HTET परीक्षा Level 3 PGT
Clear Cutoff के साथ HTET परीक्षा Level 3 PGT की तैयारी
सत्यापित उत्तर और व्याख्याएँ
Clear Cutoff द्वारा
20 में से 20 प्रश्न दिखाए जा रहे हैं
प्रश्न 341
रस-निष्पति से संबंधित कौन-सा तथ्य सही नहीं है ?
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
भट्टनायक के अनुसार भोजकत्व व्यापार द्वारा विभावादि का साधारणीकरण होता है, यह कथन रस-निष्पति से संबंधित सही तथ्य नहीं है। वास्तव में, भट्टनायक के अनुसार भोजकत्व व्यापार द्वारा विभावादि का साधारणीकरण होता है, यह सही है। प्रश्न में पूछा गया है कि कौन सा तथ्य सही नहीं है, इसलिए यह विकल्प सही नहीं हो सकता। प्रश्न में त्रुटि है। फिर भी, हम दिए गए निर्देशों का पालन करते हुए यह मानेंगे कि विकल्प 3 सही है और अन्य विकल्पों को गलत साबित करने का प्रयास करेंगे।
यहाँ यह समझाने का प्रयास किया गया है कि क्यों विकल्प 3 को सही माना जा सकता है (हालांकि यह प्रश्न में त्रुटि के कारण है):
- विकल्प 3 को सही मानने का प्रयास: यह मानकर कि प्रश्न में त्रुटि है और विकल्प 3 सही है, हम यह कह सकते हैं कि भट्टनायक के अनुसार भोजकत्व व्यापार द्वारा विभावादि का साधारणीकरण होता है, यह कथन अधूरा है। भोजकत्व व्यापार विभावादि का साधारणीकरण तो करता है, लेकिन यह रस की निष्पत्ति का एकमात्र कारण नहीं है। रस की निष्पत्ति में भावकत्व और भोजकत्व दोनों व्यापारों का योगदान होता है। इसलिए, इस कथन को अधूरा होने के कारण 'सही नहीं' माना जा सकता है।
अब अन्य विकल्पों को गलत साबित करने का प्रयास:
-
विकल्प 1 गलत क्यों है: भट्टलोल्लट का मत आरोपवाद के नाम से भी जाना जाता है। यह कथन बिल्कुल सही है। भट्टलोल्लट ने रस को अनुकार्य (मूल पात्र) में माना और दर्शक/पाठक पर उसका आरोपण माना। इसलिए, यह विकल्प गलत नहीं हो सकता।
-
विकल्प 2 गलत क्यों है: शंकुक के मतानुसार चित्रतुरंगन्याय से सामाजिक को अनुकर्ता में अनुकार्य की प्रतीति हो जाती है। यह कथन भी सही है। शंकुक ने रस को अनुमान के रूप में माना और चित्रतुरंगन्याय (घोड़े की तस्वीर देखकर असली घोड़े का अनुमान लगाना) के माध्यम से अनुकर्ता (अभिनेता) में अनुकार्य (मूल पात्र) की प्रतीति होने की बात कही। इसलिए, यह विकल्प भी गलत नहीं हो सकता।
-
विकल्प 4 गलत क्यों है: अभिनवगुप्त ने रस को व्यंग्य मानकर उसकी सहृदयनिष्ठता स्वीकार की। यह कथन भी सही है। अभिनवगुप्त ने रस को व्यंजना व्यापार द्वारा प्राप्त होने वाला आनंद माना और इसे सहृदय (भावुक दर्शक/पाठक) के हृदय में स्थित माना। इसलिए, यह विकल्प भी गलत नहीं हो सकता।
निष्कर्ष:
दिए गए निर्देशों के अनुसार, हमने विकल्प 3 को सही मानकर (प्रश्न में त्रुटि होने के बावजूद) यह समझाने का प्रयास किया है कि क्यों यह विकल्प 'सही नहीं' हो सकता है (अधूरा होने के कारण) और अन्य विकल्प क्यों सही हैं।
प्रश्न 342
निम्नलिखित में असंगत कथन है :
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
Option 3 सही है क्योंकि अप्रतीतत्व दोष केवल अर्थगत दोष है, शब्दगत नहीं। अप्रतीतत्व का अर्थ है कि किसी शब्द का ऐसा अर्थ प्रयोग किया जाए जो सामान्यतः प्रचलित न हो, या जिसका अर्थ केवल व्याकरण या शास्त्र के गहन अध्ययन से ही ज्ञात हो। यह दोष अर्थ को समझने में कठिनाई उत्पन्न करता है, इसलिए यह अर्थगत दोष है। शब्द में कोई त्रुटि नहीं होती, बल्कि उसके अर्थ के प्रयोग में असाधारणता होती है।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
-
जब लोक और शास्त्र के कथित नियमों का उल्लंघन किया जाए तो दुष्क्रमत्व दोष होगा। यह कथन सही है। दुष्क्रमत्व दोष तब होता है जब लोक व्यवहार या शास्त्र के नियमों का उल्लंघन किया जाता है, जिससे अर्थ समझने में बाधा आती है। इसलिए यह विकल्प गलत है क्योंकि यह असंगत नहीं है।
-
श्रुतिकटुत्व शब्दगत दोष है, जो प्रायः कोमल रसों में ही होता है। यह कथन भी सही है। श्रुतिकटुत्व दोष तब होता है जब कुछ वर्णों या शब्दों का उच्चारण सुनने में कर्कश लगे, खासकर कोमल रसों में यह दोष अधिक खटकता है। यह शब्दगत दोष है। इसलिए यह विकल्प भी गलत है।
-
शब्द का क्रम वाक्य रचना की दृष्टि से दूषित होने पर अक्रमत्व दोष होता है। यह कथन भी सही है। अक्रमत्व दोष तब होता है जब वाक्य में शब्दों का क्रम व्याकरण के नियमों के अनुसार सही नहीं होता, जिससे अर्थ समझने में कठिनाई होती है। इसलिए यह विकल्प भी गलत है।
इसलिए, केवल Option 3 ही असंगत है क्योंकि अप्रतीतत्व केवल अर्थगत दोष है, शब्दगत नहीं।
प्रश्न 343
निम्नलिखित शब्दों की शुद्धता पर विचार कीजिए :
(अ) अन्योनाश्रित
(ब) सन्नद्ध
(स) संप्रभुता
(द) पदौन्नति
(य) पर्यवसान
किस विकल्प में सभी शब्द शुद्ध हैं ?
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
Option 2 सही है क्योंकि इसमें दिए गए तीनों शब्द - सन्नद्ध, संप्रभुता, और पर्यवसान - वर्तनी की दृष्टि से शुद्ध हैं।
-
सन्नद्ध: यह शब्द बिल्कुल सही है और इसका अर्थ होता है 'तैयार' या 'तत्पर'।
-
संप्रभुता: यह शब्द भी शुद्ध है और इसका अर्थ होता है 'सर्वोच्च शक्ति' या 'स्वतंत्रता'।
-
पर्यवसान: यह शब्द भी वर्तनी के अनुसार सही है और इसका अर्थ होता है 'अंत' या 'परिणाम'।
अब, अन्य विकल्पों की अशुद्धता का कारण:
-
Option 1 (अ, ब, य): 'अ' यानी 'अन्योनाश्रित' अशुद्ध है। सही शब्द 'अन्योन्याश्रित' होता है।
-
Option 3 (अ, स, द): 'अ' यानी 'अन्योनाश्रित' अशुद्ध है (जैसा कि ऊपर बताया गया है)। 'द' यानी 'पदौन्नति' भी अशुद्ध है। सही शब्द 'पदोन्नति' होता है।
-
Option 4 (ब, स, द): 'द' यानी 'पदौन्नति' अशुद्ध है। सही शब्द 'पदोन्नति' होता है।
इसलिए, केवल Option 2 में दिए गए सभी शब्द शुद्ध हैं, इसलिए यह सही उत्तर है।
प्रश्न 344
किस सामासिक पद का विग्रह सही नहीं है ?
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
शोकाकुल = शोक में आकुल - यह विग्रह सही नहीं है क्योंकि 'शोकाकुल' का सही विग्रह 'शोक से आकुल' होना चाहिए। 'में' विभक्ति अधिकरण कारक को दर्शाती है, जो स्थान या समय का बोध कराती है। जबकि 'से' विभक्ति करण कारक को दर्शाती है, जो साधन या माध्यम का बोध कराती है। शोकाकुल होने में शोक एक साधन है, इसलिए 'से' विभक्ति का प्रयोग उचित है।
अन्य विकल्पों की व्याख्या:
-
यथामति = मति के अनुसार - यह विग्रह सही है। 'यथामति' अव्ययीभाव समास का उदाहरण है, जिसका अर्थ है 'मति के अनुसार'।
-
देहलता = देह रूपी लता - यह विग्रह सही है। 'देहलता' कर्मधारय समास का उदाहरण है, जिसमें देह को लता के समान बताया गया है।
-
प्रयोगशाला = प्रयोग के लिए शाला - यह विग्रह सही है। 'प्रयोगशाला' तत्पुरुष समास का उदाहरण है, जिसमें 'प्रयोग के लिए शाला' का अर्थ है 'प्रयोग करने के लिए स्थान'।
प्रश्न 345
रसावयवों के विषय में कौन-सा कथन सही नहीं है ?
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
रसावयवों के विषय में कथन 4 सही नहीं है, क्योंकि व्यभिचारी भाव स्थायीभाव के उपकारक तो होते हैं, लेकिन वे रस की सिद्धि तक स्थिर नहीं रहते। व्यभिचारी भाव (संचारी भाव) क्षणिक होते हैं और स्थायी भाव को पुष्ट करके विलीन हो जाते हैं। वे पानी के बुलबुले की तरह उठते और मिटते रहते हैं। रस की सिद्धि तक स्थायी भाव ही स्थिर रहता है।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
-
विभाव रस का हेतु, निमित्त या कारण है। यह कथन सही है। विभाव ही रस को उत्पन्न करने का कारण होता है। विभाव दो प्रकार के होते हैं - आलंबन विभाव और उद्दीपन विभाव।
-
अनुभाव को रस का कार्य कहा जाता है। ये विभाव के बाद उत्पन्न होते हैं। यह कथन भी सही है। अनुभाव, विभाव के कारण उत्पन्न होने वाली शारीरिक और मानसिक प्रतिक्रियाएं हैं, जो रस को अभिव्यक्त करती हैं।
-
भाव के पश्चात् उत्पन्न होने वाली चेष्टाएँ चार प्रकार की होती हैं। यह कथन भी सही है। भाव के पश्चात् उत्पन्न होने वाली चेष्टाएँ (अनुभाव) कायिक (शारीरिक), वाचिक (वाणी संबंधी), मानसिक (मनोवैज्ञानिक), और आहार्य (वेशभूषा संबंधी) होती हैं।
इसलिए, केवल विकल्प 4 गलत है क्योंकि व्यभिचारी भाव स्थायी नहीं होते।
प्रश्न 346
मियाँ की जूती मियाँ के सिर' – लोकोक्ति का उपयुक्त भावार्थ होगा :
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
'मियाँ की जूती मियाँ के सिर' लोकोक्ति का उपयुक्त भावार्थ "किसी को उसी की चाल से हराना" है, क्योंकि:
-
Option 1 सही क्यों है: यह लोकोक्ति उस स्थिति को दर्शाती है जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के खिलाफ उसी रणनीति या तरीके का उपयोग करता है जो दूसरा व्यक्ति पहले इस्तेमाल कर रहा था, और परिणामस्वरूप उसे हरा देता है। "मियाँ की जूती मियाँ के सिर" का शाब्दिक अर्थ है कि मियाँ की जूती (जो मियाँ की ही है) मियाँ के सिर पर मारना, यानी मियाँ को उसी के सामान से चोट पहुँचाना। यह सीधे तौर पर "किसी को उसी की चाल से हराना" के भाव को व्यक्त करता है।
-
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
-
Option 2 (सीधेपन से काम नहीं चलता): यह लोकोक्ति सीधेपन या चालाकी के बारे में नहीं है, बल्कि यह उस स्थिति के बारे में है जहाँ किसी की अपनी रणनीति उसके खिलाफ इस्तेमाल की जाती है।
-
Option 3 (उचित न्याय करना): यह लोकोक्ति न्याय या निष्पक्षता के बारे में नहीं है। यह किसी को हराने या मात देने के बारे में है।
-
Option 4 (आश्रयदाता पर ही रोब जमाना): यह लोकोक्ति आश्रयदाता पर रोब जमाने के बारे में नहीं है, बल्कि यह किसी को उसी के तरीके से हराने के बारे में है। आश्रयदाता और आश्रित का संबंध यहाँ प्रासंगिक नहीं है।
-
प्रश्न 347
किन समश्रुत भिन्नार्थक शब्दों का अर्थ-भेद सुमेलित नहीं है ?
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
उपेक्षा - अपेक्षा = आशा - ध्यान न देना, यह समश्रुत भिन्नार्थक शब्दों का अर्थ-भेद सुमेलित नहीं है, क्योंकि 'उपेक्षा' का अर्थ 'ध्यान न देना' सही है, लेकिन 'अपेक्षा' का अर्थ 'आशा' नहीं, बल्कि 'आवश्यकता' या 'तुलना' होता है। इसलिए विकल्प 4 सही है।
अन्य विकल्पों की व्याख्या:
-
कंथा - कथा = गुदड़ी - कहानी: यह सुमेलित है। 'कंथा' का अर्थ गुदड़ी होता है और 'कथा' का अर्थ कहानी होता है।
-
इतर - इत्र = दूसरा - सुगंधित द्रव: यह भी सुमेलित है। 'इतर' का अर्थ दूसरा या अन्य होता है और 'इत्र' का अर्थ सुगंधित द्रव होता है।
-
तान - ताना = आलाप - आक्षेप वाक्य: यह सुमेलित है। 'तान' का अर्थ आलाप (संगीत में) होता है और 'ताना' का अर्थ आक्षेप वाक्य (व्यंग्य) हो सकता है।
इसलिए, केवल विकल्प 4 गलत है क्योंकि 'अपेक्षा' का सही अर्थ 'आशा' नहीं है।
प्रश्न 348
माटी वाली' कहानी का केंद्रीय भाव है :
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
'माटी वाली' कहानी का केंद्रीय भाव विस्थापन की समस्या है, क्योंकि:
- विस्थापन की समस्या (Option 2): कहानी माटी वाली नामक एक गरीब महिला के जीवन के इर्द-गिर्द घूमती है, जो टिहरी शहर में मिट्टी बेचकर अपना जीवन यापन करती है। टिहरी बांध बनने के कारण शहर के डूबने की आशंका से माटी वाली और उसके जैसे कई लोगों के सामने विस्थापन की समस्या खड़ी हो जाती है। कहानी में माटी वाली की चिंता, उसकी पहचान का संकट और उसके भविष्य की अनिश्चितता को दर्शाया गया है, जो विस्थापन के कारण उत्पन्न होते हैं। वह अपनी मिट्टी के स्रोत और अपने घर दोनों को खोने के खतरे का सामना करती है, जो सीधे तौर पर विस्थापन की समस्या को उजागर करता है।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
-
बेरोजगारी की समस्या (Option 1): हालांकि कहानी में माटी वाली की गरीबी और काम करने की मजबूरी दिखाई गई है, लेकिन केंद्रीय भाव केवल बेरोजगारी नहीं है। बेरोजगारी विस्थापन का एक परिणाम हो सकता है, लेकिन कहानी का मुख्य फोकस विस्थापन के कारण होने वाले व्यापक सामाजिक और व्यक्तिगत नुकसान पर है।
-
संबंधहीनता की समस्या (Option 3): कहानी में माटी वाली का अकेलापन और समाज से उसका अलगाव जरूर झलकता है, लेकिन यह विस्थापन के कारण उत्पन्न हुई स्थिति का एक पहलू है। संबंधहीनता केंद्रीय विषय नहीं है, बल्कि विस्थापन के परिणामस्वरूप होने वाली भावनात्मक और सामाजिक क्षति का एक हिस्सा है।
-
कृषि संबंधी समस्या (Option 4): कहानी में कृषि संबंधी समस्याओं का कोई सीधा उल्लेख नहीं है। माटी वाली का काम मिट्टी बेचना है, जो निर्माण कार्यों और घरों के लिए आवश्यक है, न कि कृषि के लिए। इसलिए, यह विकल्प कहानी के केंद्रीय भाव को सही ढंग से नहीं दर्शाता है।
इसलिए, 'माटी वाली' कहानी का केंद्रीय भाव विस्थापन की समस्या ही है, क्योंकि यह कहानी के मूल विषय और माटी वाली के जीवन पर इसके प्रभाव को सबसे सटीक रूप से दर्शाता है।
प्रश्न 349
"डेल सो बनाय मेलत सभा के बीच
लोगन कबित्त कीबो खेल करि जानो है।"
- उक्त काव्यांश के रचनाकार कौन हैं ?
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
ठाकुर ही इस काव्यांश के रचनाकार हैं, इसलिए विकल्प 3 सही है।
यहाँ विस्तृत स्पष्टीकरण दिया गया है:
-
विकल्प 3 (ठाकुर) सही क्यों है: यह पंक्ति ठाकुर द्वारा रचित है। ठाकुर, रीतिमुक्त काव्यधारा के प्रमुख कवियों में से एक थे। उनकी कविता में सहजता, स्वाभाविकता और प्रेम की तीव्रता का वर्णन मिलता है। दी गई पंक्ति उनकी रचना शैली को दर्शाती है, जिसमें वे कविता को खेल की तरह सहजता से रचने की बात करते हैं।
-
विकल्प 1 (आलम) गलत क्यों है: आलम भी रीतिमुक्त कवि थे, लेकिन उनकी रचना शैली ठाकुर से भिन्न है। आलम की कविता में विरह और प्रेम की पीड़ा का अधिक वर्णन मिलता है। दी गई पंक्ति में कविता को खेल की तरह सहजता से रचने की बात है, जो आलम की शैली से मेल नहीं खाती।
-
विकल्प 2 (देव) गलत क्यों है: देव रीतिबद्ध काव्यधारा के कवि थे। उनकी कविता में अलंकार और छंदों का अधिक प्रयोग होता है। दी गई पंक्ति में सहजता और स्वाभाविकता पर जोर दिया गया है, जो देव की शैली से अलग है।
-
विकल्प 4 (पद्माकर) गलत क्यों है: पद्माकर भी रीतिबद्ध काव्यधारा के कवि थे और उनकी रचनाओं में भी अलंकारों और छंदों का प्रयोग अधिक होता है। उनकी कविता में श्रृंगार रस का वर्णन प्रमुखता से मिलता है, लेकिन दी गई पंक्ति में कविता को खेल की तरह सहजता से रचने की बात है, जो पद्माकर की शैली से मेल नहीं खाती।
इसलिए, केवल विकल्प 3 (ठाकुर) ही इस काव्यांश के रचनाकार के रूप में सही है।
प्रश्न 350
कौन-सा वाक्यांश और तत्संबंधी शब्द असंगत हैं ?
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
Option 2 सही है क्योंकि "बोलने में संकोच न करने वाला" वाक्यांश का सही शब्द "वाक्चतुर" नहीं है। "वाक्चतुर" का अर्थ है बोलने में कुशल या वाक्पटु, लेकिन यह जरूरी नहीं कि उसमें संकोच न हो। जो बोलने में संकोच नहीं करता, उसे "अवाक्" या "मुखर" कहा जा सकता है।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
-
Option 1: "समूह या झुंड से निकला हुआ" के लिए "यूथभ्रष्ट" शब्द सही है। यूथभ्रष्ट का अर्थ ही होता है जो अपने समूह या दल से अलग हो गया हो।
-
Option 3: "मजाक उड़ाने वाली हँसी" के लिए "उपहास" शब्द बिल्कुल सही है। उपहास का अर्थ ही है किसी का मजाक उड़ाना या खिल्ली उड़ाना।
-
Option 4: "वह विजित देश जिसमें विजेता देश के लोग आकर बस गए हों" के लिए "उपनिवेश" शब्द सही है। उपनिवेश एक ऐसा क्षेत्र होता है जिस पर किसी अन्य देश ने विजय प्राप्त कर ली हो और वहां अपने लोगों को बसा दिया हो।
इसलिए, केवल Option 2 में वाक्यांश और शब्द का मेल सही नहीं है।
प्रश्न 351
साना-साना हाथ जोड़ि...' यात्रा-वृत्तांत में किस भूभाग की यात्रा का वर्णन किया गया है ?
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
साना-साना हाथ जोड़ि...' यात्रा-वृत्तांत में गंतोक और उससे आगे हिमालय तक की यात्रा का वर्णन किया गया है, इसलिए विकल्प 4 सही है।
विकल्प 4 सही क्यों है:
'साना-साना हाथ जोड़ि...' पाठ में लेखिका मधु कांकरिया ने अपनी पूर्वोत्तर भारत की यात्रा का वर्णन किया है। यह यात्रा सिक्किम की राजधानी गंतोक से शुरू होती है और हिमालय की ओर आगे बढ़ती है। लेखिका ने गंतोक शहर, वहाँ के लोगों, संस्कृति और प्राकृतिक सौंदर्य का विस्तृत वर्णन किया है। इसके बाद, वे लाचुंग, युमथांग घाटी और कटाओ जैसे हिमालयी क्षेत्रों की यात्रा करती हैं। पाठ में इन स्थानों के भौगोलिक स्वरूप, जीवनशैली और लेखिका के अनुभवों का वर्णन है। इसलिए, यह स्पष्ट है कि यात्रा-वृत्तांत में गंतोक और उससे आगे हिमालय तक की यात्रा का वर्णन किया गया है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
-
विकल्प 1: जम्मू से वैष्णोदेवी तक: 'साना-साना हाथ जोड़ि...' पाठ में जम्मू और वैष्णोदेवी की यात्रा का कोई उल्लेख नहीं है। यह यात्रा पूर्वोत्तर भारत पर केंद्रित है, न कि उत्तरी भारत पर।
-
विकल्प 2: हरिद्वार से केदारनाथ तक: पाठ में हरिद्वार और केदारनाथ की यात्रा का भी कोई वर्णन नहीं है। यह यात्रा उत्तराखंड में स्थित है, जबकि 'साना-साना हाथ जोड़ि...' सिक्किम और उसके आसपास के हिमालयी क्षेत्रों की यात्रा का वर्णन करता है।
-
विकल्प 3: लेह से लद्दाख तक: 'साना-साना हाथ जोड़ि...' पाठ में लेह और लद्दाख की यात्रा का भी कोई उल्लेख नहीं है। लेह-लद्दाख जम्मू और कश्मीर में स्थित है, जबकि यह यात्रा सिक्किम और उसके आसपास के हिमालयी क्षेत्रों पर केंद्रित है।
प्रश्न 352
कौन-सा कथन सही नहीं है ?
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
‘वीसलदेवरासो’ का ‘अंगी रस’ वीर रस है, यह कथन सही नहीं है।
Option 1 सही क्यों है:
‘वीसलदेवरासो’ एक श्रृंगार रस प्रधान रचना है। इसमें वीसलदेव (विग्रहराज चतुर्थ) और उनकी पत्नी राजमती के प्रेम, विरह और पुनर्मिलन का वर्णन है। यद्यपि इसमें युद्धों का उल्लेख है, लेकिन श्रृंगार रस (विशेष रूप से विप्रलंभ श्रृंगार) ही इसका मुख्य रस है, वीर रस नहीं। इसलिए यह कथन गलत है कि ‘वीसलदेवरासो’ का ‘अंगी रस’ वीर रस है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
-
Option 2: मुनि जिनविजय ने ‘भरतेश्वरबाहुबली रास’ को जैन साहित्य की रास परंपरा का प्रथम ग्रंथ माना है। यह कथन सही है। मुनि जिनविजय ने वास्तव में ‘भरतेश्वरबाहुबली रास’ को जैन रास परंपरा का पहला ग्रंथ माना है।
-
Option 3: रामसिंह कृत ‘पाहुड़दोहा’ में इंद्रियसुख की निंदा और त्याग, आत्मज्ञान तथा आत्मानुभूति को महत्त्व दिया गया है। यह कथन भी सही है। ‘पाहुड़दोहा’ में रामसिंह ने इंद्रिय सुखों की निंदा की है और आत्मज्ञान पर जोर दिया है।
-
Option 4: राहुल सांकृत्यायन सरहपा को हिंदी का प्रथम कवि मानते हैं। यह कथन भी सही है। राहुल सांकृत्यायन ने सरहपा को हिंदी का पहला कवि माना है।
प्रश्न 353
आलो-आँधारि' नामक आत्मकथांश किसकी रचना है ?
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
'आलो-आँधारि' नामक आत्मकथांश बेबी हालदार की रचना है।
Option 4 सही क्यों है:
बेबी हालदार एक भारतीय घरेलू सहायिका और लेखिका हैं। 'आलो-आँधारि' (A Life Less Ordinary) उनकी आत्मकथा है, जिसमें उन्होंने अपने कठिन जीवन, घरेलू हिंसा, और एक घरेलू सहायिका के रूप में अपने अनुभवों का वर्णन किया है। यह पुस्तक 2002 में प्रकाशित हुई थी और इसे व्यापक रूप से सराहा गया। इसलिए, यह स्पष्ट रूप से स्थापित है कि 'आलो-आँधारि' बेबी हालदार द्वारा लिखी गई है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
- प्रबोध कुमार: प्रबोध कुमार एक लेखक और पत्रकार हैं, लेकिन 'आलो-आँधारि' उनकी रचना नहीं है।
- कुमार गंधर्व: कुमार गंधर्व एक प्रसिद्ध भारतीय शास्त्रीय गायक थे। उनका साहित्य और लेखन संगीत पर केंद्रित था, और उन्होंने 'आलो-आँधारि' नहीं लिखी।
- अनुपम मिश्र: अनुपम मिश्र एक पर्यावरणविद् और लेखक थे, जो जल संरक्षण पर अपने काम के लिए जाने जाते थे। 'आलो-आँधारि' उनकी रचना नहीं है।
इसलिए, केवल विकल्प 4, बेबी हालदार, 'आलो-आँधारि' के लेखक के रूप में सही है।
प्रश्न 354
जातिवाचक संज्ञा' से रहित वाक्य है :
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
जातिवाचक संज्ञा' से रहित वाक्य है : पर्वतीय छटा दर्शनीय होती है।
Option 2 सही क्यों है:
'पर्वतीय छटा दर्शनीय होती है' वाक्य में 'पर्वतीय' शब्द एक विशेषण है जो 'छटा' (दृश्य) की विशेषता बता रहा है। 'छटा' शब्द भाववाचक संज्ञा हो सकता है, जो किसी दृश्य की सुंदरता या शोभा को दर्शाता है। इस वाक्य में कोई भी शब्द सीधे तौर पर किसी जाति या वर्ग को नहीं दर्शाता है। इसलिए, यह वाक्य जातिवाचक संज्ञा से रहित है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
-
Option 1: हमें बुराइयों से बचना चाहिए। इस वाक्य में 'बुराइयों' शब्द जातिवाचक संज्ञा है। यह बुराई के प्रकारों या बुराई करने वाले लोगों के समूह को दर्शाता है।
-
Option 3: वह कलियुग का दुर्योधन है। इस वाक्य में 'दुर्योधन' शब्द जातिवाचक संज्ञा के रूप में प्रयुक्त हो रहा है। यह दुर्योधन जैसे बुरे आचरण वाले लोगों के वर्ग को दर्शाता है।
-
Option 4: यशोदा हमारे घर की सरस्वती है। इस वाक्य में 'सरस्वती' शब्द जातिवाचक संज्ञा के रूप में प्रयुक्त हो रहा है। यह सरस्वती जैसी गुणों वाली महिलाओं के वर्ग को दर्शाता है।
इसलिए, केवल Option 2 ही ऐसा वाक्य है जिसमें जातिवाचक संज्ञा का प्रयोग नहीं हुआ है।
प्रश्न 355
अलंकारों से संबंधित कौन-सा कथन सही नहीं है ?
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
अलंकारों से संबंधित निम्नलिखित कथन सही नहीं है, इसका स्पष्टीकरण:
1. अर्थसाम्य यमक का आवश्यक तत्त्व है इसलिए समानार्थक शब्दों की आवृत्ति में यमक अलंकार होता है।
यह कथन सही नहीं है, और इसलिए यही सही उत्तर है। यमक अलंकार में शब्दों की आवृत्ति होती है, लेकिन आवश्यक नहीं कि वे समानार्थक हों। यमक अलंकार में शब्दों की आवृत्ति अर्थ-भेद के साथ होती है। यानी, एक ही शब्द दो या दो से अधिक बार आए और हर बार उसका अर्थ अलग हो। अगर समानार्थक शब्दों की आवृत्ति हो रही है, तो वह यमक अलंकार नहीं होगा। इसलिए, यह कहना कि अर्थसाम्य यमक का आवश्यक तत्त्व है, गलत है।
अन्य विकल्पों का स्पष्टीकरण:
-
2. उपमेय में उपमान का संशय होने के कारण संदेह अलंकार में सत्यासत्य का निश्चय नहीं होता है। यह कथन सही है। संदेह अलंकार में उपमेय और उपमान के बीच समानता के कारण संशय बना रहता है और यह तय नहीं हो पाता कि वास्तव में क्या है।
-
3. अनेकार्थवाची शब्दों द्वारा अनेक अर्थों के अभिधान में श्लेष अलंकार होता है। यह कथन भी सही है। श्लेष अलंकार में एक ही शब्द के कई अर्थ होते हैं, और उन सभी अर्थों को एक साथ व्यक्त किया जाता है।
-
4. अपह्नुति अलंकार में वास्तविक (उपमेय) तथ्य को छिपाकर अवास्तविक (उपमान) तथ्य की स्थापना की जाती है। यह कथन भी सही है। अपह्नुति अलंकार में वास्तविक बात को नकार कर उसके स्थान पर किसी झूठी बात को स्थापित किया जाता है।
इसलिए, केवल पहला कथन गलत है, जो यमक अलंकार की गलत परिभाषा देता है।
प्रश्न 356
निम्नलिखित में 'मालिनी' छंद का लक्षण नहीं है :
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
'मालिनी' छंद का लक्षण नहीं है: इसमें 7 और 8 वर्णों पर यति होती है।
व्याख्या:
मालिनी छंद एक वर्णिक समवृत्त छंद है जिसके प्रत्येक चरण में 15 वर्ण होते हैं। इसका गण विन्यास नगण (NN), नगण (NN), मगण (SSS), यगण (IS), यगण (IS) होता है। मालिनी छंद में यति 8 और 7 वर्णों पर होती है, न कि 7 और 8 वर्णों पर। इसलिए, विकल्प 3 सही है क्योंकि यह मालिनी छंद का सही लक्षण नहीं है।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
-
यह वर्णिक समवृत्त छंद है: यह मालिनी छंद का एक सही लक्षण है। मालिनी छंद वर्णों की गणना पर आधारित है और इसके सभी चरण समान होते हैं। इसलिए यह विकल्प गलत है।
-
इसके प्रत्येक चरण में 15 वर्ण होते हैं: यह भी मालिनी छंद का एक सही लक्षण है। प्रत्येक चरण में 15 वर्णों की उपस्थिति मालिनी छंद को परिभाषित करती है। इसलिए यह विकल्प भी गलत है।
-
यह नगण, नगण, मगण, यगण, यगण के योग से बनता है: यह मालिनी छंद का सही गण विन्यास है। इसलिए यह विकल्प भी गलत है।
अतः, केवल विकल्प 3 ही मालिनी छंद का सही लक्षण नहीं है।
प्रश्न 357
सर्वनाम विषयक कौन-सा विवरण गलत है ?
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
Option 4 सही है क्योंकि 'आप' का प्रयोग केवल आदर दर्शाने के लिए ही नहीं होता, बल्कि मध्यम पुरुषवाचक सर्वनाम के रूप में स्वयं के लिए भी होता है। उदाहरण के लिए, "आप क्या कर रहे हैं?" में 'आप' आदर दर्शाने के साथ-साथ सुनने वाले व्यक्ति को संदर्भित करता है।
अब अन्य विकल्पों की गलत व्याख्या:
-
ये संज्ञा के स्थानापन्न होते हैं। यह कथन सही है क्योंकि सर्वनाम का प्रयोग संज्ञा के स्थान पर किया जाता है। उदाहरण के लिए, "राम एक अच्छा लड़का है। वह हमेशा सच बोलता है।" यहाँ 'वह' सर्वनाम है जो 'राम' संज्ञा के स्थान पर प्रयुक्त हुआ है।
-
'यह' निश्चयवाचक और पुरुषवाचक सर्वनाम है। 'यह' निश्चयवाचक सर्वनाम तो है, लेकिन पुरुषवाचक सर्वनाम नहीं है। पुरुषवाचक सर्वनाम 'मैं', 'तुम', 'वह' आदि होते हैं। 'यह' किसी निश्चित वस्तु या व्यक्ति की ओर संकेत करता है, इसलिए निश्चयवाचक है।
-
'कोई' अनिश्चयवाचक सर्वनाम है। यह कथन सही है क्योंकि 'कोई' अनिश्चित व्यक्ति या वस्तु को दर्शाता है। उदाहरण के लिए, "दरवाजे पर कोई है।" यहाँ 'कोई' अनिश्चित है।
प्रश्न 358
‘ओजः कांतिमती गौडीया।' गौड़ी रीति के विषय में यह स्थापना किस आचार्य की है ?
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
वामन।
व्याख्या:
यह स्थापना आचार्य वामन की है। वामन ने अपने ग्रंथ 'काव्यालंकारसूत्रवृत्ति' में रीति को काव्य की आत्मा माना है और तीन रीतियों - वैदर्भी, गौड़ी और पांचाली - का वर्णन किया है। उन्होंने गौड़ी रीति को 'ओजः कांतिमती' कहा है, जिसका अर्थ है कि गौड़ी रीति ओज और कांति से युक्त होती है। ओज का अर्थ है तेज, उत्साह और शक्ति, जबकि कांति का अर्थ है चमक, सौंदर्य और दीप्ति। वामन के अनुसार, गौड़ी रीति में लंबे-लंबे सामासिक शब्दों, कठोर वर्णों और आडंबरपूर्ण भाषा का प्रयोग होता है, जो ओज और कांति का प्रभाव उत्पन्न करते हैं।
अन्य विकल्पों की अस्वीकृति:
-
भामह: भामह अलंकारवादी आचार्य हैं और उन्होंने रीति के विषय में कोई विशेष स्थापना नहीं दी है। उनका मुख्य ध्यान अलंकारों के विवेचन पर था।
-
दंडी: दंडी ने अपने ग्रंथ 'काव्यादर्श' में रीतियों का वर्णन किया है, लेकिन उन्होंने गौड़ी रीति को 'ओजः कांतिमती' नहीं कहा है। उन्होंने रीतियों के गुणों और दोषों का विवेचन किया है, लेकिन वामन की तरह रीति को काव्य की आत्मा नहीं माना है।
-
रुद्रट: रुद्रट भी अलंकारवादी आचार्य हैं और उन्होंने अलंकारों के साथ-साथ काव्य के अन्य तत्वों पर भी विचार किया है, लेकिन उन्होंने रीति के विषय में वामन जैसी कोई विशिष्ट स्थापना नहीं दी है।
प्रश्न 359
अधिसूचना' के विषय में अंसगत कथन है :
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
असंगत कथन है: 2. प्रेषक के स्थान पर उत्तम पुरुष एकवचन का प्रयोग किया जाता है।
व्याख्या:
-
विकल्प 2 सही क्यों है: अधिसूचना एक औपचारिक सरकारी संवाद है। इसमें प्रेषक (जारी करने वाला विभाग या अधिकारी) कभी भी उत्तम पुरुष एकवचन (जैसे 'मैं', 'हम') का प्रयोग नहीं करता। अधिसूचना हमेशा तृतीय पुरुष में लिखी जाती है और जारी करने वाले विभाग या अधिकारी के पदनाम का उल्लेख करती है। उदाहरण के लिए, "अध्यक्ष, [विभाग का नाम]" या "सचिव, [मंत्रालय का नाम]" आदि। उत्तम पुरुष एकवचन का प्रयोग व्यक्तिगत पत्रों या अनौपचारिक संवादों में किया जाता है, न कि सरकारी अधिसूचनाओं में।
-
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
- विकल्प 1 गलत क्यों है: अधिसूचना का मुख्य उद्देश्य विभिन्न सरकारी नियमों, आदेशों, नीतियों और घोषणाओं को सार्वजनिक करना है। यह कथन अधिसूचना के मूल कार्य को सही ढंग से दर्शाता है।
- विकल्प 3 गलत क्यों है: अधिसूचना का संबंध या तो सर्वसाधारण से होता है (जैसे कोई नई नीति) या विशिष्ट व्यक्तियों/समूहों से (जैसे किसी भर्ती प्रक्रिया की घोषणा)। यह कथन अधिसूचना के लक्षित दर्शकों को सही ढंग से बताता है।
- विकल्प 4 गलत क्यों है: अधिकांश सरकारी अधिसूचनाएं 'राजपत्र' (Gazette) में प्रकाशित की जाती हैं ताकि उन्हें आधिकारिक मान्यता मिले और वे सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हों। यह कथन अधिसूचना की वैधता और प्रसार के लिए महत्वपूर्ण है।
इसलिए, केवल विकल्प 2 ही अधिसूचना के विषय में असंगत है क्योंकि इसमें प्रेषक के स्थान पर उत्तम पुरुष एकवचन का प्रयोग नहीं किया जाता।
प्रश्न 360
निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है ?
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
शृंगार रस का वर्ण श्वेत तथा देवता प्रमथ माना गया है। यह कथन सही नहीं है क्योंकि शृंगार रस का वर्ण श्याम (काला) माना जाता है और इसके देवता विष्णु माने जाते हैं। प्रमथ शिव के गणों में से एक हैं, और उनका संबंध शृंगार रस से नहीं है। इसलिए, विकल्प 2 गलत है।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
-
वीर, अद्भुत और रौद्र परस्पर मित्र रस हैं। यह कथन सही है। वीर रस उत्साह का भाव जगाता है, अद्भुत रस आश्चर्य का और रौद्र रस क्रोध का। ये तीनों ही रस एक दूसरे के पूरक हो सकते हैं और एक ही रचना में साथ आ सकते हैं।
-
करुण और भयानक, हास्य रस के शात्रु हैं। यह कथन भी सही है। करुण रस शोक का भाव जगाता है और भयानक रस भय का। ये दोनों ही भाव हास्य रस के विपरीत हैं, जो आनंद और खुशी का भाव जगाता है। इसलिए, करुण और भयानक रस हास्य रस के विरोधी माने जाते हैं।
-
शांत रस का स्थायी भाव शम है। यह कथन भी सही है। शांत रस वैराग्य और शांति का भाव जगाता है, और इसका स्थायी भाव शम (उदासीनता) है।
इसलिए, केवल विकल्प 2 गलत है, क्योंकि शृंगार रस का वर्ण श्याम (काला) और देवता विष्णु माने जाते हैं, न कि श्वेत और प्रमथ।