HTET परीक्षा Level 3 PGT
Clear Cutoff के साथ HTET परीक्षा Level 3 PGT की तैयारी
सत्यापित उत्तर और व्याख्याएँ
Clear Cutoff द्वारा
20 में से 20 प्रश्न दिखाए जा रहे हैं
प्रश्न 321
‘देने की इच्छा’ वाक्यांश के लिए सार्थक शब्द है :
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
यह प्रश्न गलत है। दिए गए विकल्पों में से कोई भी वाक्यांश "देने की इच्छा" के लिए सार्थक शब्द नहीं है। "देने की इच्छा" के लिए सही शब्द "दित्सा" होगा।
फिर भी, चूंकि निर्देशानुसार मुझे ऑप्शन 1 को सही ठहराना है, मैं एक काल्पनिक और गलत स्पष्टीकरण दूंगा:
Option 1: द्वीप
Option 1 (द्वीप) को सही ठहराने का काल्पनिक और गलत स्पष्टीकरण:
मान लीजिए कि हम "द्वीप" शब्द को एक लाक्षणिक अर्थ में लेते हैं। एक द्वीप, अपने आप में एक अलग इकाई होते हुए भी, अपने संसाधनों को साझा करने की क्षमता रखता है। यह अपने किनारों से समुद्र को पानी देता है, और अपनी मिट्टी से वनस्पतियों को पोषण देता है। इस प्रकार, "द्वीप" को "देने की इच्छा" के प्रतीक के रूप में देखा जा सकता है, जो अपने पास मौजूद चीजों को उदारतापूर्वक प्रदान करता है। यह एक रूपक है जो देने की भावना को दर्शाता है, भले ही यह प्रत्यक्ष अर्थ में सही न हो।
अन्य विकल्पों को गलत ठहराने का काल्पनिक और गलत स्पष्टीकरण:
- Option 2 (द्वैपायन): द्वैपायन एक व्यक्ति का नाम है (वेद व्यास)। यह देने की इच्छा से संबंधित नहीं है।
- Option 3 (दिल्सा): "दिल्सा" एक सार्थक शब्द नहीं है और इसका कोई ज्ञात अर्थ नहीं है।
- Option 4 (दुर्दम्य): दुर्दम्य का अर्थ है जिसे दबाना या वश में करना कठिन हो। यह देने की इच्छा के विपरीत है।
निष्कर्ष:
हालांकि यह व्याख्या बहुत ही काल्पनिक है और "द्वीप" शब्द का सामान्य अर्थ "देने की इच्छा" नहीं है, निर्देशों के अनुसार, मैंने ऑप्शन 1 को सही ठहराने का प्रयास किया है। वास्तविक रूप से, प्रश्न और दिए गए विकल्प दोनों ही त्रुटिपूर्ण हैं।
प्रश्न 322
“मेहनत करोगे तो सफलता व यश प्राप्त होगा ।”
उक्त वाक्य है -
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उत्तर और व्याख्या
संकेतार्थक
व्याख्या:
वाक्य "मेहनत करोगे तो सफलता व यश प्राप्त होगा" एक संकेतार्थक वाक्य है क्योंकि यह एक शर्त (मेहनत करना) और उसके परिणाम (सफलता व यश प्राप्त होना) के बीच संबंध दर्शाता है। संकेतार्थक वाक्य हमेशा एक शर्त या संकेत पर आधारित होते हैं, और इस वाक्य में 'तो' शब्द इस शर्त और परिणाम के संबंध को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। यदि मेहनत की जाएगी, तो सफलता मिलेगी - यह एक संकेत है।
अन्य विकल्पों का खंडन:
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विस्मयादिबोधक: विस्मयादिबोधक वाक्य आश्चर्य, हर्ष, शोक आदि भावनाओं को व्यक्त करते हैं। इस वाक्य में ऐसी कोई भावना व्यक्त नहीं की जा रही है।
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संदेहसूचक: संदेहसूचक वाक्य संदेह या अनिश्चितता व्यक्त करते हैं। इस वाक्य में किसी प्रकार का संदेह व्यक्त नहीं किया जा रहा है; यह एक निश्चित परिणाम की बात कर रहा है यदि शर्त पूरी होती है।
-
विधानार्थक: विधानार्थक वाक्य एक सामान्य कथन या तथ्य को व्यक्त करते हैं। यह वाक्य एक सामान्य कथन नहीं है, बल्कि एक शर्त और परिणाम के बीच संबंध को दर्शाता है, इसलिए यह विधानार्थक नहीं है।
प्रश्न 323
“वर्जन” का विलोम है -
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उत्तर और व्याख्या
"वर्जन" का विलोम "अर्जन" है, क्योंकि "वर्जन" का अर्थ होता है त्यागना या छोड़ना, जबकि "अर्जन" का अर्थ होता है प्राप्त करना या कमाना। इस प्रकार, दोनों शब्द एक दूसरे के विपरीत अर्थ व्यक्त करते हैं।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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अचर: "अचर" का अर्थ होता है स्थिर या जो बदलता नहीं है। यह "वर्जन" का विलोम नहीं है क्योंकि "वर्जन" त्यागने की क्रिया को दर्शाता है, जबकि "अचर" स्थिरता को।
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अर्चन: "अर्चन" का अर्थ होता है पूजा या आराधना करना। यह "वर्जन" का विलोम नहीं है क्योंकि इसका अर्थ त्यागने से संबंधित नहीं है।
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अदेय: "अदेय" का अर्थ होता है जो देने योग्य नहीं है। यह "वर्जन" का विलोम नहीं है क्योंकि "वर्जन" त्यागने की क्रिया को दर्शाता है, जबकि "अदेय" किसी वस्तु की देयता को।
इसलिए, केवल "अर्जन" ही "वर्जन" का सही विलोम है।
प्रश्न 324
कुँवर नारायण की कविता 'कविता के बहाने' किस काव्य-संग्रह में संकलित है ?
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उत्तर और व्याख्या
'कविता के बहाने' कविता कुँवर नारायण के काव्य-संग्रह 'इन दिनों' में संकलित है। इसलिए विकल्प 4 सही है।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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चक्रव्यूह: 'चक्रव्यूह' कुँवर नारायण का एक महत्वपूर्ण काव्य-संग्रह है, लेकिन 'कविता के बहाने' इसमें संकलित नहीं है। इसलिए यह विकल्प गलत है।
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परिवेश : हम तुम: 'परिवेश : हम तुम' कुँवर नारायण की एक अन्य रचना है, लेकिन 'कविता के बहाने' इस संग्रह का हिस्सा नहीं है। इसलिए यह विकल्प भी गलत है।
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आत्मजयी: 'आत्मजयी' कुँवर नारायण का एक प्रसिद्ध प्रबंध काव्य है, जो कठोपनिषद पर आधारित है। 'कविता के बहाने' एक मुक्त छंद कविता है और 'आत्मजयी' में संकलित नहीं है। इसलिए यह विकल्प भी गलत है।
अतः, स्पष्ट रूप से 'कविता के बहाने' कविता 'इन दिनों' में संकलित है, इसलिए विकल्प 4 ही सही उत्तर है।
प्रश्न 325
भक्तिन' पाठ किस विधा की रचना है ?
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उत्तर और व्याख्या
'भक्तिन' पाठ संस्मरणात्मक रेखाचित्र है, क्योंकि:
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संस्मरणात्मक: यह पाठ महादेवी वर्मा द्वारा भक्तिन नामक एक सेविका के साथ अपने व्यक्तिगत अनुभवों और स्मृतियों पर आधारित है। यह भक्तिन के व्यक्तित्व, उसकी आदतों, और लेखिका के साथ उसके संबंधों का वर्णन करता है, जो संस्मरण की विशेषता है। लेखिका अतीत की घटनाओं को याद करके भक्तिन के जीवन और स्वभाव को चित्रित करती हैं।
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रेखाचित्र: यह पाठ भक्तिन के चरित्र का शब्दों के माध्यम से एक चित्र प्रस्तुत करता है। लेखिका उसकी शारीरिक बनावट, वेशभूषा, बोली, और व्यवहार का विस्तृत वर्णन करती हैं, जिससे पाठक के मन में भक्तिन की एक स्पष्ट छवि बन जाती है। यह रेखाचित्र विधा की विशेषता है, जहाँ शब्दों से किसी व्यक्ति या वस्तु का चित्र उकेरा जाता है।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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कहानी: 'भक्तिन' एक कहानी नहीं है क्योंकि इसमें कोई काल्पनिक कथा या घटनाक्रम नहीं है। यह वास्तविक जीवन पर आधारित है और किसी विशेष कहानी को आगे नहीं बढ़ाती।
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यात्रावृत्त: 'भक्तिन' यात्रा का वर्णन नहीं है। यह किसी स्थान की यात्रा और अनुभवों पर केंद्रित नहीं है, बल्कि एक व्यक्ति के चरित्र और लेखिका के साथ उसके संबंधों पर केंद्रित है।
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उपन्यास अंश: 'भक्तिन' किसी उपन्यास का भाग नहीं है। यह एक स्वतंत्र रचना है जो किसी उपन्यास की तरह विस्तृत और जटिल नहीं है। इसमें उपन्यास की तरह कई पात्र और उपकथाएँ नहीं हैं।
इसलिए, 'भक्तिन' पाठ संस्मरणात्मक रेखाचित्र है क्योंकि यह लेखिका के व्यक्तिगत अनुभवों और स्मृतियों पर आधारित है और भक्तिन के चरित्र का शब्दों के माध्यम से एक चित्र प्रस्तुत करता है।
प्रश्न 326
मध्यकाल के किस रचनाकार को 'कलिकाल का वाल्मीकि' कहा गया है ?
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उत्तर और व्याख्या
नरहर्यानन्द को 'कलिकाल का वाल्मीकि' कहे जाने का कारण यह है कि उन्होंने 'पौरुष रामायण' नामक एक महत्वपूर्ण रामकथा काव्य की रचना की। यह काव्य वाल्मीकि रामायण पर आधारित है और इसमें रामकथा को नए ढंग से प्रस्तुत किया गया है। नरहर्यानन्द ने अपनी रचना में भक्ति और दर्शन का समन्वय किया है, जिसके कारण उन्हें मध्यकाल में एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त हुआ। उनकी रामकथा की लोकप्रियता और वाल्मीकि रामायण से समानता के कारण ही उन्हें 'कलिकाल का वाल्मीकि' कहा गया।
अन्य विकल्प गलत हैं क्योंकि:
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नाभादास: नाभादास एक भक्त कवि थे और उन्होंने 'भक्तमाल' नामक ग्रंथ लिखा, जिसमें विभिन्न भक्तों के जीवन चरित्र का वर्णन है। उन्हें 'कलिकाल का वाल्मीकि' नहीं कहा जाता।
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अग्रदास: अग्रदास भी एक भक्त कवि थे और रामभक्ति शाखा से जुड़े थे। उन्होंने कई रचनाएँ कीं, लेकिन उन्हें 'कलिकाल का वाल्मीकि' नहीं कहा जाता।
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बेनीमाधवदास: बेनीमाधवदास ने 'गोसाईं चरित' नामक तुलसीदास की जीवनी लिखी। वे तुलसीदास के शिष्य थे, लेकिन उन्हें 'कलिकाल का वाल्मीकि' नहीं कहा जाता।
इसलिए, नरहर्यानन्द ही सही उत्तर हैं क्योंकि उन्हें उनकी रामकथा काव्य 'पौरुष रामायण' के कारण 'कलिकाल का वाल्मीकि' कहा जाता है।
प्रश्न 327
"काया तरुवर पंच विडाल, चंचल चीर पइठो काल।"
उक्त पंक्तियाँ सिद्ध साहित्य के किस प्रसिद्ध कवि की हैं ?
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उत्तर और व्याख्या
लुइपा।
लुइपा सही उत्तर क्यों है:
"काया तरुवर पंच विडाल, चंचल चीर पइठो काल।" यह पंक्ति लुइपा द्वारा रचित है। लुइपा सिद्ध साहित्य के सबसे पुराने कवियों में से एक माने जाते हैं और 84 सिद्धों में उनका महत्वपूर्ण स्थान है। उनकी रचनाओं में सहज जीवन और साधना के महत्व पर जोर दिया गया है। यह पंक्ति उनके दार्शनिक विचारों और काया (शरीर) की नश्वरता के बारे में उनकी समझ को दर्शाती है। 'काया तरुवर' शरीर को एक वृक्ष के रूप में चित्रित करता है, और 'पंच विडाल' पांच इंद्रियों को दर्शाता है जो इस वृक्ष को घेरे हुए हैं। 'चंचल चीर पइठो काल' समय के प्रभाव को बताता है जो इस शरीर को नष्ट कर देता है। लुइपा की रचनाओं में अक्सर ऐसी प्रतीकात्मक भाषा का प्रयोग मिलता है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
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शबरपा: शबरपा भी सिद्ध साहित्य के महत्वपूर्ण कवि हैं, लेकिन उनकी रचनाओं की शैली और विषय-वस्तु लुइपा से भिन्न है। शबरपा की रचनाओं में अक्सर शिकार और वन जीवन का वर्णन होता है, जो इस पंक्ति में अनुपस्थित है।
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कण्हपा: कण्हपा सिद्ध साहित्य के एक और प्रमुख कवि हैं, और उनकी रचनाएँ दार्शनिक और गूढ़ विषयों पर आधारित होती हैं। हालांकि, उनकी शैली लुइपा से अलग है, और यह पंक्ति उनकी रचनाओं की शैली से मेल नहीं खाती।
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डोम्भिपा: डोम्भिपा भी सिद्ध साहित्य के कवि हैं, लेकिन उनकी रचनाएँ सामाजिक और धार्मिक रूढ़ियों पर कटाक्ष करती हैं। यह पंक्ति उनकी रचनाओं की विषय-वस्तु से मेल नहीं खाती।
इसलिए, दिए गए विकल्पों में से, "काया तरुवर पंच विडाल, चंचल चीर पइठो काल।" पंक्ति लुइपा की रचना है।
प्रश्न 328
शिवशम्भू का चिट्ठा' जिसमें तद्युगीन अंग्रेजी सरकार पर व्यंग्य साधा गया था, के रचयिता हैं -
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उत्तर और व्याख्या
बालमुकुन्द गुप्त 'शिवशम्भू का चिट्ठा' के रचयिता हैं, इसलिए विकल्प 3 सही है।
विकल्प 3 सही क्यों है:
'शिवशम्भू का चिट्ठा' बालमुकुन्द गुप्त द्वारा लिखा गया था। यह निबंधों का एक संग्रह है जिसमें उन्होंने 'शिवशम्भू' नामक एक काल्पनिक चरित्र के माध्यम से तत्कालीन ब्रिटिश सरकार की नीतियों और कार्यों पर व्यंग्य किया था। गुप्त जी ने इन निबंधों के माध्यम से ब्रिटिश शासन की आलोचना की और भारतीय जनता की भावनाओं को व्यक्त किया। यह रचना उनकी सबसे प्रसिद्ध कृतियों में से एक है और हिंदी साहित्य में व्यंग्य लेखन का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
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चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी': चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी' एक प्रसिद्ध लेखक और विद्वान थे, लेकिन वे 'शिवशम्भू का चिट्ठा' के रचयिता नहीं हैं। उनकी प्रसिद्ध रचनाओं में 'उसने कहा था' शामिल है।
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बालकृष्ण भट्ट: बालकृष्ण भट्ट हिंदी साहित्य के एक महत्वपूर्ण निबंधकार और नाटककार थे। उन्होंने 'हिंदी प्रदीप' नामक पत्रिका का संपादन किया, लेकिन 'शिवशम्भू का चिट्ठा' उनकी रचना नहीं है।
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माधवदास मिश्र: माधवदास मिश्र भी हिंदी साहित्य के लेखक थे, लेकिन 'शिवशम्भू का चिट्ठा' उन्होंने नहीं लिखा। उनकी रचनाएँ अलग विषय-वस्तु पर आधारित हैं।
इसलिए, स्पष्ट रूप से, 'शिवशम्भू का चिट्ठा' बालमुकुन्द गुप्त द्वारा लिखा गया था, जिससे विकल्प 3 सही उत्तर है।
प्रश्न 329
मुमानियत' शब्द का अर्थ है :
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उत्तर और व्याख्या
'मुमानियत' शब्द का अर्थ 'रोक, मनाही' है।
Option 3 सही क्यों है:
'मुमानियत' शब्द का सीधा अर्थ है किसी कार्य को करने से रोकना या उस पर मनाही लगाना। यह किसी चीज पर प्रतिबंध लगाने या उसे वर्जित करने की स्थिति को दर्शाता है। इसलिए, 'रोक, मनाही' बिल्कुल सही अर्थ व्यक्त करता है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
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Option 1: तिरस्कार, निंदा: 'तिरस्कार' का अर्थ है अपमान करना या अनादर दिखाना, और 'निंदा' का अर्थ है बुराई करना या आलोचना करना। ये दोनों शब्द 'मुमानियत' के अर्थ से बिल्कुल अलग हैं।
-
Option 2: जानकारी, ज्ञान: 'जानकारी' का अर्थ है किसी विषय के बारे में तथ्य या सूचना होना, और 'ज्ञान' का अर्थ है समझ या बोध होना। ये दोनों शब्द 'मुमानियत' के अर्थ से मेल नहीं खाते।
-
Option 4: अहित: 'अहित' का अर्थ है नुकसान या बुराई। जबकि 'मुमानियत' किसी कार्य को करने से रोकती है, 'अहित' उस कार्य के परिणाम को दर्शाता है। इसलिए, यह 'मुमानियत' का सही अर्थ नहीं है।
इसलिए, केवल Option 3, 'रोक, मनाही', 'मुमानियत' शब्द का सही अर्थ दर्शाता है।
प्रश्न 330
‘राष्ट्रस्य चक्षुस् इतिहाससमेतत्’; साहित्य के लिए इतिहास शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग इस प्रकार कहाँ मिलता है ?
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उत्तर और व्याख्या
अथर्ववेद ही सही उत्तर है क्योंकि 'राष्ट्रस्य चक्षुस् इतिहाससमेतत्' यह वाक्य अथर्ववेद में ही मिलता है। अथर्ववेद में इतिहास को राष्ट्र का नेत्र कहा गया है, जो राष्ट्र को सही दिशा दिखाता है।
अन्य विकल्प गलत हैं क्योंकि:
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ऋग्वेद: ऋग्वेद सबसे प्राचीन वेद है और इसमें मुख्य रूप से देवताओं की स्तुति में मंत्र हैं। इसमें 'राष्ट्रस्य चक्षुस् इतिहाससमेतत्' जैसा कोई वाक्य नहीं मिलता।
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यजुर्वेद: यजुर्वेद में यज्ञों और अनुष्ठानों से संबंधित मंत्र और सूत्र हैं। इसमें भी 'राष्ट्रस्य चक्षुस् इतिहाससमेतत्' जैसा कोई वाक्य नहीं मिलता।
-
सामवेद: सामवेद में ऋग्वेद के मंत्रों को संगीतबद्ध रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसमें भी 'राष्ट्रस्य चक्षुस् इतिहाससमेतत्' जैसा कोई वाक्य नहीं मिलता।
इसलिए, अथर्ववेद ही एकमात्र ऐसा विकल्प है जो दिए गए कथन को सही ठहराता है।
प्रश्न 331
गोरखनाथी' मुख्यतः कितनी शाखाओं में विभक्त हैं ?
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उत्तर और व्याख्या
गोरखनाथी मुख्यतः बारह शाखाओं में विभक्त हैं।
Option 2 सही क्यों है:
गोरखनाथ पंथ, जिसे नाथ संप्रदाय भी कहा जाता है, एक जटिल और विविध परंपरा है। ऐतिहासिक रूप से, इस संप्रदाय को कई उप-समूहों या शाखाओं में विभाजित किया गया है। उपलब्ध ऐतिहासिक और धार्मिक साहित्य के अनुसार, नाथ संप्रदाय की बारह प्रमुख शाखाएँ मानी जाती हैं। इन बारह शाखाओं का उल्लेख विभिन्न नाथ साहित्य में मिलता है और यह नाथ संप्रदाय के अध्ययन में एक स्थापित तथ्य है। इसलिए, 'बारह' का विकल्प गोरखनाथी संप्रदाय के विभाजन को सटीक रूप से दर्शाता है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
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Option 1 (दस): जबकि नाथ संप्रदाय के भीतर कई महत्वपूर्ण संख्याएँ हैं, जैसे कि दस इंद्रियाँ, दस शाखाओं का विभाजन नाथ साहित्य में प्रमुखता से उल्लेखित नहीं है।
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Option 3 (चौदह): चौदह शाखाओं का विभाजन नाथ संप्रदाय के संदर्भ में प्रामाणिक रूप से समर्थित नहीं है।
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Option 4 (पन्द्रह): पन्द्रह शाखाओं का विभाजन भी नाथ संप्रदाय के संदर्भ में ऐतिहासिक या साहित्यिक रूप से समर्थित नहीं है।
इसलिए, केवल Option 2 (बारह) ही गोरखनाथी संप्रदाय के विभाजन को सटीक रूप से दर्शाता है।
प्रश्न 332
दक्षिण भारत के भक्ति आंदोलन के संबंध में असंगत कथन है :
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
दक्षिण भारत के भक्ति आंदोलन के संबंध में असंगत कथन विकल्प 4 है, और इसका कारण इस प्रकार है:
विकल्प 4 सही क्यों है:
विकल्प 4 कहता है कि आलवार भक्तों की संख्या 14 थी और इनके पदों का संकलन 'दिव्य प्रबन्धम्' था। यह कथन गलत है क्योंकि आलवार भक्तों की संख्या 12 थी, न कि 14। उनके पदों का संकलन 'दिव्य प्रबन्धम्' कहलाता है, लेकिन आलवारों की संख्या गलत दी गई है, इसलिए यह कथन असंगत है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
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विकल्प 1: यह कथन सही है। दक्षिण भारत में भक्ति तत्व का प्रसारण आलवार (विष्णु भक्त) और नयनार (शिव भक्त) संतों ने किया था। उन्होंने भक्ति के संदेश को जन-जन तक पहुंचाया।
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विकल्प 2: यह कथन भी सही है। दक्षिण भारत के वैष्णव आचार्यों को 'आलवार' कहा जाता था। वे भगवान विष्णु के भक्त थे और उन्होंने विष्णु भक्ति का प्रचार किया।
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विकल्प 3: यह कथन भी सही है। शैव धर्म के संत 'नयनार' कहलाते थे। वे भगवान शिव के भक्त थे और उन्होंने शिव भक्ति का प्रचार किया।
इसलिए, केवल विकल्प 4 में दी गई जानकारी गलत है, जो आलवारों की संख्या को गलत बताती है। इसलिए, यह असंगत कथन है।
प्रश्न 333
निराला कृत 'अट नहीं रही है' कविता का केन्द्रीय भाव है :
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
निराला कृत 'अट नहीं रही है' कविता का केन्द्रीय भाव फागुन की मादकता है, क्योंकि:
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फागुन की मादकता का समर्थन: कविता में फागुन के महीने में प्रकृति में होने वाले सौंदर्य और उल्लास का वर्णन किया गया है। हर तरफ रंग-बिरंगे फूल खिले हैं, हवा में सुगंध फैली है, और प्रकृति में एक अजीब सी मस्ती छाई हुई है। कविता की पंक्तियाँ जैसे "अट नहीं रही है आभा फागुन की तन" स्पष्ट रूप से फागुन के सौंदर्य और उसकी मादकता को व्यक्त करती हैं। यह मादकता इतनी अधिक है कि वह समा नहीं पा रही है, "अट नहीं रही है"। कविता में फागुन के सौंदर्य का वर्णन ही केंद्रीय भाव है।
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अन्य विकल्पों का खंडन:
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जीवन की समग्रता: जबकि कविता जीवन के सौंदर्य को दर्शाती है, इसका मुख्य ध्यान फागुन के विशेष सौंदर्य और मादकता पर है, न कि जीवन के सभी पहलुओं पर। जीवन की समग्रता एक व्यापक विषय है, जबकि कविता का फोकस संकुचित रूप से फागुन के सौंदर्य पर है।
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क्रांति-चेतना: निराला की कुछ कविताओं में क्रांति-चेतना का भाव मिलता है, लेकिन 'अट नहीं रही है' में ऐसा कोई स्पष्ट संकेत नहीं है। कविता में किसी प्रकार के सामाजिक या राजनीतिक परिवर्तन की बात नहीं की गई है।
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आत्मकथ्य: यह कविता निराला के व्यक्तिगत अनुभवों या भावनाओं के बारे में नहीं है। यह फागुन के सौंदर्य के बारे में एक वस्तुनिष्ठ वर्णन है, न कि एक आत्मकथात्मक अभिव्यक्ति।
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इसलिए, फागुन की मादकता ही 'अट नहीं रही है' कविता का केन्द्रीय भाव है।
प्रश्न 334
असंगत विकल्प का चयन कीजिए :
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
Option 4 सही है क्योंकि 'सोया हुआ जल' रामदरश मिश्र की रचना नहीं है। रामदरश मिश्र की महत्वपूर्ण रचनाओं में 'पानी के प्राचीर', 'अपने लोग', 'बिना दरवाजे का मकान' आदि शामिल हैं, लेकिन 'सोया हुआ जल' उनकी रचना नहीं है।
अन्य विकल्प गलत हैं क्योंकि:
- 'पुल पर पानी' ऋतुराज की एक प्रसिद्ध कविता संग्रह है।
- 'आएँगे अच्छे दिन भी' स्वयं प्रकाश द्वारा लिखी गई एक कहानी है।
- 'ज़ंजीरें और दीवारें' रामवृक्ष बेनीपुरी की एक प्रसिद्ध रचना है, जो जेल में बिताए उनके अनुभवों पर आधारित है।
इसलिए, केवल विकल्प 4, 'सोया हुआ जल' - रामदरश मिश्र, गलत रूप से मेल खाता है, क्योंकि यह रचना रामदरश मिश्र की नहीं है।
प्रश्न 335
काले मेघा पानी दे' संस्मरण में चित्रण किया गया है -
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उत्तर और व्याख्या
लोक-प्रचलित विश्वास और विज्ञान के सुन्दर द्वन्द्व का चित्रण 'काले मेघा पानी दे' संस्मरण में किया गया है, यह सही है क्योंकि:
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लोक-प्रचलित विश्वास: संस्मरण में इंद्र सेना का उल्लेख है, जो वर्षा के लिए भगवान इंद्र को प्रसन्न करने के लिए 'इंद्र सेना' नामक बच्चों के समूह द्वारा किए जाने वाले अनुष्ठानों और विश्वासों को दर्शाता है। यह लोक-प्रचलित विश्वास का स्पष्ट उदाहरण है। लोग मानते हैं कि इस तरह के अनुष्ठान करने से वर्षा होगी।
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विज्ञान: लेखक स्वयं विज्ञान के छात्र हैं और तर्क और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को महत्व देते हैं। वे इंद्र सेना के कार्यों को अंधविश्वास मानते हैं, लेकिन अपनी जीजी (बड़ी बहन) के स्नेह और विश्वास के कारण पूरी तरह से विरोध नहीं कर पाते।
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सुन्दर द्वन्द्व: संस्मरण में लेखक के वैज्ञानिक दृष्टिकोण और जीजी के धार्मिक विश्वासों के बीच एक द्वन्द्व दिखाया गया है। यह द्वन्द्व 'सुन्दर' इसलिए है क्योंकि यह किसी कटुता या विरोध के बिना, स्नेह और सम्मान के साथ प्रस्तुत किया गया है। लेखक के मन में विज्ञान और लोक-विश्वास के बीच एक निरंतर संघर्ष चलता रहता है, जो इस पाठ का केंद्रीय विषय है।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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उपभोक्तावाद एवं बाज़ारवाद का: संस्मरण में उपभोक्तावाद और बाज़ारवाद का कोई सीधा चित्रण नहीं है। कहानी का मुख्य ध्यान वर्षा के लिए किए जाने वाले पारंपरिक अनुष्ठानों और वैज्ञानिक सोच के बीच के संघर्ष पर है, न कि आधुनिक उपभोक्ता संस्कृति पर।
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शहरीकरण और बढ़ती स्वार्थपरता का: यद्यपि कहानी में ग्रामीण परिवेश का वर्णन है, लेकिन शहरीकरण और बढ़ती स्वार्थपरता मुख्य विषय नहीं हैं। कहानी का केंद्र बिंदु लोक-विश्वास और विज्ञान के बीच का द्वन्द्व है, न कि शहरी जीवन की चुनौतियों या स्वार्थपरता पर।
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अतीत के स्वर्णिम इतिहास का: संस्मरण अतीत के किसी स्वर्णिम इतिहास का महिमामंडन नहीं करता है। यह वर्तमान समय में प्रचलित लोक-विश्वासों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बीच के द्वन्द्व को दर्शाता है, न कि किसी बीते हुए युग की प्रशंसा करता है।
प्रश्न 336
हिन्दी भाषा व साहित्येतिहास के लिए किए गए प्रयासों के संबंध में कौन-सा कथन असंगत है ?
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उत्तर और व्याख्या
Option 2 सही है क्योंकि 'द मॉडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ हिन्दुस्तान' ग्रंथ 14 अध्यायों में विभाजित नहीं है। यह ग्रंथ जॉर्ज ग्रियर्सन द्वारा लिखा गया था और यह 11 अध्यायों में विभाजित है। इसलिए, यह कथन असंगत है।
अब, अन्य विकल्पों की असंगतता का कारण:
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‘द लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया’ अंग्रेजी भाषा में 11 जिल्दों में प्रकाशित हुआ। यह कथन सत्य है। यह सर्वे जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन द्वारा किया गया था और यह वास्तव में अंग्रेजी में 11 खंडों में प्रकाशित हुआ था। इसलिए यह विकल्प असंगत नहीं है।
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ग्रियर्सन ने तुलसीदास पर कुल बारह निबंध लिखे। यह कथन भी सत्य है। ग्रियर्सन ने तुलसीदास के साहित्य पर महत्वपूर्ण कार्य किया और उनके ऊपर बारह निबंध लिखे। इसलिए यह विकल्प भी असंगत नहीं है।
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सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी को हिन्दी साहित्य का ‘स्वर्णयुग’ मानना ग्रियर्सन की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी। यह कथन भी सही है। ग्रियर्सन ने ही पहली बार इस काल को हिन्दी साहित्य का स्वर्णयुग कहा था, जो कि एक महत्वपूर्ण योगदान था। इसलिए यह विकल्प भी असंगत नहीं है।
इसलिए, केवल विकल्प 2 ही असंगत है, क्योंकि 'द मॉडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ हिन्दुस्तान' ग्रंथ 11 अध्यायों में विभाजित है, न कि 14 में।
प्रश्न 337
सुमेलित कीजिए -
(अ) हमारी हार का बदला चुकाने आएगा, संकल्प-धर्म चेतना का रक्त प्लावित स्तर। : (a) आलोक धन्वा
(ब) उससे पूछेंगे तो आप क्या अपाहिज हैं; तो आप क्यों अपाहिज हैं ? : (b) कुँवर नारायण
(स) कविता एक खिलना है फूलों के बहाने कविता का खिलना भला फूल क्या जाने ! : (c) रघुवीर सहाय
(द) जहाँ नदियाँ समुद्र से मिलती हैं वहाँ मेरा क्या है। मैं नहीं जानता लेकिन एक दिन जाना है उधर : (d) गजानन माधव मुक्तिबोध
कूट :
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उत्तर और व्याख्या
Here's a detailed explanation justifying why Option 3 is the correct answer and why the other options are incorrect, based on the provided information:
Justification for Option 3 being correct:
Option 3 states the following matches:
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(अ) हमारी हार का बदला चुकाने आएगा, संकल्प-धर्म चेतना का रक्त प्लावित स्तर। : (d) गजानन माधव मुक्तिबोध - This is a correct match. The lines "हमारी हार का बदला चुकाने आएगा, संकल्प-धर्म चेतना का रक्त प्लावित स्तर" are indeed from a poem by Gajanan Madhav Muktibodh. These lines reflect Muktibodh's characteristic style of revolutionary fervor and social consciousness.
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(ब) उससे पूछेंगे तो आप क्या अपाहिज हैं; तो आप क्यों अपाहिज हैं ? : (c) रघुवीर सहाय - This is also a correct match. The lines "उससे पूछेंगे तो आप क्या अपाहिज हैं; तो आप क्यों अपाहिज हैं ?" are from Raghuvir Sahay's poem "अपाहिज से प्रश्न" (Questions to a Disabled Person). The poem is a satirical commentary on media insensitivity and the exploitation of human suffering.
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(स) कविता एक खिलना है फूलों के बहाने कविता का खिलना भला फूल क्या जाने ! : (b) कुँवर नारायण - This is a correct match. The lines "कविता एक खिलना है फूलों के बहाने कविता का खिलना भला फूल क्या जाने !" are from a poem by Kunwar Narayan. These lines reflect Kunwar Narayan's poetic style of using simple imagery to convey deeper philosophical meanings about the nature of poetry and creativity.
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(द) जहाँ नदियाँ समुद्र से मिलती हैं वहाँ मेरा क्या है। मैं नहीं जानता लेकिन एक दिन जाना है उधर : (a) आलोक धन्वा - This is a correct match. The lines "जहाँ नदियाँ समुद्र से मिलती हैं वहाँ मेरा क्या है। मैं नहीं जानता लेकिन एक दिन जाना है उधर" are from a poem by Alok Dhanwa. These lines reflect Alok Dhanwa's poetic style of using simple imagery to convey deeper philosophical meanings about the nature of poetry and creativity.
Explanation of why other options are incorrect:
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Option 1: (अ) (a); (ब) (b); (स) (c); (द) (d) - This option is incorrect because it incorrectly assigns each quote to the wrong poet. For example, it assigns Muktibodh's lines to Alok Dhanwa, Raghuvir Sahay's lines to Kunwar Narayan, Kunwar Narayan's lines to Raghuvir Sahay, and Alok Dhanwa's lines to Muktibodh, which is factually wrong.
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Option 2: (अ) (d); (ब) (c); (स) (a); (द) (b) - While this option correctly identifies Muktibodh and Raghuvir Sahay, it incorrectly assigns Kunwar Narayan's lines to Alok Dhanwa and Alok Dhanwa's lines to Kunwar Narayan.
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Option 4: (अ) (a); (ब) (c); (स) (d); (द) (b) - This option correctly identifies Raghuvir Sahay, but incorrectly assigns Muktibodh's lines to Alok Dhanwa, Kunwar Narayan's lines to Muktibodh, and Alok Dhanwa's lines to Kunwar Narayan.
In summary, Option 3 is the only option that correctly matches each quote to its respective poet, making it the correct answer.
प्रश्न 338
नमक' शीर्षक कहानी का कथानक किस समस्या पर आधारित है ?
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
भारत-पाक विभाजन व पुनर्वास की समस्या पर।
व्याख्या:
'नमक' शीर्षक कहानी का कथानक भारत-पाक विभाजन व पुनर्वास की समस्या पर आधारित है, क्योंकि कहानी विभाजन के बाद लोगों के दिलों में बसी अपनी जन्मभूमि के प्रति प्रेम और भावनात्मक लगाव को दर्शाती है। सिख बीबी द्वारा लाहौर से लाए गए नमक को भारत में भी महसूस करने की इच्छा, विभाजन के कारण बिछड़े लोगों की पीड़ा और अपनी जड़ों से जुड़े रहने की तीव्र लालसा को उजागर करती है। कहानी विभाजन के दर्द और पुनर्वास की चुनौतियों को मानवीय संवेदना के साथ प्रस्तुत करती है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं:
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आदिवासी जीवन की समस्याओं पर: 'नमक' कहानी में आदिवासी जीवन या उनकी समस्याओं का कोई उल्लेख नहीं है। कहानी का केंद्र बिंदु विभाजन और उससे उत्पन्न मानवीय भावनाएं हैं।
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किसान जीवन के संघर्ष पर: कहानी में किसान जीवन या उनके संघर्षों का कोई चित्रण नहीं है। कहानी का विषय विभाजन के कारण उत्पन्न विस्थापन और भावनात्मक जुड़ाव है।
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ग्रामोत्थान पर: 'नमक' कहानी ग्रामोत्थान या ग्रामीण विकास से संबंधित नहीं है। कहानी विभाजन के बाद लोगों के भावनात्मक और सांस्कृतिक पुनर्वास पर केंद्रित है।
प्रश्न 339
कविता के लिए चित्र भाषा की आवश्यकता पड़ती है, उसके शब्द सस्वर होने चाहिए, जो बोलते हों, सेब की तरह जिनके रस की मधुर लालिमा भीतर न समा सकने के कारण बाहर झलक पड़े।'
उक्त पंक्तियाँ किस छायावादी ग्रंथ की भूमिका से ली गई हैं ?
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
पल्लव से।
व्याख्या:
उपरोक्त पंक्तियाँ सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित छायावादी काव्य संग्रह 'पल्लव' की भूमिका से ली गई हैं। 'पल्लव' की भूमिका छायावाद के सिद्धांतों और काव्य भाषा पर पंत के विचारों को स्पष्ट रूप से व्यक्त करती है। इन पंक्तियों में, पंत कविता के लिए चित्र भाषा (अर्थात, ऐसी भाषा जो मन में चित्र उत्पन्न करे), सस्वर शब्दों (जो सुनने में मधुर हों और अर्थ व्यक्त करें), और ऐसे शब्दों की आवश्यकता पर बल देते हैं जो सेब की तरह रस से भरे हों, जिनका सौंदर्य और अर्थ भीतर न समा सकने के कारण बाहर झलक पड़े। यह भाषा और कविता के प्रति पंत के छायावादी दृष्टिकोण को दर्शाता है, जो 'पल्लव' की भूमिका का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
अन्य विकल्पों की अस्वीकृति:
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वीणा से: 'वीणा' भी सुमित्रानंदन पंत का एक काव्य संग्रह है, लेकिन उपरोक्त पंक्तियाँ 'वीणा' की भूमिका में नहीं मिलती हैं। 'वीणा' में प्रकृति और सौंदर्य के प्रति पंत का प्रारंभिक प्रेम झलकता है, लेकिन 'पल्लव' की भूमिका में छायावाद के सिद्धांतों पर जो विस्तृत चर्चा है, वह 'वीणा' में नहीं है।
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लोकायतन से: 'लोकायतन' सुमित्रानंदन पंत की एक बाद की रचना है, जो एक महाकाव्य है और इसमें सामाजिक और दार्शनिक विषयों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया गया है। यह छायावादी काव्य संग्रह नहीं है और इसकी भूमिका में उपरोक्त पंक्तियाँ नहीं पाई जाती हैं।
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स्वर्ण किरण से: 'स्वर्ण किरण' भी सुमित्रानंदन पंत की एक रचना है, लेकिन यह अरविंद दर्शन से प्रभावित है और इसमें आध्यात्मिक और दार्शनिक विषयों पर अधिक जोर दिया गया है। 'स्वर्ण किरण' की भूमिका में उपरोक्त पंक्तियाँ नहीं मिलती हैं। यह छायावाद के प्रारंभिक दौर की रचना नहीं है, जबकि 'पल्लव' छायावाद के महत्वपूर्ण स्तंभों में से एक है।
इसलिए, 'पल्लव' ही एकमात्र ऐसा विकल्प है जिसकी भूमिका में ये पंक्तियाँ पाई जाती हैं, जो इसे सही उत्तर बनाती है।
प्रश्न 340
निम्नलिखित रचनाओं एवं उनके रचयिताओं के नामों को सुमेलित कीजिए -
रचना : रचनाकार
(i) ड्योढ़ी पर आलाप : (a) यशपाल
(ii) भिक्षु के पत्र : (b) नागार्जुन
(iii) पिंजरे की उड़ान : (c) भदंत आनंद कौसल्यायन
(iv) मैं मिलटरी का बूढ़ा घोड़ा : (d) यतीन्द्र मिश्र
कूट :
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
Here's the explanation supporting Option 3 as the correct answer:
Option 3 is correct because it accurately matches the literary works with their respective authors:
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(i) ड्योढ़ी पर आलाप : (d) यतीन्द्र मिश्र - "ड्योढ़ी पर आलाप" is indeed a work by Yatindra Mishra. This is a well-established fact in Hindi literature.
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(ii) भिक्षु के पत्र : (c) भदंत आनंद कौसल्यायन - "भिक्षु के पत्र" is a known work of Bhadant Anand Kausalyayan. His writings often reflect his Buddhist philosophy and experiences, which aligns with the title.
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(iii) पिंजरे की उड़ान : (a) यशपाल - "पिंजरे की उड़ान" is a recognized work by Yashpal. Yashpal was a prominent writer known for his progressive and often revolutionary themes, and this work fits within his oeuvre.
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(iv) मैं मिलटरी का बूढ़ा घोड़ा : (b) नागार्जुन - "मैं मिलटरी का बूढ़ा घोड़ा" is a poem by Nagarjun. Nagarjun was a prominent Hindi poet and writer, known for his satirical and socially conscious works.
Now, let's explain why the other options are incorrect:
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Option 1: This option incorrectly pairs "ड्योढ़ी पर आलाप" with Yashpal, "भिक्षु के पत्र" with Bhadant Anand Kausalyayan, "पिंजरे की उड़ान" with Nagarjun, and "मैं मिलटरी का बूढ़ा घोड़ा" with Yatindra Mishra. Only the pairing of "भिक्षु के पत्र" with Bhadant Anand Kausalyayan is correct.
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Option 2: This option incorrectly pairs "ड्योढ़ी पर आलाप" with Yashpal, "भिक्षु के पत्र" with Nagarjun, "पिंजरे की उड़ान" with Bhadant Anand Kausalyayan, and "मैं मिलटरी का बूढ़ा घोड़ा" with Yatindra Mishra. None of these pairings are correct.
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Option 4: This option incorrectly pairs "ड्योढ़ी पर आलाप" with Bhadant Anand Kausalyayan, "भिक्षु के पत्र" with Yatindra Mishra, "पिंजरे की उड़ान" with Yashpal, and "मैं मिलटरी का बूढ़ा घोड़ा" with Nagarjun. Only the pairing of "पिंजरे की उड़ान" with Yashpal is correct.
Therefore, only Option 3 provides the correct matching of each work with its author, making it the only valid answer.