हमें इस बात को समझना होगा कि युद्ध की अनुपस्थिति ही शांति की परिभाषा नहीं है। बुद्ध ने जिस शांतिपूर्ण समाज की परिकल्पना की थी, उसमें समानता का वह संदेश भी शामिल था, जो हमें इस बात का अहसास कराता है कि मनुष्य को मनुष्य से पृथक् दिखाने का हर प्रयास मनुष्यता का शत्रु है। ऐसे प्रत्येक प्रयास को विफल बनाना मनुष्योचित तो है, एक शर्त भी है मनुष्य के रूप में जीने की। हमारी चिंता यह होनी चाहिए कि हमें स्वयं को मनुष्य कैसे बनाएँ एवं कैसे मनुष्य बनाए रखें। मनुष्य बनने का अर्थ है - अपने भीतर दूसरे की पीड़ा को समझने का अहसास जगाना, अपने भीतर करुणा का वह भाव जगाना, जो हमें दूसरे से जोड़ता है। छोटे-छोटे पुल बनाने होंगे हमें दूसरे से जुड़ने के लिए - करुणा का पुल, मैत्री का पुल, समानता का पुल, विषमता मिटाने वाला पुल ......। ऐसा समझकर ही हम मानवोचित आचरण का मंत्र अपना सकते हैं, प्रबुद्ध बन सकते हैं। गद्यांश में प्रयुक्त पदों की व्याकरणिक विवेचना के संदर्भ में असंगत कथन चुनिए :
गद्यांश में दिए गए विकल्पों में से असंगत कथन चुनने के लिए हमें व्याकरणिक विवेचना का सहारा लेना होगा। सही उत्तर विकल्प 2 है, जो कहता है कि "मनुष्यता - जातिवाचक संज्ञा"। आइए इसे विस्तार से समझते हैं: 1. अनुपस्थिति - दो उपसर्ग: "अनुपस्थिति" शब्द में "अनु" और "उप" दो उपसर्ग हैं। "अनु" का अर्थ है 'बाद में' और "उप" का अर्थ है 'निकट'। इस प्रकार, यह कथन व्याकरणिक रूप…Read More
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