HTET Exam Level 3 PGT
HTET exam Level 3 PGT preparation with Clear Cutoff
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by Clear Cutoff
Showing 20 of 20 questions
Question 341
कर्बला', 'संग्राम' तथा 'प्रेम की देवी' नाटकों के रचयिता हैं -
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Answer & Explanation
प्रेमचंद
Explanation:
'कर्बला', 'संग्राम' तथा 'प्रेम की देवी' नाटकों के रचयिता प्रेमचंद हैं। मुंशी प्रेमचंद, जिन्हें हिंदी साहित्य के महानतम लेखकों में से एक माना जाता है, ने उपन्यास और कहानियों के साथ-साथ नाटकों की भी रचना की। 'कर्बला' एक ऐतिहासिक नाटक है जो कर्बला की लड़ाई पर आधारित है। 'संग्राम' नाटक सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर आधारित है। 'प्रेम की देवी' नाटक प्रेम और आदर्शों पर केंद्रित है। इसलिए, विकल्प 3 सही है।
अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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हजारी प्रसाद द्विवेदी: हजारी प्रसाद द्विवेदी एक प्रसिद्ध निबंधकार, आलोचक और उपन्यासकार थे, लेकिन वे इन नाटकों के रचयिता नहीं हैं। उनका योगदान मुख्य रूप से निबंध और आलोचना के क्षेत्र में है।
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जयशंकर प्रसाद: जयशंकर प्रसाद एक महान कवि, नाटककार, उपन्यासकार और कहानीकार थे। उनके प्रसिद्ध नाटकों में 'चंद्रगुप्त', 'स्कंदगुप्त' और 'ध्रुवस्वामिनी' शामिल हैं। हालांकि वे एक महत्वपूर्ण नाटककार थे, 'कर्बला', 'संग्राम' और 'प्रेम की देवी' उनके द्वारा नहीं लिखे गए हैं।
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जगदीशचंद्र माथुर: जगदीशचंद्र माथुर एक प्रसिद्ध नाटककार थे, लेकिन वे 'कर्बला', 'संग्राम' और 'प्रेम की देवी' के रचयिता नहीं हैं। उनके प्रसिद्ध नाटकों में 'कोणार्क' और 'शारदीया' शामिल हैं।
Question 342
"अगर इंसानों के अनुरूप जीने की सुविधा कुछ लोगों तक ही सीमित है, तब जिस सुविधा को आमतौर पर स्वतंत्रता कहा जाता है, उसे विशेषाधिकार कहना उचित है।"
उक्त कथन किस शिक्षाविद्, समाजशास्त्री तथा विधिवेत्ता का है ?
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Answer & Explanation
डॉ० भीमराव अम्बेडकर ही सही उत्तर हैं, इसके समर्थन में स्पष्टीकरण इस प्रकार है:
डॉ० भीमराव अम्बेडकर, जिन्हें बाबासाहेब अम्बेडकर के नाम से भी जाना जाता है, एक प्रसिद्ध समाज सुधारक, विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ और दार्शनिक थे। उन्होंने भारत में दलितों (अछूतों) के अधिकारों के लिए अथक प्रयास किया। उनका पूरा जीवन सामाजिक न्याय और समानता के लिए समर्पित था।
उद्धृत कथन, "अगर इंसानों के अनुरूप जीने की सुविधा कुछ लोगों तक ही सीमित है, तब जिस सुविधा को आमतौर पर स्वतंत्रता कहा जाता है, उसे विशेषाधिकार कहना उचित है," सीधे तौर पर अम्बेडकर के दर्शन और कार्यों से मेल खाता है। अम्बेडकर का मानना था कि वास्तविक स्वतंत्रता तभी प्राप्त हो सकती है जब समाज के सभी वर्गों को समान अवसर और सम्मान मिले। यदि कुछ लोगों को ही बेहतर जीवन जीने की सुविधा उपलब्ध है, तो स्वतंत्रता एक विशेषाधिकार बन जाती है, न कि एक मौलिक अधिकार। यह कथन सामाजिक असमानता और वंचितों के अधिकारों के प्रति उनकी गहरी चिंता को दर्शाता है। उन्होंने जाति व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई लड़ी और सभी के लिए समान अवसर सुनिश्चित करने की वकालत की।
अब, अन्य विकल्पों पर विचार करते हैं:
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सर्वपल्ली राधाकृष्णन्: वे एक दार्शनिक और भारत के पूर्व राष्ट्रपति थे। उनका योगदान शिक्षा और दर्शन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण है, लेकिन उनका कार्य मुख्य रूप से सामाजिक न्याय और समानता के मुद्दों पर केंद्रित नहीं था, जितना कि अम्बेडकर का था। इसलिए, यह कथन उनके विचारों से सीधे तौर पर संबंधित नहीं है।
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पं० जवाहरलाल नेहरू: वे भारत के पहले प्रधानमंत्री थे और उन्होंने भारत के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका ध्यान राष्ट्र निर्माण, आर्थिक विकास और गुटनिरपेक्षता की नीति पर अधिक था। जबकि वे सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्ध थे, उद्धृत कथन अम्बेडकर के दलितों के अधिकारों पर केंद्रित दृष्टिकोण से अधिक मेल खाता है।
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मदर टेरेसा: वे एक कैथोलिक नन थीं जिन्होंने गरीबों और बीमारों की सेवा की। उनका कार्य मानवीय सेवा और करुणा पर केंद्रित था। जबकि वे गरीबों के लिए चिंतित थीं, उद्धृत कथन सामाजिक संरचनाओं और असमानता के बारे में एक राजनीतिक और दार्शनिक वक्तव्य है, जो अम्बेडकर के कार्य के अधिक अनुरूप है।
इसलिए, उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि उद्धृत कथन डॉ० भीमराव अम्बेडकर के विचारों और कार्यों के साथ सबसे अधिक मेल खाता है। यह कथन सामाजिक न्याय, समानता और वंचितों के अधिकारों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जो उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण पहलू था।
Question 343
पद्म पराग' व 'पद्म मंजरी' निबन्ध संकलनों के निबंधकार हैं -
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Answer & Explanation
'पद्म पराग' व 'पद्म मंजरी' निबन्ध संकलनों के निबंधकार सरदार पूर्णसिंह हैं।
Option 1 (सरदार पूर्णसिंह) सही क्यों है:
सरदार पूर्णसिंह एक प्रसिद्ध निबंधकार थे और 'पद्म पराग' और 'पद्म मंजरी' उनके द्वारा रचित निबंध संकलन हैं। ये संकलन उनकी साहित्यिक कृतियों का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और उनकी निबंध शैली को दर्शाते हैं। इसलिए, यह विकल्प सही है क्योंकि यह सीधे तौर पर स्थापित तथ्य पर आधारित है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
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Option 2 (चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी’): चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी’ एक प्रसिद्ध लेखक और निबंधकार थे, लेकिन 'पद्म पराग' और 'पद्म मंजरी' उनके द्वारा रचित निबंध संकलन नहीं हैं। उनकी प्रसिद्ध रचनाओं में 'उसने कहा था' शामिल है, लेकिन इन निबंध संकलनों से उनका कोई संबंध नहीं है।
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Option 3 (आचार्य रामचन्द्र शुक्ल): आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हिंदी साहित्य के एक महान आलोचक और निबंधकार थे। उन्होंने 'चिंतामणि' जैसे महत्वपूर्ण निबंध संग्रह लिखे हैं, लेकिन 'पद्म पराग' और 'पद्म मंजरी' उनके द्वारा रचित नहीं हैं।
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Option 4 (विद्यानिवास मिश्र): विद्यानिवास मिश्र एक जाने-माने निबंधकार थे और उन्होंने ललित निबंधों के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनके निबंधों में भारतीय संस्कृति और लोक जीवन की झलक मिलती है, लेकिन 'पद्म पराग' और 'पद्म मंजरी' उनके द्वारा रचित नहीं हैं।
इसलिए, केवल सरदार पूर्णसिंह ही 'पद्म पराग' और 'पद्म मंजरी' के निबंधकार हैं, और अन्य विकल्प गलत हैं।
Question 344
जैन आचार्यों ने 'आर्षी' अथवा 'आदिभाषा' किसे माना है ?
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Answer & Explanation
जैन आचार्यों ने 'आर्षी' अथवा 'आदिभाषा' अर्ध-मागधी को माना है, इसके समर्थन में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं:
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अर्ध-मागधी का महत्व: अर्ध-मागधी जैन धर्म के आगम साहित्य (canonical texts) की भाषा है। जैन धर्म के अधिकांश महत्वपूर्ण ग्रंथ, जैसे कि आगम सूत्र, अर्ध-मागधी में ही लिखे गए हैं। इस भाषा में तीर्थंकरों के उपदेशों को संकलित किया गया है, इसलिए इसे 'आर्षी' (ऋषियों की भाषा) या 'आदिभाषा' (मूल भाषा) मानना स्वाभाविक है।
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आगम साहित्य की भाषा: जैन धर्म में आगम साहित्य का सर्वोच्च स्थान है। यह साहित्य जैन दर्शन, आचार, और ज्ञान का मूल स्रोत है। अर्ध-मागधी में लिखे होने के कारण, यह भाषा जैन धर्म के अनुयायियों के लिए अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण है।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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शौरसेनी: शौरसेनी एक प्राकृत भाषा है जो मुख्य रूप से नाटकों में प्रयुक्त होती थी। यह जैन धर्म के कुछ ग्रंथों में भी पाई जाती है, लेकिन यह आगम साहित्य की मुख्य भाषा नहीं है। इसलिए, इसे 'आर्षी' या 'आदिभाषा' नहीं माना जाता।
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मागधी: मागधी प्राचीन मगध क्षेत्र की भाषा थी। यह बौद्ध धर्म के कुछ ग्रंथों में प्रयुक्त हुई है, लेकिन जैन धर्म के आगम साहित्य की मुख्य भाषा अर्ध-मागधी है, न कि मागधी।
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महाराष्ट्री: महाराष्ट्री एक प्राकृत भाषा है जो मुख्य रूप से काव्य और साहित्य में प्रयुक्त होती थी। यह जैन धर्म के कुछ ग्रंथों में भी पाई जाती है, लेकिन यह आगम साहित्य की मुख्य भाषा नहीं है। इसलिए, इसे 'आर्षी' या 'आदिभाषा' नहीं माना जाता।
इसलिए, अर्ध-मागधी ही 'आर्षी' अथवा 'आदिभाषा' है क्योंकि यह जैन आगम साहित्य की भाषा है और जैन धर्म में इसका महत्वपूर्ण स्थान है।
Question 345
"जगत्-जीवन के संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदना में कमाई हुई मार्मिक आलोचना दृष्टि के बिना कविकर्म अधूरा है।"
प्रस्तुत पंक्तियाँ किस रचनाकार द्वारा रचित हैं ?
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गजानन माधव मुक्तिबोध।
व्याख्या:
मुक्तिबोध की कविता और आलोचना दोनों में ही संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदना का गहरा समन्वय दिखाई देता है। उनकी रचनाओं में जगत और जीवन के प्रति एक तीव्र संवेदनशीलता है, जो केवल बौद्धिक विश्लेषण तक सीमित नहीं रहती, बल्कि मानवीय अनुभवों की गहराई तक जाती है। उनकी आलोचना दृष्टि भी इसी संवेदनात्मक और ज्ञानात्मक मिश्रण से उपजी है। वे किसी भी रचना को केवल सैद्धांतिक कसौटियों पर नहीं परखते, बल्कि उसके मानवीय और सामाजिक संदर्भों को भी गहराई से समझते हैं। उनकी कविता 'अंधेरे में' और 'ब्रह्मराक्षस' जैसी रचनाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि वे संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदना को किस प्रकार अपने कविकर्म में समाहित करते हैं। इसलिए, यह पंक्ति मुक्तिबोध की रचना प्रक्रिया और आलोचनात्मक दृष्टिकोण को सटीक रूप से दर्शाती है।
अन्य विकल्पों की अस्वीकृति:
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आचार्य नंददुलारे वाजपेयी: वाजपेयी जी की आलोचना शास्त्रीय मूल्यों पर आधारित है और उसमें मुक्तिबोध की तरह संवेदनात्मक गहराई और ज्ञानात्मक संवेदना का इतना तीव्र मिश्रण नहीं मिलता। उनकी आलोचना अधिक वस्तुनिष्ठ और सैद्धांतिक होती है।
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हजारी प्रसाद द्विवेदी: द्विवेदी जी की रचनाओं में भारतीय संस्कृति और इतिहास का गहरा ज्ञान है, लेकिन उनकी आलोचना में मुक्तिबोध की तरह आधुनिक जीवन की जटिलताओं और संवेदनात्मक अनुभवों पर इतना अधिक जोर नहीं दिया गया है।
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विद्यानिवास मिश्र: मिश्र जी की रचनाएँ लोक संस्कृति और ग्रामीण जीवन से अधिक जुड़ी हुई हैं। उनकी आलोचना में भी लोक तत्वों का प्रभाव अधिक दिखाई देता है, जबकि मुक्तिबोध की आलोचना आधुनिकता और अस्तित्ववाद से प्रभावित है। इसलिए, यह पंक्ति मिश्र जी की रचना शैली से मेल नहीं खाती।
Question 346
"सोरठियो दूहो भलो, भली मरवण री बात।
जोबन छाई धण भली, ताराँ छाई रात।।"
उक्त दोहा किस ग्रंथ की लोकप्रियता के संबंध में लिखा गया है ?
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Answer & Explanation
"सोरठियो दूहो भलो, भली मरवण री बात।
जोबन छाई धण भली, ताराँ छाई रात।।"
यह दोहा 'ढोला मारू रा दूहा' नामक ग्रंथ की लोकप्रियता के संबंध में लिखा गया है, क्योंकि:
- 'ढोला मारू रा दूहा' की विषयवस्तु: यह ग्रंथ ढोला और मारवणी (मरवण) की प्रेम कहानी पर आधारित है। दोहे में 'मरवण री बात' का स्पष्ट उल्लेख इस बात का प्रमाण है कि यह दोहा 'ढोला मारू रा दूहा' से संबंधित है। 'सोरठियो दूहो भलो' का तात्पर्य है कि इस ग्रंथ के सोरठा छंद में लिखे गए दोहे बहुत अच्छे हैं, जो इसकी लोकप्रियता का कारण हैं।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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कीर्तिलता: यह विद्यापति द्वारा रचित एक अवहट्ट भाषा का ग्रंथ है, जो कीर्तिसिंह नामक राजा की वीरता का वर्णन करता है। इसमें ढोला मारू की प्रेम कहानी का कोई उल्लेख नहीं है, इसलिए यह विकल्प गलत है।
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वसंत विलास: यह एक प्राचीन गुजराती काव्य है जो वसंत ऋतु के सौंदर्य और प्रेम का वर्णन करता है। इसमें ढोला मारू की कहानी का कोई संबंध नहीं है, इसलिए यह विकल्प भी गलत है।
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पृथ्वीराज रासो: यह चंदबरदाई द्वारा रचित एक वीरगाथा काव्य है, जो पृथ्वीराज चौहान के जीवन और युद्धों का वर्णन करता है। इसमें ढोला मारू की प्रेम कहानी का कोई उल्लेख नहीं है, इसलिए यह विकल्प भी गलत है।
अतः, 'ढोला मारू रा दूहा' ही सही उत्तर है क्योंकि दोहे में 'मरवण री बात' का सीधा संबंध इसी ग्रंथ से है और यह ग्रंथ सोरठा छंद में लिखे गए दोहों के लिए प्रसिद्ध है।
Question 347
"समय ही वह रंग है जो अनेक-अनेक रंगों में विभाजित होता है और पठन-पाठन प्रक्रिया द्वारा फिर एक हो जाता है।"
प्रस्तुत उद्धरण किस प्रसिद्ध साहित्यकार का है ?
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Answer & Explanation
कृष्णा सोबती।
व्याख्या:
कृष्णा सोबती एक प्रतिष्ठित हिंदी साहित्यकार थीं, जो अपनी भाषा शैली और विषयों के चुनाव के लिए जानी जाती हैं। उनके लेखन में समय, स्मृति और मानवीय संबंधों की जटिलताओं का गहरा चित्रण मिलता है। दिया गया उद्धरण, "समय ही वह रंग है जो अनेक-अनेक रंगों में विभाजित होता है और पठन-पाठन प्रक्रिया द्वारा फिर एक हो जाता है," कृष्णा सोबती की लेखन शैली और उनके विचारों के अनुरूप है। यह उद्धरण समय की परिवर्तनशीलता और ज्ञान के माध्यम से उसे समझने की प्रक्रिया को दर्शाता है, जो सोबती के लेखन का एक महत्वपूर्ण पहलू है। उनकी रचनाओं में अक्सर समय के सापेक्ष मानवीय अनुभवों की खोज की जाती है, और यह उद्धरण उसी भावना को व्यक्त करता है।
अन्य विकल्पों की अस्वीकृति:
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प्रेमचंद: प्रेमचंद मुख्य रूप से सामाजिक यथार्थवाद और ग्रामीण जीवन के चित्रण के लिए जाने जाते हैं। उनकी भाषा शैली सरल और सीधी होती थी, और उनके लेखन में इस प्रकार के दार्शनिक और काव्यात्मक उद्धरण कम ही मिलते हैं।
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नासिरा शर्मा: नासिरा शर्मा समकालीन हिंदी साहित्य में एक महत्वपूर्ण नाम हैं, लेकिन उनकी लेखन शैली और विषयों का चुनाव कृष्णा सोबती से भिन्न है। उनके लेखन में सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया जाता है, जबकि दिया गया उद्धरण अधिक दार्शनिक और चिंतनशील है।
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बालमुकुंद गुप्त: बालमुकुंद गुप्त भारतेंदु युग के एक प्रमुख लेखक और पत्रकार थे। उनकी लेखन शैली व्यंग्यात्मक और हास्यपूर्ण होती थी, और उनके लेखन में इस प्रकार के गंभीर और दार्शनिक उद्धरण की संभावना कम है।
इसलिए, दिए गए उद्धरण की शैली और विषय-वस्तु को देखते हुए, यह कृष्णा सोबती के लेखन के साथ सबसे अधिक मेल खाता है।
Question 348
बाज़ार दर्शन' निबंध के रचयिता हैं -
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'बाज़ार दर्शन' निबंध के रचयिता जैनेन्द्र कुमार हैं, इसलिए विकल्प 3 सही है।
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विकल्प 3 सही क्यों है: 'बाज़ार दर्शन' निबंध जैनेन्द्र कुमार द्वारा लिखा गया है। यह निबंध उपभोक्तावाद और बाज़ार के मनोविज्ञान पर एक गहरा चिंतन प्रस्तुत करता है। जैनेन्द्र कुमार हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक कथाकार और निबंधकार हैं, और 'बाज़ार दर्शन' उनकी एक महत्वपूर्ण रचना है।
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विकल्प 1 गलत क्यों है: गजानन माधव मुक्तिबोध एक प्रसिद्ध कवि और आलोचक हैं, लेकिन उन्होंने 'बाज़ार दर्शन' निबंध नहीं लिखा है। उनकी रचनाएँ अधिकतर कविता और आलोचना के क्षेत्र में हैं।
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विकल्प 2 गलत क्यों है: महादेवी वर्मा एक प्रसिद्ध कवयित्री और लेखिका हैं, जिन्हें छायावादी युग की प्रमुख स्तंभ माना जाता है। उन्होंने 'बाज़ार दर्शन' निबंध नहीं लिखा है। उनकी रचनाएँ अधिकतर कविता, रेखाचित्र और संस्मरणों पर आधारित हैं।
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विकल्प 4 गलत क्यों है: धर्मवीर भारती एक प्रसिद्ध लेखक, कवि और पत्रकार थे। उन्होंने 'गुनाहों का देवता' जैसे प्रसिद्ध उपन्यास लिखे हैं, लेकिन 'बाज़ार दर्शन' निबंध जैनेन्द्र कुमार द्वारा लिखा गया है, धर्मवीर भारती द्वारा नहीं।
इसलिए, स्पष्ट रूप से 'बाज़ार दर्शन' निबंध के रचयिता जैनेन्द्र कुमार हैं, जिससे विकल्प 3 सही उत्तर है।
Question 349
आलो-आँधारि' मूल रूप में किस भाषा में लिखी गई है ?
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'आलो-आँधारि' मूल रूप से बांग्ला भाषा में लिखी गई है।
Option 4 (बांग्ला) सही क्यों है:
'आलो-आँधारि' (আলো-আঁধারি) बांग्ला भाषा की प्रसिद्ध लेखिका बेबी हालदार (Baby Halder) द्वारा लिखी गई एक आत्मकथा है। यह पुस्तक उनके जीवन के संघर्षों और अनुभवों को दर्शाती है। चूंकि यह बेबी हालदार द्वारा लिखी गई है, जो एक बंगाली लेखिका हैं, इसलिए यह स्पष्ट है कि पुस्तक मूल रूप से बांग्ला में लिखी गई थी। बाद में इसका अन्य भाषाओं में अनुवाद किया गया।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
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Option 1 (कन्नड़): 'आलो-आँधारि' कन्नड़ भाषा में मूल रूप से नहीं लिखी गई थी। इसका कन्नड़ से कोई सीधा संबंध नहीं है।
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Option 2 (तमिल): 'आलो-आँधारि' तमिल भाषा में मूल रूप से नहीं लिखी गई थी। इसका तमिल से कोई सीधा संबंध नहीं है।
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Option 3 (असमिया): 'आलो-आँधारि' असमिया भाषा में मूल रूप से नहीं लिखी गई थी। इसका असमिया से कोई सीधा संबंध नहीं है।
Question 350
कृश्नचंदर कृत 'जामुन का पेड़' किस विधा की रचना है ?
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हास्य-व्यंग्य कथा।
व्याख्या:
'जामुन का पेड़' कृश्नचंदर द्वारा रचित एक प्रसिद्ध हास्य-व्यंग्य कथा है। यह कहानी सरकारी कार्यालयों में व्याप्त लालफीताशाही, संवेदनहीनता और मानवीय मूल्यों के अभाव पर तीखा व्यंग्य करती है। कहानी में एक जामुन का पेड़ गिर जाता है जिसके नीचे एक आदमी दब जाता है। उस आदमी को बचाने की बजाय, विभिन्न विभागों के अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से बचने और कागजी कार्रवाई में उलझे रहते हैं। यह स्थिति हास्य उत्पन्न करती है, लेकिन साथ ही व्यवस्था की विसंगतियों पर करारा प्रहार भी करती है। कहानी का अंत भी व्यंग्यात्मक है, जो व्यवस्था की निरर्थकता को दर्शाता है। इसलिए, 'जामुन का पेड़' एक हास्य-व्यंग्य कथा है।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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उपन्यास-अंश: 'जामुन का पेड़' एक स्वतंत्र, लघु कथा है, न कि किसी उपन्यास का भाग। यह एक पूर्ण कहानी है जो एक ही घटना पर केंद्रित है। इसलिए यह विकल्प गलत है।
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रेखाचित्र: रेखाचित्र किसी व्यक्ति या वस्तु का शब्दों के माध्यम से चित्र प्रस्तुत करता है। 'जामुन का पेड़' किसी व्यक्ति का रेखाचित्र नहीं है, बल्कि एक घटना पर आधारित व्यंग्यात्मक कहानी है। इसलिए यह विकल्प गलत है।
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संस्मरण: संस्मरण लेखक के अपने जीवन के अनुभवों पर आधारित होता है। 'जामुन का पेड़' कृश्नचंदर के व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित नहीं है, बल्कि एक काल्पनिक घटना पर आधारित व्यंग्य है। इसलिए यह विकल्प गलत है।
अतः, स्पष्ट रूप से, 'जामुन का पेड़' एक हास्य-व्यंग्य कथा है, जो सरकारी तंत्र पर व्यंग्य करती है।
Question 351
वाममार्गी साधना पद्धति से अभिप्राय है -
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वाममार्गी साधना पद्धति से अभिप्राय सिद्ध साधना पद्धति है, क्योंकि:
- सिद्ध साधना पद्धति: वाममार्ग, जिसे वामाचार भी कहा जाता है, तांत्रिक साधना का एक मार्ग है जो पारंपरिक वैदिक या ब्राह्मणवादी प्रथाओं से अलग है। सिद्ध परंपरा, जो 84 सिद्धों से जुड़ी है, तांत्रिक साधनाओं पर बहुत जोर देती है, जिसमें पंचमकार (मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा, मैथुन) का प्रतीकात्मक या वास्तविक उपयोग शामिल है। ये साधनाएँ अक्सर सांसारिक सुखों के माध्यम से आध्यात्मिक मुक्ति प्राप्त करने के उद्देश्य से की जाती हैं, जो कि वाममार्गी दृष्टिकोण का एक विशिष्ट पहलू है। इसलिए, सिद्ध साधना पद्धति वाममार्गी साधना पद्धति का प्रतिनिधित्व करती है।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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नाथ साधना पद्धति: नाथ परंपरा हठ योग और आंतरिक साधनाओं पर अधिक केंद्रित है। हालांकि नाथ परंपरा में तांत्रिक तत्व मौजूद हैं, लेकिन यह वाममार्गी साधनाओं पर उतना जोर नहीं देती जितना कि सिद्ध परंपरा। नाथ पंथ में बाहरी कर्मकांडों की तुलना में आंतरिक रूपांतरण पर अधिक ध्यान दिया जाता है।
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संत साधना: संत परंपरा भक्ति और प्रेम पर आधारित है। यह ईश्वर के प्रति समर्पण और नैतिक आचरण पर जोर देती है। संत साधना में वाममार्गी साधनाओं का कोई स्थान नहीं है।
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सूफी साधना: सूफीवाद इस्लाम का एक रहस्यवादी पहलू है जो ईश्वर के साथ व्यक्तिगत अनुभव और प्रेम पर केंद्रित है। सूफी साधना में वाममार्गी साधनाओं का कोई स्थान नहीं है। यह प्रेम, भक्ति और त्याग पर आधारित है।
इसलिए, स्पष्ट रूप से, सिद्ध साधना पद्धति ही वाममार्गी साधना पद्धति से सबसे अधिक संबंधित है।
Question 352
"हिन्दुस्तान में सर्वमान्य हो सकने वाली कोई लिपि है तो वह देवनागरी ही है ...। यदि राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करना है तो पहले देवनागरी लिपि को समृद्ध करना होगा।"
उक्त कथन किस विचारक का है ?
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महात्मा गाँधी के कथन के रूप में देवनागरी लिपि को राष्ट्रीय एकता के लिए महत्वपूर्ण बताने का औचित्य इस प्रकार है:
महात्मा गाँधी हमेशा से ही स्वदेशी और भारतीय भाषाओं के उत्थान के प्रबल समर्थक रहे थे। देवनागरी लिपि, जो हिंदी और कई अन्य भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त होती है, को राष्ट्रीय स्तर पर सर्वमान्य बनाने का विचार उनकी स्वदेशी भावना और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने की सोच के अनुरूप है। गाँधी जी का मानना था कि एक समान लिपि होने से विभिन्न भाषा-भाषी क्षेत्रों के लोगों के बीच संवाद और समझ बढ़ेगी, जिससे राष्ट्रीय एकता मजबूत होगी। उन्होंने हमेशा सरल और सुलभ भाषा के प्रयोग पर जोर दिया, और देवनागरी लिपि की सरलता और वैज्ञानिकता इसे राष्ट्रीय स्तर पर अपनाने के लिए उपयुक्त बनाती है। इसलिए, यह तर्कसंगत है कि गाँधी जी ने देवनागरी लिपि को राष्ट्रीय एकता के लिए महत्वपूर्ण बताया होगा।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
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डॉ० सुनीति कुमार चटर्जी: डॉ० सुनीति कुमार चटर्जी एक भाषाविद थे और उन्होंने भाषाओं के विकास पर महत्वपूर्ण कार्य किया है। हालांकि, इस विशिष्ट कथन का श्रेय उन्हें देना ठोस प्रमाणों के अभाव में उचित नहीं है।
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भोलानाथ तिवारी: भोलानाथ तिवारी भी एक भाषाविद थे, लेकिन उनका कार्यक्षेत्र मुख्य रूप से हिंदी भाषा और व्याकरण पर केंद्रित था। इस कथन के साथ उनका सीधा संबंध स्थापित करने के लिए पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं है।
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बाल गंगाधर तिलक: बाल गंगाधर तिलक एक स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक थे। उन्होंने स्वराज्य की वकालत की, लेकिन देवनागरी लिपि पर उनके विशिष्ट विचारों के बारे में इस कथन के संदर्भ में कोई ठोस जानकारी नहीं है।
इसलिए, दिए गए विकल्पों में से, महात्मा गाँधी का नाम इस कथन के साथ सबसे अधिक मेल खाता है, क्योंकि वे राष्ट्रीय एकता और स्वदेशी भाषाओं के प्रबल समर्थक थे।
Question 353
"हर कलाकृति जितनी वह पढ़ी जाती है, सुनाई या दिखाई देती है; उससे कहीं ज़्यादा होती है और फ़िल्म को लेकर शायद यह कुछ अधिक सत्य है।" प्रस्तुत कथन किस लेखक का है ?
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विष्णु खरे।
विष्णु खरे क्यों सही उत्तर हैं:
यह कथन विष्णु खरे का है। विष्णु खरे एक प्रसिद्ध हिंदी कवि, आलोचक और अनुवादक थे। उनकी लेखन शैली में गहराई और कला के प्रति एक विशेष दृष्टिकोण झलकता है। यह कथन, "हर कलाकृति जितनी वह पढ़ी जाती है, सुनाई या दिखाई देती है; उससे कहीं ज़्यादा होती है और फ़िल्म को लेकर शायद यह कुछ अधिक सत्य है," उनकी कला और फ़िल्मों के प्रति गहरी समझ को दर्शाता है। यह कथन कला के बहुआयामी स्वरूप और उसकी व्याख्या की जटिलता पर जोर देता है, जो विष्णु खरे के लेखन की एक विशिष्ट विशेषता है। उनकी आलोचनात्मक लेखन में अक्सर कला के विभिन्न रूपों की गहरी छानबीन और विश्लेषण शामिल होता है, जिससे यह कथन उनके विचारों के अनुरूप प्रतीत होता है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं:
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रज़िया सज्जाद ज़हीर: रज़िया सज्जाद ज़हीर एक उर्दू लेखिका थीं जिन्होंने सामाजिक मुद्दों पर लिखा। उनकी लेखन शैली और विषयों में इस कथन के समान कला के प्रति गहरी दार्शनिक दृष्टिकोण की कमी है।
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हजारी प्रसाद द्विवेदी: हजारी प्रसाद द्विवेदी एक प्रतिष्ठित हिंदी साहित्यकार थे, लेकिन उनका लेखन मुख्य रूप से भारतीय संस्कृति, इतिहास और दर्शन पर केंद्रित था। जबकि वे कला के महत्व को समझते थे, यह विशेष कथन उनकी लेखन शैली या विचारों के अनुरूप नहीं है।
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फणीश्वर नाथ रेणु: फणीश्वर नाथ रेणु एक आंचलिक उपन्यासकार थे, जिन्होंने ग्रामीण जीवन और सामाजिक यथार्थवाद पर लिखा। उनका लेखन कला के दार्शनिक पहलुओं की बजाय स्थानीय संस्कृति और मानवीय भावनाओं पर अधिक केंद्रित था। इसलिए, यह कथन उनके लेखन शैली से मेल नहीं खाता।
इसलिए, दिए गए विकल्पों में से, विष्णु खरे ही एकमात्र ऐसे लेखक हैं जिनकी लेखन शैली और विचारों के संदर्भ में यह कथन सबसे अधिक प्रासंगिक और संगत है।
Question 354
नागरी प्रचारिणी पत्रिका' का प्रकाशन वर्ष है
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Answer & Explanation
'नागरी प्रचारिणी पत्रिका' का प्रकाशन वर्ष 1896 ई० है, इसलिए विकल्प 1 सही है।
विस्तृत स्पष्टीकरण:
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विकल्प 1 (1896 ई०): नागरी प्रचारिणी सभा, काशी द्वारा 'नागरी प्रचारिणी पत्रिका' का प्रकाशन 1896 ई० में शुरू हुआ था। यह पत्रिका हिंदी साहित्य के इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है और इसके माध्यम से हिंदी भाषा और साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया गया। इसलिए, यह विकल्प सही है।
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विकल्प 2 (1897 ई०): 1897 ई० 'नागरी प्रचारिणी पत्रिका' का प्रकाशन वर्ष नहीं है। पत्रिका का प्रकाशन 1896 ई० में शुरू हुआ था। इसलिए, यह विकल्प गलत है।
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विकल्प 3 (1898 ई०): 1898 ई० भी 'नागरी प्रचारिणी पत्रिका' का प्रकाशन वर्ष नहीं है। पत्रिका का प्रकाशन 1896 ई० में शुरू हुआ था। इसलिए, यह विकल्प गलत है।
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विकल्प 4 (1899 ई०): 1899 ई० 'नागरी प्रचारिणी पत्रिका' का प्रकाशन वर्ष नहीं है। पत्रिका का प्रकाशन 1896 ई० में शुरू हुआ था। इसलिए, यह विकल्प गलत है।
अतः, केवल विकल्प 1 सही है क्योंकि 'नागरी प्रचारिणी पत्रिका' का प्रकाशन वर्ष 1896 ई० है।
Question 355
"अभिधा उत्तम काव्य है, मध्य लक्षणा हीन।
अधम व्यंजना रस विरस, उलटी कहत नवीन।"
शब्दशक्ति विषयक उक्त पद किसका है ?
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Answer & Explanation
देवकवि।
व्याख्या:
यह पद देवकवि का है। देवकवि, जिन्हें देवदत्त द्विवेदी के नाम से भी जाना जाता है, रीतिकाल के प्रमुख कवियों में से एक थे। उन्होंने शब्दशक्ति (अभिधा, लक्षणा, व्यंजना) के विषय में अपने विचार प्रस्तुत किए, और यह पद उनकी काव्य-सिद्धांत संबंधी समझ को दर्शाता है। देवकवि ने 'शब्द रसायन', 'भाव विलास', 'अष्टयाम' जैसे ग्रंथों की रचना की, जिनमें काव्यशास्त्र के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है। प्रस्तुत पद उनकी रचनाओं में मिलता है और शब्द शक्तियों के वर्गीकरण को उनके दृष्टिकोण से प्रस्तुत करता है।
अन्य विकल्पों की अस्वीकृति:
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भिखारीदास: भिखारीदास भी रीतिकाल के महत्वपूर्ण कवि थे, लेकिन शब्दशक्ति के विषय में यह विशिष्ट पद उनसे संबंधित नहीं है। उनकी रचनाओं में काव्यशास्त्र के अन्य पहलुओं पर ध्यान केंद्रित किया गया है, लेकिन यह विशेष पद देवकवि की पहचान है।
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चिंतामणि: चिंतामणि रीतिकाल के एक और प्रमुख कवि थे और उन्हें रीतिकाल का प्रवर्तक भी माना जाता है। उन्होंने भी काव्यशास्त्र पर लिखा, लेकिन यह पद उनकी रचनाओं में नहीं पाया जाता।
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रसलीन: रसलीन भी रीतिकाल के कवि थे, लेकिन उनकी रचनाएँ श्रृंगार रस पर अधिक केंद्रित थीं। शब्दशक्ति के विषय में यह पद उनकी शैली से मेल नहीं खाता।
इसलिए, दिए गए विकल्पों में से, देवकवि ही इस पद के रचयिता हैं।
Question 356
"आकाश में ध्रुवतारा टिमटिमा रहा है।" वाक्य में कौन-से क्रिया रूप का प्रयोग किया गया है ?
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Answer & Explanation
अकर्मक क्रिया
व्याख्या:
दिए गए वाक्य "आकाश में ध्रुवतारा टिमटिमा रहा है।" में 'टिमटिमा रहा है' क्रिया है। यह एक अकर्मक क्रिया है क्योंकि क्रिया का फल कर्ता (ध्रुवतारा) पर ही पड़ रहा है। वाक्य में कोई कर्म (object) मौजूद नहीं है जिस पर क्रिया का प्रभाव पड़े।
अन्य विकल्पों का खंडन:
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पूर्ण सकर्मक क्रिया: सकर्मक क्रिया वह होती है जिसमें कर्म (object) मौजूद होता है और क्रिया का फल कर्ता से कर्म पर पड़ता है। इस वाक्य में कर्म नहीं है, इसलिए यह विकल्प गलत है।
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द्विकर्मक क्रिया: द्विकर्मक क्रिया वह होती है जिसमें दो कर्म (objects) होते हैं। इस वाक्य में एक भी कर्म नहीं है, इसलिए यह विकल्प गलत है।
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अपूर्ण सकर्मक क्रिया: अपूर्ण सकर्मक क्रिया वह होती है जिसमें कर्म के साथ-साथ कर्म पूरक (object complement) की भी आवश्यकता होती है ताकि वाक्य का अर्थ पूर्ण हो सके। इस वाक्य में न तो कर्म है और न ही कर्म पूरक की आवश्यकता है, इसलिए यह विकल्प गलत है।
इसलिए, केवल अकर्मक क्रिया ही सही उत्तर है क्योंकि क्रिया का फल सीधे कर्ता पर पड़ रहा है और वाक्य में कोई कर्म मौजूद नहीं है।
Question 357
"दस करोड़ की लागत से बना महाविद्यालय उजड़ गया है।"
रेखांकित वाक्यांश किस विशेषण का उदाहरण है ?
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Answer & Explanation
"दस करोड़" रेखांकित वाक्यांश पूर्णांकबोधक विशेषण का उदाहरण है क्योंकि यह एक निश्चित और पूरी संख्या (दस करोड़) को दर्शाता है। पूर्णांकबोधक विशेषण वे विशेषण होते हैं जो निश्चित संख्या का बोध कराते हैं। यहाँ, "दस करोड़" एक स्पष्ट और पूर्ण संख्या है, जो महाविद्यालय की लागत को दर्शाती है।
अब, अन्य विकल्पों पर विचार करते हैं:
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अपूर्णांकबोधक: अपूर्णांकबोधक विशेषण वे होते हैं जो पूरी संख्या का बोध नहीं कराते, बल्कि किसी संख्या के अंश या भाग को दर्शाते हैं, जैसे "आधा," "चौथाई," या "कुछ।" "दस करोड़" एक पूर्ण संख्या है, इसलिए यह विकल्प गलत है।
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समुदायवाचक: समुदायवाचक विशेषण किसी समूह या समुदाय को दर्शाते हैं, जैसे "दोनों," "तीनों," या "चारों।" "दस करोड़" किसी समूह को नहीं दर्शाता, बल्कि एक निश्चित संख्या को दर्शाता है, इसलिए यह विकल्प गलत है।
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क्रमवाचक: क्रमवाचक विशेषण किसी क्रम या स्थान को दर्शाते हैं, जैसे "पहला," "दूसरा," या "दसवाँ।" "दस करोड़" किसी क्रम को नहीं दर्शाता, बल्कि एक निश्चित संख्या को दर्शाता है, इसलिए यह विकल्प गलत है।
इसलिए, केवल पूर्णांकबोधक विशेषण ही रेखांकित वाक्यांश "दस करोड़" के लिए सही विकल्प है, क्योंकि यह एक निश्चित और पूरी संख्या को दर्शाता है।
Question 358
निम्न में से पुल्लिंग शब्द को छाँटिए -
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Answer & Explanation
Option 2, भाद्रपद, पुल्लिंग शब्द है। इसका कारण यह है कि हिंदी में महीनों के नाम आम तौर पर पुल्लिंग होते हैं। हम कहते हैं "भाद्रपद का महीना", "भाद्रपद आया", जिससे स्पष्ट होता है कि यह पुल्लिंग है।
अब अन्य विकल्पों पर विचार करते हैं:
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सरसों: सरसों एक स्त्रीलिंग शब्द है। हम कहते हैं "सरसों बोई गई", "सरसों की फसल", जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह स्त्रीलिंग है।
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मधुशाला: मधुशाला भी एक स्त्रीलिंग शब्द है। हम कहते हैं "मधुशाला खुली है", "मधुशाला प्रसिद्ध है", जिससे यह स्त्रीलिंग प्रतीत होता है।
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महती: महती एक स्त्रीलिंग शब्द है। इसका प्रयोग स्त्रीलिंग संज्ञाओं के साथ विशेषण के रूप में होता है।
इसलिए, केवल भाद्रपद ही पुल्लिंग शब्द है, और यही कारण है कि Option 2 सही उत्तर है।
Question 359
निम्न में से किस अलंकार का उल्लेख भरतमुनि के 'नाट्यशास्त्र' में नहीं हुआ है ?
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Answer & Explanation
अतिशयोक्ति अलंकार का उल्लेख भरतमुनि के 'नाट्यशास्त्र' में नहीं हुआ है, इसलिए विकल्प 4 सही है।
विस्तृत स्पष्टीकरण:
भरतमुनि का 'नाट्यशास्त्र' नाट्यकला और साहित्य का एक प्राचीन और महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें उन्होंने नाटकों में प्रयुक्त होने वाले विभिन्न तत्वों, जैसे रस, भाव, अभिनय, और अलंकार आदि का विस्तृत वर्णन किया है। भरतमुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में केवल चार अलंकारों का उल्लेख किया है: उपमा, रूपक, दीपक और यमक।
- अतिशयोक्ति: अतिशयोक्ति अलंकार में किसी वस्तु या स्थिति का वर्णन बढ़ा-चढ़ाकर किया जाता है। हालांकि यह एक महत्वपूर्ण अलंकार है और बाद के आचार्यों द्वारा इसे मान्यता दी गई, लेकिन भरतमुनि ने अपने 'नाट्यशास्त्र' में इसका उल्लेख नहीं किया है। इसलिए, यह विकल्प सही है।
अन्य विकल्पों की व्याख्या:
- उपमा: उपमा अलंकार में दो वस्तुओं या व्यक्तियों के बीच समानता बताई जाती है। भरतमुनि ने 'नाट्यशास्त्र' में उपमा अलंकार का उल्लेख किया है। इसलिए, यह विकल्प गलत है।
- यमक: यमक अलंकार में एक ही शब्द दो या दो से अधिक बार आता है, लेकिन हर बार उसका अर्थ अलग होता है। भरतमुनि ने 'नाट्यशास्त्र' में यमक अलंकार का उल्लेख किया है। इसलिए, यह विकल्प गलत है।
- दीपक: दीपक अलंकार में एक ही शब्द या वाक्य से कई अर्थ निकलते हैं। भरतमुनि ने 'नाट्यशास्त्र' में दीपक अलंकार का उल्लेख किया है। इसलिए, यह विकल्प गलत है।
अतः, स्पष्ट है कि भरतमुनि के 'नाट्यशास्त्र' में अतिशयोक्ति अलंकार का उल्लेख नहीं है।
Question 360
तथागति' शब्द में समास है :
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Answer & Explanation
'तथागति' शब्द में अव्ययीभाव समास है, क्योंकि:
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अव्ययीभाव समास की परिभाषा: अव्ययीभाव समास में पहला पद अव्यय होता है और वह प्रधान होता है। समस्त पद भी अव्यय की तरह काम करता है।
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'तथागति' का विश्लेषण: 'तथागति' शब्द 'तथा' (अव्यय) और 'गति' के मेल से बना है। यहाँ 'तथा' अव्यय है और इसका अर्थ 'उस प्रकार' या 'वैसी' है। 'तथा' अव्यय 'गति' शब्द के साथ मिलकर पूरे पद को अव्यय बना रहा है, जिसका अर्थ है 'वैसी गति' या 'उसी प्रकार की गति'।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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तत्पुरुष समास: तत्पुरुष समास में दूसरा पद प्रधान होता है और कारक चिह्नों का लोप होता है। 'तथागति' में ऐसा कुछ नहीं है। कारक चिह्नों का लोप नहीं हो रहा है और न ही दूसरा पद प्रधान है।
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द्विगु समास: द्विगु समास में पहला पद संख्यावाची होता है और समूह का बोध कराता है। 'तथागति' में कोई संख्यावाची शब्द नहीं है।
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बहुव्रीहि समास: बहुव्रीहि समास में कोई भी पद प्रधान नहीं होता, बल्कि समस्त पद किसी तीसरे अर्थ की ओर संकेत करता है। 'तथागति' किसी तीसरे अर्थ की ओर संकेत नहीं करता, बल्कि एक विशेष प्रकार की गति को दर्शाता है।
इसलिए, 'तथागति' शब्द में अव्ययीभाव समास ही सही उत्तर है, क्योंकि यह अव्ययीभाव समास की परिभाषा और विशेषताओं को पूरी तरह से संतुष्ट करता है।