HTET Exam Level 3 PGT
HTET exam Level 3 PGT preparation with Clear Cutoff
Verified Answers and Explanations
by Clear Cutoff
Showing 20 of 20 questions
Question 321
वाक्यांश के लिए शब्द के संदर्भ में कौन-सा विकल्प असंगत है ?
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
Option 2 सही है क्योंकि "जो कठिनता से भेदा जा सके" के लिए सही वाक्यांश "दुर्भेद्य" होगा, न कि "दुस्तर"। "दुस्तर" का अर्थ होता है जिसे पार करना कठिन हो, भेदना नहीं। इसलिए, यह विकल्प वाक्यांश के लिए एक असंगत शब्द है।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
-
Option 1: जिसकी पूर्ति आसानी से हो जाए - सुपूर्य: यह विकल्प सही है। "सुपूर्य" का अर्थ होता है जिसे आसानी से पूरा किया जा सके।
-
Option 3: मानसिक भाव छिपाना – अवहित्था: यह विकल्प भी सही है। "अवहित्था" एक प्रकार का छल या कपट है जिसमें व्यक्ति अपने वास्तविक मानसिक भावों को छिपाता है।
-
Option 4: अच्छाई और बुराई की पहचान का गुण - विवेक: यह विकल्प भी सही है। "विवेक" का अर्थ होता है सही और गलत के बीच अंतर करने की क्षमता।
इसलिए, केवल Option 2 ही गलत है, क्योंकि "जो कठिनता से भेदा जा सके" के लिए सही शब्द "दुर्भेद्य" है, न कि "दुस्तर"।
Question 322
किस विकल्प में उपसर्ग एवं प्रत्यय दोनों का योग हुआ है ?
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
Option 1 (पारिवारिक) सही क्यों है:
"पारिवारिक" शब्द में उपसर्ग और प्रत्यय दोनों का योग हुआ है। इसका मूल शब्द "परिवार" है।
-
उपसर्ग: इस शब्द में कोई स्पष्ट उपसर्ग नहीं है। हालांकि, कुछ व्याकरणिक दृष्टिकोण से, "परि" को एक प्रकार का अव्यय माना जा सकता है जो "चारों ओर" या "संबंधी" का भाव देता है। लेकिन मुख्य रूप से, इसे उपसर्ग के रूप में नहीं देखा जाता।
-
प्रत्यय: "इक" प्रत्यय "परिवार" शब्द के अंत में जुड़कर "पारिवारिक" बनाता है। "इक" प्रत्यय संबंध या विशेषता दर्शाता है (जैसे, परिवार से संबंधित)।
इसलिए, "पारिवारिक" शब्द में "इक" प्रत्यय का स्पष्ट रूप से प्रयोग हुआ है, और "परि" को कुछ हद तक उपसर्ग के रूप में माना जा सकता है, जिससे यह उपसर्ग और प्रत्यय दोनों के योग का उदाहरण बनता है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
-
Option 2 (रासायनिक): "रासायनिक" शब्द में "रसायन" मूल शब्द है और "इक" प्रत्यय लगा है। इसमें कोई उपसर्ग नहीं है।
-
Option 3 (काल्पनिक): "काल्पनिक" शब्द में "कल्पना" मूल शब्द है और "इक" प्रत्यय लगा है। इसमें कोई उपसर्ग नहीं है।
-
Option 4 (पाशविक): "पाशविक" शब्द में "पशु" मूल शब्द है और "इक" प्रत्यय लगा है। इसमें कोई उपसर्ग नहीं है।
अतः, केवल "पारिवारिक" शब्द में ही उपसर्ग (परि, हालांकि विवादास्पद) और प्रत्यय (इक) दोनों का योग हुआ है। इसलिए Option 1 सही है।
Question 323
डेढ़ चावल की खिचड़ी पकाना' उक्त मुहावरा किस अर्थ को प्रकट करता है ?
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
'डेढ़ चावल की खिचड़ी पकाना' मुहावरे का अर्थ 'बहुमत से अलग रहना' है, क्योंकि:
-
Option 1 सही क्यों है: यह मुहावरा उस व्यक्ति या समूह को दर्शाता है जो अपने विचारों, कार्यों या तौर-तरीकों में दूसरों से अलग चलता है। 'डेढ़ चावल की खिचड़ी' का तात्पर्य है कि वह व्यक्ति या समूह एक अलग और संभवतः अपूर्ण या असामान्य तरीके से काम कर रहा है, जो सामान्य बहुमत से भिन्न है। यह अलगाव और असहमति को दर्शाता है।
-
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
- Option 2 (किसी का शासन होना): यह मुहावरा किसी के शासन या प्रभुत्व को नहीं दर्शाता है। इसका संबंध व्यक्तिगत या सामूहिक भिन्नता से है, न कि शासन व्यवस्था से।
- Option 3 (आय के अनुसार व्यय): यह मुहावरा वित्तीय प्रबंधन या मितव्ययिता से संबंधित नहीं है। इसका संबंध विचारों और कार्यों में अलगाव से है।
- Option 4 (किसी के वश में होना): यह मुहावरा किसी के नियंत्रण या अधीनता को नहीं दर्शाता है। यह स्वतंत्रता और अलगाव को दर्शाता है, भले ही वह अलगाव असामान्य हो।
इसलिए, 'डेढ़ चावल की खिचड़ी पकाना' मुहावरे का सबसे सटीक अर्थ 'बहुमत से अलग रहना' ही है।
Question 324
किस वाक्य में 'संबंधसूचक अव्यय' का प्रयोग हुआ है ?
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
'आज विराट की जगह रोहित खेलेगा' वाक्य में 'संबंधसूचक अव्यय' का प्रयोग हुआ है क्योंकि 'की जगह' शब्द विराट और रोहित के बीच संबंध स्थापित कर रहा है। यह बता रहा है कि रोहित, विराट के स्थान पर खेलेगा। 'की जगह' एक संबंधसूचक अव्यय है जो दो संज्ञाओं या सर्वनामों के बीच संबंध दर्शाता है।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
-
मैं भली-भाँति जानता हूँ।: इस वाक्य में 'भली-भाँति' क्रियाविशेषण है, जो जानने की क्रिया की विशेषता बता रहा है। इसमें संबंधसूचक अव्यय का प्रयोग नहीं हुआ है।
-
यदि तुम सत्य बोलोगे तो इनाम पाओगे।: इस वाक्य में 'यदि...तो' समुच्चयबोधक अव्यय हैं, जो दो वाक्यों को जोड़ रहे हैं। यह शर्त और परिणाम के बीच संबंध दिखा रहा है, लेकिन यह संबंधसूचक अव्यय नहीं है।
-
बाप रे! अँधेरे में कोई खड़ा है।: इस वाक्य में 'बाप रे!' विस्मयादिबोधक अव्यय है, जो आश्चर्य या विस्मय का भाव व्यक्त कर रहा है। इसमें संबंधसूचक अव्यय का प्रयोग नहीं हुआ है।
इसलिए, केवल विकल्प 2 में ही 'संबंधसूचक अव्यय' का सही प्रयोग हुआ है।
Question 325
‘पृथ्वीराज रासो’ के विषय में कौन-सा तथ्य सही नहीं है ?
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
'पृथ्वीराज रासो' के विषय में ऑप्शन 4 सही नहीं है, क्योंकि यह काव्य डिंगल मिश्रित भाषा में रचित है, यह कहना पूरी तरह से सटीक नहीं है।
Option 4 सही क्यों है:
'पृथ्वीराज रासो' में डिंगल भाषा का प्रयोग अवश्य हुआ है, लेकिन यह केवल डिंगल मिश्रित भाषा में ही रचित नहीं है। इसमें पिंगल भाषा (ब्रजभाषा का साहित्यिक रूप) का भी महत्वपूर्ण योगदान है। इसलिए, यह कहना कि यह काव्य केवल डिंगल मिश्रित भाषा में रचित है, एक सरलीकरण होगा और पूरी तरह से सही नहीं है। रासो में विभिन्न भाषाओं और शैलियों का मिश्रण है, जिसमें डिंगल और पिंगल दोनों प्रमुख हैं।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
-
Option 1: आचार्य शुक्ल के अनुसार यह हिंदी का प्रथम महाकाव्य है। यह कथन सही है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 'पृथ्वीराज रासो' को हिंदी का प्रथम महाकाव्य माना है, भले ही इसकी प्रामाणिकता पर विवाद हो।
-
Option 2: नागरी प्रचारिणी सभा काशी से प्रकाशित वृहद् संस्करण में 69 समय है। यह कथन भी सही है। नागरी प्रचारिणी सभा, काशी द्वारा प्रकाशित 'पृथ्वीराज रासो' के वृहद् संस्करण में 69 'समय' (सर्ग या अध्याय) हैं।
-
Option 3: इसमें श्रृंगार एवं वीर रस प्रमुख हैं। यह कथन भी सही है। 'पृथ्वीराज रासो' में श्रृंगार और वीर रस दोनों का ही प्रभावी ढंग से वर्णन किया गया है। पृथ्वीराज चौहान के प्रेम और वीरता की कहानियों को इसमें प्रमुखता से दर्शाया गया है।
इसलिए, केवल Option 4 ही ऐसा है जो 'पृथ्वीराज रासो' के भाषा संबंधी पहलू को पूरी तरह से सही ढंग से प्रस्तुत नहीं करता है, क्योंकि यह केवल डिंगल भाषा पर ही जोर देता है जबकि पिंगल का भी महत्वपूर्ण योगदान है।
Question 326
‘सिल्वर वेडिंग’ कहानी की मूल संवेदना है :
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
'सिल्वर वेडिंग' कहानी की मूल संवेदना पीढ़ी अंतराल से उत्पन्न सामंजस्यहीनता है, यह सही है क्योंकि:
-
पीढ़ी अंतराल का चित्रण: कहानी में यशोधर बाबू और उनके बच्चों के बीच मूल्यों, सोच और जीवनशैली में स्पष्ट अंतर दिखाया गया है। यशोधर बाबू पुरानी पीढ़ी के मूल्यों को मानते हैं, जबकि उनके बच्चे आधुनिक जीवनशैली को अपनाते हैं। यह अंतर उनके बीच सामंजस्यहीनता पैदा करता है।
-
पारिवारिक मूल्यों में टकराव: यशोधर बाबू संयुक्त परिवार और पारंपरिक मूल्यों को महत्व देते हैं, जबकि उनके बच्चे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आधुनिक मूल्यों को प्राथमिकता देते हैं। इस टकराव के कारण परिवार में तनाव और असहमति बनी रहती है।
-
यशोधर बाबू की निराशा: यशोधर बाबू अपने बच्चों की आधुनिक सोच और जीवनशैली से निराश हैं। उन्हें लगता है कि उनके बच्चे उनकी बातों को नहीं समझते हैं और उन्हें सम्मान नहीं देते हैं। यह निराशा पीढ़ी अंतराल के कारण उत्पन्न सामंजस्यहीनता का परिणाम है।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
-
आधुनिक जीवन शैली का अंधानुकरण: यह विकल्प आंशिक रूप से सही हो सकता है, क्योंकि कहानी में यशोधर बाबू के बच्चे आधुनिक जीवनशैली को अपनाते हैं। लेकिन, कहानी का मुख्य फोकस आधुनिक जीवनशैली का अंधानुकरण नहीं है, बल्कि पीढ़ी अंतराल के कारण उत्पन्न सामंजस्यहीनता है।
-
आध्यात्मिकता एवं नैतिकता का हास: कहानी में आध्यात्मिकता और नैतिकता के हास का चित्रण है, लेकिन यह कहानी का मुख्य विषय नहीं है। कहानी का मुख्य विषय पीढ़ी अंतराल के कारण उत्पन्न सामंजस्यहीनता है।
-
भौतिकतावादी दृष्टिकोण: कहानी में भौतिकतावादी दृष्टिकोण का चित्रण है, लेकिन यह कहानी का मुख्य विषय नहीं है। कहानी का मुख्य विषय पीढ़ी अंतराल के कारण उत्पन्न सामंजस्यहीनता है।
इसलिए, 'सिल्वर वेडिंग' कहानी की मूल संवेदना पीढ़ी अंतराल से उत्पन्न सामंजस्यहीनता है, यह सबसे सटीक उत्तर है।
Question 327
असंगत कथन चुनिए :
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
असंगत कथन है: 3. प्रपद्यवाद छायावाद का पर्याय है।
व्याख्या:
-
क्यों विकल्प 3 सही है: प्रपद्यवाद (नकेनवाद) और छायावाद दो अलग-अलग काव्य धाराएं हैं। प्रपद्यवाद 1950 के दशक में बिहार के तीन कवियों - नलिन विलोचन शर्मा, केसरी कुमार और नरेश मेहता द्वारा शुरू किया गया था। यह प्रयोगवाद के बाद आया और इसने व्यक्तिवाद, निराशावाद और अस्तित्ववाद पर जोर दिया। छायावाद (1918-1936) एक रोमांटिक आंदोलन था जो प्रकृति, प्रेम और सौंदर्य पर केंद्रित था। इसलिए, प्रपद्यवाद को छायावाद का पर्याय कहना गलत है।
-
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं:
-
विकल्प 1: "लघु मानव की धारणा नई कविता की प्रवृत्तिगत विशेषता है।" यह कथन सही है। नई कविता में आम आदमी के जीवन और उसकी भावनाओं को महत्व दिया गया, इसलिए 'लघु मानव' की धारणा इसकी एक महत्वपूर्ण विशेषता है।
-
विकल्प 2: "प्रयोगवादी कविता ह्रासोन्मुख मध्यवर्गीय समाज के जीवन का चित्र है।" यह कथन भी सही है। प्रयोगवादी कविता में मध्यवर्गीय समाज की निराशा, कुंठा और अस्तित्वगत संकट को चित्रित किया गया है।
-
विकल्प 4: "श्रीनिवास दास कृत ‘रघुवीर प्रेम मोहिनी’ को हिंदी का पहला दु:खान्तक नाटक माना जाता है।" यह कथन भी सही है। 'रघुवीर प्रेम मोहिनी' को हिंदी का पहला दु:खान्तक नाटक माना जाता है।
-
Question 328
कौन-सा विकल्प सुमेलित नहीं है ?
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
छंदों का बंधन - नई कविता की मुख्य विशेषता है। यह विकल्प सुमेलित नहीं है क्योंकि नई कविता छंदों के बंधन से मुक्ति और नए भावबोध को व्यक्त करने पर अधिक बल देती है। नई कविता में परंपरागत छंदों के नियमों का पालन अनिवार्य नहीं माना गया, बल्कि मुक्त छंद और लय के नए प्रयोगों को प्रोत्साहित किया गया। इसलिए, छंदों का बंधन नई कविता की मुख्य विशेषता नहीं है, बल्कि इससे मुक्ति पाना इसकी एक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति है।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
-
कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास - नागार्जुन रचित काव्य पंक्तियाँ हैं। यह विकल्प सही है। ये पंक्तियाँ नागार्जुन की प्रसिद्ध कविता 'अकाल और उसके बाद' से ली गई हैं, जो अकाल की भयावहता और गरीबी का चित्रण करती हैं।
-
हिन्दी गज़ल विधा के प्रवर्तक - दुष्यंत कुमार को माना जाता है। यह विकल्प भी सही है। दुष्यंत कुमार को हिंदी गज़ल को लोकप्रिय बनाने और उसे एक नई पहचान दिलाने का श्रेय दिया जाता है। उन्होंने गज़ल को आम आदमी के मुद्दों और भावनाओं से जोड़ा।
-
‘जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ’ - पंक्तियों के रचयिता भवानी प्रसाद मिश्र हैं। यह विकल्प भी सही है। यह पंक्ति भवानी प्रसाद मिश्र की प्रसिद्ध कविता 'गीत फरोश' से है, जो एक गीत बेचने वाले की मनोदशा और समाज की विडंबनाओं को दर्शाती है।
इसलिए, केवल पहला विकल्प गलत है क्योंकि नई कविता छंदों के बंधन से मुक्ति पर जोर देती है, न कि उस बंधन को अपनी विशेषता मानती है।
Question 329
“दुख ही जीवन की कथा रही,
क्या कहूँ आज, जो नहीं कही।”
काव्य पंक्तियाँ हैं :
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
"दुख ही जीवन की कथा रही,
क्या कहूँ आज, जो नहीं कही।"
ये काव्य पंक्तियाँ निराला की सरोज स्मृति से हैं।
Option 2 सही क्यों है:
- ये पंक्तियाँ सीधे तौर पर सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की शोक-गीत 'सरोज स्मृति' से उद्धृत हैं। यह कविता निराला ने अपनी दिवंगत पुत्री सरोज की याद में लिखी थी। कविता में पिता के हृदय का गहरा दुख और पीड़ा व्यक्त होती है। ये पंक्तियाँ कविता के मूल भाव को दर्शाती हैं, जिसमें कवि अपने जीवन के दुखों और अपनी बेटी के खोने के दर्द को व्यक्त कर रहा है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
- 1. निराला की राम की शक्ति पूजा से: 'राम की शक्ति पूजा' एक लंबी कविता है जो राम और रावण के युद्ध के दौरान राम की मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति की खोज पर केंद्रित है। इसमें दुख और पीड़ा के तत्व तो हैं, लेकिन ये पंक्तियाँ विशिष्ट रूप से 'सरोज स्मृति' से संबंधित हैं, जो व्यक्तिगत शोक पर आधारित है।
- 3. अज्ञेय की असाध्य वीणा से: 'असाध्य वीणा' अज्ञेय की एक प्रतीकात्मक कविता है जो कला, सृजन और मानवीय अनुभव की गहराई को दर्शाती है। यह कविता एक विशेष वीणा और उसके रहस्य को उजागर करने की कोशिश करने वाले लोगों के बारे में है। इसका विषय 'सरोज स्मृति' के व्यक्तिगत शोक और दुख से बहुत अलग है।
- 4. मुक्तिबोध की ब्रह्मराक्षस से: 'ब्रह्मराक्षस' मुक्तिबोध की एक लंबी कविता है जो एक बुद्धिजीवी की विफलता और अलगाव को दर्शाती है। यह कविता जटिल दार्शनिक और सामाजिक मुद्दों से संबंधित है, जबकि 'सरोज स्मृति' व्यक्तिगत दुख और शोक पर केंद्रित है। इसलिए, ये पंक्तियाँ 'ब्रह्मराक्षस' से नहीं हैं।
Question 330
घर की याद' कविता में कवि का संदेशवाहक है :
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
'घर की याद' कविता में कवि का संदेशवाहक सावन है।
Option 1 (सावन) सही क्यों है:
कविता में स्पष्ट रूप से सावन के महीने का वर्णन है। कवि सावन को संबोधित करते हुए अपनी भावनाओं को व्यक्त करता है और उसे अपने घर, अपने माता-पिता और भाई-बहनों तक अपना संदेश पहुंचाने का माध्यम बनाता है। सावन की बारिश और हरियाली कवि को अपने घर की याद दिलाती है और वह सावन के माध्यम से ही अपने परिवार को अपनी कुशलता का संदेश भेजना चाहता है। कविता में सावन के बादल, बारिश और वातावरण का उपयोग कवि ने अपनी भावनाओं को व्यक्त करने और घर की याद को तीव्र करने के लिए किया है। इसलिए, सावन ही कवि का संदेशवाहक है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
-
Option 2 (ग्रीष्म): कविता में ग्रीष्म ऋतु का कोई उल्लेख नहीं है। कवि की भावनाएं सावन के महीने से जुड़ी हुई हैं, न कि ग्रीष्म से।
-
Option 3 (बसंत): बसंत ऋतु का भी कविता में कोई वर्णन नहीं है। बसंत खुशी और उल्लास का प्रतीक हो सकता है, लेकिन कविता में कवि की भावनाएं घर से दूर होने के कारण उदासी और यादों से भरी हैं, जो सावन के महीने से अधिक मेल खाती हैं।
-
Option 4 (शरद): शरद ऋतु का भी कविता में कोई जिक्र नहीं है। शरद ऋतु आमतौर पर शांत और स्थिर मानी जाती है, जबकि कविता में सावन की बारिश और उमंग कवि की भावनाओं को अधिक प्रभावी ढंग से व्यक्त करती है।
इसलिए, केवल सावन ही कविता में कवि का संदेशवाहक है।
Question 331
निम्न में से एक विकल्प सुमेलित नहीं है, उसे चुनिए :
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
चिरजीवौ जोरी जुरे, क्यों न सनेह गंभीर।
को घटि ए वृषभानुजा, वे हलधर के वीर।। - अभंग श्लेष - यह सुमेलित नहीं है, इसलिए सही उत्तर है।
व्याख्या:
-
विकल्प 1 सही क्यों है: इस दोहे में श्लेष अलंकार तो है, लेकिन यह 'अभंग श्लेष' नहीं है। अभंग श्लेष में शब्द को भंग (तोड़े) किए बिना ही दो अर्थ निकलते हैं। यहाँ 'वृषभानुजा' और 'हलधर' शब्दों के दो अर्थ हैं:
- वृषभानुजा: वृषभानु की पुत्री (राधा) और वृषभ (बैल) की बहन (गाय)।
- हलधर: हल धारण करने वाला (बलराम) और हल को धारण करने वाला (बैल)।
हालांकि, इन शब्दों के दो अर्थ निकालने के लिए शब्द को तोड़ना नहीं पड़ता, लेकिन इस दोहे में श्लेष की प्रधानता होते हुए भी, इसे 'अभंग श्लेष' कहना सटीक नहीं है। 'अभंग श्लेष' की परिभाषा के अनुसार, शब्द को बिना तोड़े दो अर्थ निकलने चाहिए, जो कि यहाँ पूर्ण रूप से लागू नहीं होता। इसलिए, यह विकल्प सुमेलित नहीं है।
-
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
-
विकल्प 2: खुले पलक, फैली सुवर्ण छवि, जगी सुरभि, डोले मधु-बाल। - लक्षणा शब्द शक्ति: यह सुमेलित है। यहाँ 'मधु-बाल' में लक्षणा शब्द शक्ति है, क्योंकि 'मधु-बाल' का सीधा अर्थ नहीं है, बल्कि यह किसी सुंदर, मादक वस्तु या व्यक्ति की ओर संकेत करता है।
-
विकल्प 3: नील सरोरुह स्याम, तरुन अरुन बारिज नयन। करहु सो मो उर धाम, सदा क्षीरसागर शयन।। - माधुर्य गुण: यह सुमेलित है। इस पंक्ति में कोमल शब्दों का प्रयोग है, जो सुनने में मधुर लगते हैं और मन को शांति प्रदान करते हैं। यह माधुर्य गुण का उदाहरण है।
-
विकल्प 4: चिक्करहिं दिग्गज डोल महि, अहि लोल सागर खरभरे। मन हरख सभ गंधर्ब-सुर-मुनि, नाग किन्नर दुःख टरे।। - ओज गुण: यह सुमेलित है। इस पंक्ति में कठोर वर्णों का प्रयोग है, जो वीरता और उत्साह का भाव उत्पन्न करते हैं। यह ओज गुण का उदाहरण है।
-
Question 332
निम्न में से कौन-सा विकल्प रचना और रचनाकार की दृष्टि से असंगत है ?
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
आखिरी कलाम - मुल्लादाऊद रचना और रचनाकार की दृष्टि से असंगत है क्योंकि 'आखिरी कलाम' मलिक मुहम्मद जायसी की रचना है, न कि मुल्लादाऊद की। मुल्लादाऊद की प्रसिद्ध रचना 'चंदायन' है।
अन्य विकल्प इसलिए गलत हैं:
- मृगावती - कुतबन: यह विकल्प सही है क्योंकि 'मृगावती' कुतबन द्वारा रचित है।
- पद्मावत - मलिक मुहम्मद जायसी: यह विकल्प भी सही है क्योंकि 'पद्मावत' मलिक मुहम्मद जायसी की एक प्रसिद्ध रचना है।
- मधुमालती - मंझन: यह विकल्प भी सही है क्योंकि 'मधुमालती' मंझन द्वारा रचित है।
इसलिए, केवल विकल्प 4, 'आखिरी कलाम - मुल्लादाऊद', गलत है क्योंकि 'आखिरी कलाम' जायसी की रचना है।
Question 333
"यह हिन्दुस्तान पाकिस्तान की एकता का मेवा है।" नामक कहानी के आधार पर बताइए कि निम्न में से मेवा किसे कहा गया है ?
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
कीनू
सही उत्तर की व्याख्या:
कहानी "यह हिन्दुस्तान पाकिस्तान की एकता का मेवा है।" में, 'मेवा' शब्द का प्रयोग कीनू के लिए किया गया है। कहानी में कीनू को एक ऐसे फल के रूप में दर्शाया गया है जो भारत और पाकिस्तान दोनों में पाया जाता है और दोनों देशों के बीच साझा विरासत और संभावित एकता का प्रतीक है। कहानी की विषयवस्तु और प्रतीकात्मकता के अनुसार, कीनू ही वह फल है जिसे 'मेवा' कहा गया है।
अन्य विकल्पों की व्याख्या:
-
संतरा: संतरा एक सामान्य फल है, लेकिन कहानी में इसे विशेष रूप से 'मेवा' के रूप में नहीं दर्शाया गया है। कहानी का संदर्भ कीनू पर केंद्रित है।
-
माल्टा: माल्टा भी एक प्रकार का संतरा है, लेकिन कहानी में इसका विशेष उल्लेख नहीं है। 'मेवा' के रूप में कीनू को ही दर्शाया गया है।
-
नींबू: नींबू एक खट्टा फल है और कहानी में इसे 'मेवा' के रूप में नहीं दर्शाया गया है। कहानी का मुख्य फल कीनू है, जिसे एकता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
इसलिए, कहानी के संदर्भ में, कीनू ही 'मेवा' है।
Question 334
आदीकाल के संदर्भ में असंगत कथन चुनिए :
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
आदीकाल के संदर्भ में असंगत कथन है: 2. "हिंदी के विधेयवादी साहित्येतिहास के आदिम प्रवर्तक शुक्ल जी नहीं, प्रत्युत ग्रियर्सन हैं" उक्त कथन आ० रामचन्द्र शुक्ल का है।
व्याख्या:
यह कथन असंगत है क्योंकि यह कथन आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का नहीं है। यह कथन डॉ. नगेन्द्र का है। डॉ. नगेन्द्र ने ग्रियर्सन को हिंदी साहित्य के विधेयवादी इतिहास का आदिम प्रवर्तक माना है। आचार्य शुक्ल ने ग्रियर्सन के इतिहास लेखन की पद्धति को दोषपूर्ण माना था। इसलिए, यह कथन कि "हिंदी के विधेयवादी साहित्येतिहास के आदिम प्रवर्तक शुक्ल जी नहीं, प्रत्युत ग्रियर्सन हैं" आचार्य शुक्ल का नहीं है, बल्कि डॉ. नगेन्द्र का है, जो इसे असंगत बनाता है।
अन्य विकल्पों की असंगतता का कारण:
-
विकल्प 1: साहित्य लेखन की सर्वोत्कृष्ट पद्धति विधेयवादी पद्धति है, जिसके जनक बेन-तेन महादेव हैं। यह कथन सही है। विधेयवादी पद्धति साहित्य के अध्ययन की एक महत्वपूर्ण पद्धति है और इसके जनक तेन (Taine) माने जाते हैं। बेन-तेन महादेव एक हास्यपूर्ण उल्लेख है, लेकिन विधेयवादी पद्धति का उल्लेख सही है।
-
विकल्प 3: चौरासी सिद्धों में तीन महिला सिद्ध - लक्ष्मीकरा, मणिभद्रपा एवं कनखलपा हैं। यह कथन भी सही है। चौरासी सिद्धों में कुछ महिला सिद्धों का उल्लेख मिलता है, जिनमें लक्ष्मीकरा, मणिभद्रपा और कनखलपा प्रमुख हैं।
-
विकल्प 4: सिद्धों का प्रधान केन्द्र ‘श्रीपर्वत’ है। यह कथन भी सही है। सिद्धों का एक महत्वपूर्ण केंद्र श्रीपर्वत माना जाता है।
इसलिए, केवल विकल्प 2 ही असंगत है क्योंकि यह गलत रूप से आचार्य रामचन्द्र शुक्ल को एक कथन का श्रेय देता है जो वास्तव में डॉ. नगेन्द्र का है।
Question 335
भक्तिकाल से संबंधित असत्य कथन चुनिए :
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
भक्तिकाल से संबंधित असत्य कथन ऑप्शन 2 है, और इसका कारण इस प्रकार है:
ऑप्शन 2 सही क्यों है:
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने सूरदास के काव्य के संदर्भ में जो कथन दिया है, वह यह नहीं है कि "प्रेम और शृंगार का ऐसा वर्णन जो बिना लज्जा और संकोच के सबके सामने पढ़ा जा सकता है।" शुक्ल जी ने सूरदास के श्रृंगार वर्णन की प्रशंसा अवश्य की है, लेकिन उन्होंने इस प्रकार के विशिष्ट शब्दों का प्रयोग नहीं किया। शुक्ल जी ने सूरदास के काव्य में श्रृंगार और वात्सल्य रस की उत्कृष्टता को स्वीकार किया है, लेकिन उन्होंने यह भी माना है कि सूरदास ने कृष्ण के बाल रूप और प्रेम लीलाओं का वर्णन अत्यंत स्वाभाविक और मार्मिक ढंग से किया है। इसलिए, दिया गया कथन आचार्य शुक्ल का नहीं है, या कम से कम उनके द्वारा सूरदास के बारे में कहे गए प्रसिद्ध कथनों में से नहीं है। यही कारण है कि यह कथन असत्य है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
-
ऑप्शन 1: "खेती न किसान को, भिखारी को न भीख भली, बनिक को बनिज, न चाकर को चाकरी।" - यह पंक्तियाँ वास्तव में तुलसीदास द्वारा रचित हैं। यह उनकी प्रसिद्ध रचनाओं में से एक है और उनके सामाजिक सरोकारों को दर्शाती है। इसलिए यह कथन सत्य है।
-
ऑप्शन 3: "चौदह सौ पचपन साल गए, चंद्रवर एक ठाठ गए।" - यह पंक्ति संत कबीर के जन्म वर्ष से संबंधित है। यह कबीर के जीवन से जुड़ी एक प्रसिद्ध उक्ति है और उनके जन्म के समय के बारे में जानकारी देती है। इसलिए यह कथन भी सत्य है।
-
ऑप्शन 4: ज्ञानश्रयी निर्गुण काव्य का दार्शनिक आधार अद्वैतवाद है। यह बिल्कुल सही है। ज्ञानश्रयी शाखा के कवि, जैसे कबीर, अद्वैत वेदांत के दर्शन से प्रभावित थे, जो ब्रह्म और आत्मा की एकता पर जोर देता है। इसलिए यह कथन भी सत्य है।
संक्षेप में, केवल ऑप्शन 2 में दिया गया कथन आचार्य शुक्ल का नहीं है, इसलिए यह असत्य है और सही उत्तर है।
Question 336
घनानंद को 'साक्षात् रसमूर्ति', 'प्रेम की पीर' एवं 'यातना का कवि' कहकर संबोधित करने वाले विद्वान् हैं :
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ही घनानंद को 'साक्षात् रसमूर्ति', 'प्रेम की पीर' एवं 'यातना का कवि' कहकर संबोधित किया है। शुक्ल जी ने अपने 'हिंदी साहित्य का इतिहास' में घनानंद के काव्य और उनके जीवन के बारे में विस्तार से चर्चा की है और उनकी रचनाओं में प्रेम की तीव्रता, विरह की पीड़ा और भावनाओं की गहराई को रेखांकित किया है। उन्होंने घनानंद के काव्य में निहित रस, प्रेम की पीड़ा और यातना के भावों को विशेष रूप से पहचाना और उन्हें इन विशेषणों से संबोधित किया।
अन्य विकल्प गलत हैं क्योंकि:
-
डॉ० नगेन्द्र: डॉ० नगेन्द्र एक प्रतिष्ठित आलोचक हैं, लेकिन घनानंद के बारे में इस विशिष्ट कथन का श्रेय उन्हें नहीं जाता।
-
आ० हजारी प्रसाद द्विवेदी: आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी भी हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण विद्वान हैं, लेकिन घनानंद के लिए इन विशेषणों का प्रयोग उन्होंने नहीं किया।
-
नलिन विलोचन शर्मा: नलिन विलोचन शर्मा एक प्रसिद्ध साहित्यकार हैं, लेकिन घनानंद के संदर्भ में यह कथन उनसे संबंधित नहीं है।
इसलिए, आचार्य रामचंद्र शुक्ल ही सही उत्तर हैं क्योंकि उन्होंने ही घनानंद को 'साक्षात् रसमूर्ति', 'प्रेम की पीर' एवं 'यातना का कवि' कहा था।
Question 337
"मेरे मालिक एक सुर बख्श दे। सुर में वह तासीर पैदा कर कि आँखों से सच्चे मोती की तरह अनगढ़ आँसू निकल आएँ।" यह इबादत किसके द्वारा की गई है ?
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ।
व्याख्या:
यह इबादत उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ द्वारा की गई है क्योंकि यह उनके संगीत के प्रति समर्पण और उनकी कला में सच्चाई और भावना को व्यक्त करने की गहरी इच्छा को दर्शाती है। उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ अपने शहनाई वादन में भावनाओं को जगाने की क्षमता के लिए जाने जाते थे। वे संगीत को एक आध्यात्मिक अनुभव मानते थे और उनका मानना था कि संगीत में इतनी शक्ति होनी चाहिए कि वह सुनने वालों की आँखों में आँसू ला सके। यह इबादत उनके इसी विश्वास को दर्शाती है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
-
उस्ताद सलार हुसैन खाँ: उस्ताद सलार हुसैन खाँ एक प्रसिद्ध संगीतकार थे, लेकिन यह इबादत विशेष रूप से उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ से जुड़ी है।
-
उस्ताद अलीबख्श: उस्ताद अलीबख्श भी एक सम्मानित संगीतकार थे, लेकिन यह इबादत उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ की शैली और दर्शन के अनुरूप है।
-
उस्ताद पैगंबर बख्श खाँ: उस्ताद पैगंबर बख्श खाँ एक कुशल संगीतकार थे, लेकिन यह इबादत उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ के संगीत के प्रति समर्पण और भावनाओं को व्यक्त करने की उनकी गहरी इच्छा को दर्शाती है।
इसलिए, उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ ही सही उत्तर हैं क्योंकि यह इबादत उनके संगीत के प्रति समर्पण और उनकी कला में सच्चाई और भावना को व्यक्त करने की गहरी इच्छा को दर्शाती है।
Question 338
नीलू नीलिमा नीलोफर' उपन्यास के रचयिता हैं :
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
'नीलू नीलिमा नीलोफर' उपन्यास के रचयिता भीष्म साहनी हैं।
Option 4 सही क्यों है:
भीष्म साहनी एक प्रतिष्ठित हिंदी लेखक थे, जिन्हें उनके सामाजिक रूप से प्रासंगिक और मानवीय विषयों पर आधारित लेखन के लिए जाना जाता है। 'नीलू नीलिमा नीलोफर' उपन्यास उन्हीं की रचना है। यह उपन्यास उनके लेखन शैली और विषयों के अनुरूप है, जो मानवीय संबंधों और सामाजिक मुद्दों को गहराई से दर्शाता है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
-
संजीव: संजीव एक प्रसिद्ध हिंदी उपन्यासकार हैं, लेकिन 'नीलू नीलिमा नीलोफर' उनकी रचना नहीं है। उनकी प्रमुख रचनाओं में 'सर्कस', 'सावधान नीचे आग है' आदि शामिल हैं।
-
असगर वजाहत: असगर वजाहत भी एक जाने-माने लेखक हैं, लेकिन 'नीलू नीलिमा नीलोफर' उन्होंने नहीं लिखी है। वे नाटक और कहानियों के लिए अधिक प्रसिद्ध हैं।
-
निर्मल वर्मा: निर्मल वर्मा एक महत्वपूर्ण हिंदी लेखक हैं, जो अपनी दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक अंतर्दृष्टि के लिए जाने जाते हैं। 'नीलू नीलिमा नीलोफर' उनकी शैली से मेल नहीं खाता और यह उनकी रचना नहीं है।
Question 339
"हिन्दी शब्द के सामान्य अर्थ के अन्तर्गत वे बोलियाँ आती हैं, जो थोड़े से स्थानीय भेदों और परिवर्तनों के साथ बनारस और बिहार तथा समर्पित तथा विजित प्रान्तों के अधिकांश हिन्दू जनसमूह द्वारा व्यवहृत होती हैं।” यह कथन किसका है ?
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
लॉर्ड ऐमहर्स्ट ही सही उत्तर है क्योंकि दिया गया कथन लॉर्ड ऐमहर्स्ट का ही है। उन्होंने हिन्दी भाषा के सामान्य अर्थ को परिभाषित करते हुए बनारस, बिहार और समर्पित तथा विजित प्रान्तों के हिन्दू जनसमूह द्वारा व्यवहृत बोलियों को शामिल किया था।
अन्य विकल्प गलत हैं क्योंकि:
-
विलियम प्राइस: विलियम प्राइस एक भाषाविद थे, लेकिन यह विशिष्ट कथन उनसे संबंधित नहीं है। उनके कार्य हिन्दी भाषा के अध्ययन में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन यह उद्धरण उनका नहीं है।
-
गिलक्राइस्ट: जॉन बोर्थविक गिलक्राइस्ट फोर्ट विलियम कॉलेज में हिन्दुस्तानी विभाग के अध्यक्ष थे और उन्होंने हिन्दी और उर्दू के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। हालांकि, यह विशेष कथन गिलक्राइस्ट का नहीं है।
-
कैप्टन टेलर: कैप्टन टेलर का हिन्दी भाषा के अध्ययन में योगदान रहा होगा, लेकिन यह कथन विशेष रूप से लॉर्ड ऐमहर्स्ट का है।
इसलिए, लॉर्ड ऐमहर्स्ट ही सही उत्तर है क्योंकि दिया गया कथन उन्हीं का है।
Question 340
असंगत कथन चुनिए :
Choose an answer to reveal your result and explanation.
Answer & Explanation
असंगत कथन है: आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने रीतिकालीन कवि केशव को ‘कठिन काव्य का प्रेत' कहा है।
व्याख्या:
यह कथन असंगत है क्योंकि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने नहीं, बल्कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने रीतिकालीन कवि केशवदास को ‘कठिन काव्य का प्रेत' कहा था। आचार्य शुक्ल ने केशवदास की कविता में क्लिष्टता और दुरूहता को देखते हुए यह टिप्पणी की थी।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
-
भूषण को 'कवि भूषण' की उपाधि सोलंकी राजा रुद्र शाह ने प्रदान की। यह कथन बिल्कुल सही है। भूषण को 'कवि भूषण' की उपाधि सोलंकी राजा रुद्र शाह ने ही दी थी, जिसके बाद वे भूषण के नाम से प्रसिद्ध हुए।
-
आचार्य शुक्ल ने घनानन्द के बारे में कहा है कि - इनकी-सी विशुद्ध सरस एवं शक्तिशालिनी ब्रजभाषा लिखने में और कोई कवि समर्थ नहीं हुआ। यह कथन भी सत्य है। आचार्य शुक्ल ने घनानंद की ब्रजभाषा की असाधारण सरसता और शक्ति का उल्लेख करते हुए यह बात कही थी। घनानंद की भाषा में प्रेम की गहराई और तीव्रता अद्वितीय है।
-
महाकवि बिहारी द्वारा रचित 'बिहारी सतसई' ब्रजभाषा में लिखित काव्य ग्रंथ है। यह कथन भी सही है। 'बिहारी सतसई' ब्रजभाषा में लिखी गई एक प्रसिद्ध रचना है, जिसमें बिहारी ने श्रृंगार रस के दोहों की रचना की है।
इसलिए, केवल दूसरा कथन गलत है क्योंकि केशवदास को 'कठिन काव्य का प्रेत' आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कहा था, न कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने। इस प्रकार, विकल्प 2 सही उत्तर है।