HTET परीक्षा Level 3 PGT
Clear Cutoff के साथ HTET परीक्षा Level 3 PGT की तैयारी
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प्रश्न 341
डायरी के पन्ने' नामक डायरी अंश में लेखिका ने 'किट्टी' का संबोधन किसे दिया है ?
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उत्तर और व्याख्या
गुड़िया को
व्याख्या:
'डायरी के पन्ने' नामक डायरी अंश में लेखिका ने 'किट्टी' का संबोधन अपनी गुड़िया को दिया है। यह स्पष्ट रूप से डायरी के पाठ में उल्लिखित है जहाँ लेखिका अपनी गुड़िया से बातें करती है और उसे 'किट्टी' कहकर संबोधित करती है। डायरी एक निजी संवाद है, और लेखिका अपनी भावनाओं और विचारों को अपनी गुड़िया के साथ साझा करती है, जिसे वह 'किट्टी' कहती है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं:
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माँ को: डायरी में माँ का उल्लेख है, लेकिन उन्हें 'किट्टी' के नाम से संबोधित नहीं किया गया है। लेखिका का अपनी माँ के साथ संबंध अलग है और उसे 'किट्टी' के रूप में संबोधित करना तर्कसंगत नहीं है।
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बहिन को: यदि लेखिका की कोई बहन होती, तो भी उसे 'किट्टी' के नाम से संबोधित करने का कोई स्पष्ट कारण नहीं है, खासकर जब डायरी में गुड़िया को 'किट्टी' कहा गया है।
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अध्यापिका को: अध्यापिका के साथ लेखिका का संबंध औपचारिक होने की संभावना है, और उन्हें 'किट्टी' जैसे स्नेहपूर्ण नाम से संबोधित करना उचित नहीं होगा। इसके अलावा, पाठ में ऐसा कोई संकेत नहीं है कि लेखिका अपनी अध्यापिका को 'किट्टी' कहती है।
इसलिए, 'गुड़िया को' ही सही उत्तर है क्योंकि डायरी के अंश में लेखिका स्पष्ट रूप से अपनी गुड़िया को 'किट्टी' कहकर संबोधित करती है।
प्रश्न 342
उदाहरण एवं अलंकार की दृष्टि से असंगत विकल्प चुनिए :
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उत्तर और व्याख्या
उदाहरण एवं अलंकार की दृष्टि से असंगत विकल्प विकल्प 3 है, और इसका कारण इस प्रकार है:
विकल्प 3 सही क्यों है:
विकल्प 3 में पंक्ति "बसन देहु, ब्रज में हमें बसन देहु ब्रजराज" दी गई है और इसे श्लेष अलंकार का उदाहरण बताया गया है। श्लेष अलंकार में एक शब्द के एक से अधिक अर्थ होते हैं, जो वाक्य में चमत्कार उत्पन्न करते हैं। इस पंक्ति में "बसन" शब्द दो बार आया है, लेकिन दोनों बार इसका अर्थ "वस्त्र" ही है। यहाँ "बसन" शब्द के दो भिन्न अर्थ नहीं हैं जो श्लेष अलंकार की विशेषता है। इसलिए, यह पंक्ति श्लेष अलंकार का सही उदाहरण नहीं है, और यही कारण है कि यह असंगत है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
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विकल्प 1: उर अंकुरित गर्व-तरु भारी – रूपक अलंकार: इस पंक्ति में "गर्व" को "तरु" (वृक्ष) के रूप में दर्शाया गया है। गर्व और तरु के बीच अभेद आरोपण है, यानी दोनों को एक ही मान लिया गया है। जहाँ उपमेय और उपमान में कोई भेद न रहे, वहाँ रूपक अलंकार होता है। इसलिए यह विकल्प सही है।
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विकल्प 2: कोमल कुसुम समान देह हा ! हुई तप्त अंगारमयी – उपमा अलंकार: इस पंक्ति में देह (शरीर) की तुलना "कोमल कुसुम" (कोमल फूल) से की गई है। "समान" शब्द का प्रयोग उपमा अलंकार का सूचक है, जो दो वस्तुओं के बीच समानता दर्शाता है। इसलिए यह विकल्प सही है।
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विकल्प 4: मुनि तापस जिन तें दुख लहहीं। ते नरेश बिनु पावक दहहीं।। – विभावना अलंकार: विभावना अलंकार वहाँ होता है जहाँ कारण के अभाव में भी कार्य का होना दिखाया जाए। इस पंक्ति में कहा गया है कि राजा बिना अग्नि (पावक) के ही जला देते हैं (दहहीं), जो कि कारण के बिना कार्य होने का उदाहरण है। इसलिए यह विकल्प सही है।
संक्षेप में, केवल विकल्प 3 में दिया गया अलंकार (श्लेष) पंक्ति के साथ मेल नहीं खाता, इसलिए यह असंगत है। अन्य सभी विकल्पों में अलंकार और उदाहरण सही ढंग से मेल खाते हैं।
प्रश्न 343
नाटक एवं नाटककार की दृष्टि से असंगत विकल्प चुनिए :
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उत्तर और व्याख्या
शारदीया और राज्यश्री, जगदीशचन्द्र माथुर द्वारा रचित नाटक नहीं हैं। इसलिए, नाटक एवं नाटककार की दृष्टि से असंगत विकल्प शारदीया, राज्यश्री – जगदीशचन्द्र माथुर है।
यहाँ अन्य विकल्पों की व्याख्या दी गई है कि वे क्यों गलत हैं:
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अन्धेर नगरी, चन्द्रावली – भारतेन्दु हरिश्चन्द्र: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा रचित दोनों नाटक 'अन्धेर नगरी' और 'चन्द्रावली' हैं। इसलिए यह विकल्प सही है।
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ध्रुवस्वामिनी, अजातशत्रु – जयशंकर प्रसाद: 'ध्रुवस्वामिनी' और 'अजातशत्रु' दोनों ही जयशंकर प्रसाद द्वारा लिखे गए प्रसिद्ध नाटक हैं। इसलिए यह विकल्प भी सही है।
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डॉक्टर, युगे-युगे क्रांति – विष्णु प्रभाकर: 'डॉक्टर' और 'युगे-युगे क्रांति' दोनों ही विष्णु प्रभाकर द्वारा रचित नाटक हैं। इसलिए यह विकल्प भी सही है।
इसलिए, केवल विकल्प 4 गलत है क्योंकि 'शारदीया' और 'राज्यश्री' दोनों जगदीशचन्द्र माथुर द्वारा रचित नाटक नहीं हैं। 'शारदीया' लक्ष्मी नारायण लाल द्वारा रचित है और 'राज्यश्री' जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित है।
प्रश्न 344
कौन-सा विकल्प सुमेलित नहीं है ?
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उत्तर और व्याख्या
सनकादि सम्प्रदाय - निम्बार्काचार्य - अचिन्त्य भेदाभेद सुमेलित नहीं है, क्योंकि सनकादि सम्प्रदाय के प्रवर्तक निम्बार्काचार्य हैं, यह सही है, लेकिन निम्बार्काचार्य का दर्शन 'द्वैताद्वैत' है, न कि 'अचिन्त्य भेदाभेद'। 'अचिन्त्य भेदाभेद' दर्शन चैतन्य महाप्रभु के गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय से सम्बंधित है। इसलिए विकल्प 4 सही है क्योंकि यह गलत मिलान दिखाता है।
अन्य विकल्प गलत हैं क्योंकि:
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ब्रह्म सम्प्रदाय - मध्वाचार्य - द्वैतवाद: यह सही है। मध्वाचार्य ब्रह्म सम्प्रदाय के प्रवर्तक थे और उन्होंने द्वैतवाद का प्रतिपादन किया।
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रुद्र सम्प्रदाय - विष्णुस्वामी - शुद्धाद्वैतवाद: यह सही है। विष्णुस्वामी रुद्र सम्प्रदाय के आचार्य थे और उन्होंने शुद्धाद्वैतवाद का प्रतिपादन किया।
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श्री सम्प्रदाय - रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैतवाद: यह सही है। रामानुजाचार्य श्री सम्प्रदाय के प्रमुख आचार्य थे और उन्होंने विशिष्टाद्वैतवाद का प्रतिपादन किया।
इसलिए, केवल विकल्प 4 गलत है, क्योंकि इसमें सनकादि सम्प्रदाय और निम्बार्काचार्य को अचिन्त्य भेदाभेद दर्शन से जोड़ा गया है, जबकि निम्बार्काचार्य का दर्शन द्वैताद्वैत है।
प्रश्न 345
अपू के साथ ढाई साल' रचना किस विधा में है ?
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उत्तर और व्याख्या
'अपू के साथ ढाई साल' रचना संस्मरण विधा में है, क्योंकि:
- संस्मरण (Option 3): यह रचना सत्यजित राय द्वारा अपनी फिल्म 'पाथेर पांचाली' के निर्माण के दौरान के अनुभवों का वर्णन है। संस्मरण किसी व्यक्ति द्वारा अपने जीवन के किसी विशेष घटना या समय को याद करके लिखा जाता है। 'अपू के साथ ढाई साल' में सत्यजित राय ने फिल्म निर्माण के दौरान अपू (एक बच्चे का किरदार) और अन्य कलाकारों के साथ बिताए समय, आई मुश्किलों और अनुभवों को याद करके लिखा है। यह एक व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित है और लेखक की यादों का हिस्सा है, इसलिए यह संस्मरण है।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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डायरी (Option 1): डायरी में दैनिक घटनाओं का क्रमिक रूप से वर्णन होता है। 'अपू के साथ ढाई साल' किसी दैनिक घटनाओं का लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि फिल्म निर्माण के दौरान के विशिष्ट अनुभवों का वर्णन है।
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रिपोर्ताज (Option 2): रिपोर्ताज किसी घटना या विषय पर आधारित विस्तृत और तथ्यात्मक रिपोर्ट होती है। इसमें लेखक घटना स्थल पर मौजूद रहकर जानकारी जुटाता है और उसे प्रस्तुत करता है। 'अपू के साथ ढाई साल' किसी घटना की रिपोर्ट नहीं है, बल्कि लेखक के व्यक्तिगत अनुभवों का वर्णन है।
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यात्रावृत्त (Option 4): यात्रावृत्त किसी यात्रा के दौरान के अनुभवों का वर्णन होता है। 'अपू के साथ ढाई साल' किसी यात्रा का वर्णन नहीं है, बल्कि फिल्म निर्माण के दौरान के अनुभवों का वर्णन है।
इसलिए, 'अपू के साथ ढाई साल' संस्मरण विधा में है क्योंकि यह सत्यजित राय के व्यक्तिगत अनुभवों और यादों पर आधारित है।
प्रश्न 346
रघुवीर सहाय' की रचना नहीं है :
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उत्तर और व्याख्या
'चक्रव्यूह' रघुवीर सहाय की रचना नहीं है, इसलिए विकल्प 2 सही है।
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विकल्प 2 सही क्यों है: 'चक्रव्यूह' कुंवर नारायण द्वारा रचित एक प्रसिद्ध काव्य संग्रह है। यह रघुवीर सहाय की रचना नहीं है। इसलिए, यह विकल्प सही है।
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अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
- विकल्प 1: आत्महत्या के विरुद्ध: 'आत्महत्या के विरुद्ध' रघुवीर सहाय द्वारा रचित एक महत्वपूर्ण काव्य संग्रह है। इसलिए यह विकल्प गलत है।
- विकल्प 3: लोग भूल गये हैं: 'लोग भूल गये हैं' रघुवीर सहाय की एक प्रसिद्ध रचना है, जिसके लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला था। इसलिए यह विकल्प गलत है।
- विकल्प 4: सीढ़ियों पर धूप में: 'सीढ़ियों पर धूप में' रघुवीर सहाय द्वारा रचित एक और महत्वपूर्ण काव्य संग्रह है। इसलिए यह विकल्प गलत है।
अतः, केवल 'चक्रव्यूह' रघुवीर सहाय की रचना नहीं है।
प्रश्न 347
"नारी का आकर्षण पुरुष को पुरुष बनाता है, तो उसका अपकर्षण उसे गौतम बुद्ध बना देता है।" यह संवाद किस नाटक का है ?
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उत्तर और व्याख्या
"नारी का आकर्षण पुरुष को पुरुष बनाता है, तो उसका अपकर्षण उसे गौतम बुद्ध बना देता है।" यह संवाद लहरों के राजहंस नाटक का है।
Option 3 (लहरों के राजहंस) सही क्यों है:
यह संवाद मोहन राकेश द्वारा लिखित नाटक 'लहरों के राजहंस' का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह संवाद नाटक के केंद्रीय विषय, अर्थात् सौंदर्य, त्याग, और सांसारिक सुखों के प्रति आकर्षण और वैराग्य के बीच के द्वंद्व को दर्शाता है। इस नाटक में, सुंदरी (नारी) का आकर्षण और बाद में उसका त्याग, नायक (गौतम बुद्ध के भाई, नन्द) के जीवन में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन लाता है। यह संवाद सीधे तौर पर नन्द के आंतरिक संघर्ष और उसके गौतम बुद्ध बनने की प्रक्रिया को इंगित करता है। इसलिए, यह संवाद 'लहरों के राजहंस' नाटक का ही है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
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Option 1 (पैर तले की ज़मीन): यह नाटक मोहन राकेश द्वारा अधूरा छोड़ा गया था और बाद में कमलेश्वर द्वारा पूरा किया गया। इस नाटक में संवाद और विषय-वस्तु 'लहरों के राजहंस' से भिन्न हैं, और उपरोक्त संवाद इस नाटक में नहीं पाया जाता।
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Option 2 (आषाढ़ का एक दिन): यह नाटक भी मोहन राकेश द्वारा लिखा गया है, लेकिन यह कालिदास और मल्लिका के प्रेम और त्याग की कहानी पर केंद्रित है। इस नाटक का विषय और संवाद 'लहरों के राजहंस' से अलग है, और उपरोक्त संवाद इस नाटक में नहीं है।
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Option 4 (आधे-अधूरे): यह नाटक मोहन राकेश द्वारा लिखा गया एक आधुनिक नाटक है जो एक मध्यमवर्गीय परिवार की अपूर्णता और रिश्तों की जटिलताओं को दर्शाता है। इस नाटक का विषय और संवाद 'लहरों के राजहंस' से बहुत अलग है, और उपरोक्त संवाद इस नाटक में नहीं पाया जाता।
इसलिए, केवल 'लहरों के राजहंस' ही वह नाटक है जिसमें यह संवाद पाया जाता है, जो इसे सही उत्तर बनाता है।
प्रश्न 348
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कुटज को 'गाढ़े का साथी' क्यों कहा है ?
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उत्तर और व्याख्या
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कुटज को 'गाढ़े का साथी' इसलिए कहा है क्योंकि कुटज विपत्ति काल में काम आता है।
व्याख्या:
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कुटज निबंध में कुटज के पौधे की विषम परिस्थितियों में भी जीवित रहने और फलने-फूलने की क्षमता का वर्णन किया है। कुटज विपरीत परिस्थितियों, जैसे कि पथरीली जमीन और पानी की कमी में भी अडिग रहता है और जीवन का प्रतीक बना रहता है। यह गुण उसे 'गाढ़े का साथी' बनाता है, क्योंकि 'गाढ़े का साथी' वह होता है जो मुश्किल समय में साथ दे। कुटज कठिनाईयों का सामना करते हुए भी जीवन की प्रेरणा देता है, इसलिए द्विवेदी जी ने उसे विपत्ति काल में काम आने वाला बताया है।
अन्य विकल्पों की अस्वीकृति:
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2. कुटज के पुष्प निर्धनों के लिए कमल समान हैं: यह विकल्प आंशिक रूप से सही हो सकता है, क्योंकि कुटज के पुष्प सुंदर होते हैं, लेकिन यह 'गाढ़े का साथी' होने का सीधा कारण नहीं है। 'गाढ़े का साथी' होने का तात्पर्य मुश्किल समय में सहायता करने से है, न कि केवल सुंदरता से।
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3. कुटज रोगनाशक है: कुटज में औषधीय गुण हो सकते हैं, लेकिन द्विवेदी जी ने 'गाढ़े का साथी' के रूप में उसकी भूमिका को उसके औषधीय गुणों से अधिक उसके विपरीत परिस्थितियों में जीवित रहने की क्षमता से जोड़ा है।
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4. कुटज एक बहुउपयोगी पेड़ है: कुटज निश्चित रूप से बहुउपयोगी हो सकता है, लेकिन 'गाढ़े का साथी' होने का तात्पर्य केवल उपयोगिता से नहीं है, बल्कि मुश्किल समय में साथ देने और सहारा बनने से है। कुटज की विषम परिस्थितियों में जीवित रहने की क्षमता उसे यह विशेषण प्रदान करती है।
इसलिए, सबसे सटीक उत्तर विकल्प 1 है, क्योंकि यह कुटज के उस गुण को दर्शाता है जो उसे 'गाढ़े का साथी' बनाता है - विपत्ति काल में काम आना।
प्रश्न 349
पत्रिका एवं सम्पादक की दृष्टि से असंगत विकल्प है :
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उत्तर और व्याख्या
पत्रिका एवं सम्पादक की दृष्टि से असंगत विकल्प 3. समालोचक - ईश्वरी प्रसाद शर्मा है, क्योंकि 'समालोचक' पत्रिका के सम्पादक चंद्रधर शर्मा गुलेरी थे, न कि ईश्वरी प्रसाद शर्मा। ईश्वरी प्रसाद शर्मा 'चाँद' पत्रिका से जुड़े थे।
अन्य विकल्प इस प्रकार सही हैं:
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1. सरस्वती - महावीर प्रसाद द्विवेदी: महावीर प्रसाद द्विवेदी 'सरस्वती' पत्रिका के एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली सम्पादक थे। उनके सम्पादन काल में पत्रिका ने हिंदी साहित्य को नई दिशा दी।
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2. सुदर्शन - देवकी नन्दन खत्री: देवकी नन्दन खत्री 'सुदर्शन' पत्रिका से जुड़े थे।
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4. इन्दु - अम्बिका प्रसाद गुप्त: अम्बिका प्रसाद गुप्त 'इन्दु' पत्रिका के सम्पादक थे।
इसलिए, केवल विकल्प 3 में पत्रिका और सम्पादक का मिलान गलत है, जो इसे असंगत बनाता है।
प्रश्न 350
नंगातलाई का गाँव' रचना है :
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उत्तर और व्याख्या
'नंगातलाई का गाँव' विश्वनाथ त्रिपाठी की आत्मकथा है, इसलिए विकल्प 1 सही है।
यहाँ अन्य विकल्प क्यों गलत हैं, इसका स्पष्टीकरण दिया गया है:
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विकल्प 2: रामदरश मिश्र का उपन्यास: रामदरश मिश्र एक प्रसिद्ध उपन्यासकार हैं, लेकिन 'नंगातलाई का गाँव' उनका उपन्यास नहीं है। उनकी रचनाएँ उपन्यास, कहानी, कविता आदि विभिन्न विधाओं में हैं, लेकिन यह विशेष कृति उनकी नहीं है।
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विकल्प 3: विश्वनाथ प्रसाद तिवारी का आत्मकथ्य: विश्वनाथ प्रसाद तिवारी भी एक प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं और उन्होंने भी आत्मकथ्य लिखे हैं, लेकिन 'नंगातलाई का गाँव' उनकी रचना नहीं है।
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विकल्प 4: मैनेजर पाण्डे का संस्मरण: मैनेजर पाण्डे एक जाने-माने आलोचक और लेखक हैं। उन्होंने संस्मरण भी लिखे हैं, लेकिन 'नंगातलाई का गाँव' उनका संस्मरण नहीं है।
इसलिए, केवल विकल्प 1, जो कि विश्वनाथ त्रिपाठी की आत्मकथा है, सही उत्तर है।
प्रश्न 351
आदिकालीन रासो साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियों से संबंधित कौन-सा कथन सत्य नहीं है ?
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उत्तर और व्याख्या
आदिकालीन रासो साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियों से संबंधित कथन 2 सत्य नहीं है, क्योंकि:
Option 2 सही क्यों है:
आदिकालीन रासो साहित्य में राष्ट्र-प्रेम का सुंदर चित्रण नहीं मिलता है। रासो साहित्य मुख्यतः अपने आश्रयदाता राजाओं की वीरता, युद्धों और व्यक्तिगत शौर्य का वर्णन करता है। इसमें राष्ट्र की भावना या राष्ट्र के प्रति प्रेम का चित्रण गौण है या अनुपस्थित है। राजा अपने राज्य और अपनी कीर्ति के लिए लड़ते थे, न कि एक एकीकृत राष्ट्र की भावना से प्रेरित होकर। इसलिए, यह कहना कि इस साहित्य में राष्ट्र-प्रेम का सुंदर चित्रण है, सत्य नहीं है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
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Option 1: शृंगार और वीर रस का एक साथ चित्रण रासो साहित्य की महत्त्वपूर्ण विशेषता है। यह कथन सत्य है। रासो साहित्य में युद्धों के वर्णन के साथ-साथ राजाओं और नायिकाओं के प्रेम और सौंदर्य का भी वर्णन मिलता है। वीर रस और श्रृंगार रस का मिश्रण इस साहित्य की एक प्रमुख विशेषता है।
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Option 3: रासो साहित्य में शौर्य और विलासिता का स्वाभाविक एवं जीवंत चित्रण हुआ है। यह कथन भी सत्य है। रासो साहित्य में राजाओं की वीरता, युद्ध कौशल और विलासितापूर्ण जीवन का विस्तृत वर्णन मिलता है। यह चित्रण स्वाभाविक और जीवंत है, जो उस समय के जीवन की झलक दिखाता है।
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Option 4: युद्धों का सजीव चित्रांकन इस साहित्य की अन्यतम उपलब्धि है। यह कथन भी सत्य है। रासो साहित्य में युद्धों का बहुत ही सजीव और विस्तृत वर्णन किया गया है। युद्धों के दृश्य, हथियारों का प्रयोग, सैनिकों की वीरता आदि का वर्णन इस साहित्य को विशेष बनाता है। यह युद्ध वर्णन रासो साहित्य की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
इसलिए, केवल Option 2 ही असत्य है क्योंकि रासो साहित्य में राष्ट्र-प्रेम का सुंदर चित्रण नहीं मिलता।
प्रश्न 352
इन साहित्य इतिहास ग्रन्थों को उनके लेखकों के साथ सुमेलित कीजिए :
(अ) हिंदी साहित्य का आदीकाल : (i) डॉ० सुमन राजे
(ब) हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास : (ii) रामकुमार वर्मा
(स) हिंदी नवरत्न : (iii) मिश्रबन्धु
(द) हिंदी साहित्य का आधा इतिहास : (iv) आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
कुंजी :
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
Option 1 is correct because it accurately matches the literary history texts with their respective authors:
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(अ) हिंदी साहित्य का आदीकाल : (iv) आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी: This is a correct match. "हिंदी साहित्य का आदीकाल" is a well-known work by Acharya Hazari Prasad Dwivedi.
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(ब) हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास : (ii) रामकुमार वर्मा: This is also a correct match. "हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास" is indeed authored by Ramkumar Verma.
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(स) हिंदी नवरत्न : (iii) मिश्रबन्धु: This is a correct pairing. "हिंदी नवरत्न" is a significant work by the Mishrabandhu (a group of three brothers).
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(द) हिंदी साहित्य का आधा इतिहास : (i) डॉ० सुमन राजे: This is a correct match. "हिंदी साहित्य का आधा इतिहास" is authored by Dr. Suman Raje.
Therefore, Option 1 provides the correct pairings for all the given literary history texts and their authors.
Now, let's explain why the other options are incorrect:
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Option 2: (अ) (iv); (ब) (ii); (स) (i); (द) (iii): This option is incorrect because while it correctly matches (अ) and (ब), it incorrectly pairs "हिंदी नवरत्न" with Dr. Suman Raje and "हिंदी साहित्य का आधा इतिहास" with Mishrabandhu.
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Option 3: (अ) (iii); (ब) (iv); (स) (ii); (द) (i): This option is incorrect because it incorrectly matches "हिंदी साहित्य का आदीकाल" with Mishrabandhu, "हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास" with Acharya Hazari Prasad Dwivedi, and "हिंदी नवरत्न" with Ramkumar Verma. Only "हिंदी साहित्य का आधा इतिहास" is correctly matched with Dr. Suman Raje.
-
Option 4: (अ) (i); (ब) (ii); (स) (iii); (द) (iv): This option is incorrect because it incorrectly matches "हिंदी साहित्य का आदीकाल" with Dr. Suman Raje and "हिंदी साहित्य का आधा इतिहास" with Acharya Hazari Prasad Dwivedi. While it correctly matches "हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास" with Ramkumar Verma and "हिंदी नवरत्न" with Mishrabandhu, the other incorrect pairings make the entire option wrong.
In conclusion, only Option 1 provides the correct and complete matching of the literary history texts with their respective authors, making it the correct answer.
प्रश्न 353
हिंदी साहित्य के आदीकाल से संबंधित नामकरण के विषय में कौन-सा विकल्प सुमेलित नहीं है ?
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
Option 2 सही है क्योंकि 'आदीकाल' नामकरण आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा दिया गया है, न कि रामचन्द्र शुक्ल द्वारा। रामचन्द्र शुक्ल ने आदिकाल को 'वीरगाथा काल' कहा था।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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सिद्ध - सामन्तकाल - राहुल सांकृत्यायन: यह विकल्प सही सुमेलित है। राहुल सांकृत्यायन ने आदिकाल को 'सिद्ध-सामन्तकाल' नाम दिया था।
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आदीकाल - रामचन्द्र शुक्ल: यह विकल्प गलत है और इसलिए सही उत्तर है। रामचन्द्र शुक्ल ने आदिकाल को 'वीरगाथा काल' कहा था। 'आदीकाल' नामकरण आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का है।
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बीजवपन काल - महावीर प्रसाद द्विवेदी: यह विकल्प सही सुमेलित है। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने आदिकाल को 'बीजवपन काल' कहा था।
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संधि एवं चारणकाल - रामकुमार वर्मा: यह विकल्प सही सुमेलित है। रामकुमार वर्मा ने आदिकाल को 'संधि एवं चारणकाल' नाम दिया था।
इसलिए, केवल Option 2 ही गलत सुमेलित है, जो यह दर्शाता है कि 'आदीकाल' नामकरण रामचन्द्र शुक्ल ने नहीं किया था।
प्रश्न 354
‘प्रेमचंद’ के किस उपन्यास में विधवा जीवन की विषम समस्याओं का चित्रण है ?
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
'प्रतिज्ञा' उपन्यास में विधवा जीवन की विषम समस्याओं का चित्रण है, इसलिए विकल्प 2 सही है।
विस्तृत स्पष्टीकरण:
'प्रतिज्ञा' उपन्यास, मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखा गया, विशेष रूप से विधवा जीवन की कठिनाइयों और समाज में उनके सामने आने वाली चुनौतियों पर केंद्रित है। इस उपन्यास में, प्रेमचंद ने विधवाओं के पुनर्विवाह के मुद्दे को उठाया है और समाज में विधवाओं के प्रति व्याप्त रूढ़िवादी दृष्टिकोण को दर्शाया है। उपन्यास की नायिका, पूर्णा, एक विधवा है और उसकी कहानी विधवाओं के संघर्षों, सामाजिक दबावों और व्यक्तिगत इच्छाओं के बीच के द्वंद्व को उजागर करती है। 'प्रतिज्ञा' में, प्रेमचंद ने विधवाओं के पुनर्विवाह के समर्थन में एक मजबूत संदेश दिया है और समाज को इस मुद्दे पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित किया है।
अन्य विकल्पों की अस्वीकृति:
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निर्मला: 'निर्मला' उपन्यास दहेज प्रथा और बेमेल विवाह की समस्याओं पर केंद्रित है। यह उपन्यास एक युवा लड़की, निर्मला, की कहानी है जिसकी शादी एक उम्रदराज व्यक्ति से हो जाती है, जिससे उसके जीवन में कई कठिनाइयाँ आती हैं। हालांकि इसमें सामाजिक मुद्दे हैं, लेकिन यह विशेष रूप से विधवा जीवन की समस्याओं पर केंद्रित नहीं है।
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सेवासदन: 'सेवासदन' उपन्यास वेश्यावृत्ति और समाज में महिलाओं की स्थिति जैसे मुद्दों पर केंद्रित है। यह उपन्यास सुमन नाम की एक महिला की कहानी है जो परिस्थितियों के कारण वेश्यावृत्ति में धकेल दी जाती है। हालांकि इसमें महिलाओं के संघर्षों को दर्शाया गया है, लेकिन यह विशेष रूप से विधवा जीवन की समस्याओं पर केंद्रित नहीं है।
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प्रेमाश्रम: 'प्रेमाश्रम' उपन्यास जमींदारी प्रथा और किसानों के शोषण जैसे सामाजिक और आर्थिक मुद्दों पर केंद्रित है। यह उपन्यास ग्रामीण जीवन और किसानों के संघर्षों को दर्शाता है। हालांकि इसमें सामाजिक अन्याय को दर्शाया गया है, लेकिन यह विशेष रूप से विधवा जीवन की समस्याओं पर केंद्रित नहीं है।
इसलिए, केवल 'प्रतिज्ञा' उपन्यास ही विधवा जीवन की विषम समस्याओं का चित्रण करता है, जिससे विकल्प 2 सही उत्तर है।
प्रश्न 355
किस विकल्प में शब्द-युग्म 'प्रदीप-प्रतीप' का सही अर्थ भेद प्रयुक्त हुआ है ?
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उत्तर और व्याख्या
Option 2 सही है क्योंकि 'प्रदीप' का अर्थ 'दीपक' होता है और 'प्रतीप' का अर्थ 'उलटा' या 'विपरीत' होता है। इसलिए, 'प्रदीप-प्रतीप' शब्द-युग्म का सही अर्थ भेद 'दीपक, उलटा' है।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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Option 1: तख्ता, प्रतिज्ञा: 'प्रदीप' और 'प्रतीप' दोनों ही शब्दों का अर्थ 'तख्ता' या 'प्रतिज्ञा' नहीं होता है। इसलिए यह विकल्प गलत है।
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Option 3: दीपक, समूह: 'प्रदीप' का अर्थ 'दीपक' तो होता है, लेकिन 'प्रतीप' का अर्थ 'समूह' नहीं होता। 'प्रतीप' का अर्थ 'उलटा' या 'विपरीत' होता है। इसलिए यह विकल्प गलत है।
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Option 4: मूँगा, सबसे बड़ा: 'प्रदीप' और 'प्रतीप' दोनों ही शब्दों का अर्थ 'मूँगा' या 'सबसे बड़ा' नहीं होता है। इसलिए यह विकल्प गलत है।
अतः, केवल Option 2 ही 'प्रदीप' और 'प्रतीप' शब्दों के सही अर्थों को दर्शाता है।
प्रश्न 356
आज के ज़माने में कोई हरिश्चन्द्र नहीं है।'
उक्त वाक्य में प्रयुक्त 'हरिश्चन्द्र' शब्द में कौन-सी संज्ञा है ?
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उत्तर और व्याख्या
जातिवाचक संज्ञा।
व्याख्या:
इस वाक्य में, "हरिश्चन्द्र" शब्द किसी विशेष व्यक्ति (राजा हरिश्चन्द्र) को संदर्भित नहीं कर रहा है, बल्कि यह एक ऐसे व्यक्ति के प्रकार या जाति को दर्शा रहा है जो सत्यवादी और ईमानदार हो। यह एक ऐसे व्यक्ति के गुण को दर्शाता है जो हरिश्चन्द्र के समान सत्यनिष्ठ हो। इसलिए, यह जातिवाचक संज्ञा है।
अन्य विकल्पों का खंडन:
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व्यक्तिवाचक संज्ञा: व्यक्तिवाचक संज्ञा किसी विशेष व्यक्ति, स्थान या वस्तु का नाम होती है। यदि वाक्य में "हरिश्चन्द्र" शब्द राजा हरिश्चन्द्र को सीधे संदर्भित करता, तो यह व्यक्तिवाचक संज्ञा होती। लेकिन यहाँ यह एक प्रकार के व्यक्ति को दर्शा रहा है, इसलिए यह व्यक्तिवाचक संज्ञा नहीं है।
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द्रव्यवाचक संज्ञा: द्रव्यवाचक संज्ञा उन वस्तुओं को दर्शाती है जिन्हें मापा या तोला जा सकता है, जैसे कि पानी, सोना, या अनाज। "हरिश्चन्द्र" कोई द्रव्य नहीं है, इसलिए यह द्रव्यवाचक संज्ञा नहीं है।
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भाववाचक संज्ञा: भाववाचक संज्ञा किसी भाव, गुण, या अवस्था को दर्शाती है, जैसे कि ईमानदारी, खुशी, या दुख। जबकि हरिश्चन्द्र के गुण (सत्यवादिता) भाववाचक संज्ञा हो सकते हैं, स्वयं "हरिश्चन्द्र" शब्द यहाँ एक प्रकार के व्यक्ति को दर्शा रहा है, न कि किसी भाव को। इसलिए, यह भाववाचक संज्ञा नहीं है।
अतः, सही उत्तर विकल्प 1, जातिवाचक संज्ञा है।
प्रश्न 357
निम्न में से किस विकल्प में तत्सम शब्द प्रयुक्त नहीं हुए हैं ?
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उत्तर और व्याख्या
Option 4 सही उत्तर है क्योंकि इसमें दिए गए दोनों शब्द, 'मिमियाना' और 'खिचड़ी', तत्सम शब्द नहीं हैं। 'मिमियाना' एक देशज शब्द है, जो स्थानीय बोलियों से आया है और 'खिचड़ी' एक देशज या अर्ध-तत्सम शब्द माना जा सकता है, लेकिन निश्चित रूप से तत्सम नहीं है। तत्सम शब्द वे होते हैं जो संस्कृत से बिना किसी बदलाव के हिंदी में प्रयोग किए जाते हैं।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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Option 1: चक्र, कार्य: इस विकल्प में दोनों शब्द, 'चक्र' और 'कार्य', तत्सम शब्द हैं। ये दोनों शब्द संस्कृत से सीधे हिंदी में आए हैं।
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Option 2: उज्ज्वल, कर्पास: इस विकल्प में भी दोनों शब्द, 'उज्ज्वल' और 'कर्पास', तत्सम शब्द हैं। 'उज्ज्वल' का अर्थ है चमकदार और 'कर्पास' का अर्थ है कपास।
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Option 3: चित्रक, अवगुंठन: इस विकल्प में भी दोनों शब्द, 'चित्रक' और 'अवगुंठन', तत्सम शब्द हैं। 'चित्रक' एक प्रकार का पौधा या चित्रकार हो सकता है और 'अवगुंठन' का अर्थ है घूंघट।
इसलिए, केवल Option 4 में तत्सम शब्दों का प्रयोग नहीं हुआ है, इसलिए यही सही उत्तर है।
प्रश्न 358
निम्न में से किस वाक्य में अकर्मक क्रिया का प्रयोग हुआ है ?
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उत्तर और व्याख्या
लड़के मैदान में दौड़ रहे हैं।
व्याख्या:
अकर्मक क्रिया वह क्रिया होती है जिसका कर्म नहीं होता, अर्थात क्रिया का फल कर्ता पर ही पड़ता है।
- विकल्प 3 सही है क्योंकि: "लड़के मैदान में दौड़ रहे हैं" वाक्य में 'दौड़ रहे हैं' क्रिया है। इस क्रिया का कोई कर्म नहीं है। दौड़ने का प्रभाव सीधे लड़कों पर पड़ रहा है। 'मैदान में' क्रिया का स्थान बता रहा है, कर्म नहीं। इसलिए यह अकर्मक क्रिया का उदाहरण है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
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विकल्प 1: गीता विद्यालय जाती है। इस वाक्य में 'जाती है' क्रिया है। 'विद्यालय' कर्म है, क्योंकि गीता के जाने का प्रभाव विद्यालय पर पड़ रहा है (वह विद्यालय पहुँच रही है)। इसलिए यह सकर्मक क्रिया है।
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विकल्प 2: सोहन भोजन कर रहा है। इस वाक्य में 'कर रहा है' क्रिया है। 'भोजन' कर्म है, क्योंकि सोहन के करने का प्रभाव भोजन पर पड़ रहा है (वह भोजन खा रहा है)। इसलिए यह सकर्मक क्रिया है।
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विकल्प 4: अंजलि ने अध्यापक को कविता सुनाई। इस वाक्य में 'सुनाई' क्रिया है। 'कविता' कर्म है, क्योंकि अंजलि के सुनाने का प्रभाव कविता पर पड़ रहा है (कविता सुनाई जा रही है)। 'अध्यापक को' भी कर्म है (द्विकर्मक क्रिया)। इसलिए यह सकर्मक क्रिया है।
अतः, केवल विकल्प 3 में अकर्मक क्रिया का प्रयोग हुआ है।
प्रश्न 359
वर्तनी की दृष्टि से अशुद्ध शब्द का चयन कीजिए :
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उत्तर और व्याख्या
वर्तनी की दृष्टि से 'रचनावलि' अशुद्ध है क्योंकि इसका शुद्ध रूप 'रचनावली' होता है। 'रचनावलि' में 'ल' पर छोटी इ की मात्रा का प्रयोग गलत है, जबकि 'रचनावली' में 'ल' पर बड़ी ई की मात्रा का प्रयोग सही है।
अन्य विकल्प इसलिए गलत हैं:
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घ्राणेन्द्रिय: यह शब्द वर्तनी की दृष्टि से शुद्ध है। इसका अर्थ है 'सूंघने की इंद्रिय'।
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गार्हस्थ्य: यह शब्द भी वर्तनी की दृष्टि से शुद्ध है। इसका अर्थ है 'गृहस्थ जीवन'।
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दौर्बल्य: यह शब्द भी वर्तनी की दृष्टि से शुद्ध है। इसका अर्थ है 'कमजोरी'।
इसलिए, केवल 'रचनावलि' ही अशुद्ध है, जिसका शुद्ध रूप 'रचनावली' है।
प्रश्न 360
निम्न में से किस विकल्प में संधि-कार्य सही हुआ है ?
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उत्तर और व्याख्या
Option 1 सही है क्योंकि "रमा + ईश = रमेश" में गुण संधि का सही प्रयोग हुआ है। 'आ' और 'ई' मिलकर 'ए' बन जाते हैं, जिससे 'रमेश' शब्द बनता है। यह संधि का एक स्थापित नियम है और इस विकल्प में इसका सही पालन किया गया है।
अब अन्य विकल्पों की गलत व्याख्या:
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Option 2: उत्तर + अयन = उत्तरायन: यह विकल्प गलत है क्योंकि यहाँ दीर्घ संधि होनी चाहिए थी, जहाँ 'अ' और 'अ' मिलकर 'आ' बनते हैं। सही संधि "उत्तरायण" होती है, लेकिन यहाँ संधि का नियम सही ढंग से लागू नहीं हुआ है।
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Option 3: ध्वनि + अर्थ = ध्वन्यार्थ: यह विकल्प गलत है क्योंकि यहाँ यण संधि होनी चाहिए थी। 'इ' के बाद असमान स्वर आने पर 'य' हो जाता है। सही संधि "ध्वन्यर्थ" होनी चाहिए थी, न कि "ध्वन्यार्थ"।
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Option 4: पितृ + आज्ञा = पित्रज्ञा: यह विकल्प गलत है क्योंकि यहाँ यण संधि होनी चाहिए थी। 'ऋ' के बाद असमान स्वर आने पर 'र' हो जाता है। सही संधि "पित्राज्ञा" होनी चाहिए थी, न कि "पित्रज्ञा"।
इसलिए, केवल Option 1 ही संधि के नियमों का सही पालन करता है।