HTET Exam - Level 1 Prt - Alankar
HTET exam Level 1 Prt preparation with Clear Cutoff
by Clear Cutoff
Showing 7 of 7 questions
Question 21
जिस अलंकार में काव्य-वर्णन वास्तविकता से बहुत दूर चला जाता है, कहा जाता है -
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Answer & Explanation
अलंकारों का अध्ययन काव्य की सुंदरता और अर्थ को समझने में मदद करता है। दिए गए प्रश्न में पूछा गया है कि वह कौन सा अलंकार है जिसमें काव्य-वर्णन वास्तविकता से बहुत दूर चला जाता है। सही उत्तर विकल्प 3, "अतिशयोक्ति" है। आइए इसे विस्तार से समझें:
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अतिशयोक्ति (Option 3): अतिशयोक्ति अलंकार का प्रयोग तब होता है जब किसी वस्तु, व्यक्ति या स्थिति का वर्णन अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर किया जाता है, जो वास्तविकता से बहुत दूर होता है। इसका उद्देश्य पाठक या श्रोता पर गहरा प्रभाव डालना होता है। उदाहरण के लिए, "उसके रोने से नदी बह निकली"। यहाँ रोने को इतना बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया गया है कि यह वास्तविकता से परे है। अतः, यह विकल्प सही है क्योंकि यह वास्तविकता से दूर जाने वाले वर्णन को दर्शाता है।
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भ्रांतिमान (Option 1): भ्रांतिमान अलंकार में भ्रम या गलतफहमी उत्पन्न होती है, लेकिन यह वास्तविकता से दूर जाने के लिए नहीं होता। यह अलंकार किसी वस्तु या व्यक्ति को किसी अन्य वस्तु या व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है, जिससे भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है। अतः यह विकल्प सही नहीं है।
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विशेषोक्ति (Option 2): विशेषोक्ति अलंकार में किसी विशेषता को विशेष रूप से उभारकर प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन यह वास्तविकता से दूर नहीं जाता। यह अलंकार किसी विशेष गुण या विशेषता को अधिक स्पष्टता से दिखाने के लिए होता है। इसलिए, यह विकल्प भी सही नहीं है।
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दीपक (Option 4): दीपक अलंकार में एक ही शब्द या वाक्यांश का प्रयोग दो या अधिक अर्थों में किया जाता है, जिससे कविता में गहराई आती है। यह अलंकार वास्तविकता से दूर जाने के लिए नहीं होता। अतः यह विकल्प भी सही नहीं है।
इस प्रकार, "अतिशयोक्ति" ही वह अलंकार है जिसमें काव्य-वर्णन वास्तविकता से बहुत दूर चला जाता है, और इसलिए विकल्प 3 सही उत्तर है।
Question 22
सुमेलित कीजिए :
(क) जो घनीभूत पीड़ा थी
मस्तक में स्मृति-सी छायी
दुर्दिन में आँसू बनकर
वह आज बरसने आयी। — (i) रूपक
(ख) विरह विकल बिनुही लिखी
पाती दई पठाय।
आँक विहीनीयौ सुचित,
सूने बाँधत जाय। — (ii) श्लोक
(ग) अरुन सरोरुह कर चरण
दृग खंजन मुखचन्द।
समै आय सुन्दरि सरद
काहि न करति आनंद। — (iii) असंगति
(घ) मेरे जीवन की उलझन
बिखरी थी उनकी अलकें
पी ली मधु मदिरा किसने
थी बंद हमारी पलकें। — (iv) विभावना
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Answer & Explanation
सही उत्तर विकल्प 1 है: (क)(ii); (ख)(iv); (ग)(i); (घ)(iii)
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(क) जो घनीभूत पीड़ा थी... — (ii) श्लोक:
इस पंक्ति में एक गहरी पीड़ा और स्मृति का वर्णन है, जो आँसू के रूप में व्यक्त हो रही है। यह शैली श्लोक के रूप में है, जहाँ भावनाओं का गहन वर्णन किया गया है। -
(ख) विरह विकल बिनुही लिखी... — (iv) विभावना:
यहाँ विरह की स्थिति का वर्णन है, जहाँ बिना लिखी पाती भेजी जा रही है। यह विभावना का उदाहरण है, जहाँ भावनाओं को बिना शब्दों के व्यक्त किया जा रहा है। -
(ग) अरुन सरोरुह कर चरण... — (i) रूपक:
इस पंक्ति में रूपक का प्रयोग किया गया है, जहाँ प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन किया गया है। यहाँ पर 'अरुन सरोरुह' और 'दृग खंजन' जैसे रूपकों का प्रयोग किया गया है। -
(घ) मेरे जीवन की उलझन... — (iii) असंगति:
इस पंक्ति में जीवन की उलझन और अलकें का वर्णन है, जो असंगति का उदाहरण है। यहाँ पर उलझन और अलकें के बीच एक असंगति दिखाई गई है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं:
- विकल्प 2: इसमें (क) को (ii) के बजाय (i) से जोड़ा गया है, जो गलत है क्योंकि (क) श्लोक का उदाहरण है, न कि रूपक का।
- विकल्प 3: इसमें (क) को (iii) से जोड़ा गया है, जो गलत है क्योंकि (क) श्लोक का उदाहरण है, न कि असंगति का।
- विकल्प 4: इसमें (ख) को (ii) से जोड़ा गया है, जो गलत है क्योंकि (ख) विभावना का उदाहरण है, न कि श्लोक का।
इस प्रकार, विकल्प 1 सही है क्योंकि यह सभी पंक्तियों को उनके सही साहित्यिक उपकरणों के साथ सही ढंग से जोड़ता है।
Question 23
आकाश का साफा बाँधकर, सूरज की चिलम खींचता' कौन बैठा है ?
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Answer & Explanation
आकाश का साफा बाँधकर, सूरज की चिलम खींचता' पहाड़ बैठा है। यह एक रूपक है जो पहाड़ की ऊँचाई और उसके स्थायित्व को दर्शाता है। आइए इसे विस्तार से समझते हैं:
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Option 1: पहाड़ (Correct Answer)
- पहाड़ की ऊँचाई और उसकी विशालता को आकाश के साफे से तुलना की गई है। पहाड़ अक्सर बादलों के ऊपर होते हैं, जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि वे आकाश को अपने सिर पर बाँध रहे हैं।
- सूरज की चिलम खींचने का अर्थ है कि पहाड़ सूरज की किरणों को अपने ऊपर से गुजरने देता है, जैसे कोई चिलम खींच रहा हो। यह दृश्य तब बनता है जब सूरज की किरणें पहाड़ की चोटियों पर पड़ती हैं और एक अद्भुत दृश्य उत्पन्न करती हैं।
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Option 2: नदी (Incorrect)
- नदी का आकाश के साफे से कोई संबंध नहीं है। नदी बहती है और उसका स्वरूप तरल होता है, जो स्थिरता और ऊँचाई का प्रतीक नहीं है।
- सूरज की चिलम खींचने का रूपक नदी पर लागू नहीं होता क्योंकि नदी सूरज की किरणों को अपने ऊपर से गुजरने नहीं देती, बल्कि वह पानी के प्रवाह में होती है।
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Option 3: वन (Incorrect)
- वन का आकाश के साफे से कोई संबंध नहीं है। वन पेड़ों का समूह होता है और उसकी ऊँचाई पहाड़ जैसी नहीं होती।
- सूरज की चिलम खींचने का रूपक वन पर लागू नहीं होता क्योंकि वन सूरज की किरणों को अपने ऊपर से गुजरने नहीं देता, बल्कि पेड़ों की छाया में रहता है।
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Option 4: सागर (Incorrect)
- सागर का आकाश के साफे से कोई संबंध नहीं है। सागर का स्वरूप तरल होता है और उसकी ऊँचाई पहाड़ जैसी नहीं होती।
- सूरज की चिलम खींचने का रूपक सागर पर लागू नहीं होता क्योंकि सागर सूरज की किरणों को अपने ऊपर से गुजरने नहीं देता, बल्कि वह पानी के विशाल विस्तार में होता है।
इस प्रकार, 'आकाश का साफा बाँधकर, सूरज की चिलम खींचता' का सबसे उपयुक्त और सही रूपक पहाड़ के लिए ही है।
Question 24
‘चंद्र ते लजात जलजात जग जानत है।
आज जलजात ते लजात चंद देखौ मैं।।’
प्रस्तुत पंक्तियों में अलंकार है :
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Answer & Explanation
प्रस्तुत पंक्तियों में अलंकार 'विभावना' है। विभावना अलंकार का प्रयोग तब होता है जब किसी वस्तु या स्थिति को उसके विपरीत रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यहाँ पर चंद्रमा और जलजात (कमल) के बीच एक विपरीत स्थिति को दर्शाया गया है। सामान्यतः चंद्रमा की शीतलता और प्रकाश से जलजात (कमल) खिलता है, लेकिन यहाँ पर यह कहा गया है कि जलजात के सामने चंद्रमा लज्जित हो रहा है। यह एक असंभव स्थिति है, जो विभावना अलंकार का उदाहरण है।
अब अन्य विकल्पों की चर्चा करते हैं:
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दीपक अलंकार: यह तब होता है जब किसी वस्तु की विशेषता को दूसरी वस्तु पर आरोपित किया जाता है। यहाँ ऐसा कोई आरोपण नहीं है, इसलिए यह विकल्प गलत है।
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उत्प्रेक्षा अलंकार: यह तब होता है जब किसी वस्तु की तुलना किसी अन्य वस्तु से की जाती है और यह संभावना व्यक्त की जाती है कि दोनों वस्तुएं समान हो सकती हैं। यहाँ पर कोई तुलना या संभावना व्यक्त नहीं की गई है, इसलिए यह विकल्प भी गलत है।
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वक्रोक्ति अलंकार: यह तब होता है जब किसी बात को घुमा-फिराकर कहा जाता है। यहाँ पर ऐसा कोई घुमावदार कथन नहीं है, इसलिए यह विकल्प भी गलत है।
इस प्रकार, प्रस्तुत पंक्तियों में विभावना अलंकार का प्रयोग किया गया है, जो विकल्प 2 को सही ठहराता है।
Question 25
जब प्रस्तुत (उपमेय) एवं अप्रस्तुत (उपमान) का एक धर्म कथन किया जाये, तो कौन-सा अलंकार होगा ?
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प्रश्न: जब प्रस्तुत (उपमेय) एवं अप्रस्तुत (उपमान) का एक धर्म कथन किया जाये, तो कौन-सा अलंकार होगा?
सही उत्तर: विकल्प 3 (दीपक)
विस्तृत व्याख्या:
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दीपक अलंकार: दीपक अलंकार वह अलंकार है जिसमें एक ही धर्म (गुण या विशेषता) को प्रस्तुत (उपमेय) और अप्रस्तुत (उपमान) दोनों के लिए कहा जाता है। इस अलंकार में एक गुण का वर्णन किया जाता है जो दोनों वस्तुओं में समान रूप से पाया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि कहा जाए कि "चंद्रमा और मुख दोनों ही शीतलता से भरे हैं", तो यहाँ शीतलता का गुण दोनों के लिए समान रूप से लागू होता है। इस प्रकार, जब प्रस्तुत और अप्रस्तुत का एक ही धर्म कथन किया जाता है, तो वह दीपक अलंकार कहलाता है।
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अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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रूपक: रूपक अलंकार में उपमेय और उपमान के बीच इतनी समानता होती है कि उपमेय को उपमान के रूप में ही प्रस्तुत किया जाता है। उदाहरण के लिए, "तुम चंद्रमा हो" में व्यक्ति को चंद्रमा के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यहाँ एक धर्म का कथन नहीं होता, बल्कि उपमेय को उपमान के रूप में ही देखा जाता है।
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उपमा: उपमा अलंकार में उपमेय और उपमान के बीच तुलना की जाती है और 'जैसे', 'तैसे', 'समान' आदि शब्दों का प्रयोग होता है। उदाहरण के लिए, "तुम चंद्रमा के समान सुंदर हो"। यहाँ स्पष्ट तुलना होती है, न कि एक धर्म का कथन।
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दृष्टांत: दृष्टांत अलंकार में किसी बात को स्पष्ट करने के लिए उदाहरण दिया जाता है। यह उपमेय और उपमान के बीच समानता दिखाने के लिए होता है, लेकिन यह एक धर्म का कथन नहीं होता।
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इस प्रकार, जब प्रस्तुत और अप्रस्तुत का एक धर्म कथन किया जाता है, तो वह दीपक अलंकार होता है, और इसलिए विकल्प 3 सही उत्तर है।
Question 26
असंगत विकल्प चुनिए :
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असंगत विकल्प चुनिए :
Options:
- उपमा अलंकार को राजशेखर अलंकारों का 'शिरोरत्न' कहते हैं।
- उपमेय के अन्तर्गत अप्रस्तुत वस्तु वर्णन किया जाता है।
- “जनम सिंधु पुनि बंधु विष दिन मलीन सकलंक।
सिय मुख समता पाव किमि चंद बापुरो रंक।।”
में व्यतिरेक अलंकार है। - “कोटि जतन कोउ करै, परै न प्रकृतिहिं बीच।
नलबलजल ऊँचो चढ़े, अंत नीच को नीच।।”
में अर्थान्तरन्यास अलंकार है।
Correct Answer: Option 2
Explanation:
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Option 1: "उपमा अलंकार को राजशेखर अलंकारों का 'शिरोरत्न' कहते हैं।" - यह कथन सही है क्योंकि उपमा अलंकार को साहित्य में विशेष महत्व दिया गया है और इसे अलंकारों का 'शिरोरत्न' कहा जाता है। यह उपमेय और उपमान के बीच समानता स्थापित करता है।
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Option 2: "उपमेय के अन्तर्गत अप्रस्तुत वस्तु वर्णन किया जाता है।" - यह कथन असंगत है क्योंकि उपमेय वह वस्तु होती है जिसकी तुलना की जाती है, जबकि अप्रस्तुत वस्तु वर्णन का संबंध अन्य अलंकारों से होता है, जैसे कि रूपक या अन्य। उपमेय में अप्रस्तुत वस्तु का वर्णन नहीं किया जाता है, बल्कि यह उपमान के साथ तुलना के लिए प्रयुक्त होता है।
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Option 3: "“जनम सिंधु पुनि बंधु विष दिन मलीन सकलंक। सिय मुख समता पाव किमि चंद बापुरो रंक।।” में व्यतिरेक अलंकार है।" - यह कथन सही है क्योंकि इस पंक्ति में व्यतिरेक अलंकार का प्रयोग हुआ है, जहाँ चंद्रमा की तुलना सीता के मुख से की गई है और चंद्रमा को रंक कहा गया है।
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Option 4: "“कोटि जतन कोउ करै, परै न प्रकृतिहिं बीच। नलबलजल ऊँचो चढ़े, अंत नीच को नीच।।” में अर्थान्तरन्यास अलंकार है।" - यह कथन सही है क्योंकि इस पंक्ति में अर्थान्तरन्यास अलंकार का प्रयोग हुआ है, जहाँ एक विचार को स्पष्ट करने के लिए दूसरा विचार प्रस्तुत किया गया है।
इस प्रकार, Option 2 असंगत है क्योंकि यह उपमेय की परिभाषा के विपरीत है।
Question 27
निम्न कथनों पर विचार करते हुए असंगत कथन छाँटिए :
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Answer & Explanation
विकल्प 3 को सही उत्तर के रूप में समर्थन करने के लिए निम्नलिखित स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया गया है:
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विकल्प 1: "विभावना विरोधमूलक अलंकार है।"
- विभावना अलंकार का संबंध किसी वस्तु या व्यक्ति के गुणों को विशेष रूप से उभारने से होता है। यह विरोधमूलक नहीं होता, बल्कि यह किसी वस्तु के गुणों को विशेष रूप से दर्शाने के लिए प्रयुक्त होता है। अतः यह कथन सही है और असंगत नहीं है।
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विकल्प 2: "‘राम नाम सुंदर करतारी, संशय बिहग उड़ावनहारी’ पंक्ति में परंपरित रूपक अलंकार है।"
- इस पंक्ति में 'राम नाम' को 'सुंदर करतारी' और 'संशय बिहग उड़ावनहारी' के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो रूपक अलंकार का एक उदाहरण है। रूपक अलंकार में उपमेय और उपमान के बीच सीधा संबंध होता है। अतः यह कथन सही है और असंगत नहीं है।
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विकल्प 3: "‘मनो कठिन आँगन चली, ताते राते पाँव।’ पंक्ति में वस्तूत्प्रेक्षा अलंकार है।"
- इस पंक्ति में वस्तूत्प्रेक्षा अलंकार का प्रयोग नहीं है। वस्तूत्प्रेक्षा अलंकार में किसी वस्तु की कल्पना की जाती है जो वास्तव में संभव नहीं होती। यहाँ पर 'मनो कठिन आँगन चली' का अर्थ है कि मन कठिन आँगन में चल रहा है, जो एक प्रकार की अतिशयोक्ति है और वस्तूत्प्रेक्षा नहीं है। इसलिए यह कथन असंगत है।
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विकल्प 4: "उपमान की अपेक्षा उपमेय के गुणोत्कर्ष वर्णन को व्यतिरेक अलंकार कहा जाता है।"
- व्यतिरेक अलंकार में उपमेय के गुणों की तुलना उपमान से की जाती है और उपमेय को श्रेष्ठ दिखाया जाता है। यह कथन सही है और व्यतिरेक अलंकार की परिभाषा के अनुरूप है। अतः यह कथन असंगत नहीं है।
इस प्रकार, विकल्प 3 असंगत है क्योंकि इसमें वस्तूत्प्रेक्षा अलंकार का गलत संदर्भ दिया गया है।