HTET Exam - Level 1 Prt - Varn Vigyan
HTET exam Level 1 Prt preparation with Clear Cutoff
by Clear Cutoff
Showing 20 of 20 questions
Question 41
निम्न में से किस विकल्प का कथन गलत है ?
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
विकल्प 2 सही उत्तर है क्योंकि विसर्ग ध्वनि की गणना नासिक्य वर्णों में नहीं की जाती है। विसर्ग एक विशेष ध्वनि है जो संस्कृत और हिंदी में स्वर के बाद आती है और इसे 'ः' के रूप में लिखा जाता है। यह ध्वनि नासिक्य नहीं होती, बल्कि यह एक प्रकार की हल्की श्वास ध्वनि होती है जो स्वर के बाद उच्चारित होती है।
अब अन्य विकल्पों की चर्चा करते हैं:
-
विकल्प 1: 'ऋ' का उच्चारण स्थान 'मूर्धा' है। यह कथन सही है क्योंकि 'ऋ' ध्वनि का उच्चारण मूर्धा से होता है, जो कि तालू के ऊपरी भाग को स्पर्श करके उत्पन्न होती है।
-
विकल्प 3: 'य' और 'व' को अर्ध स्वर भी कहा जाता है। यह कथन सही है क्योंकि 'य' और 'व' ध्वनियाँ अर्ध स्वर के रूप में जानी जाती हैं। ये ध्वनियाँ स्वर और व्यंजन के बीच की स्थिति में होती हैं।
-
विकल्प 4: 'ड़' और 'ढ़' उत्क्षिप्त वर्ण कहलाते हैं। यह कथन सही है क्योंकि 'ड़' और 'ढ़' ध्वनियाँ उत्क्षिप्त वर्णों की श्रेणी में आती हैं, जो कि विशेष प्रकार की ध्वनियाँ हैं।
इस प्रकार, विकल्प 2 का कथन गलत है और यही सही उत्तर है।
Question 42
किस विकल्प में सभी ध्वनियाँ 'तालव्य' हैं ?
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
विकल्प 2: च्, ज्, श् को सही उत्तर के रूप में समर्थन करने के लिए निम्नलिखित स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया गया है:
-
तालव्य ध्वनियाँ: तालव्य ध्वनियाँ वे ध्वनियाँ होती हैं जो उच्चारण के समय जीभ के अगले हिस्से को तालु के साथ मिलाकर उत्पन्न की जाती हैं। हिंदी में तालव्य ध्वनियाँ च्, छ्, ज्, झ्, और श् हैं।
-
विकल्प 2 का विश्लेषण: विकल्प 2 में च्, ज्, श् शामिल हैं। ये सभी ध्वनियाँ तालव्य ध्वनियाँ हैं:
- च्: यह एक तालव्य ध्वनि है, जो जीभ के अगले हिस्से को तालु के साथ मिलाकर उच्चारित की जाती है।
- ज्: यह भी एक तालव्य ध्वनि है, जो च् के समान ही तालु के संपर्क में आकर उच्चारित होती है।
- श्: यह ध्वनि भी तालव्य है, जो तालु के संपर्क में जीभ के अगले हिस्से से उच्चारित होती है।
-
अन्य विकल्पों का विश्लेषण:
- विकल्प 1 (च्, छ्, ष्): यहाँ च् और छ् तालव्य हैं, लेकिन ष् एक मूर्धन्य ध्वनि है, जो तालव्य नहीं है।
- विकल्प 3 (ज्, झ्, स्): यहाँ ज् और झ् तालव्य हैं, लेकिन स् एक दंत्य ध्वनि है, जो तालव्य नहीं है।
- विकल्प 4 (च्, झ्, हू): यहाँ च् और झ् तालव्य हैं, लेकिन हू में 'ह' एक कंठ्य ध्वनि है, जो तालव्य नहीं है।
इस प्रकार, विकल्प 2 (च्, ज्, श्) सही उत्तर है क्योंकि इसमें सभी ध्वनियाँ तालव्य हैं।
Question 43
निम्नलिखित में से किस विकल्प में सभी 'स्पर्श अल्पप्राण' व्यंजन हैं ?
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
स्पर्श अल्पप्राण व्यंजन वे व्यंजन होते हैं जिनका उच्चारण करते समय मुख के किसी भाग से स्पर्श होता है और जिनमें अल्प मात्रा में प्राण (हवा) का प्रयोग होता है। अब हम दिए गए विकल्पों का विश्लेषण करते हैं:
-
विकल्प 1: स्, श्, ह्
- ये सभी व्यंजन स्पर्श व्यंजन नहीं हैं। 'स्' और 'श्' उच्चारण में स्पर्श का आभास होता है, लेकिन 'ह्' एक अघोष व्यंजन है और इनमें से कोई भी अल्पप्राण नहीं है।
-
विकल्प 2: फ्, ब्, द्
- इनमें से 'फ्' एक महाप्राण व्यंजन है, जबकि 'ब्' और 'द्' स्पर्श व्यंजन हैं, लेकिन 'फ्' के कारण यह विकल्प सही नहीं है।
-
विकल्प 3: क्, ग्, ट्
- ये सभी स्पर्श अल्पप्राण व्यंजन हैं। 'क्' और 'ग्' कंठ्य वर्ग के हैं और 'ट्' मूर्धन्य वर्ग का है। इनका उच्चारण करते समय मुख के किसी भाग से स्पर्श होता है और ये अल्पप्राण होते हैं।
-
विकल्प 4: न्, ल्, र्
- ये सभी व्यंजन स्पर्श व्यंजन नहीं हैं। 'न्' एक नासिक्य व्यंजन है, 'ल्' और 'र्' अर्धस्वर हैं। इनमें से कोई भी अल्पप्राण स्पर्श व्यंजन नहीं है।
इस प्रकार, विकल्प 3 सही है क्योंकि इसमें दिए गए सभी व्यंजन स्पर्श अल्पप्राण व्यंजन हैं।
Question 44
निम्नलिखित में से कौन-सा कथन असत्य है ?
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
Option 4: "र् लुंठित, घोष एवं महाप्राण व्यंजन है।" असत्य कथन है।
विस्तृत व्याख्या:
-
र् का स्वरूप:
- "र्" ध्वनि को संस्कृत और हिंदी व्याकरण में अर्धस्वर या अर्धव्यंजन के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। यह घोष ध्वनि है, लेकिन इसे महाप्राण नहीं माना जाता। महाप्राण ध्वनियाँ वे होती हैं जिनके उच्चारण में अधिक वायु का प्रयोग होता है, जैसे "ख", "घ", "ठ", "ध" आदि। "र्" का उच्चारण अल्पप्राण होता है।
-
अन्य विकल्पों का विश्लेषण:
-
विकल्प 1: "क् कंठ्य, अघोष एवं अल्पप्राण व्यंजन है।"
- "क्" ध्वनि कंठ्य है क्योंकि इसका उच्चारण गले से होता है। यह अघोष है क्योंकि इसके उच्चारण में स्वर यंत्र का कंपन नहीं होता। यह अल्पप्राण है क्योंकि इसके उच्चारण में कम वायु का प्रयोग होता है। यह कथन सत्य है।
-
विकल्प 2: "ठ् मूर्धन्य, अघोष एवं महाप्राण व्यंजन है।"
- "ठ्" ध्वनि मूर्धन्य है क्योंकि इसका उच्चारण जीभ की नोक को तालु के ऊपरी हिस्से से लगाकर किया जाता है। यह अघोष है क्योंकि इसके उच्चारण में स्वर यंत्र का कंपन नहीं होता। यह महाप्राण है क्योंकि इसके उच्चारण में अधिक वायु का प्रयोग होता है। यह कथन सत्य है।
-
विकल्प 3: "प् ओष्ठ्य, अघोष एवं अल्पप्राण व्यंजन है।"
- "प्" ध्वनि ओष्ठ्य है क्योंकि इसका उच्चारण होंठों से होता है। यह अघोष है क्योंकि इसके उच्चारण में स्वर यंत्र का कंपन नहीं होता। यह अल्पप्राण है क्योंकि इसके उच्चारण में कम वायु का प्रयोग होता है। यह कथन सत्य है।
-
इस प्रकार, विकल्प 4 का कथन "र् लुंठित, घोष एवं महाप्राण व्यंजन है।" असत्य है क्योंकि "र्" महाप्राण नहीं है। यही कारण है कि विकल्प 4 सही उत्तर है।
Question 45
निम्नलिखित वर्णों के संदर्भ में कौन-सा विकल्प असंगत है ?
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
Option 4 असंगत है क्योंकि:
- ष – मूर्धन्य, अल्पप्राण, अघोष: 'ष' एक मूर्धन्य व्यंजन है (उच्चारण जीभ के मूर्धा से स्पर्श करने पर होता है) और यह अघोष भी है (उच्चारण में स्वरतंत्री में कंपन नहीं होता)। लेकिन, 'ष' अल्पप्राण नहीं, बल्कि महाप्राण है (उच्चारण में अधिक वायु निकलती है)। इसलिए, यह विकल्प असंगत है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं:
-
य – तालव्य, अल्पप्राण, घोष: 'य' तालव्य व्यंजन है (उच्चारण जीभ के तालु से स्पर्श करने पर होता है), अल्पप्राण है (उच्चारण में कम वायु निकलती है), और घोष भी है (उच्चारण में स्वरतंत्री में कंपन होता है)। इसलिए यह विकल्प सही है।
-
इ – तालव्य, ह्रस्व, अवृत्तमुखी: 'इ' तालव्य स्वर है, ह्रस्व है (उच्चारण में कम समय लगता है), और अवृत्तमुखी भी है (उच्चारण में होंठ गोल नहीं होते)। इसलिए यह विकल्प भी सही है।
-
ब – ओष्ठ्य, घोष, अल्पप्राण: 'ब' ओष्ठ्य व्यंजन है (उच्चारण दोनों होंठों के मिलने से होता है), घोष है (उच्चारण में स्वरतंत्री में कंपन होता है), लेकिन 'ब' अल्पप्राण नहीं, बल्कि महाप्राण है (उच्चारण में अधिक वायु निकलती है)। इसलिए यह विकल्प भी सही है।
इसलिए, केवल Option 4 ही गलत है क्योंकि 'ष' महाप्राण है, अल्पप्राण नहीं।
Question 46
निम्न में से कौन-सी ध्वनि ओष्ठ्य नहीं है ?
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
प्रश्न: निम्न में से कौन-सी ध्वनि ओष्ठ्य नहीं है ?
सही उत्तर: विकल्प 4 (ञ')
विस्तृत व्याख्या:
-
विकल्प 4: ञ'
'ञ' ध्वनि को ओष्ठ्य ध्वनि नहीं माना जाता है। ओष्ठ्य ध्वनियाँ वे होती हैं जो मुख के ओष्ठ (होंठ) के प्रयोग से उच्चारित होती हैं। 'ञ' ध्वनि का उच्चारण तालव्य स्थान से होता है, जहाँ जीभ का अग्रभाग तालु के पास आता है। इस प्रकार, 'ञ' ध्वनि ओष्ठ्य नहीं है, बल्कि यह तालव्य ध्वनि है। -
विकल्प 1: उ'
'उ' ध्वनि एक स्वर ध्वनि है और इसे ओष्ठ्य स्वर माना जाता है क्योंकि इसका उच्चारण करते समय होंठ गोलाकार होते हैं। इस प्रकार, 'उ' ध्वनि ओष्ठ्य ध्वनि है। -
विकल्प 2: व'
'व' ध्वनि भी ओष्ठ्य ध्वनि है। इसका उच्चारण करते समय होंठों का प्रयोग होता है, जिससे यह ओष्ठ्य ध्वनि की श्रेणी में आती है। -
विकल्प 3: ब'
'ब' ध्वनि भी ओष्ठ्य ध्वनि है। इसका उच्चारण करते समय होंठों का प्रयोग होता है, जिससे यह ओष्ठ्य ध्वनि की श्रेणी में आती है।
इस प्रकार, 'ञ' ध्वनि ओष्ठ्य नहीं है और यही कारण है कि विकल्प 4 सही उत्तर है।
Question 47
उच्चारण की दृष्टि से 'ग' व्यंजन की ध्वनिगत विशेषताएँ हैं :
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
उच्चारण की दृष्टि से 'ग' व्यंजन की ध्वनिगत विशेषताएँ हैं: कंठ्य, सघोष, अल्पप्राण।
-
विकल्प 3 का समर्थन:
- 'ग' ध्वनि का उच्चारण कंठ से होता है, इसलिए इसे कंठ्य कहा जाता है।
- 'ग' ध्वनि सघोष है क्योंकि इसका उच्चारण करते समय स्वर यंत्र में कंपन होता है।
- 'ग' ध्वनि अल्पप्राण है क्योंकि इसका उच्चारण करते समय कम मात्रा में वायु का प्रयोग होता है।
-
अन्य विकल्पों की अस्वीकृति:
- विकल्प 1 (कंठ्य, अघोष, महाप्राण): 'ग' ध्वनि सघोष है, न कि अघोष। इसके अलावा, 'ग' अल्पप्राण है, न कि महाप्राण।
- विकल्प 2 (कंठ्य, सघोष, महाप्राण): 'ग' ध्वनि सघोष तो है, लेकिन यह महाप्राण नहीं है, बल्कि अल्पप्राण है।
- विकल्प 4 (कंठ्य, अघोष, अल्पप्राण): 'ग' ध्वनि अघोष नहीं है, बल्कि सघोष है।
इस प्रकार, विकल्प 3 सही है क्योंकि यह 'ग' ध्वनि की ध्वनिगत विशेषताओं को सही रूप से दर्शाता है।
Question 48
कट्टर शब्द में प्रयुक्त 'ट्ट' व्यंजन गुच्छ किस श्रेणी का है ?
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
कट्टर शब्द में प्रयुक्त 'ट्ट' व्यंजन गुच्छ को द्वित्व व्यंजन कहा जाता है। द्वित्व व्यंजन वे होते हैं जिनमें एक ही व्यंजन का दो बार उच्चारण होता है। 'ट्ट' में 'ट' का दो बार उच्चारण होता है, इसलिए यह द्वित्व व्यंजन की श्रेणी में आता है।
अब हम अन्य विकल्पों को गलत साबित करते हैं:
-
प्रकंपित व्यंजन: प्रकंपित व्यंजन वे होते हैं जिनमें ध्वनि का कंपन होता है, जैसे 'र'। 'ट्ट' में ऐसा कोई कंपन नहीं होता, इसलिए यह प्रकंपित व्यंजन नहीं है।
-
संयुक्त व्यंजन: संयुक्त व्यंजन वे होते हैं जो दो या अधिक व्यंजनों के मेल से बनते हैं, जैसे 'क्ष', 'त्र', 'ज्ञ'। 'ट्ट' में केवल एक ही व्यंजन 'ट' का दोहराव है, इसलिए यह संयुक्त व्यंजन नहीं है।
-
संघर्षी व्यंजन: संघर्षी व्यंजन वे होते हैं जिनमें ध्वनि के उच्चारण में संघर्ष होता है, जैसे 'फ', 'थ'। 'ट्ट' में ऐसा कोई संघर्ष नहीं होता, इसलिए यह संघर्षी व्यंजन नहीं है।
इस प्रकार, 'ट्ट' को द्वित्व व्यंजन के रूप में सही ठहराया जाता है, और विकल्प 1 सही है।
Question 49
उच्चारण की दृष्टि से 'ल' वर्ण का उच्चारण स्थान होगा :
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
उच्चारण की दृष्टि से 'ल' वर्ण का उच्चारण स्थान दन्त है, क्योंकि 'ल' का उच्चारण करते समय जीभ का अगला भाग ऊपरी दाँतों को स्पर्श करता है।
यहाँ अन्य विकल्प क्यों गलत हैं, इसका स्पष्टीकरण दिया गया है:
-
ओष्ठ: ओष्ठ का अर्थ है होंठ। 'प', 'फ', 'ब', 'भ', 'म' जैसे वर्णों का उच्चारण होंठों के प्रयोग से होता है, 'ल' का नहीं। इसलिए यह विकल्प गलत है।
-
मूर्धा: मूर्धा मुख के भीतर की छत का वह भाग है जो तालु से थोड़ा पीछे होता है। 'ट', 'ठ', 'ड', 'ढ', 'ण' जैसे वर्णों का उच्चारण मूर्धा से होता है, 'ल' का नहीं। इसलिए यह विकल्प गलत है।
-
तालु: तालु मुख के भीतर की छत का अगला भाग है। 'च', 'छ', 'ज', 'झ', 'ञ', 'य', 'श' जैसे वर्णों का उच्चारण तालु से होता है, 'ल' का नहीं। इसलिए यह विकल्प गलत है।
इसलिए, 'ल' वर्ण का उच्चारण स्थान दन्त होने के कारण विकल्प 4 सही है।
Question 50
निम्न में से कौन-सा युग्म संगत नहीं है ?
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
विकल्प 1 सही उत्तर है क्योंकि:
- य, व - नासिक्य वर्ण: यह युग्म संगत नहीं है क्योंकि 'य' और 'व' दोनों ही नासिक्य वर्ण नहीं हैं। नासिक्य वर्ण वे होते हैं जिनका उच्चारण नाक से होता है, जैसे कि 'ङ', 'ञ', 'ण', 'न', 'म'। 'य' और 'व' का उच्चारण मुख से होता है और ये अर्धस्वर वर्ण माने जाते हैं।
अन्य विकल्पों की व्याख्या:
-
ड़, ढ़ - उत्क्षिप्त वर्ण: यह युग्म संगत है क्योंकि 'ड़' और 'ढ़' दोनों ही उत्क्षिप्त वर्ण हैं। उत्क्षिप्त वर्ण वे होते हैं जिनका उच्चारण जीभ के पिछले भाग को तालु के ऊपरी भाग से स्पर्श कर किया जाता है।
-
र - लुंठित वर्ण: यह युग्म संगत है क्योंकि 'र' लुंठित वर्ण है। लुंठित वर्ण वे होते हैं जिनका उच्चारण जीभ के अग्र भाग को ऊपर की ओर घुमाकर किया जाता है।
-
ल - पार्श्विव वर्ण: यह युग्म संगत है क्योंकि 'ल' पार्श्विव वर्ण है। पार्श्विव वर्ण वे होते हैं जिनका उच्चारण जीभ के किनारों से होता है।
इस प्रकार, विकल्प 1 सही उत्तर है क्योंकि 'य' और 'व' नासिक्य वर्ण नहीं हैं, जबकि अन्य सभी विकल्पों में वर्णों का वर्गीकरण सही है।
Question 51
ग', 'ल' तथा 'ब' उक्त वर्णों का क्रमशः उच्चारण स्थान है :
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
The correct option is 3:
उच्चारण स्थान (Articulation Place) ध्वनि विज्ञान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह वह स्थान होता है जहाँ से वायु को रोककर या बाधित करके किसी वर्ण का उच्चारण किया जाता है। हमें यहाँ पर क्रमशः 'ग', 'ल', और 'ब' वर्णों के उच्चारण स्थान की पहचान करनी है। 'ग' वर्ण, हिंदी वर्णमाला के 'क वर्ग' (क, ख, ग, घ, ङ) का तीसरा वर्ण है। 'क वर्ग' के सभी वर्णों का उच्चारण स्थान 'कण्ठ' (गला) होता है, क्योंकि इनके उच्चारण में जीभ का पिछला भाग कंठ को स्पर्श करता है या उसके निकट जाता है। इसलिए 'ग' का उच्चारण स्थान कण्ठ है।
'ल' वर्ण एक अंतस्थ व्यंजन है और इसे 'दन्त्य' (दाँत) वर्ण माना जाता है। 'ल' का उच्चारण करते समय जीभ का ऊपरी हिस्सा दाँतों के पीछे के भाग को स्पर्श करता है, जिससे हवा जीभ के किनारों से निकलती है। इसलिए 'ल' का उच्चारण स्थान दन्त है।
'ब' वर्ण 'प वर्ग' (प, फ, ब, भ, म) का तीसरा वर्ण है, और 'प वर्ग' के सभी वर्णों का उच्चारण स्थान 'ओष्ठ' (होठ) होता है। 'ब' का उच्चारण दोनों होंठों को आपस में मिलाकर किया जाता है। इसलिए 'ब' का उच्चारण स्थान ओष्ठ है।
इस प्रकार, 'ग', 'ल' तथा 'ब' का क्रमशः उच्चारण स्थान 'कण्ठ, दन्त, ओष्ठ' है, जो विकल्प 3 में दिया गया है।
The incorrect option is 1 (तालु, कण्ठ, ओष्ठ):
यह विकल्प गलत है क्योंकि 'ग' का उच्चारण स्थान तालु नहीं, बल्कि कण्ठ होता है। तालु से उच्चारित होने वाले वर्ण 'च वर्ग' (च, छ, ज, झ, ञ) के होते हैं। इसके अलावा, 'ल' का उच्चारण स्थान यहाँ कण्ठ बताया गया है, जो कि गलत है; 'ल' का सही उच्चारण स्थान दन्त है।
The incorrect option is 2 (दन्त, कण्ठ, तालु):
यह विकल्प गलत है क्योंकि यहाँ 'ग' का उच्चारण स्थान दन्त बताया गया है, जबकि 'ग' का सही उच्चारण स्थान कण्ठ है। साथ ही, 'ल' का उच्चारण स्थान कण्ठ बताया गया है, जबकि इसका सही उच्चारण स्थान दन्त है। 'ब' का उच्चारण स्थान तालु बताया गया है, जो पूरी तरह से गलत है; 'ब' का सही उच्चारण स्थान ओष्ठ होता है।
The incorrect option is 4 (ओष्ठ, कण्ठ, तालु):
यह विकल्प गलत है क्योंकि यहाँ 'ग' का उच्चारण स्थान ओष्ठ बताया गया है, जबकि 'ग' का सही उच्चारण स्थान कण्ठ है। ओष्ठ से 'प वर्ग' (प, फ, ब, भ, म) के वर्ण उच्चारित होते हैं। 'ल' का उच्चारण स्थान कण्ठ बताया गया है, जबकि यह दन्त वर्ण है। 'ब' का उच्चारण स्थान तालु बताया गया है, जबकि यह ओष्ठ वर्ण है।
Question 52
निम्न में से असंगत को चुनिए :
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
The correct option is 3:
श, ष, स - स्पर्श संघर्षी, यह विकल्प असंगत है क्योंकि 'श', 'ष', और 'स' व्यंजन 'ऊष्म व्यंजन' या 'संघर्षी व्यंजन' (Fricatives) कहलाते हैं, न कि 'स्पर्श संघर्षी' (Affricates)। 'ऊष्म व्यंजन' वे होते हैं जिनके उच्चारण में वायु मुख के किसी स्थान पर रगड़ खाकर या घर्षण (Friction) के साथ बाहर निकलती है, जिससे ऊष्मा (गर्मी) उत्पन्न होती है। जबकि 'स्पर्श संघर्षी' व्यंजन हिंदी में 'च', 'छ', 'ज', 'झ' होते हैं, जिनके उच्चारण में पहले स्पर्श होता है और फिर वायु संघर्ष के साथ बाहर निकलती है। इसलिए, 'श, ष, स' का वर्गीकरण 'स्पर्श संघर्षी' के रूप में करना असंगत (मिसमैच) है।
The incorrect option is 1:
अं, अः - अयोगवाह ध्वनियाँ। यह कथन संगत है। 'अं' (अनुस्वार) और 'अः' (विसर्ग) को 'अयोगवाह' ध्वनियाँ कहा जाता है क्योंकि ये न तो पूर्ण रूप से स्वर हैं और न ही व्यंजन। ये स्वरों और व्यंजनों के बीच की कड़ी हैं और हमेशा किसी स्वर के साथ जुड़कर ही प्रयोग होती हैं, जैसे 'अ' के साथ जुड़कर।
The incorrect option is 2:
ड़, ढ़ - उत्क्षिप्त ध्वनियाँ। यह कथन संगत है। 'ड़' और 'ढ़' को उत्क्षिप्त (या द्विगुण) व्यंजन कहा जाता है। इनके उच्चारण में जीभ झटके के साथ ऊपर उठकर नीचे गिरती है। हिंदी वर्णमाला में ये ध्वनियाँ संस्कृत से नहीं आई हैं, बल्कि बाद में विकसित हुई हैं।
The incorrect option is 4:
ऐ, औ - अर्थ संवृत। यह कथन संगत है। हिंदी स्वर वर्गीकरण में 'ऐ' और 'औ' को 'अर्ध संवृत' नहीं बल्कि 'अर्ध विवृत' (Half-open) स्वर माना जाता है। हालाँकि, हिंदी की कुछ पुस्तकों में इन्हें 'संवृत' या 'अर्ध संवृत' के निकट माना जाता है। लेकिन वर्णमाला के मानक वर्गीकरण के अनुसार, 'ऐ' और 'औ' 'अर्ध विवृत' स्वर हैं, जिनका उच्चारण विवृत (खुला) से थोड़ा कम होता है। चूँकि विकल्प 3 स्पष्ट रूप से गलत है, इसलिए यह विकल्प, जिसमें सामान्यतः 'अर्ध विवृत' वर्गीकरण होता है, इस संदर्भ में गौण असंगति दर्शाता है, लेकिन 'श, ष, स' का वर्गीकरण पूरी तरह से गलत है।\
Question 53
गायक' का संधि-विच्छेद है
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
सही विकल्प है 3:
'गायक' शब्द का सही संधि-विच्छेद 'गै + अक' होता है। यह हिंदी व्याकरण की अयादि संधि (Ayadi Sandhi) का एक उदाहरण है। अयादि संधि स्वर संधि का एक प्रकार है, जिसमें ए/ऐ/ओ/औ के बाद कोई भिन्न स्वर आने पर क्रमशः अय्, आय्, अव्, और आव् में परिवर्तन होता है। 'गायक' शब्द में, 'गै' (ऐ) का मेल 'अक' (अ) से होने पर 'ऐ' का परिवर्तन 'आय्' में होता है, और यह मिलकर 'ग + आय् + अक' = 'गायक' बनाता है। इस नियम के अनुसार, जब 'ऐ' के साथ कोई अन्य स्वर (यहाँ 'अ') जुड़ता है, तो 'आय्' ध्वनि बनती है, जो इस शब्द के निर्माण को सही ठहराती है।
गलत विकल्प है 1: 'गा + यक' इस विकल्प में 'गा' को मूल शब्द माना गया है और 'यक' को अलग, जो कि संधि-विच्छेद के नियमों का उल्लंघन करता है। 'गायक' शब्द में 'आय' की ध्वनि निहित है, जो दीर्घ स्वर संधि या किसी अन्य सामान्य संधि के नियम से नहीं बनती, बल्कि 'ऐ' और 'अ' के मेल से बनती है। इसलिए, यह विच्छेद गलत है।
गलत विकल्प है 2: 'गाय + इक' यह विच्छेद इसलिए गलत है क्योंकि इसमें 'गाय' को प्रथम पद मानकर जब 'इक' जोड़ा जाता है, तो कोई सुसंगत संधि नियम लागू नहीं होता जो 'गायक' जैसा शब्द उत्पन्न करे। 'गाय' एक पूर्ण शब्द है, और इसका 'इक' के साथ मेल स्वर या व्यंजन संधि के आवश्यक परिवर्तन को पूरा नहीं करता है।
गलत विकल्प है 4: 'ग + आयक' यह विच्छेद व्याकरणिक रूप से गलत है। संधि दो समीपवर्ती वर्णों के मेल को कहते हैं। इस विकल्प में 'ग' (एक व्यंजन) का मेल 'आयक' से दिखाया गया है, जो 'आय्' ध्वनि के उत्पन्न होने की मूल शर्त (ऐ/औ के बाद भिन्न स्वर) को पूरा नहीं करता है। इसलिए, यह अयादि संधि के नियम से पूरी तरह बाहर है और 'गायक' के निर्माण का सही आधार नहीं है।
Question 54
यण सन्धि का उदाहरण है
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
सही विकल्प है 1:
अभ्यर्थी
यण सन्धि का उदाहरण है Options: अभ्यर्थी, नवोढ़ा, शुभेच्छा, प्राप्तोद्रक. Correct: 1
सही विकल्प 1 है: अभ्यर्थी
यण सन्धि स्वर सन्धि का एक प्रमुख भेद है। इसका नियम यह है कि जब ह्रस्व या दीर्घ स्वर 'इ/ई', 'उ/ऊ', या 'ऋ' के बाद कोई भिन्न स्वर आता है, तो 'इ/ई' का परिवर्तन 'य' में, 'उ/ऊ' का परिवर्तन 'व' में, और 'ऋ' का परिवर्तन 'र' में हो जाता है। शब्द 'अभ्यर्थी' का सन्धि-विच्छेद करने पर यह नियम स्पष्ट होता है:
अभि + अर्थी = अभ्यर्थी
यहाँ, 'अभि' के अंत में 'इ' स्वर है और 'अर्थी' के प्रारंभ में 'अ' स्वर है। चूंकि 'इ' के बाद कोई भिन्न स्वर ('अ') आया है, इसलिए 'इ' का परिवर्तन 'य' में हो गया (इ + अ = य)। इस प्रकार, यह यण सन्धि का सटीक उदाहरण है। 'य' से पहले का वर्ण ('भ्') आधा (र्ध) हो जाता है, जो यण सन्धि की एक पहचान भी है।
गलत विकल्प 2 है: नवोढ़ा
'नवोढ़ा' का सन्धि-विच्छेद होता है: नव + ऊढ़ा। इसमें 'अ' और 'ऊ' के मिलने से 'ओ' बनता है। यह गुण सन्धि का उदाहरण है (अ/आ + इ/ई, उ/ऊ, ऋ = ए, ओ, अर्), न कि यण सन्धि का। इसलिए, यह विकल्प गलत है।
गलत विकल्प 3 है: शुभेच्छा
'शुभेच्छा' का सन्धि-विच्छेद होता है: शुभ + इच्छा। यहाँ 'अ' और 'इ' के मिलने से 'ए' बनता है। यह भी गुण सन्धि का उदाहरण है (अ + इ = ए), इसलिए यह यण सन्धि का उदाहरण नहीं हो सकता।
गलत विकल्प 4 है: प्राप्तोद्रक
'प्राप्तोद्रक' का सन्धि-विच्छेद होता है: प्राप्त + उदक। यहाँ 'अ' और 'उ' के मिलने से 'ओ' बनता है। यह भी 'नवोढ़ा' की तरह गुण सन्धि का उदाहरण है, क्योंकि इसमें 'अ' के बाद 'उ' आने पर 'ओ' में परिवर्तन हुआ है।
Question 55
अहोरात्र' का संधि विच्छेद है
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
संधि विच्छेद का अर्थ होता है दो शब्दों को उनके मूल रूप में अलग करना। 'अहोरात्र' शब्द का संधि विच्छेद 'अहन् + रात्रि' होता है। आइए इसे विस्तार से समझते हैं:
- अहन् + रात्रि: 'अहोरात्र' शब्द में 'अहन्' का अर्थ होता है 'दिन' और 'रात्रि' का अर्थ होता है 'रात'। जब इन दोनों शब्दों का संधि होती है, तो 'अहन्' का अंतिम 'न्' और 'रात्रि' का प्रारंभिक 'र' मिलकर 'अहोरात्र' बनता है। इसलिए, सही संधि विच्छेद 'अहन् + रात्रि' है।
अब अन्य विकल्पों को देखते हैं:
-
अहन + रात्रि: यह विकल्प गलत है क्योंकि 'अहन' शब्द का कोई अर्थ नहीं होता है। सही शब्द 'अहन्' है, जिसमें 'न्' का उच्चारण होता है।
-
अहो + रात्र: यह विकल्प भी गलत है क्योंकि 'अहो' का अर्थ 'हे' या 'ओह' होता है, जो कि यहाँ संदर्भ में सही नहीं है। इसके अलावा, 'रात्र' शब्द भी अपूर्ण है; सही शब्द 'रात्रि' है।
-
अहा + रात्रि: यह विकल्प भी गलत है क्योंकि 'अहा' का कोई संबंध 'अहोरात्र' से नहीं है। 'अहा' का अर्थ 'वाह' या 'आश्चर्य' होता है, जो कि यहाँ संदर्भ में सही नहीं है।
इस प्रकार, 'अहोरात्र' का सही संधि विच्छेद 'अहन् + रात्रि' ही है, जो विकल्प 2 में दिया गया है।
Question 56
महत्त्व' का उचित संधि विच्छेद है
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
महत्त्व का उचित संधि विच्छेद "महत् + त्व" है। आइए इसे विस्तार से समझते हैं:
-
महत् + त्व (Option 1):
- 'महत्त्व' शब्द का निर्माण 'महत्' और 'त्व' के संयोग से होता है।
- 'महत्' का अर्थ होता है 'महान' या 'विशाल'।
- 'त्व' प्रत्यय का प्रयोग विशेषण से संज्ञा बनाने के लिए किया जाता है, जो गुण या अवस्था को दर्शाता है।
- इसलिए, 'महत्' और 'त्व' के संयोग से 'महत्त्व' शब्द बनता है, जिसका अर्थ होता है 'महानता' या 'विशेषता'।
-
मह + त्व (Option 2):
- 'मह' शब्द का अर्थ 'बड़ा' होता है, लेकिन यह संधि के लिए उपयुक्त नहीं है क्योंकि 'मह' के साथ 'त्व' का संयोग नहीं होता है।
- 'मह' और 'त्व' का संयोग 'महत्त्व' नहीं बनाता है।
-
महान् + त्व (Option 3):
- 'महान्' शब्द का अर्थ 'विशाल' या 'उत्कृष्ट' होता है, लेकिन 'महान्' के साथ 'त्व' का संयोग नहीं होता है।
- 'महान्' और 'त्व' का संयोग 'महत्त्व' नहीं बनाता है।
-
महत् + व (Option 4):
- 'महत्' सही है, लेकिन 'व' प्रत्यय का प्रयोग यहाँ गलत है।
- 'व' प्रत्यय से 'महत्त्व' शब्द नहीं बनता है।
इस प्रकार, 'महत्त्व' का सही संधि विच्छेद 'महत् + त्व' ही है, जो Option 1 में दिया गया है। अन्य विकल्प सही नहीं हैं क्योंकि वे संधि के नियमों के अनुसार 'महत्त्व' शब्द का निर्माण नहीं करते हैं।
Question 57
संधि प्रक्रिया में किन्हीं दो स्वरों के स्थान पर एक स्वर होना 'एकादेश' कहलाता है। किस विकल्प में इस प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ है ?
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
संधि प्रक्रिया में 'एकादेश' का अर्थ होता है कि दो स्वरों के स्थान पर एक स्वर का प्रयोग किया जाता है। इस प्रक्रिया के अनुसार, जब दो शब्द मिलते हैं और उनके बीच स्वर संधि होती है, तो दो स्वरों के स्थान पर एक नया स्वर उत्पन्न होता है। आइए दिए गए विकल्पों का विश्लेषण करते हैं:
-
सागरोर्मि सागर: यहाँ 'सागर' और 'उर्मि' के बीच स्वर संधि हुई है। 'सागर' का अंतिम स्वर 'अ' और 'उर्मि' का प्रारंभिक स्वर 'उ' मिलकर 'ओ' बनाते हैं। यह एकादेश का उदाहरण है।
-
द्वारकेश: यह 'द्वारका' और 'ईश' के संधि से बना है। 'द्वारका' का अंतिम स्वर 'आ' और 'ईश' का प्रारंभिक स्वर 'ई' मिलकर 'ए' बनाते हैं। यह भी एकादेश का उदाहरण है।
-
एकैव व: यहाँ 'एक' और 'एव' के बीच स्वर संधि हुई है। 'एक' का अंतिम स्वर 'अ' और 'एव' का प्रारंभिक स्वर 'ए' मिलकर 'ऐ' बनाते हैं। यह भी एकादेश का उदाहरण है।
-
अधिआदेश: इस विकल्प में 'अधि' और 'आदेश' के बीच कोई स्वर संधि नहीं हुई है। 'अधि' का अंतिम स्वर 'इ' और 'आदेश' का प्रारंभिक स्वर 'आ' मिलकर कोई नया स्वर नहीं बनाते हैं। यहाँ दो स्वरों के स्थान पर एक स्वर नहीं बना है, इसलिए यह एकादेश का पालन नहीं करता है।
इस प्रकार, विकल्प 4 'अधिआदेश' में एकादेश की प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ है, इसलिए यह सही उत्तर है।
Question 58
किस शब्द का संधि-विच्छेद अशुद्ध है ?
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
संधि-विच्छेद के प्रश्न में हमें यह देखना होता है कि दिए गए शब्दों का सही संधि-विच्छेद किया गया है या नहीं। इस प्रश्न में हमें यह पहचानना है कि किस विकल्प में संधि-विच्छेद अशुद्ध है। सही उत्तर विकल्प 3 है: "प्रभू + दयाल = प्रभुदयाल"। आइए इसे विस्तार से समझते हैं:
-
प्रभू + दयाल = प्रभुदयाल: यह संधि-विच्छेद अशुद्ध है। सही संधि-विच्छेद "प्रभु + उदयाल = प्रभुदयाल" होना चाहिए। यहां पर 'प्रभु' और 'दयाल' के बीच 'उ' की ध्वनि का सही प्रयोग नहीं किया गया है।
-
शक + अन्धु = शकन्धु: यह संधि-विच्छेद शुद्ध है। यहां 'शक' और 'अन्धु' के बीच 'अ' की ध्वनि का सही प्रयोग किया गया है, जिससे 'शकन्धु' बनता है।
-
पतत् + अंजलि = पतंजलि: यह संधि-विच्छेद भी शुद्ध है। 'पतत्' और 'अंजलि' के बीच 'अ' की ध्वनि का सही प्रयोग किया गया है, जिससे 'पतंजलि' बनता है।
-
नव + रात्रि = नवरात्र: यह संधि-विच्छेद भी शुद्ध है। 'नव' और 'रात्रि' के बीच 'अ' की ध्वनि का सही प्रयोग किया गया है, जिससे 'नवरात्र' बनता है।
इस प्रकार, विकल्प 3 में संधि-विच्छेद अशुद्ध है क्योंकि इसमें 'प्रभु' और 'दयाल' के बीच सही ध्वनि का प्रयोग नहीं किया गया है। यही कारण है कि विकल्प 3 सही उत्तर है।
Question 59
किस विकल्प में संधि नियम का उल्लंघन होने के कारण अशुद्ध शब्द बना है ?
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
संधि नियमों के अनुसार, शब्दों का निर्माण करते समय कुछ विशेष नियमों का पालन किया जाता है। दिए गए विकल्पों में से, हमें यह देखना है कि किस विकल्प में संधि नियम का उल्लंघन हुआ है।
-
अभिषेक: यह शब्द 'अभि' + 'षेक' से बना है। यहां पर 'अभि' उपसर्ग और 'षेक' धातु का संयोग है, जो कि सही संधि नियमों के अनुसार है।
-
निषेध: यह शब्द 'नि' + 'षेध' से बना है। यहां पर 'नि' उपसर्ग और 'षेध' धातु का संयोग है, जो कि सही संधि नियमों के अनुसार है।
-
अनुशंगी: यह शब्द 'अनु' + 'शंगी' से बना है। यहां पर 'अनु' उपसर्ग और 'शंगी' धातु का संयोग है। लेकिन यह संधि नियमों के अनुसार सही नहीं है। सही शब्द 'अनुशंकी' होना चाहिए, जहां 'अनु' और 'शंकी' का संयोग होता है। इस प्रकार, संधि नियम का उल्लंघन होने के कारण यह अशुद्ध शब्द बना है।
-
सुषुप्ति: यह शब्द 'सु' + 'षुप्ति' से बना है। यहां पर 'सु' उपसर्ग और 'षुप्ति' धातु का संयोग है, जो कि सही संधि नियमों के अनुसार है।
इस प्रकार, विकल्प 3 'अनुशंगी' में संधि नियम का उल्लंघन हुआ है, इसलिए यह अशुद्ध शब्द है। यही कारण है कि विकल्प 3 सही उत्तर है।
Question 60
गुण स्वर सन्धि' का उदाहरण चुनिए :
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
गुण स्वर सन्धि का उदाहरण चुनने के लिए हमें यह समझना होगा कि गुण स्वर सन्धि क्या होती है। गुण स्वर सन्धि में जब दो स्वर मिलते हैं, तो उनके मिलने से एक नया स्वर उत्पन्न होता है। यह सन्धि विशेष रूप से 'अ', 'आ', 'इ', 'ई', 'उ', 'ऊ' के मिलने पर होती है और इसके परिणामस्वरूप 'ए', 'ओ' जैसे स्वर बनते हैं।
अब हम दिए गए विकल्पों का विश्लेषण करते हैं:
-
यमुनोर्मि: यह सही उत्तर है। यहाँ 'यमुना' और 'उर्मि' के मिलने से 'यमुनोर्मि' बनता है। 'यमुना' का अंतिम स्वर 'आ' और 'उर्मि' का प्रारंभिक स्वर 'उ' मिलकर 'ओ' बनाते हैं, जो गुण स्वर सन्धि का उदाहरण है।
-
दध्योदन: यहाँ 'दधि' और 'उदन' के मिलने से 'दध्योदन' बनता है। यह यण सन्धि का उदाहरण है, जहाँ 'इ' और 'उ' के मिलने से 'यो' बनता है। यह गुण स्वर सन्धि नहीं है।
-
मनोदशा: यहाँ 'मन' और 'दशा' के मिलने से 'मनोदशा' बनता है। यह दीर्घ सन्धि का उदाहरण है, जहाँ 'अ' और 'अ' के मिलने से 'आ' बनता है। यह गुण स्वर सन्धि नहीं है।
-
शिरोरेखा: यहाँ 'शिर' और 'रेखा' के मिलने से 'शिरोरेखा' बनता है। यह दीर्घ सन्धि का उदाहरण है, जहाँ 'अ' और 'आ' के मिलने से 'आ' बनता है। यह गुण स्वर सन्धि नहीं है।
इस प्रकार, 'यमुनोर्मि' गुण स्वर सन्धि का सही उदाहरण है, क्योंकि इसमें 'आ' और 'उ' के मिलने से 'ओ' स्वर बनता है। अन्य विकल्पों में गुण स्वर सन्धि नहीं है, इसलिए वे गलत हैं।