद्ध और सही विश्लेषण है, जिसमें वे कबीर के आंदोलन को विद्रोही और तुलसीदास के आंदोलन को प्रतिरोधात्मक बताते हैं। अतः यह कथन संगत है।
विकल्प 4: आ० रामचंद्र- गोस्वामी के प्रादुर्भाव को हिन्दी काव्य के क्षेत्र में एक चमत्कार समझना चाहिए।
- आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने तुलसीदास को हिंदी साहित्य का सर्वश्रेष्ठ कवि माना है और उनके आगमन को एक असाधारण घटना के रूप में देखा है। यह कथन आचार्य रामचंद्र शुक्ल के तुलसीदास के प्रति अगाध श्रद्धा और उनके काव्य के महत्व को दर्शाता है। यह कथन आचार्य रामचंद्र शुक्ल के विचारों के अनुरूप है और सही रूप से उनसे संबंधित है। अतः यह कथन संगत है।
उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि विकल्प 1 में दिया गया कथन, भले ही तुलसीदास के महत्व को दर्शाता हो, लेकिन उसका attribution (रामस्वरूप चतुर्वेदी द्वारा कहा गया) सही नहीं है। अन्य सभी विकल्प सही रूप से संबंधित आलोचकों के कथन हैं।
अतः, सही उत्तर विकल्प 1 है क्योंकि यह तुलसीदास के संबंध में असंगत कथन है (विशेष रूप से इसके attribution के संदर्भ में)।
प्रश्न 29
महाकवि जायसी कृत 'पद्मावत' के संबंध में असत्य कथन है :
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उत्तर और व्याख्या
महाकवि जायसी कृत 'पद्मावत' के संबंध में असत्य कथन विकल्प 4 है। आइए प्रत्येक विकल्प की विस्तृत व्याख्या करते हैं:
विकल्प 4: डॉ० रामकुमार वर्मा - वर्ण विचार एवं भाव-व्यंजना की दृष्टि से पद्मावत एक अत्यंत उच्च कोटि का काव्य है। (यह असत्य कथन है)
- स्पष्टीकरण: डॉ. रामकुमार वर्मा ने सूफी काव्य परंपरा और 'पद्मावत' के महत्व को स्वीकार किया है, लेकिन यह विशिष्ट कथन कि "वर्ण विचार एवं भाव-व्यंजना की दृष्टि से पद्मावत एक अत्यंत उच्च कोटि का काव्य है" उनके द्वारा दिया गया एक प्रसिद्ध या विशिष्ट कथन नहीं है। डॉ. वर्मा का ध्यान सूफी काव्य की रहस्यवादी, दार्शनिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर अधिक केंद्रित रहा है। जबकि 'पद्मावत' की वर्ण-विचार और भाव-व्यंजना उच्च कोटि की है, इस विशेष कथन का श्रेय डॉ. रामकुमार वर्मा को देना सही नहीं है। इसलिए, यह कथन असत्य है क्योंकि यह डॉ. रामकुमार वर्मा के नाम से गलत रूप से उद्धृत किया गया है।
अन्य विकल्प क्यों सही हैं (अर्थात, वे सत्य कथन हैं):
विकल्प 1: आ० रामचंद्र शुक्ल - पद्मावत हिन्दी का प्रथम बड़ा महाकाव्य है।
- स्पष्टीकरण: आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' में स्पष्ट रूप से 'पद्मावत' को हिन्दी का प्रथम बड़ा महाकाव्य माना है। यह हिन्दी साहित्य आलोचना का एक सर्वमान्य और मौलिक कथन है।
विकल्प 2: डॉ० नगेन्द्र - पद्मावत प्रेमाख्यान परंपरा का प्रौढ़तम काव्य है।
- स्पष्टीकरण: डॉ. नगेन्द्र ने 'पद्मावत' को प्रेमाख्यान काव्य परंपरा का सबसे परिपक्व (प्रौढ़तम) और उत्कृष्ट काव्य माना है। यह उनकी आलोचनात्मक दृष्टि का एक महत्वपूर्ण बिंदु है और यह कथन सही है।
विकल्प 3: डॉ० बच्चन सिंह - पद्मावत समूची हिन्दी काव्य परंपरा का दुर्लभ रत्न है।
- स्पष्टीकरण: डॉ. बच्चन सिंह ने 'पद्मावत' की महत्ता को स्वीकार करते हुए उसे समूची हिन्दी काव्य परंपरा का एक "दुर्लभ रत्न" कहा है। यह कथन उनकी आलोचनात्मक शैली और 'पद्मावत' के प्रति उनके उच्च मूल्यांकन को दर्शाता है और यह सही है।
अतः, दिए गए विकल्पों में से, डॉ. रामकुमार वर्मा के नाम से उद्धृत कथन असत्य है।
प्रश्न 30
स्वर्ण श्रृंखला और लाल किरण' में रेखांकित शब्द हैं :
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
सही विकल्प 1 है:
दिए गए वाक्यांश 'स्वर्ण श्रृंखला' और 'लाल किरण' में 'स्वर्ण' (सोने जैसी) और 'लाल' शब्द क्रमशः 'श्रृंखला' और 'किरण' की विशेषता बता रहे हैं। व्याकरण की दृष्टि से, जो शब्द किसी संज्ञा या सर्वनाम के गुण, दोष, रंग, रूप, आकार या दशा का बोध कराते हैं, उन्हें गुणवाचक विशेषण कहा जाता है। यहाँ 'स्वर्ण' श्रृंखला के रंग और मूल्यवान होने के गुण को दर्शाता है, जबकि 'लाल' शब्द किरण के रंग रूपी गुण को स्पष्ट कर रहा है। अतः ये दोनों शब्द संज्ञा की आंतरिक या बाह्य विशेषता प्रकट करने के कारण गुणवाचक विशेषण की श्रेणी में आते हैं।
गलत विकल्प 2 है:
संख्यावाचक विशेषण उन शब्दों को कहते हैं जो संज्ञा या सर्वनाम की संख्या का बोध कराते हैं, जैसे- चार, पाँच, सातवाँ या दुगुना। 'स्वर्ण' और 'लाल' शब्दों से किसी भी प्रकार की गिनती या क्रम का पता नहीं चलता है। ये शब्द यह नहीं बताते कि श्रृंखलाएँ कितनी हैं या किरणें कितनी संख्या में हैं। चूँकि यहाँ गणना संबंधी कोई भी सूचना प्राप्त नहीं हो रही है, इसलिए इसे संख्यावाचक विशेषण नहीं माना जा सकता। यह विकल्प केवल तभी सही होता जब वाक्य में 'दो श्रृंखला' या 'तीन किरण' जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया होता।
गलत विकल्प 3 है:
परिमाणवाचक विशेषण का प्रयोग वस्तुओं की नाप, तौल या मात्रा बताने के लिए किया जाता है, जैसे- दो लीटर दूध या थोड़ा पानी। 'स्वर्ण' और 'लाल' शब्द किसी वस्तु की भौतिक मात्रा या वजन को नहीं माप रहे हैं। ये केवल संज्ञा के रंग और प्रकृति के बारे में जानकारी दे रहे हैं, न कि उनके परिमाण के बारे में। चूँकि स्वर्ण और लाल से किसी वजन या लंबाई-चौड़ाई का बोध नहीं होता, इसलिए यह परिमाणवाचक विशेषण की परिभाषा पर खरा नहीं उतरता। अतः इस विकल्प को सही उत्तर के रूप में नहीं चुना जा सकता।
गलत विकल्प 4 है:
सार्वनामिक विशेषण वे सर्वनाम शब्द होते हैं जो संज्ञा से पहले आकर विशेषण की तरह कार्य करते हैं, जैसे- 'वह' घर या 'यह' लड़का। यहाँ 'स्वर्ण' और 'लाल' मूलतः विशेषण शब्द हैं, न कि सर्वनाम जो संज्ञा की ओर संकेत कर रहे हों। ये शब्द स्वतंत्र रूप से विशेषण का कार्य कर रहे हैं और किसी संकेतवाचक सर्वनाम की भूमिका में नहीं हैं। सार्वनामिक विशेषण होने के लिए शब्द का सर्वनाम होना अनिवार्य शर्त है, जो यहाँ पूरी नहीं होती। इसलिए, इसे सार्वनामिक विशेषण कहना तर्कसंगत नहीं होगा।
प्रश्न 31
विभिन्नताओं को दृष्टिगत रखते हुए शिक्षण कार्य करवाना चाहिए। उक्त कथन किस सिद्धान्त को परिभाषित करता है ?
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उत्तर और व्याख्या
प्रश्न: विभिन्नताओं को दृष्टिगत रखते हुए शिक्षण कार्य करवाना चाहिए। उक्त कथन किस सिद्धान्त को परिभाषित करता है ?
सही उत्तर: विकल्प 2
विस्तृत व्याख्या:
विकल्प 2: वैयक्तिक भिन्नता का सिद्धान्त (Principle of Individual Differences) - यह सही विकल्प क्यों है?
प्रश्न में कहा गया है कि "विभिन्नताओं को दृष्टिगत रखते हुए शिक्षण कार्य करवाना चाहिए।" यह कथन सीधे तौर पर 'वैयक्तिक भिन्नता के सिद्धान्त' को परिभाषित करता है। वैयक्तिक भिन्नता का सिद्धान्त यह बताता है कि प्रत्येक छात्र अपनी क्षमताओं, रुचियों, सीखने की गति, पृष्ठभूमि, बुद्धि और व्यक्तित्व में एक-दूसरे से भिन्न होता है। एक प्रभावी शिक्षक को इन व्यक्तिगत भिन्नताओं को पहचानना चाहिए और अपनी शिक्षण विधियों, सामग्री और मूल्यांकन को इस तरह से अनुकूलित करना चाहिए ताकि प्रत्येक छात्र की विशिष्ट आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके। "विभिन्नताओं को दृष्टिगत रखते हुए" वाक्यांश स्पष्ट रूप से इन व्यक्तिगत भिन्नताओं को ध्यान में रखने की आवश्यकता पर बल देता है, जो इस सिद्धान्त का मूल है। इसलिए, शिक्षण को छात्रों की व्यक्तिगत भिन्नताओं के अनुरूप ढालना ही इस सिद्धान्त का मुख्य उद्देश्य है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
-
विकल्प 1: उद्देश्य एवं चयन विभाजन का सिद्धान्त (Principle of Objective and Selection Division)
यह सिद्धान्त शिक्षण के उद्देश्यों को स्पष्ट रूप से निर्धारित करने और उन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए उपयुक्त शिक्षण सामग्री, विधियों और अनुभवों का चयन करने से संबंधित है। यह बताता है कि शिक्षण लक्ष्य-उन्मुख होना चाहिए। हालांकि यह शिक्षण का एक महत्वपूर्ण पहलू है, यह सीधे तौर पर छात्रों के बीच की "विभिन्नताओं" को ध्यान में रखने की बात नहीं करता है, बल्कि शिक्षण के लक्ष्यों और सामग्री के चुनाव पर केंद्रित है। -
विकल्प 3: अभ्यास का सिद्धान्त (Principle of Practice)
अभ्यास का सिद्धान्त यह बताता है कि सीखने को सुदृढ़ करने और कौशल विकसित करने के लिए दोहराव और अभ्यास आवश्यक है। यह अधिगम को स्थायी बनाने में मदद करता है। यह सिद्धान्त सीखने की प्रक्रिया में अभ्यास के महत्व पर जोर देता है, लेकिन यह छात्रों की व्यक्तिगत "विभिन्नताओं" को ध्यान में रखकर शिक्षण करवाने की बात नहीं करता है। -
विकल्प 4: स्वाभाविकता का सिद्धान्त (Principle of Naturalness/Spontaneity)
स्वाभाविकता का सिद्धान्त यह सुझाव देता है कि शिक्षण को बच्चे के प्राकृतिक विकास, रुचियों और सहज प्रवृत्तियों के अनुरूप होना चाहिए। यह सीखने को स्वाभाविक और आनंददायक बनाने पर जोर देता है। जबकि यह अप्रत्यक्ष रूप से बच्चे की प्रकृति से संबंधित है, यह विशेष रूप से छात्रों के बीच मौजूद "विभिन्नताओं" (जैसे सीखने की गति, क्षमताएं, आदि) को संबोधित करने और उनके अनुसार शिक्षण को अनुकूलित करने पर केंद्रित नहीं है, जैसा कि प्रश्न में कहा गया है।
इसलिए, प्रश्न में दिया गया कथन स्पष्ट रूप से 'वैयक्तिक भिन्नता के सिद्धान्त' को परिभाषित करता है।
प्रश्न 32
अष्टछाप कवियों के संबंध में कौन-सा कथन असंगत है ?
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उत्तर और व्याख्या
सही विकल्प 1 है:
अष्टछाप के कवियों के संबंध में विकल्प 1 असंगत है क्योंकि कुंभनदास अष्टछाप के सबसे 'वरिष्ठ' कवि थे, न कि कनिष्ठ। अष्टछाप की स्थापना 1565 ई. में गोस्वामी विट्ठलनाथ द्वारा की गई थी, जिसमें आठ कृष्णभक्त कवि शामिल थे। इनमें उम्र और अनुभव के आधार पर कुंभनदास को सबसे बड़ा स्थान प्राप्त है, जबकि नंददास को सबसे छोटा या 'कनिष्ठ' कवि माना जाता है। कुंभनदास ने वल्लभाचार्य से दीक्षा ली थी और वे अपनी विरक्ति और भक्ति के लिए प्रसिद्ध थे। अतः यह कथन कि वे कनिष्ठ थे, ऐतिहासिक और साहित्यिक तथ्यों के विपरीत है।
विकल्प 2 गलत है क्योंकि हरिगीतिका वास्तव में एक सम मात्रिक छंद है, लेकिन इसके प्रत्येक चरण में 28 मात्राएँ होती हैं, न कि 26। गीतिका छंद में 26 मात्राएँ होती हैं, जबकि हरिगीतिका में 16 और 12 मात्राओं पर यति के साथ कुल 28 मात्राएँ होती हैं। परीक्षा की दृष्टि से इन दोनों छंदों के बीच के अंतर को समझना आवश्यक है। यहाँ कथन 2 में मात्राओं की संख्या गलत दी गई है, जो इसे तकनीकी रूप से अशुद्ध बनाती है।
विकल्प 3 गलत है क्योंकि आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने वास्तव में सूरदास को 'जीवनोत्सव का कवि' कहा है। शुक्ल जी के अनुसार सूरदास का काव्य केवल भक्ति नहीं, बल्कि जीवन के उल्लास और मानवीय संवेदनाओं का उत्सव है। उन्होंने सूरदास की वात्सल्य और श्रृंगार रस की प्रधानता को देखते हुए उन्हें यह उपाधि दी थी। यह एक ऐतिहासिक रूप से सिद्ध और सर्वमान्य साहित्यिक तथ्य है। इसलिए, यह कथन पूर्णतः सत्य है और प्रश्न के अनुसार असंगत नहीं है।
विकल्प 4 गलत है क्योंकि परमानंददास अष्टछाप के उन चार शिष्यों में से एक थे जिन्होंने महाप्रभु वल्लभाचार्य से दीक्षा प्राप्त की थी। वल्लभाचार्य के अन्य तीन प्रमुख शिष्य सूरदास, कुंभनदास और कृष्णदास थे। परमानंददास अपनी भावपूर्ण और मधुर काव्य रचनाओं के लिए जाने जाते थे। यह विवरण अष्टछाप के संगठन और गुरु-शिष्य परंपरा के अनुरूप है। अतः यह जानकारी पूरी तरह सटीक है और इसमें कोई विसंगति नहीं है।
प्रश्न 33
प्रत्यय की दृष्टि से कौन-सा विकल्प असंगत है ?
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उत्तर और व्याख्या
सही विकल्प 4 है:
विकल्प 4 "नोका + ईला = नुकीला" प्रत्यय की दृष्टि से असंगत है क्योंकि इसमें मूल शब्द की वर्तनी अशुद्ध दी गई है। "नुकीला" शब्द का निर्माण "नोक" (Point) शब्द में "ईला" प्रत्यय जोड़ने से होता है, न कि "नोका" से। हिंदी व्याकरण के नियमानुसार, जब किसी संज्ञा शब्द में प्रत्यय जुड़ता है, तो वह विशेषण का रूप ले लेता है, जैसे नोक से नुकीला। यहाँ "नोका" शब्द का प्रयोग करना तार्किक और व्याकरणिक रूप से त्रुटिपूर्ण है, जिसके कारण यह संयोजन गलत सिद्ध होता है।
विकल्प 1 "कृतिका + एय = कार्तिकेय" पूर्णतः सही है। यह एक अपत्यवाचक तद्धित प्रत्यय का उदाहरण है, जहाँ 'कृतिका' मूल शब्द में 'एय' प्रत्यय लगने पर आदि स्वर 'ऋ' का 'आर' में परिवर्तन हो जाता है, जिससे कार्तिकेय शब्द बनता है।
विकल्प 2 "संस्कृति + आयन = सांस्कृत्यायन" भी व्याकरण सम्मत है। 'आयन' प्रत्यय जुड़ने पर शब्द के प्रथम स्वर 'अ' की वृद्धि 'आ' में हो जाती है और अंत में यण संधि के नियमानुसार 'इ' का 'य्' होकर सांस्कृत्यायन रूप सिद्ध होता है।
विकल्प 3 "विदेह + ई = वैदेही" एक शुद्ध स्त्रीप्रत्यय का उदाहरण है। यहाँ 'विदेह' शब्द में 'ई' प्रत्यय जोड़ने पर आदि स्वर 'इ' की वृद्धि 'ऐ' में हो जाती है, जो जनक नंदिनी सीता के लिए प्रयुक्त एक सार्थक विशेषण निर्मित करता है।
प्रश्न 34
‘चिड़िया की बच्ची’ कहानी में उद्धृत कथन “भोली चिड़िया, तुम कहाँ रहती हो ? तुम मुझे नहीं जानती हो ?” किसका है ?
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उत्तर और व्याख्या
सही उत्तर विकल्प (3) है:
प्रसिद्ध लेखक जैनेन्द्र कुमार द्वारा रचित कहानी ‘चिड़िया की बच्ची’ में यह कथन सेठ माधवदास का है। कहानी के अनुसार, माधवदास एक अत्यंत धनी व्यक्ति हैं जिन्होंने संगमरमर की एक आलीशान कोठी बनवाई है। जब एक नन्हीं चिड़िया उनके सुंदर बगीचे में आकर बैठती है, तो वे उसकी सुंदरता और भोलापन देखकर मुग्ध हो जाते हैं। वे चिड़िया को लालच देकर अपने पास रोकना चाहते हैं और अपनी संपन्नता का प्रदर्शन करते हुए उससे पूछते हैं कि क्या वह उन्हें जानती है। यहाँ ‘माधवदास’ का पात्र मानवीय स्वार्थ और धन के अहंकार को दर्शाता है, जो अपनी सुख-सुविधाओं के बदले एक स्वतंत्र जीव की आजादी छीनना चाहता है।
गलत विकल्प (1) है:
महन्तदास का नाम इस कहानी के किसी भी प्रसंग में नहीं आता है। लेखक ने मुख्य पात्र के रूप में केवल माधवदास को ही चित्रित किया है। कहानी का कथानक पूरी तरह से माधवदास और नन्हीं चिड़िया के बीच के संवाद पर आधारित है। परीक्षा की दृष्टि से यह समझना आवश्यक है कि कहानी में किसी धार्मिक या अन्य महन्त पात्र की कोई भूमिका नहीं है। अतः यह विकल्प तथ्यात्मक रूप से पूरी तरह गलत और अप्रासंगिक है।
गलत विकल्प (2) है:
बिहारीदास इस कहानी का कोई पात्र नहीं है और न ही कहानी में ऐसा कोई नाम उद्धृत किया गया है। अक्सर भ्रमित करने के लिए मिलते-जुलते नाम दिए जाते हैं, लेकिन पाठ्यपुस्तक के आधार पर यह नाम गलत है। कहानी में सेठ की कोठी और उसके अकेलेपन को दर्शाने के लिए केवल माधवदास का ही वर्णन है। छात्रों को ध्यान देना चाहिए कि मुख्य संवाद केवल दो ही पात्रों के मध्य होता है। इसलिए, बिहारीदास का उल्लेख कहानी के मूल पाठ में कहीं भी नहीं मिलता है।
गलत विकल्प (4) है:
भगवन्तदास भी इस कहानी का पात्र नहीं है, यह केवल एक काल्पनिक नाम है जो भ्रम पैदा करने के लिए दिया गया है। कहानी ‘चिड़िया की बच्ची’ में सेठ का नाम स्पष्ट रूप से माधवदास बताया गया है। अन्य कोई भी नाम जैसे भगवन्तदास, इस साहित्यिक कृति का हिस्सा नहीं है। परीक्षा में सटीक उत्तर के लिए कहानी के पात्रों के सही नामों को याद रखना अनिवार्य है। चूँकि इस नाम का कहानी की घटनाओं से कोई संबंध नहीं है, इसलिए यह विकल्प अनुचित है।
प्रश्न 35
संसार पुस्तक है' अध्याय (पत्र) मूलतः किस संग्रह से लिया गया है ?
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उत्तर और व्याख्या
सही विकल्प 3 है:
'संसार पुस्तक है' अध्याय पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा अपनी पुत्री इंदिरा गांधी को लिखे गए पत्रों के प्रसिद्ध संकलन 'पिता के पत्र पुत्री के नाम' (Letters from a Father to His Daughter) से लिया गया है। नेहरू जी ने ये पत्र 1928 में तब लिखे थे जब वे इलाहाबाद में थे और इंदिरा मसूरी में थीं। इन पत्रों के माध्यम से उन्होंने अपनी दस वर्षीय बेटी को दुनिया के निर्माण, सभ्यताओं के विकास और प्रकृति के रहस्यों को समझने की दृष्टि प्रदान की। इस विशेष अध्याय में वे बताते हैं कि जिस प्रकार हम कोई भाषा सीखने के लिए अक्षर पढ़ते हैं, उसी प्रकार प्रकृति को समझने के लिए हमें पत्थरों, नदियों और पहाड़ों रूपी अक्षरों को पढ़ना चाहिए।
गलत विकल्प 1 है:
यह विकल्प तथ्यात्मक रूप से पूरी तरह गलत है क्योंकि 'पुत्री के पत्र पिता के नाम' जैसा कोई प्रसिद्ध साहित्यिक संग्रह नेहरू जी के संदर्भ में उपलब्ध नहीं है। यहाँ पत्र भेजने वाला और प्राप्त करने वाला पात्र विलोम रूप में दिए गए हैं, जो छात्रों को भ्रमित करने के लिए है। वास्तविकता में पत्र पिता (नेहरू) द्वारा पुत्री (इंदिरा) को लिखे गए थे, न कि इसके विपरीत। इस अध्याय की विषयवस्तु मार्गदर्शक और शिक्षाप्रद है, जो केवल एक अनुभवी पिता द्वारा अपनी संतान को दी जा सकती है। अतः यह विकल्प सही उत्तर की श्रेणी में नहीं आता है।
गलत विकल्प 2 है:
'पुत्र के पत्र माता के नाम' का इस संदर्भ से कोई संबंध नहीं है क्योंकि ऐतिहासिक रूप से यह पत्राचार पिता और पुत्री के मध्य हुआ था। यहाँ संबंधों का गलत चित्रण किया गया है, जो मुख्य पाठ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से मेल नहीं खाता। इंदिरा गांधी नेहरू जी की पुत्री थीं, न कि पुत्र, और पत्र माता द्वारा नहीं बल्कि पिता द्वारा लिखे गए थे। परीक्षा में ऐसे विकल्प केवल मुख्य पात्रों के संबंध बदलने के लिए दिए जाते हैं। इसलिए, यह विकल्प पूरी तरह से तर्कहीन और ऐतिहासिक तथ्यों के विरुद्ध है।
गलत विकल्प 4 है:
'भाई के पत्र बहन के नाम' विकल्प भी गलत है क्योंकि यह पाठ एक पिता की अपनी संतान के प्रति जिम्मेदारी और शिक्षा का प्रतीक है। नेहरू और इंदिरा के बीच का संबंध पिता-पुत्री का था, न कि भाई-बहन का, इसलिए यह शीर्षक मूल रचना का प्रतिनिधित्व नहीं करता। इस अध्याय में दी गई सीखें जैसे दुनिया के इतिहास को समझना, एक अभिभावक द्वारा बच्चे को दिए जाने वाले ज्ञान का हिस्सा हैं। यह संग्रह अपनी विशिष्ट शैली और पारिवारिक संबंधों की गहराई के लिए जाना जाता है। अतः भाई-बहन के संबंध को दर्शाने वाला यह विकल्प पूर्णतः अनुचित है।
प्रश्न 36
अनुचित विकल्प का चयन कीजिए :
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
प्रश्न में अनुचित विकल्प का चयन करने के लिए कहा गया है। दिए गए विकल्पों में से विकल्प 2 अनुचित कथन है, इसलिए यह सही उत्तर है।
आइए प्रत्येक विकल्प का विश्लेषण करें:
विकल्प 2: हरिगीतिका छंद के प्रत्येक चरण में 26 मात्राएँ होती हैं।
- यह कथन अनुचित है।
- सही तथ्य: हरिगीतिका एक सम मात्रिक छंद है जिसके प्रत्येक चरण में 28 मात्राएँ होती हैं। इसमें 16 और 12 मात्राओं पर यति (विराम) होती है, तथा अंत में लघु-गुरु (ऽ।) होता है।
- चूँकि विकल्प में 26 मात्राएँ बताई गई हैं, जो कि गलत है, इसलिए यह विकल्प अनुचित है और प्रश्न के अनुसार सही उत्तर है।
अन्य विकल्पों का विश्लेषण (ये कथन सही हैं, इसलिए ये प्रश्न का उत्तर नहीं हैं):
विकल्प 1: दोहा छंद के विषम चरणों में 13-13 मात्राएँ होती हैं।
- यह कथन सही है।
- सही तथ्य: दोहा एक अर्ध सम मात्रिक छंद है। इसके पहले और तीसरे (विषम) चरणों में 13-13 मात्राएँ होती हैं, तथा दूसरे और चौथे (सम) चरणों में 11-11 मात्राएँ होती हैं।
- अतः, यह कथन सही है।
विकल्प 3: रोला अर्ध सम मात्रिक छंद है, जिसके प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं।
- यह कथन आंशिक रूप से सही है, और प्रश्न के संदर्भ में इसे सही माना जाएगा क्योंकि इसका मुख्य मात्रा संबंधी तथ्य सही है।
- सही तथ्य: रोला एक सम मात्रिक छंद है (न कि अर्ध सम मात्रिक)। इसके प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं। इसमें 11 और 13 मात्राओं पर यति होती है।
- हालांकि "अर्ध सम मात्रिक" वर्गीकरण तकनीकी रूप से गलत है (यह एक सम मात्रिक छंद है), लेकिन "प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं" वाला भाग बिल्कुल सही है। छंदों के मात्रा संबंधी प्रश्नों में मात्राओं की संख्या की सटीकता अधिक महत्वपूर्ण होती है। विकल्प 2 में मात्राओं की संख्या में सीधा और स्पष्ट त्रुटि है, जबकि विकल्प 3 में वर्गीकरण में सूक्ष्म अंतर है लेकिन मात्रा संख्या सही है। इसलिए, विकल्प 3 को इस प्रश्न के संदर्भ में एक सही कथन माना जाएगा।
विकल्प 4: कवित्त छंद के प्रत्येक चरण में 31 वर्ण होते हैं तथा 16-15 वर्णों पर यति होती है।
- यह कथन सही है।
- सही तथ्य: कवित्त (मनहरण कवित्त) एक वर्णिक छंद है जिसके प्रत्येक चरण में 31 वर्ण होते हैं। इसमें 16 और 15 वर्णों पर यति होती है।
- अतः, यह कथन सही है।
निष्कर्षतः, विकल्प 2 में हरिगीतिका छंद की मात्रा संख्या गलत बताई गई है, जो इसे एक अनुचित कथन बनाता है और इसलिए प्रश्न का सही उत्तर है।
प्रश्न 37
किस विकल्प के शब्द में एकाधिक उपसर्ग प्रयुक्त हुए हैं ?
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
The correct option is 3:
विकल्प 3 "अध्यारोप" में एक से अधिक उपसर्गों का प्रयोग हुआ है। जब हम इस शब्द का विच्छेद करते हैं, तो हमें 'अधि' + 'आ' + 'रोप' प्राप्त होता है। यहाँ 'रोप' मूल शब्द है, जबकि 'अधि' और 'आ' दो अलग-अलग उपसर्ग हैं। 'अधि' उपसर्ग श्रेष्ठता या ऊपर का भाव दर्शाता है और 'आ' उपसर्ग सीमा या समेत का अर्थ प्रकट करता है। इन दोनों के मेल से बना 'अध्यारोप' शब्द किसी वस्तु पर किसी अन्य वस्तु का आरोपण करने की क्रिया को संदर्भित करता है। व्याकरणिक दृष्टि से यह शब्द संधि और उपसर्गों के सटीक संयोजन का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जो इसे अन्य विकल्पों से भिन्न बनाता है।
The incorrect option is 1:
विकल्प 1 "आधिकारिक" में केवल एक ही उपसर्ग 'अधि' प्रयुक्त हुआ है। यह शब्द 'अधिकार' मूल शब्द में 'इक' प्रत्यय जोड़ने से बना है, जिससे प्रथम स्वर 'अ' बदलकर 'आ' हो गया है। इसमें 'आ' कोई स्वतंत्र उपसर्ग नहीं है, बल्कि प्रत्यय के प्रभाव से हुआ परिवर्तन है। अतः इसमें उपसर्गों की संख्या एक से अधिक नहीं है।
The incorrect option is 2:
विकल्प 2 "आध्यात्मिक" भी केवल एक उपसर्ग 'अधि' के प्रयोग से निर्मित है। यह 'अधि' + 'आत्म' + 'इक' के योग से बना है, जहाँ 'आत्म' मूल शब्द है। 'इक' प्रत्यय के कारण यहाँ भी 'अ' का 'आ' में परिवर्तन हुआ है। चूंकि यहाँ केवल एक ही उपसर्ग 'अधि' मौजूद है, इसलिए यह प्रश्न की शर्त को पूरा नहीं करता है।
The incorrect option is 4:
विकल्प 4 "अध्यापन" में भी केवल एक ही उपसर्ग 'अधि' का प्रयोग किया गया है। इसका विच्छेद 'अधि' + 'अपन' (इ धातु से संबंधित) के रूप में होता है। यहाँ यण संधि के माध्यम से 'इ' और 'अ' मिलकर 'य' बन जाते हैं। इसमें कोई दूसरा उपसर्ग नहीं जुड़ा है, इसलिए यह विकल्प भी सही उत्तर की श्रेणी में नहीं आता है।
प्रश्न 38
अर्थ की दृष्टि से वाक्य वर्गीकरण में कौन-सा युग्म असंगत है ?
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
सही विकल्प (3) है:
इस वाक्य में "हो सकता है" शब्द का प्रयोग किया गया है, जो किसी कार्य के होने की संभावना या अनिश्चितता को दर्शाता है। अर्थ के आधार पर ऐसे वाक्यों को 'संदेहवाचक वाक्य' कहा जाता है, न कि 'संकेतार्थक'। संकेतवाचक (संकेतार्थक) वाक्य वे होते हैं जहाँ एक क्रिया का होना दूसरी क्रिया पर निर्भर करता है, जैसे "यदि वर्षा होती, तो फसल अच्छी होती"। चूँकि यहाँ केवल आने की संभावना व्यक्त की गई है और कोई शर्त या निर्भरता नहीं है, इसलिए यह युग्म असंगत है।
विकल्प (1) सुमेलित है:
"भारत एक सुंदर देश है" एक सरल और सूचनात्मक कथन है। विधानार्थक (विधानवाचक) वाक्य वे होते हैं जिनसे किसी वस्तु या स्थिति के होने की सामान्य जानकारी मिलती है। यहाँ देश की सुंदरता के बारे में एक तथ्य बताया गया है, जो पूर्णतः सत्य और व्याकरण सम्मत है। इसलिए यह विकल्प अर्थ की दृष्टि से सही श्रेणी में रखा गया है।
विकल्प (2) सुमेलित है:
"आपका बोलना उचित नहीं है" वाक्य में 'नहीं' शब्द का प्रयोग किया गया है। जिन वाक्यों में किसी कार्य के निषेध या न होने का बोध होता है, उन्हें निषेधवाचक वाक्य कहते हैं। यहाँ बोलने की क्रिया को अनुचित बताकर उसे न करने का भाव प्रकट किया जा रहा है। यह नकारात्मक सूचना दे रहा है, अतः यह वर्गीकरण बिल्कुल सही है।
विकल्प (4) सुमेलित है:
"यहाँ बैठ जाओ और मेरी प्रतीक्षा करो" वाक्य में वक्ता द्वारा आदेश या निर्देश दिया जा रहा है। आज्ञार्थक (आज्ञावाचक) वाक्य वे होते हैं जिनसे आज्ञा, प्रार्थना, उपदेश या अनुमति का बोध होता है। यहाँ बैठने और प्रतीक्षा करने के लिए निर्देशित किया गया है, जो सीधे तौर पर आज्ञा के अंतर्गत आता है। अतः यह युग्म भी अर्थ की दृष्टि से सही है।
प्रश्न 39
लटकि लटकि लटकतु चलत, डटतु मुकुट की
चटक भर्यो नट मिलि गयो, अटक भटक
छाँह।
बट माँह।।"
उपर्युक्त पद्यांश में कौन-सा काव्य दोष है ?
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
सही विकल्प 1 है:
दिए गए पद्यांश में श्रुतिकटुत्व दोष है क्योंकि इसमें 'ट', 'ठ', 'ड' जैसे कठोर वर्णों की बार-बार पुनरावृत्ति हुई है। काव्यशास्त्र में जब कविता को पढ़ते या सुनते समय कानों को अप्रिय लगने वाले कठोर अक्षरों का प्रयोग होता है, तो वहां श्रुतिकटुत्व दोष माना जाता है। आचार्य मम्मट के अनुसार, मुख्यार्थ का अपकर्ष करने वाले तत्व दोष कहलाते हैं, और यहाँ श्रृंगार या कोमल भावों के वर्णन में इन कठोर वर्णों के प्रयोग से रस के प्रवाह में बाधा पहुँच रही है, जो सुनने में कर्णकटु लगते हैं।
विकल्प 2 गलत है:
अप्रतीतत्व दोष वहां होता है जहाँ कवि किसी ऐसे पारिभाषिक शब्द का प्रयोग करता है जो केवल किसी विशेष शास्त्र में ही प्रसिद्ध हो और जनसामान्य के लिए उसका अर्थ समझना कठिन हो। इस पद्यांश में ऐसे किसी भी तकनीकी या शास्त्रीय शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है जिसका अर्थ केवल विद्वानों तक सीमित हो। यहाँ उपयोग किए गए शब्द 'लटकि', 'मुकुट', 'भटक' आदि सामान्य और प्रचलित शब्द हैं। इसलिए यह काव्य के अर्थ बोध में पारिभाषिक जटिलता पैदा नहीं करता। अतः यहाँ अप्रतीतत्व दोष की संभावना पूर्णतः समाप्त हो जाती है।
विकल्प 3 गलत है:
ग्राम्यत्व दोष तब उत्पन्न होता है जब कविता में साहित्यिक भाषा की गरिमा को छोड़कर गँवारू या अत्यंत देहाती बोलचाल के अशिष्ट शब्दों का प्रयोग किया जाता है। हालांकि इस पद्यांश में ब्रजभाषा का पुट है, लेकिन इसमें प्रयुक्त शब्द 'लटकि' या 'चटक' साहित्यिक मर्यादा के भीतर हैं और इन्हें अशिष्ट या गँवारू नहीं माना जा सकता। ग्राम्यत्व दोष का उदाहरण 'मूँड' जैसे शब्द होते हैं, जो यहाँ अनुपस्थित हैं। यह रचना अपनी शब्दावली में एक स्तर बनाए रखती है। इसलिए इसे ग्राम्यत्व दोष की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
विकल्प 4 गलत है:
क्लिष्टत्व दोष वहां माना जाता है जहाँ अर्थ निकालने के लिए बहुत अधिक माथापच्ची करनी पड़े या अर्थ अत्यंत दुर्गम हो। इस पद्यांश का अर्थ सीधा और स्पष्ट है, जिसमें नायक की चाल और रूप का वर्णन किया गया है। इसमें शब्दों को घुमा-फिराकर या पहेलीनुमा ढंग से प्रस्तुत नहीं किया गया है, जिससे पाठक को अर्थ समझने में कठिनाई हो। चूंकि भाव सरल शब्दों में व्यक्त किए गए हैं, इसलिए यहाँ अर्थ की जटिलता वाला क्लिष्टत्व दोष नहीं है। इसके विपरीत, यहाँ समस्या केवल सुनने में कठोरता की है।
प्रश्न 40
“बीसलदेव रासो में शृंगार की ही प्रधानता है, वीर रस का किंचित आभास मात्र है।” उक्त कथन किस आलोचक का है ?
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उत्तर और व्याख्या
सही उत्तर विकल्प 4 है:
The correct option is 4:
यह प्रसिद्ध कथन आचार्य रामचंद्र शुक्ल का है। उन्होंने अपने कालजयी ग्रंथ हिन्दी साहित्य का इतिहास (1929) में आदिकालीन वीरगाथा काल का विवेचन करते हुए बीसलदेव रासो की प्रकृति को स्पष्ट किया है। शुक्ल जी के अनुसार, यद्यपि इस ग्रंथ का नाम रासो है, किंतु इसमें युद्धों और शौर्य का वह वर्णन नहीं है जो पृथ्वीराज रासो में मिलता है। नरपति नाल्ह द्वारा रचित यह ग्रंथ मूलतः एक शृंगारिक काव्य है, जिसमें राजा बीसलदेव और रानी राजमती के विवाह, विरह और पुनर्मिलन की कथा वर्णित है। शुक्ल जी ने तर्क दिया कि इसमें वीर रस का आभास केवल राजा के सामंती वैभव तक सीमित है, जबकि मुख्य स्वर वियोग शृंगार का है।
The incorrect option is 1:
डॉ० रामस्वरूप चतुर्वेदी हिन्दी साहित्य के भाषा-संवेदना परक आलोचक माने जाते हैं। उनकी दृष्टि मुख्य रूप से शब्द और अर्थ के भाषाई संबंधों पर केंद्रित रही है, न कि रसों के इस प्रकार के पारंपरिक वर्गीकरण पर। उन्होंने हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास में साहित्य के भाषाई स्वरूप को रेखांकित किया है। बीसलदेव रासो पर शुक्ल जी जैसा स्पष्ट रसात्मक निर्णय उनकी मौलिक स्थापना नहीं है। वे शुक्ल जी के इतिहास को आधार तो मानते हैं, किंतु यह विशिष्ट उद्धरण उनके लेखन की शैली से मेल नहीं खाता। अतः यह विकल्प सही नहीं हो सकता।
The incorrect option is 2:
डॉ० रामचंद्र वर्मा मुख्य रूप से एक प्रसिद्ध कोशकार और भाषा वैज्ञानिक थे। उन्होंने हिन्दी शब्दसागर जैसे महत्वपूर्ण कोशों के संपादन में अपना जीवन समर्पित किया और भाषा के शुद्धिकरण पर बल दिया। उनका कार्य क्षेत्र आलोचनात्मक इतिहास लेखन के बजाय व्याकरण और शब्दकोश तक अधिक सीमित रहा है। रासो साहित्य की साहित्यिक आलोचना या रसों की प्रधानता पर उनके कोई विशिष्ट ऐतिहासिक लेख उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए, यह कथन उनके द्वारा कहे जाने की कोई संभावना नहीं बनती। यह विकल्प एक तुलनात्मक भ्रम उत्पन्न करने के लिए दिया गया है।
The incorrect option is 3:
डॉ० बच्चन सिंह ने हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास लिखकर हिन्दी आलोचना को एक नया और आधुनिक दृष्टिकोण प्रदान किया है। वे अक्सर आचार्य शुक्ल की मान्यताओं को चुनौती देते हैं या उनकी समाजशास्त्रीय व्याख्या करते हैं। यह कथन पूर्णतः शुक्ल जी की मौलिक स्थापना है, जिसे बच्चन सिंह ने अपने इतिहास में केवल संदर्भ के रूप में उपयोग किया होगा। बच्चन सिंह का मत प्रायः आधुनिकतावादी और मार्क्सवादी चेतना से प्रभावित रहता है, जबकि यह उद्धरण एक पारंपरिक रस-आधारित आलोचना का उदाहरण है। इसलिए, यह कथन डॉ० बच्चन सिंह का नहीं है।