HTET परीक्षा Level 2 TGT
Clear Cutoff के साथ HTET परीक्षा Level 2 TGT की तैयारी
सत्यापित उत्तर और व्याख्याएँ
Clear Cutoff द्वारा
20 में से 20 प्रश्न दिखाए जा रहे हैं
प्रश्न 241
अलंकार को काव्य का प्राण मानने वाले आचार्य हैं :
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
अलंकार को काव्य का प्राण मानने वाले आचार्य के रूप में केशवदास को सही विकल्प माना गया है। आइए इसे विस्तार से समझते हैं:
-
केशवदास (विकल्प 2): केशवदास हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध कवि और आचार्य थे, जिन्होंने अलंकार शास्त्र पर विशेष ध्यान दिया। उनकी रचनाओं में अलंकारों का व्यापक प्रयोग मिलता है, और उन्होंने अलंकारों को काव्य की शोभा और प्राण के रूप में प्रस्तुत किया है। केशवदास की रचनाएँ जैसे 'रसिकप्रिया' और 'कविप्रिया' में अलंकारों का विशद वर्णन मिलता है, जो यह दर्शाता है कि वे अलंकार को काव्य का प्राण मानते थे। इसलिए, विकल्प 2 सही है।
-
चिंतामणि (विकल्प 1): चिंतामणि का नाम हिंदी साहित्य में अलंकार शास्त्र के संदर्भ में प्रमुखता से नहीं आता है। वे अलंकार को काव्य का प्राण मानने वाले आचार्य के रूप में प्रसिद्ध नहीं हैं। इसलिए, यह विकल्प सही नहीं है।
-
भिखारीदास (विकल्प 3): भिखारीदास भी हिंदी साहित्य के एक महत्वपूर्ण कवि हैं, लेकिन वे अलंकार को काव्य का प्राण मानने वाले आचार्य के रूप में नहीं जाने जाते। उनकी रचनाओं में अलंकारों का प्रयोग होता है, परंतु वे इस विशेष दृष्टिकोण के लिए प्रसिद्ध नहीं हैं। इसलिए, यह विकल्प सही नहीं है।
-
देवदत्त (विकल्प 4): देवदत्त का नाम हिंदी साहित्य के प्रमुख आचार्यों में नहीं आता है, विशेषकर अलंकार शास्त्र के संदर्भ में। इसलिए, यह विकल्प भी सही नहीं है।
इस प्रकार, केशवदास को अलंकार को काव्य का प्राण मानने वाले आचार्य के रूप में सही विकल्प माना गया है।
प्रश्न 242
नन्हीं-नन्हीं' बूँदन मेहा बरसे।
रेखांकित पद में किस अलंकार का प्रयोग किया गया है ?
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
रेखांकित पद 'नन्हीं-नन्हीं' में 'विशेषण पुनरुक्ति' अलंकार का प्रयोग किया गया है। इस अलंकार में विशेषण शब्द का पुनरावृत्ति होती है, जिससे वाक्य में विशेष प्रभाव उत्पन्न होता है। यहाँ 'नन्हीं' शब्द का दो बार प्रयोग किया गया है, जो विशेषण है और बूँदों की विशेषता को दर्शाता है। इस प्रकार, यह विशेषण पुनरुक्ति का उदाहरण है।
अब अन्य विकल्पों पर विचार करते हैं:
-
संज्ञा पुनरुक्ति: इस अलंकार में संज्ञा शब्द की पुनरावृत्ति होती है। चूंकि 'नन्हीं' एक विशेषण है, न कि संज्ञा, इसलिए यह विकल्प सही नहीं है।
-
क्रिया पुनरुक्ति: इस अलंकार में क्रिया शब्द की पुनरावृत्ति होती है। यहाँ 'नन्हीं' शब्द क्रिया नहीं है, इसलिए यह विकल्प भी सही नहीं है।
-
वीप्सा अलंकार: इस अलंकार में किसी क्रिया या विशेषण की अधिकता या तीव्रता को दर्शाया जाता है। 'नन्हीं-नन्हीं' में केवल विशेषण की पुनरावृत्ति है, न कि उसकी अधिकता या तीव्रता, इसलिए यह विकल्प भी सही नहीं है।
इस प्रकार, 'विशेषण पुनरुक्ति' ही सही उत्तर है क्योंकि यह विशेषण 'नन्हीं' की पुनरावृत्ति को दर्शाता है।
प्रश्न 243
देह की पतली, कमर की है लचीली ।
नीले फूले फूल को सिर पर चढ़ाकर,
कह रही है, जो छुए यह दूँ हृदय का दान उसको ।'
उक्त काव्य-पंक्तियाँ किसका मानवीकरण कर रही हैं ?
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
उक्त काव्य-पंक्तियाँ अलसी का मानवीकरण कर रही हैं, जो कि विकल्प 4 है। आइए इसे विस्तार से समझते हैं:
-
अलसी का मानवीकरण:
- "देह की पतली, कमर की है लचीली" - यह पंक्ति अलसी के पौधे की विशेषताओं का वर्णन करती है। अलसी के पौधे की पतली और लचीली शाखाएँ होती हैं, जो हवा में लहराती हैं।
- "नीले फूले फूल को सिर पर चढ़ाकर" - अलसी के फूल नीले रंग के होते हैं, जो पौधे के शीर्ष पर खिलते हैं। यह वर्णन अलसी के फूलों की विशेषता को दर्शाता है।
- "कह रही है, जो छुए यह दूँ हृदय का दान उसको" - यह मानवीकरण का एक उदाहरण है, जहाँ अलसी को एक जीवित प्राणी की तरह प्रस्तुत किया गया है, जो अपनी सुंदरता और आकर्षण के माध्यम से किसी को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।
-
अन्य विकल्पों का खंडन:
- बाजरे का (विकल्प 1): बाजरे के पौधे की विशेषताएँ इन पंक्तियों से मेल नहीं खातीं। बाजरे के पौधे में नीले फूल नहीं होते और इसकी शाखाएँ भी पतली और लचीली नहीं होतीं।
- सरसों का (विकल्प 2): सरसों के पौधे के फूल पीले होते हैं, न कि नीले। इसके अलावा, सरसों की शाखाएँ भी अलसी की तरह पतली और लचीली नहीं होतीं।
- रींवा के पेड़ों का (विकल्प 3): रींवा के पेड़ बड़े और मजबूत होते हैं, जिनकी शाखाएँ पतली और लचीली नहीं होतीं। इसके अलावा, रींवा के पेड़ों के फूल नीले नहीं होते।
इस प्रकार, दिए गए काव्य-पंक्तियों का सही मानवीकरण अलसी के पौधे से ही मेल खाता है, जो विकल्प 4 को सही उत्तर बनाता है।
प्रश्न 244
किस विकल्प में तत्पुरुष समास नहीं है ?
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
विकल्प 4 "मीनकेतु" तत्पुरुष समास नहीं है। इसे समझने के लिए, पहले हमें तत्पुरुष समास की परिभाषा को समझना होगा। तत्पुरुष समास में दो या अधिक शब्द मिलकर एक नया शब्द बनाते हैं, जिसमें पहला शब्द विशेषण या विशेष्य होता है और दूसरा शब्द प्रधान होता है।
अब हम प्रत्येक विकल्प का विश्लेषण करते हैं:
-
वाक्चातुर्य: यह एक तत्पुरुष समास है। इसमें "वाक्" (वाणी) और "चातुर्य" (चतुराई) मिलकर एक नया शब्द बनाते हैं, जिसका अर्थ है वाणी की चतुराई।
-
तीर्थाटन: यह भी एक तत्पुरुष समास है। इसमें "तीर्थ" (धार्मिक स्थल) और "आटन" (यात्रा) मिलकर एक नया शब्द बनाते हैं, जिसका अर्थ है तीर्थ यात्रा।
-
अरण्यरोदन: यह भी एक तत्पुरुष समास है। इसमें "अरण्य" (जंगल) और "रोदन" (रोना) मिलकर एक नया शब्द बनाते हैं, जिसका अर्थ है जंगल में रोना।
-
मीनकेतु: यह तत्पुरुष समास नहीं है। "मीन" का अर्थ मछली और "केतु" का अर्थ ध्वज होता है। यह एक विशेष प्रकार का नाम है और इसमें तत्पुरुष समास की संरचना नहीं है।
इस प्रकार, विकल्प 4 "मीनकेतु" तत्पुरुष समास नहीं है, और यही कारण है कि यह सही उत्तर है।
प्रश्न 245
निम्न में 'संकर शब्द' किस विकल्प में नहीं है ?
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
प्रश्न: निम्न में 'संकर शब्द' किस विकल्प में नहीं है ?
सही उत्तर: विकल्प 1
विस्तृत व्याख्या:
-
विज्ञापनदाता (Option 1): 'विज्ञापनदाता' शब्द में 'विज्ञापन' और 'दाता' दो अलग-अलग शब्द हैं, जो संस्कृत और हिंदी से लिए गए हैं। यह शब्द पूरी तरह से हिंदी में निर्मित है और इसमें किसी विदेशी भाषा का मिश्रण नहीं है। इसलिए, यह 'संकर शब्द' नहीं है।
-
डबलरोटी (Option 2): 'डबलरोटी' एक संकर शब्द है। यह अंग्रेजी के 'डबल' और हिंदी के 'रोटी' शब्दों का मिश्रण है। इसलिए, यह विकल्प 'संकर शब्द' की श्रेणी में आता है।
-
आमचुनाव (Option 3): 'आमचुनाव' भी एक संकर शब्द है। इसमें 'आम' शब्द हिंदी से है और 'चुनाव' शब्द भी हिंदी में ही है, लेकिन यह शब्द अंग्रेजी के 'इलेक्शन' के अर्थ में प्रयोग होता है। हालांकि यह पूरी तरह से हिंदी शब्द है, लेकिन इसका प्रयोग अंग्रेजी के प्रभाव में होता है।
-
हिन्दीकरण (Option 4): 'हिन्दीकरण' शब्द में 'हिन्दी' और 'करण' दो अलग-अलग शब्द हैं। 'करण' संस्कृत से लिया गया है, लेकिन यह शब्द अंग्रेजी के 'इंडियनाइजेशन' के प्रभाव में बना है। इसलिए, यह भी एक संकर शब्द है।
इस प्रकार, 'विज्ञापनदाता' एकमात्र ऐसा विकल्प है जो पूरी तरह से हिंदी में निर्मित है और इसमें किसी विदेशी भाषा का मिश्रण नहीं है, इसलिए यह 'संकर शब्द' नहीं है। यही कारण है कि विकल्प 1 सही उत्तर है।
प्रश्न 246
कौन-सा विकल्प सुमेलित नहीं है ?
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
विकल्प 3, "मोहपाश – करणतत्पुरुष समास," सही उत्तर है क्योंकि यह सुमेलित नहीं है। आइए इसे विस्तार से समझते हैं:
-
मोहपाश – करणतत्पुरुष समास: "मोहपाश" का अर्थ है "मोह का पाश" या "मोह द्वारा बंधन।" यह करणतत्पुरुष समास नहीं है, बल्कि यह तत्पुरुष समास का उदाहरण है, जिसमें "मोह" और "पाश" के बीच संबंध है। करणतत्पुरुष समास में साधन या कारण का बोध होता है, जो यहाँ नहीं है।
-
कुसुमकोमल – कर्मधारय समास: "कुसुमकोमल" का अर्थ है "फूल के समान कोमल।" यह कर्मधारय समास का उदाहरण है, जहाँ विशेषण और विशेष्य के बीच संबंध होता है। यहाँ "कुसुम" विशेषण है और "कोमल" विशेष्य है, जो सही मेल है।
-
भक्ष्याभक्ष्य – वैकल्पिक द्वन्द्व: "भक्ष्याभक्ष्य" का अर्थ है "जो खाया जा सकता है और जो नहीं खाया जा सकता।" यह वैकल्पिक द्वन्द्व समास का उदाहरण है, जहाँ दो विकल्पों के बीच संबंध होता है। यह सही मेल है।
-
क्रोधाग्नि – कर्मधारय समास: "क्रोधाग्नि" का अर्थ है "क्रोध के समान अग्नि।" यह भी कर्मधारय समास का उदाहरण है, जहाँ विशेषण और विशेष्य के बीच संबंध होता है। यहाँ "क्रोध" विशेषण है और "अग्नि" विशेष्य है, जो सही मेल है।
इस प्रकार, विकल्प 3 "मोहपाश – करणतत्पुरुष समास" सुमेलित नहीं है, क्योंकि यह करणतत्पुरुष समास का उदाहरण नहीं है।
प्रश्न 247
किस विकल्प में तत्पुरुष समास का प्रयोग नहीं हुआ है ?
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
तत्पुरुष समास एक प्रकार का समास होता है जिसमें दो या अधिक शब्द मिलकर एक नया शब्द बनाते हैं, और उनमें से एक शब्द प्रधान होता है। अब हम दिए गए विकल्पों का विश्लेषण करते हैं:
-
ख्यातिप्राप्त: यह एक तत्पुरुष समास है। इसमें 'ख्याति' और 'प्राप्त' शब्द मिलकर 'ख्यातिप्राप्त' बनाते हैं, जिसका अर्थ है 'प्रसिद्धि प्राप्त करने वाला'।
-
शपथपत्र: यह भी एक तत्पुरुष समास है। इसमें 'शपथ' और 'पत्र' शब्द मिलकर 'शपथपत्र' बनाते हैं, जिसका अर्थ है 'शपथ का पत्र'।
-
सेवानिवृत्त: यह भी एक तत्पुरुष समास है। इसमें 'सेवा' और 'निवृत्त' शब्द मिलकर 'सेवानिवृत्त' बनाते हैं, जिसका अर्थ है 'सेवा से निवृत्त होने वाला'।
-
अंधविश्वास: यह तत्पुरुष समास नहीं है। यह एक अव्ययीभाव समास है, जिसमें 'अंध' और 'विश्वास' शब्द मिलकर 'अंधविश्वास' बनाते हैं, जिसका अर्थ है 'बिना तर्क के विश्वास'।
इस प्रकार, विकल्प 4 'अंधविश्वास' में तत्पुरुष समास का प्रयोग नहीं हुआ है, इसलिए यह सही उत्तर है। अन्य सभी विकल्पों में तत्पुरुष समास का प्रयोग हुआ है।
प्रश्न 248
ल्हासा की ओर' यात्रा वृत्तान्त के रचयिता हैं :
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
राहुल सांकृत्यायन को 'ल्हासा की ओर' यात्रा वृत्तान्त के रचयिता के रूप में सही विकल्प माना गया है। आइए जानते हैं क्यों:
-
राहुल सांकृत्यायन (Option 3): राहुल सांकृत्यायन को हिंदी साहित्य में यात्रा साहित्य के जनक के रूप में जाना जाता है। उन्होंने कई यात्रा वृत्तान्त लिखे हैं, जिनमें 'ल्हासा की ओर' प्रमुख है। यह पुस्तक उनके तिब्बत यात्रा के अनुभवों का वर्णन करती है। राहुल सांकृत्यायन ने अपने जीवन में कई देशों की यात्रा की और अपने अनुभवों को साहित्य के माध्यम से प्रस्तुत किया। उनकी लेखनी में गहराई और अनुभव की प्रामाणिकता होती है, जो पाठकों को उस समय और स्थान की सजीव झलक देती है।
-
नागार्जुन (Option 1): नागार्जुन एक प्रसिद्ध हिंदी कवि और लेखक थे, लेकिन 'ल्हासा की ओर' उनकी रचना नहीं है। वे अपनी कविताओं और उपन्यासों के लिए अधिक जाने जाते हैं, जिनमें सामाजिक और राजनीतिक विषयों का समावेश होता है।
-
नाना साहेब (Option 2): नाना साहेब का नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख नेता के रूप में जाना जाता है। वे साहित्यिक रचनाओं के लिए नहीं, बल्कि 1857 के विद्रोह में उनकी भूमिका के लिए प्रसिद्ध हैं। इसलिए, 'ल्हासा की ओर' से उनका कोई संबंध नहीं है।
-
श्यामाचरण दुबे (Option 4): श्यामाचरण दुबे एक प्रसिद्ध समाजशास्त्री और लेखक थे, लेकिन उनकी रचनाएँ समाजशास्त्र और मानवशास्त्र के क्षेत्र में अधिक केंद्रित थीं। 'ल्हासा की ओर' यात्रा वृत्तान्त से उनका कोई संबंध नहीं है।
इस प्रकार, 'ल्हासा की ओर' के रचयिता के रूप में राहुल सांकृत्यायन का नाम सही है, और अन्य विकल्प इस संदर्भ में सही नहीं हैं।
प्रश्न 249
किसिम-किसिम की कविता' नामक लेख के रचयिता हैं :
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
'किसिम-किसिम की कविता' नामक लेख के रचयिता डॉ० जगदीश गुप्त हैं। यह जानकारी सही है और इसे सही ठहराने के लिए निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किए जा सकते हैं:
-
डॉ० जगदीश गुप्त का साहित्यिक योगदान: डॉ० जगदीश गुप्त हिंदी साहित्य के एक प्रतिष्ठित लेखक और आलोचक हैं। उन्होंने कविता और साहित्य के विभिन्न पहलुओं पर गहन अध्ययन किया है और उनके लेखन में साहित्यिक विश्लेषण की गहराई देखी जा सकती है। 'किसिम-किसिम की कविता' उनके द्वारा रचित एक महत्वपूर्ण लेख है जो कविता के विभिन्न प्रकारों और उनके विशेषताओं पर प्रकाश डालता है।
-
अन्य विकल्पों की असंगति:
- नरेश कुमार: नरेश कुमार का नाम हिंदी साहित्य में प्रमुखता से नहीं आता है, विशेषकर 'किसिम-किसिम की कविता' लेख के संदर्भ में। इसलिए यह विकल्प सही नहीं है।
- मुक्तिबोध: मुक्तिबोध एक प्रसिद्ध कवि और लेखक थे, लेकिन 'किसिम-किसिम की कविता' लेख उनके द्वारा नहीं लिखा गया है। उनका लेखन अधिकतर सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर केंद्रित था।
- नागार्जुन: नागार्जुन भी एक प्रसिद्ध कवि और लेखक थे, लेकिन उनका लेखन शैली और विषयवस्तु के मामले में अलग था। 'किसिम-किसिम की कविता' लेख उनके द्वारा नहीं लिखा गया है।
इस प्रकार, दिए गए विकल्पों में से डॉ० जगदीश गुप्त ही सही उत्तर हैं, क्योंकि 'किसिम-किसिम की कविता' लेख उन्हीं के द्वारा रचित है।
प्रश्न 250
छायावाद की महत्त्वपूर्ण कृति कामायनी में कितने सर्ग हैं ?
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
कामायनी, जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित एक महत्त्वपूर्ण छायावादी काव्य है। यह कृति भारतीय साहित्य में अपनी गहनता और दार्शनिकता के लिए जानी जाती है। कामायनी में कुल पन्द्रह सर्ग हैं, जो मानव जीवन के विभिन्न मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक पहलुओं को दर्शाते हैं।
-
विकल्प 2: पन्द्रह (सही उत्तर) - कामायनी में पन्द्रह सर्ग हैं, जो क्रमशः श्रद्धा, इड़ा, आनंद, काम, वासना, लज्जा, श्रम, शांति, ज्ञान, चिंता, आशा, विश्वास, निर्वेद, वैराग्य और आनंद के रूप में विभाजित हैं। प्रत्येक सर्ग मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं और भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है, जो इस कृति की गहराई और व्यापकता को दर्शाता है।
-
विकल्प 1: चौदह - यह विकल्प गलत है क्योंकि कामायनी में चौदह नहीं बल्कि पन्द्रह सर्ग हैं। चौदह सर्ग का उल्लेख इस कृति की संरचना के साथ मेल नहीं खाता।
-
विकल्प 3: सोलह - यह विकल्प भी गलत है क्योंकि कामायनी में सोलह सर्ग नहीं हैं। सोलह सर्ग का उल्लेख इस कृति की वास्तविक संरचना से अधिक है।
-
विकल्प 4: अठारह - यह विकल्प भी गलत है क्योंकि कामायनी में अठारह सर्ग नहीं हैं। अठारह सर्ग का उल्लेख इस कृति की वास्तविक संरचना से काफी अधिक है।
इस प्रकार, विकल्प 2 सही है क्योंकि कामायनी में वास्तव में पन्द्रह सर्ग हैं, जो इस काव्य की संरचना और विषयवस्तु के अनुरूप हैं।
प्रश्न 251
अष्टछाप के कवियों के संबंध में कौन-सा कथन असंगत है ?
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
अष्टछाप के कवियों के संबंध में दिए गए कथनों में से विकल्प 3 असंगत है। आइए इसे विस्तार से समझते हैं:
-
विकल्प 1: "अष्टछाप के वरिष्ठ कवि कुंभनदास और कनिष्ठ कवि नंददास हैं।" - यह कथन सही है। अष्टछाप के कवियों में कुंभनदास को वरिष्ठ और नंददास को कनिष्ठ माना जाता है। अष्टछाप के कवि वल्लभाचार्य के अनुयायी थे और इनकी रचनाएँ भक्ति साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं।
-
विकल्प 2: "अष्टछाप को अष्टसखा भी कहते हैं।" - यह कथन भी सही है। अष्टछाप के आठ कवियों को 'अष्टसखा' के नाम से भी जाना जाता है। ये सभी कवि वल्लभ संप्रदाय के अनुयायी थे और भगवान कृष्ण की भक्ति में रचनाएँ करते थे।
-
विकल्प 3: "सूरसागर श्रीमद्भागवत के नवम् स्कंध पर आधारित है।" - यह कथन असंगत है। सूरसागर, सूरदास द्वारा रचित एक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है, जो भगवान कृष्ण की लीलाओं का वर्णन करता है। हालांकि, यह सीधे तौर पर श्रीमद्भागवत के नवम् स्कंध पर आधारित नहीं है। श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध में भगवान कृष्ण की लीलाओं का वर्णन है, जो सूरसागर के विषय से मेल खाता है, लेकिन यह कथन कि सूरसागर नवम् स्कंध पर आधारित है, सही नहीं है।
-
विकल्प 4: "श्रीमद्भागवत में बारह स्कंध हैं।" - यह कथन सही है। श्रीमद्भागवत पुराण में कुल बारह स्कंध होते हैं, जो विभिन्न विषयों और कथाओं का वर्णन करते हैं।
इस प्रकार, विकल्प 3 का कथन असंगत है क्योंकि यह सूरसागर के विषय को गलत तरीके से प्रस्तुत करता है।
प्रश्न 252
हिमालयोन प्रवास' और 'लोकमाता' यात्रा वृत्तांतों के रचयिता हैं :
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
'हिमालयोन प्रवास' और 'लोकमाता' यात्रा वृत्तांतों के रचयिता काका कालेलकर हैं। काका कालेलकर एक प्रसिद्ध भारतीय लेखक और विचारक थे, जिन्होंने अपने यात्रा वृत्तांतों के माध्यम से भारतीय संस्कृति और समाज का गहन अध्ययन प्रस्तुत किया। उनके लेखन में हिमालय की प्राकृतिक सुंदरता और भारतीय समाज की विविधता का अद्भुत वर्णन मिलता है।
अब हम अन्य विकल्पों पर विचार करते हैं:
-
राहुल सांकृत्यायन: राहुल सांकृत्यायन भी एक प्रसिद्ध यात्रा लेखक थे, लेकिन उनके प्रमुख कार्यों में 'मेरी जीवन यात्रा' और 'तिब्बत में सवा वर्ष' शामिल हैं। 'हिमालयोन प्रवास' और 'लोकमाता' उनके द्वारा नहीं लिखे गए हैं।
-
मोहन राकेश: मोहन राकेश एक प्रसिद्ध नाटककार और उपन्यासकार थे। उनके प्रमुख कार्यों में 'आषाढ़ का एक दिन' और 'आधे अधूरे' शामिल हैं। यात्रा वृत्तांत उनके साहित्यिक क्षेत्र का हिस्सा नहीं थे।
-
गणेश शंकर विद्यार्थी: गणेश शंकर विद्यार्थी एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी और पत्रकार थे। उनका लेखन मुख्यतः सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर केंद्रित था, न कि यात्रा वृत्तांतों पर।
इस प्रकार, 'हिमालयोन प्रवास' और 'लोकमाता' के रचयिता के रूप में काका कालेलकर का नाम सही है।
प्रश्न 253
निम्नलिखित रचनाकारों को उनके जीवनकाल के आरोहीक्रम में व्यवस्थित कीजिए :
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
Option 3: जायसी, दादूदयाल, सुंदरदास, कासिमशाह
Explanation:
-
जायसी (मलिक मुहम्मद जायसी): जायसी का जन्म 1477 ई. में हुआ था और वे 1542 ई. में निधन हो गए। वे भारतीय सूफी कवि थे और उनकी प्रसिद्ध रचना 'पद्मावत' है। जायसी का समय 15वीं और 16वीं शताब्दी के मध्य का है।
-
दादूदयाल: दादूदयाल का जन्म 1544 ई. में हुआ था और वे 1603 ई. में निधन हो गए। वे एक प्रसिद्ध संत और कवि थे, जिन्होंने निर्गुण भक्ति परंपरा का प्रचार किया। उनका समय जायसी के बाद आता है।
-
सुंदरदास: सुंदरदास का जन्म 1596 ई. में हुआ था और वे 1689 ई. में निधन हो गए। वे दादूदयाल के शिष्य थे और उनके विचारों को आगे बढ़ाने का कार्य किया। उनका समय दादूदयाल के बाद आता है।
-
कासिमशाह: कासिमशाह का समय 17वीं शताब्दी के अंत और 18वीं शताब्दी के प्रारंभ का माना जाता है। उनके बारे में विस्तृत जानकारी कम उपलब्ध है, लेकिन वे सुंदरदास के बाद के समय के माने जाते हैं।
इस प्रकार, जब हम इन रचनाकारों को उनके जीवनकाल के आरोहीक्रम में व्यवस्थित करते हैं, तो सही क्रम होगा: जायसी, दादूदयाल, सुंदरदास, कासिमशाह। इसलिए, विकल्प 3 सही है।
अन्य विकल्पों की गलतियाँ:
-
विकल्प 1: इसमें दादूदयाल को जायसी से पहले रखा गया है, जो गलत है क्योंकि जायसी का समय दादूदयाल से पहले का है।
-
विकल्प 2: इसमें सुंदरदास को दादूदयाल से पहले रखा गया है, जो गलत है क्योंकि सुंदरदास दादूदयाल के शिष्य थे और उनका समय बाद का है।
-
विकल्प 4: इसमें सुंदरदास और कासिमशाह को जायसी और दादूदयाल से पहले रखा गया है, जो गलत है क्योंकि उनका समय बाद का है।
इस प्रकार, विकल्प 3 ही सही उत्तर है।
प्रश्न 254
नेपथ्य में हँसी' और 'दो पंक्तियों के बीच' काव्य संग्रहों के रचयिता हैं :
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
राजेश जोशी एक प्रसिद्ध हिंदी कवि हैं, जिनकी रचनाएँ समकालीन हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। 'नेपथ्य में हँसी' और 'दो पंक्तियों के बीच' उनके प्रमुख काव्य संग्रह हैं। उनकी कविताएँ सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर गहरी दृष्टि प्रस्तुत करती हैं और उनकी भाषा शैली सरल लेकिन प्रभावशाली होती है। इसलिए, विकल्प 1, राजेश जोशी, सही उत्तर है।
अब हम अन्य विकल्पों पर विचार करते हैं और समझते हैं कि वे क्यों गलत हैं:
-
त्रिलोचन: त्रिलोचन शास्त्री हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध कवि थे, लेकिन उनकी रचनाएँ 'नेपथ्य में हँसी' और 'दो पंक्तियों के बीच' नहीं हैं। वे अपनी त्रिवेणियों और अन्य कविताओं के लिए जाने जाते हैं।
-
केदारनाथ अग्रवाल: केदारनाथ अग्रवाल भी हिंदी के एक प्रमुख कवि थे, लेकिन उनकी रचनाएँ 'नेपथ्य में हँसी' और 'दो पंक्तियों के बीच' नहीं हैं। उनकी कविताएँ प्रकृति और श्रमजीवी जीवन पर केंद्रित होती हैं।
-
केदारनाथ सिंह: केदारनाथ सिंह आधुनिक हिंदी कविता के एक प्रमुख कवि थे, लेकिन 'नेपथ्य में हँसी' और 'दो पंक्तियों के बीच' उनके काव्य संग्रह नहीं हैं। उनकी कविताएँ आधुनिक जीवन की जटिलताओं को दर्शाती हैं।
इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि 'नेपथ्य में हँसी' और 'दो पंक्तियों के बीच' के रचयिता राजेश जोशी ही हैं, और इसलिए विकल्प 1 सही उत्तर है।
प्रश्न 255
निम्न में से कौन-से आचार्य 'श्री सम्प्रदाय' से सम्बन्धित नहीं हैं ?
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
'श्री सम्प्रदाय' एक प्रमुख वैष्णव सम्प्रदाय है, जिसकी स्थापना रामानुजाचार्य ने की थी। यह सम्प्रदाय भगवान विष्णु की भक्ति पर आधारित है और इसका मुख्य उद्देश्य भक्तों को भगवान के प्रति प्रेम और समर्पण की ओर प्रेरित करना है। अब हम प्रत्येक विकल्प का विश्लेषण करते हैं:
-
रामानुजाचार्य: रामानुजाचार्य 'श्री सम्प्रदाय' के संस्थापक हैं। उन्होंने इस सम्प्रदाय के सिद्धांतों को स्थापित किया और इसे व्यापक रूप से प्रचारित किया। इसलिए, वे 'श्री सम्प्रदाय' से सम्बन्धित हैं।
-
रामानंद: रामानंद भी वैष्णव परंपरा से जुड़े हुए हैं और उन्होंने रामानंदी सम्प्रदाय की स्थापना की, जो कि 'श्री सम्प्रदाय' से प्रभावित है। हालांकि, वे सीधे 'श्री सम्प्रदाय' के नहीं हैं, लेकिन उनके विचारधारा में समानताएं हैं।
-
राघवानंद: राघवानंद भी वैष्णव परंपरा के संत हैं और उनका योगदान वैष्णव भक्ति के प्रचार में महत्वपूर्ण है। वे 'श्री सम्प्रदाय' से जुड़े हुए माने जाते हैं।
-
विष्णुस्वामी: विष्णुस्वामी 'वल्लभ सम्प्रदाय' के संस्थापक माने जाते हैं, जो कि एक अलग वैष्णव सम्प्रदाय है। यह सम्प्रदाय 'शुद्धाद्वैत' दर्शन पर आधारित है और इसका 'श्री सम्प्रदाय' से सीधा संबंध नहीं है। इसलिए, विष्णुस्वामी 'श्री सम्प्रदाय' से सम्बन्धित नहीं हैं।
इस प्रकार, विष्णुस्वामी का 'श्री सम्प्रदाय' से सीधा संबंध नहीं होने के कारण विकल्प 4 सही उत्तर है।
प्रश्न 256
निम्नलिखित कवियों को उनके जीवनकाल के आरोहीक्रम में व्यवस्थित कीजिए :
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
Option 2 को सही उत्तर के रूप में प्रस्तुत किया गया है। आइए इसे सही ठहराने के लिए प्रत्येक कवि के जीवनकाल के आधार पर विश्लेषण करें:
-
नागार्जुन (1911-1998): नागार्जुन का जन्म 1911 में हुआ था और उनका निधन 1998 में हुआ। वे हिंदी साहित्य के प्रमुख कवियों में से एक थे और उनकी रचनाएँ सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर केंद्रित थीं।
-
त्रिलोचन (1917-2007): त्रिलोचन का जन्म 1917 में हुआ था और उनका निधन 2007 में हुआ। वे हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध कवि थे और उनकी कविताएँ सरल भाषा में गहरी भावनाओं को व्यक्त करती थीं।
-
मुक्तिबोध (1917-1964): गजानन माधव मुक्तिबोध का जन्म 1917 में हुआ था और उनका निधन 1964 में हुआ। वे हिंदी साहित्य के प्रगतिशील कवियों में से एक थे और उनकी रचनाएँ जटिल विचारों और गहन सामाजिक चिंताओं को व्यक्त करती थीं।
-
रांगेय राघव (1923-1962): रांगेय राघव का जन्म 1923 में हुआ था और उनका निधन 1962 में हुआ। वे हिंदी साहित्य के बहुमुखी लेखक थे और उनकी रचनाएँ विविध विषयों पर आधारित थीं।
अब, इन कवियों के जीवनकाल के आधार पर उन्हें आरोही क्रम में व्यवस्थित करने पर हमें मिलता है: नागार्जुन, त्रिलोचन, मुक्तिबोध, रांगेय राघव। यह क्रम Option 2 के अनुसार है।
अन्य विकल्पों की गलतियाँ:
-
Option 1: त्रिलोचन को नागार्जुन से पहले रखा गया है, जो गलत है क्योंकि नागार्जुन का जन्म त्रिलोचन से पहले हुआ था।
-
Option 3: इसमें त्रिलोचन को मुक्तिबोध के बाद रखा गया है, जबकि दोनों का जन्म वर्ष 1917 है, लेकिन त्रिलोचन का निधन मुक्तिबोध के बाद हुआ, इसलिए यह क्रम सही नहीं है।
-
Option 4: इसमें रांगेय राघव को मुक्तिबोध के बाद रखा गया है, जबकि रांगेय राघव का निधन मुक्तिबोध से पहले हुआ था।
इस प्रकार, Option 2 सही उत्तर है क्योंकि यह कवियों के जीवनकाल के सही आरोही क्रम को दर्शाता है।
प्रश्न 257
अज्ञेय को उनकी किस काव्य कृति के लिए 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' (1964) मिला ?
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
अज्ञेय को उनकी काव्य कृति 'आँगन के पार द्वार' के लिए 1964 में 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' से सम्मानित किया गया था। यह कृति उनकी साहित्यिक यात्रा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है और इसे साहित्यिक जगत में अत्यधिक सराहा गया। इस कृति में अज्ञेय ने मानवीय संवेदनाओं और जीवन के विभिन्न पहलुओं को गहराई से उकेरा है, जो पाठकों को सोचने पर मजबूर करता है। उनकी लेखनी की विशिष्टता और गहनता ने उन्हें इस प्रतिष्ठित पुरस्कार का हकदार बनाया।
अब अन्य विकल्पों पर विचार करते हैं:
-
इल्लाम: यह कृति अज्ञेय की प्रमुख रचनाओं में से एक नहीं है और इसे 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' नहीं मिला।
-
इन्द्रधनु रोते हुए थे: यह भी अज्ञेय की एक अन्य रचना है, लेकिन इसे 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' नहीं मिला। यह कृति उनकी अन्य रचनाओं की तरह प्रसिद्ध है, लेकिन पुरस्कार के संदर्भ में सही विकल्प नहीं है।
-
हरी घास पर क्षण भर: यह भी अज्ञेय की एक महत्वपूर्ण रचना है, लेकिन इसे 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' नहीं मिला। यह कृति उनकी साहित्यिक शैली और विचारधारा को दर्शाती है, परंतु पुरस्कार के संदर्भ में सही विकल्प नहीं है।
इस प्रकार, 'आँगन के पार द्वार' ही वह कृति है जिसके लिए अज्ञेय को 1964 में 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' मिला, और यही सही उत्तर है।
प्रश्न 258
दादूदयाल के संबंध में कौन-सा कथन असत्य है ?
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
दादूदयाल के संबंध में दिए गए कथनों में से विकल्प 2 असत्य है। आइए इसे विस्तार से समझते हैं:
-
विकल्प 2: कमाल और रामदास ने इनकी रचनाओं का संग्रह हरड़ेवाणी के नाम से किया था।
यह कथन असत्य है क्योंकि दादूदयाल की रचनाओं का संग्रह "हरड़ेवाणी" के नाम से नहीं किया गया था। दादूदयाल की वाणी का संग्रह "दादूवाणी" के नाम से प्रसिद्ध है। कमाल और रामदास उनके शिष्य थे, लेकिन उन्होंने "हरड़ेवाणी" नाम से कोई संग्रह नहीं किया। इसीलिए यह कथन गलत है और यही कारण है कि इसे सही उत्तर के रूप में चुना गया है। -
विकल्प 1: सांभर के निकट नराने (नरैना) नामक स्थान पर 1603 में इन्होंने अपना शरीर छोड़ा।
यह कथन सत्य है। दादूदयाल ने 1603 में सांभर के निकट नराने (नरैना) में अपना शरीर त्यागा था। यह ऐतिहासिक तथ्य है और इसलिए यह कथन सही है। -
विकल्प 3: कालांतर में रज्जब ने इसका संपादन अंगवधू नाम से किया।
यह कथन भी सत्य है। रज्जब, जो दादूदयाल के शिष्य थे, ने उनकी वाणी का संपादन "अंगवधू" नाम से किया था। यह तथ्य ऐतिहासिक रूप से मान्य है। -
विकल्प 4: इन्होंने निर्गुण निराकार को वैयक्तिक भावनाओं का विषय बनाया है।
यह कथन भी सत्य है। दादूदयाल निर्गुण निराकार ब्रह्म के उपासक थे और उन्होंने इसे अपनी वाणी में वैयक्तिक भावनाओं के माध्यम से व्यक्त किया है। यह उनके दर्शन का एक प्रमुख हिस्सा है।
इस प्रकार, विकल्प 2 को असत्य के रूप में सही उत्तर माना गया है क्योंकि यह दादूदयाल के संबंध में ऐतिहासिक तथ्यों के विपरीत है।
प्रश्न 259
कवि बच्चन ने 'अग्नि-पथ' शब्द का प्रयोग किसके प्रतीक स्वरूप किया है ?
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
कवि बच्चन ने 'अग्नि-पथ' शब्द का प्रयोग जीवन की कठिनाइयों का प्रतीक स्वरूप किया है। यह प्रतीकात्मकता इस बात को दर्शाती है कि जीवन में आने वाली कठिनाइयाँ और संघर्ष एक अग्नि-पथ के समान होते हैं, जिन्हें पार करना आवश्यक होता है। बच्चन की कविता में 'अग्नि-पथ' का अर्थ है कि जीवन में आने वाली चुनौतियाँ और समस्याएँ हमें मजबूती और साहस के साथ आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं। यह एक प्रेरणादायक संदेश है कि कठिनाइयों का सामना करते हुए हमें अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहना चाहिए।
अब अन्य विकल्पों की चर्चा करते हैं:
-
काँटों की डगर का: यह विकल्प गलत है क्योंकि 'अग्नि-पथ' का सीधा संबंध काँटों की डगर से नहीं है। काँटों की डगर का अर्थ होता है एक कठिन और दर्दनाक मार्ग, लेकिन 'अग्नि-पथ' का विशेष रूप से जीवन की कठिनाइयों से संबंध है, जो एक व्यापक और गहन प्रतीक है।
-
अग्नि के सफर का: यह विकल्प भी गलत है क्योंकि 'अग्नि-पथ' का अर्थ अग्नि के सफर से नहीं है। अग्नि के सफर का अर्थ होता है आग के माध्यम से यात्रा करना, जो कि बच्चन की कविता के संदर्भ में सही नहीं बैठता।
-
कुत्सित मनोवृत्तियों का: यह विकल्प भी गलत है क्योंकि 'अग्नि-पथ' का प्रयोग कुत्सित मनोवृत्तियों के लिए नहीं किया गया है। कुत्सित मनोवृत्तियाँ नकारात्मक सोच और भावनाओं को दर्शाती हैं, जबकि 'अग्नि-पथ' जीवन की कठिनाइयों और संघर्षों का प्रतीक है।
इस प्रकार, 'अग्नि-पथ' का सही अर्थ जीवन की कठिनाइयों का प्रतीक है, जो हमें संघर्षों का सामना करने और उन्हें पार करने की प्रेरणा देता है।
प्रश्न 260
निम्न में से कौन-सा कथन असंगत है ?
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
कथन 3: "रमैनी और सबद में पूर्वी बोलियों का प्रयोग है।" को असंगत माना गया है। आइए इसे विस्तार से समझते हैं:
-
कथन 3 का विश्लेषण: रमैनी और सबद कबीर की रचनाओं के भाग हैं, और इनमें पूर्वी बोलियों का प्रयोग हुआ है। हालांकि, यह कथन असंगत इसलिए है क्योंकि रमैनी और सबद में केवल पूर्वी बोलियों का ही प्रयोग नहीं है, बल्कि इनमें अन्य भाषाओं और बोलियों का भी समावेश है। कबीर की रचनाएँ बहुभाषीय हैं और इनमें विभिन्न भाषाओं का मिश्रण देखने को मिलता है। इस प्रकार, यह कथन असंगत है क्योंकि यह केवल पूर्वी बोलियों के प्रयोग को ही इंगित करता है।
-
अन्य विकल्पों का विश्लेषण:
-
विकल्प 1: "कबीर के राम रामानंद के राम नहीं हैं।" - यह कथन संगत है क्योंकि कबीर के राम निर्गुण और निराकार हैं, जबकि रामानंद के राम सगुण और साकार हैं। कबीर ने अपने राम को एक आध्यात्मिक और सार्वभौमिक सत्ता के रूप में देखा है, जो पारंपरिक धार्मिक धारणाओं से भिन्न है।
-
विकल्प 2: "रमैनी, सबद और साखी बीजक के ही तीन भाग हैं।" - यह कथन भी संगत है क्योंकि बीजक कबीर की रचनाओं का संग्रह है, जिसमें रमैनी, सबद और साखी शामिल हैं। ये तीनों बीजक के प्रमुख भाग हैं और कबीर की शिक्षाओं को व्यक्त करते हैं।
-
विकल्प 4: "जन-बोली के शब्दों का प्रयोग कबीर की कविता में खूब हुआ है।" - यह कथन भी सही है क्योंकि कबीर ने अपनी कविताओं में जन-बोली का व्यापक रूप से प्रयोग किया है। उनकी रचनाएँ आम जनता की भाषा में हैं, जिससे वे सीधे लोगों के दिलों तक पहुँचती हैं।
-
इस प्रकार, विकल्प 3 को असंगत माना गया है क्योंकि यह रमैनी और सबद में केवल पूर्वी बोलियों के प्रयोग को इंगित करता है, जबकि वास्तव में कबीर की रचनाएँ बहुभाषीय हैं।