HTET परीक्षा Level 2 TGT
Clear Cutoff के साथ HTET परीक्षा Level 2 TGT की तैयारी
सत्यापित उत्तर और व्याख्याएँ
Clear Cutoff द्वारा
20 में से 20 प्रश्न दिखाए जा रहे हैं
प्रश्न 221
पर्यायवाची की दृष्टि से असंगत विकल्प चुनिए :
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उत्तर और व्याख्या
विकल्प 3 सही उत्तर है क्योंकि यह पर्यायवाची शब्दों की दृष्टि से असंगत है। आइए इसे विस्तार से समझते हैं:
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विकल्प 1: पक्षी – शकुंत, द्विज, नभचर
ये सभी शब्द पक्षी के पर्यायवाची हैं। 'शकुंत' और 'द्विज' दोनों ही पक्षी के लिए प्रयुक्त होते हैं, और 'नभचर' का अर्थ है आकाश में विचरण करने वाला, जो पक्षी के लिए उपयुक्त है। -
विकल्प 2: बैल – ऋषभ, वृषभ, अक्षधर
ये सभी शब्द बैल के पर्यायवाची हैं। 'ऋषभ' और 'वृषभ' दोनों ही बैल के लिए प्रयुक्त होते हैं, और 'अक्षधर' का अर्थ है जो धुरी को धारण करता है, जो बैल के लिए उपयुक्त है। -
विकल्प 3: वेद – आम्नाय, आगम, आकर
यहाँ पर 'आम्नाय' और 'आगम' वेद के पर्यायवाची हैं, लेकिन 'आकर' का अर्थ है खजाना या स्रोत, जो वेद के लिए पर्यायवाची नहीं है। इसलिए यह विकल्प असंगत है। -
विकल्प 4: हरिण – कुरंग, प्लवंग, सारंग
ये सभी शब्द हरिण के पर्यायवाची हैं। 'कुरंग', 'प्लवंग', और 'सारंग' सभी हरिण के लिए प्रयुक्त होते हैं।
इस प्रकार, विकल्प 3 में 'आकर' शब्द वेद के पर्यायवाची नहीं होने के कारण असंगत है, और यही कारण है कि यह सही उत्तर है।
प्रश्न 222
आरोहण' का विलोम है :
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उत्तर और व्याख्या
प्रश्न: 'आरोहण' का विलोम है :
सही उत्तर: विकल्प 2
विस्तृत व्याख्या:
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विकल्प 2: अवरोहण
'आरोहण' का अर्थ है ऊपर की ओर चढ़ना या वृद्धि करना। इसके विपरीत, 'अवरोहण' का अर्थ है नीचे की ओर उतरना या कमी होना। इसलिए, 'आरोहण' का विलोम शब्द 'अवरोहण' है। यह एक सामान्य शब्द युग्म है जो संगीत, गणित और अन्य संदर्भों में भी उपयोग होता है, जहाँ आरोहण और अवरोहण क्रमशः वृद्धि और कमी को दर्शाते हैं। -
विकल्प 1: आवर्तक
'आवर्तक' का अर्थ है पुनरावृत्ति करने वाला या बार-बार होने वाला। यह शब्द 'आरोहण' के विपरीत अर्थ को नहीं दर्शाता है। इसलिए, यह विकल्प सही नहीं है। -
विकल्प 3: अनादृत
'अनादृत' का अर्थ है जिसका आदर न किया गया हो या उपेक्षित। यह शब्द 'आरोहण' के विपरीत अर्थ को नहीं दर्शाता है। इसलिए, यह विकल्प सही नहीं है। -
विकल्प 4: अनाक्रांत
'अनाक्रांत' का अर्थ है जो आक्रांत न हो या जिसे आक्रमण न किया गया हो। यह शब्द 'आरोहण' के विपरीत अर्थ को नहीं दर्शाता है। इसलिए, यह विकल्प सही नहीं है।
इस प्रकार, 'आरोहण' का सही विलोम 'अवरोहण' है, जो विकल्प 2 में दिया गया है।
प्रश्न 223
निम्न में से कौन-सा शब्द 'जुगनूँ' का पर्याय नहीं है ?
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उत्तर और व्याख्या
निम्नलिखित स्पष्टीकरण में हम यह समझेंगे कि क्यों विकल्प 4 'आतप' सही उत्तर है और अन्य विकल्प क्यों गलत हैं:
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विकल्प 4: आतप
'आतप' का अर्थ है धूप या सूर्य की किरणें। यह शब्द 'जुगनूँ' का पर्याय नहीं है क्योंकि जुगनूँ एक कीट है जो अपनी चमक के लिए जाना जाता है, जबकि 'आतप' का संबंध सूर्य की रोशनी से है। इसलिए, 'आतप' का जुगनूँ से कोई संबंध नहीं है और यह सही उत्तर है। -
विकल्प 1: इंद्रगोप
'इंद्रगोप' एक प्रकार का कीट है जो लाल रंग का होता है और इसे कभी-कभी जुगनूँ के पर्याय के रूप में भी देखा जाता है। इसलिए, यह विकल्प जुगनूँ का पर्याय हो सकता है और गलत उत्तर है। -
विकल्प 2: सोनकिरवा
'सोनकिरवा' भी जुगनूँ का एक पर्यायवाची शब्द है। यह शब्द जुगनूँ के लिए स्थानीय बोलियों में उपयोग किया जाता है। इसलिए, यह विकल्प भी जुगनूँ का पर्याय है और गलत उत्तर है। -
विकल्प 3: ज्योतिर्बीज
'ज्योतिर्बीज' का अर्थ है वह जो प्रकाश का बीज है, और यह शब्द भी जुगनूँ के लिए उपयोग किया जाता है क्योंकि जुगनूँ रात में चमकता है। इसलिए, यह विकल्प भी जुगनूँ का पर्याय है और गलत उत्तर है।
इस प्रकार, 'आतप' (विकल्प 4) ही एकमात्र ऐसा शब्द है जो जुगनूँ का पर्याय नहीं है, और इसलिए यह सही उत्तर है।
प्रश्न 224
किसी के दुःख से दुःखी होकर उस पर दया करने का भाव कहलाता है -
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उत्तर और व्याख्या
Option 4, "अनुकम्पा," को सही उत्तर के रूप में चुना गया है। आइए समझते हैं कि यह विकल्प क्यों सही है और अन्य विकल्प क्यों गलत हैं:
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अनुकम्पा (Option 4):
- "अनुकम्पा" का अर्थ है किसी के दुःख या कष्ट को देखकर उस पर दया करना और उसकी सहायता करने की भावना रखना। यह शब्द विशेष रूप से उस स्थिति को दर्शाता है जब हम किसी के दुःख से प्रभावित होकर उसकी मदद करने की इच्छा रखते हैं। इस प्रकार, यह शब्द प्रश्न में दिए गए भाव को सही रूप से व्यक्त करता है।
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दया (Option 1):
- "दया" का अर्थ है किसी के प्रति करुणा या ममता का भाव रखना। हालांकि यह शब्द भी किसी के दुःख से प्रभावित होने का संकेत देता है, लेकिन यह अनुकम्पा की तरह सक्रिय सहायता की भावना को नहीं दर्शाता। दया एक सामान्य करुणा का भाव है, जबकि अनुकम्पा में सहायता करने की प्रवृत्ति होती है।
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समानुभूति (Option 2):
- "समानुभूति" का अर्थ है किसी के भावनात्मक अनुभव को समझना और महसूस करना। यह शब्द अधिकतर मानसिक और भावनात्मक स्तर पर जुड़ाव को दर्शाता है, लेकिन इसमें दया या सहायता करने की भावना का अभाव होता है। इसलिए यह विकल्प सही नहीं है।
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सहानुभूति (Option 3):
- "सहानुभूति" का अर्थ है किसी के दुःख या कष्ट को समझना और उसके प्रति संवेदनशील होना। यह शब्द भी करुणा का भाव दर्शाता है, लेकिन यह अनुकम्पा की तरह सक्रिय सहायता की भावना को नहीं दर्शाता। सहानुभूति में समझ और संवेदनशीलता होती है, लेकिन अनुकम्पा में सहायता करने की प्रवृत्ति होती है।
इस प्रकार, "अनुकम्पा" (Option 4) सही उत्तर है क्योंकि यह शब्द न केवल किसी के दुःख से प्रभावित होने का भाव दर्शाता है, बल्कि उस पर दया करके सहायता करने की भावना को भी व्यक्त करता है।
प्रश्न 225
भरतमुनि' के 'नाट्यशास्त्र' में कितने अलंकारों का उल्लेख मिलता है ?
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उत्तर और व्याख्या
भरतमुनि के 'नाट्यशास्त्र' में अलंकारों का उल्लेख एक महत्वपूर्ण विषय है। 'नाट्यशास्त्र' भारतीय नाट्यकला का एक प्राचीन ग्रंथ है, जिसमें नाट्यकला के विभिन्न पहलुओं का विस्तृत वर्णन किया गया है।
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Option 2: 4 अलंकार - यह सही उत्तर है। भरतमुनि के 'नाट्यशास्त्र' में चार प्रमुख अलंकारों का उल्लेख मिलता है। ये अलंकार नाट्यकला में सौंदर्य और अभिव्यक्ति को बढ़ाने के लिए उपयोग किए जाते हैं। ये अलंकार नाट्यकला के विभिन्न तत्वों को सजाने और दर्शकों के मन में गहरी छाप छोड़ने में सहायक होते हैं।
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Option 1: 3 अलंकार - यह विकल्प गलत है क्योंकि 'नाट्यशास्त्र' में तीन नहीं, बल्कि चार अलंकारों का उल्लेख मिलता है। तीन अलंकारों का उल्लेख नाट्यशास्त्र के संदर्भ में अधूरा होगा और यह भरतमुनि के द्वारा वर्णित संपूर्णता को नहीं दर्शाता।
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Option 3: 6 अलंकार - यह विकल्प भी गलत है। 'नाट्यशास्त्र' में छह अलंकारों का उल्लेख नहीं किया गया है। यह संख्या भरतमुनि के द्वारा वर्णित अलंकारों की वास्तविक संख्या से अधिक है और इस प्रकार यह विकल्प सही नहीं है।
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Option 4: 8 अलंकार - यह विकल्प भी गलत है। आठ अलंकारों का उल्लेख 'नाट्यशास्त्र' में नहीं मिलता है। यह संख्या भरतमुनि के द्वारा वर्णित अलंकारों की वास्तविक संख्या से काफी अधिक है और इस प्रकार यह विकल्प भी सही नहीं है।
इस प्रकार, 'नाट्यशास्त्र' में चार अलंकारों का उल्लेख होने के कारण Option 2 सही उत्तर है।
प्रश्न 226
उसके मुख शशिकर से सौन्दर्य-किरण बरसी।
मन-कुमुद खिला, हर्षित निश्छल उर की सरसी।।'
प्रस्तुत पद में किस शब्द-शक्ति का प्रयोग किया गया है ?
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उत्तर और व्याख्या
प्रस्तुत पद में "गौणी लक्षणा" शब्द-शक्ति का प्रयोग किया गया है। आइए इसे विस्तार से समझते हैं:
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गौणी लक्षणा: लक्षणा शब्द-शक्ति का वह प्रकार है जिसमें शब्द का प्राथमिक अर्थ छोड़कर किसी अन्य अर्थ को ग्रहण किया जाता है। गौणी लक्षणा में शब्द का अर्थ गौण होता है, अर्थात् वह किसी अन्य अर्थ की ओर संकेत करता है। इस पद में "मुख शशिकर" और "मन-कुमुद" जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है, जो सीधे-सीधे अपने सामान्य अर्थ में नहीं लिए गए हैं, बल्कि सौन्दर्य और हर्ष का बोध कराते हैं। यहाँ "मुख" का अर्थ मुखमंडल से है और "शशिकर" का अर्थ चंद्रमा की किरणों से है, जो सौन्दर्य की ओर संकेत करता है। इसी प्रकार "मन-कुमुद" का अर्थ मन के कमल से है, जो हर्ष और प्रसन्नता का प्रतीक है। इस प्रकार, गौणी लक्षणा का प्रयोग स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
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शुद्धा लक्षणा: शुद्धा लक्षणा में शब्द का अर्थ उसके सामान्य अर्थ से हटकर किसी अन्य अर्थ में लिया जाता है, लेकिन गौण अर्थ नहीं होता। यहाँ ऐसा कोई प्रयोग नहीं है, इसलिए यह विकल्प सही नहीं है।
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शाब्दी व्यंजना: शाब्दी व्यंजना में शब्दों के माध्यम से किसी अन्य अर्थ का बोध होता है, जो शब्दों के सामान्य अर्थ से भिन्न होता है। यहाँ पद में शब्दों का प्रयोग उनके सामान्य अर्थ से हटकर नहीं किया गया है, बल्कि गौण अर्थ में किया गया है, इसलिए यह विकल्प सही नहीं है।
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आर्थी व्यंजना: आर्थी व्यंजना में शब्दों के अर्थ के माध्यम से किसी अन्य अर्थ का बोध होता है। यहाँ पद में शब्दों का प्रयोग उनके अर्थ के माध्यम से नहीं, बल्कि गौण अर्थ में किया गया है, इसलिए यह विकल्प सही नहीं है।
इस प्रकार, प्रस्तुत पद में गौणी लक्षणा का प्रयोग किया गया है, जो विकल्प 1 को सही ठहराता है।
प्रश्न 227
मरम वचन जब सीता बोला,
पंचम स्वर में कोकिल बोला।'
प्रस्तुत पद में शब्द प्रयोग संबंधी कौन-सा दोष है ?
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उत्तर और व्याख्या
प्रस्तुत पद में "मरम वचन जब सीता बोला, पंचम स्वर में कोकिल बोला।" में शब्द प्रयोग संबंधी दोष का विश्लेषण करते हुए, हम देखते हैं कि सही उत्तर विकल्प 4, "च्युत संस्कार दोष" है। आइए इसे विस्तार से समझें:
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च्युत संस्कार दोष: यह दोष तब होता है जब किसी शब्द का प्रयोग उसके सही अर्थ या संदर्भ में नहीं किया जाता है, जिससे उसके मूल संस्कार या अर्थ में विकृति आ जाती है। प्रस्तुत पद में "मरम वचन जब सीता बोला" में "बोला" का प्रयोग किया गया है, जबकि "सीता" के लिए "बोली" का प्रयोग होना चाहिए था। यह लिंग संबंधी त्रुटि है, जो च्युत संस्कार दोष के अंतर्गत आती है। इस प्रकार, यह विकल्प सही है।
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अप्रयुक्त दोष: यह दोष तब होता है जब किसी शब्द का प्रयोग अप्रचलित या असामान्य रूप में किया जाता है। प्रस्तुत पद में ऐसा कोई शब्द नहीं है जो अप्रचलित हो, इसलिए यह विकल्प गलत है।
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असमर्थ दोष: यह दोष तब होता है जब शब्दों का प्रयोग ऐसा हो कि वे अपने अर्थ को स्पष्ट रूप से व्यक्त न कर पाएं। प्रस्तुत पद में शब्दों का अर्थ स्पष्ट है, इसलिए यह विकल्प गलत है।
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ग्राम्यत्व दोष: यह दोष तब होता है जब भाषा में अशिष्टता या ग्राम्य भाषा का प्रयोग होता है। प्रस्तुत पद में ऐसा कोई अशिष्ट या ग्राम्य भाषा का प्रयोग नहीं है, इसलिए यह विकल्प गलत है।
इस प्रकार, प्रस्तुत पद में "च्युत संस्कार दोष" का होना स्पष्ट है, और यही कारण है कि विकल्प 4 सही उत्तर है।
प्रश्न 228
पद्माकर' के किस ग्रंथ को 'शृंगार रस का सारग्रंथ' कहा जाता है ?
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उत्तर और व्याख्या
पद्माकर के साहित्य में 'जगद्विनोद' को 'शृंगार रस का सारग्रंथ' कहा जाता है। इसका कारण यह है कि 'जगद्विनोद' में शृंगार रस का अत्यधिक प्रभावशाली और सुंदर वर्णन किया गया है। इस ग्रंथ में प्रेम, सौंदर्य और भावनाओं का ऐसा चित्रण मिलता है जो शृंगार रस की विशेषताओं को पूरी तरह से उजागर करता है। पद्माकर ने इस ग्रंथ में शृंगार रस के विभिन्न पक्षों को गहराई से प्रस्तुत किया है, जिससे यह ग्रंथ शृंगार रस का सारग्रंथ माना जाता है।
अब अन्य विकल्पों पर विचार करते हैं:
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हिम्मत बहादुर विरुदावली: यह ग्रंथ वीर रस पर आधारित है और इसमें वीरता और साहस का वर्णन किया गया है। इसलिए इसे शृंगार रस का सारग्रंथ नहीं कहा जा सकता।
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राम-रसायन: यह ग्रंथ भक्ति रस पर आधारित है और इसमें भगवान राम की महिमा का वर्णन है। यह शृंगार रस से संबंधित नहीं है।
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प्रबोध-पचासा: यह ग्रंथ नीति और ज्ञान पर आधारित है और इसमें शृंगार रस का वर्णन नहीं है। इसलिए इसे शृंगार रस का सारग्रंथ नहीं माना जा सकता।
इस प्रकार, 'जगद्विनोद' को 'शृंगार रस का सारग्रंथ' कहा जाना उचित है और यही कारण है कि विकल्प 3 सही उत्तर है।
प्रश्न 229
जिस अलंकार में काव्य-वर्णन वास्तविकता से बहुत दूर चला जाता है, कहा जाता है -
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उत्तर और व्याख्या
अलंकारों का अध्ययन काव्य की सुंदरता और अर्थ को समझने में मदद करता है। दिए गए प्रश्न में पूछा गया है कि वह कौन सा अलंकार है जिसमें काव्य-वर्णन वास्तविकता से बहुत दूर चला जाता है। सही उत्तर विकल्प 3, "अतिशयोक्ति" है। आइए इसे विस्तार से समझें:
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अतिशयोक्ति (Option 3): अतिशयोक्ति अलंकार का प्रयोग तब होता है जब किसी वस्तु, व्यक्ति या स्थिति का वर्णन अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर किया जाता है, जो वास्तविकता से बहुत दूर होता है। इसका उद्देश्य पाठक या श्रोता पर गहरा प्रभाव डालना होता है। उदाहरण के लिए, "उसके रोने से नदी बह निकली"। यहाँ रोने को इतना बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया गया है कि यह वास्तविकता से परे है। अतः, यह विकल्प सही है क्योंकि यह वास्तविकता से दूर जाने वाले वर्णन को दर्शाता है।
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भ्रांतिमान (Option 1): भ्रांतिमान अलंकार में भ्रम या गलतफहमी उत्पन्न होती है, लेकिन यह वास्तविकता से दूर जाने के लिए नहीं होता। यह अलंकार किसी वस्तु या व्यक्ति को किसी अन्य वस्तु या व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है, जिससे भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है। अतः यह विकल्प सही नहीं है।
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विशेषोक्ति (Option 2): विशेषोक्ति अलंकार में किसी विशेषता को विशेष रूप से उभारकर प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन यह वास्तविकता से दूर नहीं जाता। यह अलंकार किसी विशेष गुण या विशेषता को अधिक स्पष्टता से दिखाने के लिए होता है। इसलिए, यह विकल्प भी सही नहीं है।
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दीपक (Option 4): दीपक अलंकार में एक ही शब्द या वाक्यांश का प्रयोग दो या अधिक अर्थों में किया जाता है, जिससे कविता में गहराई आती है। यह अलंकार वास्तविकता से दूर जाने के लिए नहीं होता। अतः यह विकल्प भी सही नहीं है।
इस प्रकार, "अतिशयोक्ति" ही वह अलंकार है जिसमें काव्य-वर्णन वास्तविकता से बहुत दूर चला जाता है, और इसलिए विकल्प 3 सही उत्तर है।
प्रश्न 230
किस विकल्प में द्वन्द्व समास का उदाहरण नहीं है ?
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उत्तर और व्याख्या
द्वन्द्व समास वह समास होता है जिसमें दो या अधिक शब्दों का योग होता है और दोनों ही शब्द प्रधान होते हैं। अब हम दिए गए विकल्पों का विश्लेषण करते हैं:
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भक्ष्याभक्ष्य: यह द्वन्द्व समास का उदाहरण है क्योंकि इसमें 'भक्ष्य' और 'अभक्ष्य' दो शब्दों का योग है, जो एक-दूसरे के विपरीत अर्थ रखते हैं और दोनों ही प्रधान हैं।
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कृष्णार्जुन: यह भी द्वन्द्व समास का उदाहरण है। इसमें 'कृष्ण' और 'अर्जुन' दो व्यक्तियों के नाम हैं, और दोनों ही समान रूप से प्रधान हैं।
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रुद्रप्रिया: यह द्वन्द्व समास का उदाहरण नहीं है। यह तत्पुरुष समास का उदाहरण है, जिसमें 'रुद्र' और 'प्रिया' का योग है, जहां 'प्रिया' 'रुद्र' के लिए प्रिय है। इसमें 'प्रिया' प्रधान है और 'रुद्र' का विशेषण है।
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उचितानुचित: यह भी द्वन्द्व समास का उदाहरण है क्योंकि इसमें 'उचित' और 'अनुचित' दो विपरीत अर्थ वाले शब्दों का योग है और दोनों ही प्रधान हैं।
इस प्रकार, विकल्प 3 'रुद्रप्रिया' द्वन्द्व समास का उदाहरण नहीं है, क्योंकि यह तत्पुरुष समास का उदाहरण है। यही कारण है कि विकल्प 3 सही उत्तर है।
प्रश्न 231
अधिकारप्राप्त' में कौन-सा समास है ?
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उत्तर और व्याख्या
प्रश्न: 'अधिकारप्राप्त' में कौन-सा समास है?
सही उत्तर: विकल्प 2 (कर्म तत्पुरुष)
व्याख्या:
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कर्म तत्पुरुष समास: 'अधिकारप्राप्त' शब्द में 'अधिकार' और 'प्राप्त' दो पद हैं। यहाँ 'प्राप्त' क्रिया है और 'अधिकार' उसका कर्म है। जब किसी क्रिया के साथ उसका कर्म जुड़ता है, तो उसे कर्म तत्पुरुष समास कहते हैं। इस प्रकार, 'अधिकारप्राप्त' में 'अधिकार' का 'प्राप्त' के साथ संबंध कर्म का है, इसलिए यह कर्म तत्पुरुष समास है।
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अन्य विकल्पों की अस्वीकृति:
- करण तत्पुरुष: करण तत्पुरुष समास में साधन या उपकरण का संबंध होता है, जैसे 'कलम से लिखा'। 'अधिकारप्राप्त' में ऐसा कोई साधन या उपकरण का संबंध नहीं है, इसलिए यह करण तत्पुरुष नहीं है।
- संप्रदान तत्पुरुष: संप्रदान तत्पुरुष में दान या समर्पण का भाव होता है, जैसे 'गुरु को पुस्तक दी'। 'अधिकारप्राप्त' में ऐसा कोई दान या समर्पण का भाव नहीं है, इसलिए यह संप्रदान तत्पुरुष नहीं है।
- अधिकरण तत्पुरुष: अधिकरण तत्पुरुष में स्थान या स्थिति का संबंध होता है, जैसे 'घर में बैठा'। 'अधिकारप्राप्त' में ऐसा कोई स्थान या स्थिति का संबंध नहीं है, इसलिए यह अधिकरण तत्पुरुष नहीं है।
इस प्रकार, 'अधिकारप्राप्त' में कर्म तत्पुरुष समास है, और यही कारण है कि विकल्प 2 सही उत्तर है।
प्रश्न 232
रेत समाधि' उपन्यास की लेखिका हैं -
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उत्तर और व्याख्या
'रेत समाधि' उपन्यास की लेखिका गीतांजली श्री हैं। यह उपन्यास हिंदी साहित्य में एक महत्वपूर्ण योगदान है और इसे व्यापक रूप से सराहा गया है। गीतांजली श्री एक प्रतिष्ठित लेखिका हैं, जिन्होंने अपने लेखन के माध्यम से समाज के विभिन्न पहलुओं को उजागर किया है। 'रेत समाधि' उनके लेखन की गहराई और संवेदनशीलता का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
अब हम अन्य विकल्पों पर विचार करते हैं:
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अल्पना मिश्र: अल्पना मिश्र एक प्रसिद्ध लेखिका हैं, लेकिन उन्होंने 'रेत समाधि' नहीं लिखा है। उनके लेखन का क्षेत्र और शैली अलग है, और वे अन्य उपन्यासों और कहानियों के लिए जानी जाती हैं।
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जया जादवानी: जया जादवानी भी एक जानी-मानी लेखिका हैं, लेकिन 'रेत समाधि' उनकी रचना नहीं है। उनका लेखन भी अलग विषयों और शैलियों पर केंद्रित है।
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नीरजा माधव: नीरजा माधव एक और प्रसिद्ध लेखिका हैं, लेकिन 'रेत समाधि' उनके द्वारा नहीं लिखा गया है। उनके लेखन का क्षेत्र भी भिन्न है।
इस प्रकार, 'रेत समाधि' उपन्यास की सही लेखिका गीतांजली श्री हैं, और यही कारण है कि विकल्प 3 सही उत्तर है।
प्रश्न 233
हिन्दी में 'शिकार साहित्य' के अग्रणी लेखक हैं -
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उत्तर और व्याख्या
श्रीराम शर्मा को 'शिकार साहित्य' के अग्रणी लेखक के रूप में मान्यता दी गई है। उनके लेखन में शिकार के अनुभवों का जीवंत वर्णन मिलता है, जो पाठकों को शिकार के रोमांच और चुनौतियों से परिचित कराता है। उनके साहित्य में शिकार के विभिन्न पहलुओं का गहन अध्ययन और विश्लेषण होता है, जो उन्हें इस क्षेत्र में एक प्रमुख लेखक बनाता है।
अब हम अन्य विकल्पों पर विचार करते हैं:
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के० विक्रम सिंह: के० विक्रम सिंह का साहित्यिक योगदान अन्य विषयों में अधिक है, लेकिन उन्हें 'शिकार साहित्य' के अग्रणी लेखक के रूप में नहीं जाना जाता है। उनका लेखन मुख्यतः अन्य साहित्यिक विधाओं में केंद्रित है।
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एस० के० पोट्टेकाट: एस० के० पोट्टेकाट एक प्रसिद्ध मलयालम लेखक हैं, जिनका लेखन मुख्यतः यात्रा साहित्य और उपन्यासों पर केंद्रित है। उनका 'शिकार साहित्य' में कोई विशेष योगदान नहीं है।
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मधुकर उपाध्याय: मधुकर उपाध्याय का लेखन भी अन्य विषयों पर केंद्रित है और उन्हें 'शिकार साहित्य' के अग्रणी लेखक के रूप में नहीं पहचाना जाता है।
इस प्रकार, श्रीराम शर्मा का 'शिकार साहित्य' में योगदान उन्हें इस क्षेत्र का अग्रणी लेखक बनाता है, और यही कारण है कि विकल्प 2 सही उत्तर है।
प्रश्न 234
सुमेलित कीजिए -
(अ) रमा सिंह : (i) शिगाफ, शालभंजिका
(ब) मनीषा कुलश्रेष्ठ : (ii) गुलाब छड़ी, तुम लिलेहोगी सत्यभामा
(स) नीरजा माधव : (iii) कलिकथा : वाया बाईपास, शेष कादम्बरी
(द) अलका सरवागी : (iv) अभी ठहरो अंधी सदी, यमदीप
कूट -
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
सही उत्तर विकल्प 3 है। आइए देखें कि यह विकल्प क्यों सही है और अन्य विकल्प क्यों गलत हैं:
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(अ) रमा सिंह : (ii) गुलाब छड़ी, तुम लिलेहोगी सत्यभामा
रमा सिंह के लेखन में "गुलाब छड़ी" और "तुम लिलेहोगी सत्यभामा" शामिल हैं। यह सही मेल है, जो विकल्प 3 में दिया गया है। -
(ब) मनीषा कुलश्रेष्ठ : (i) शिगाफ, शालभंजिका
मनीषा कुलश्रेष्ठ के प्रसिद्ध कार्यों में "शिगाफ" और "शालभंजिका" शामिल हैं। यह मेल भी विकल्प 3 में सही दिया गया है। -
(स) नीरजा माधव : (iv) अभी ठहरो अंधी सदी, यमदीप
नीरजा माधव के लेखन में "अभी ठहरो अंधी सदी" और "यमदीप" शामिल हैं। यह मेल विकल्प 3 में सही है। -
(द) अलका सरवागी : (iii) कलिकथा : वाया बाईपास, शेष कादम्बरी
अलका सरवागी के प्रसिद्ध कार्य "कलिकथा : वाया बाईपास" और "शेष कादम्बरी" हैं। यह मेल भी विकल्प 3 में सही दिया गया है।
अब, अन्य विकल्पों की गलतियों को देखें:
- विकल्प 1: इसमें सभी मेल गलत हैं। उदाहरण के लिए, रमा सिंह को "शिगाफ, शालभंजिका" से जोड़ा गया है, जो गलत है।
- विकल्प 2: इसमें भी सभी मेल गलत हैं। उदाहरण के लिए, मनीषा कुलश्रेष्ठ को "गुलाब छड़ी, तुम लिलेहोगी सत्यभामा" से जोड़ा गया है, जो गलत है।
- विकल्प 4: इसमें भी सभी मेल गलत हैं। उदाहरण के लिए, रमा सिंह को "कलिकथा : वाया बाईपास, शेष कादम्बरी" से जोड़ा गया है, जो गलत है।
इस प्रकार, विकल्प 3 सही है क्योंकि यह सभी लेखकों और उनके कार्यों के सही मेल प्रस्तुत करता है।
प्रश्न 235
निम्नलिखित को सुमेलित कीजिए -
सूची-I : सूची-II
(अ) इन्दुमती : (i) रामचंद्र शुक्ल
(ब) ग्यारह वर्ष का समय : (ii) गिरिजादत्त बाजपेई
(स) दुलाई वाली : (iii) बंग महिला
(द) पंडित पंडितानी : (iv) किशोरी लाल गोस्वामी
कूट -
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
सही उत्तर विकल्प 4 है। आइए इसे विस्तार से समझते हैं:
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इन्दुमती : किशोरी लाल गोस्वामी (अ)(iv) - 'इन्दुमती' कहानी किशोरी लाल गोस्वामी द्वारा लिखी गई है। यह एक प्रसिद्ध हिंदी कहानी है जो उनके साहित्यिक योगदान का हिस्सा है।
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ग्यारह वर्ष का समय : रामचंद्र शुक्ल (ब)(i) - 'ग्यारह वर्ष का समय' रामचंद्र शुक्ल की रचना है। रामचंद्र शुक्ल हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण आलोचक और लेखक थे, और यह रचना उनके कार्यों में शामिल है।
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दुलाई वाली : बंग महिला (स)(iii) - 'दुलाई वाली' कहानी बंग महिला के नाम से प्रसिद्ध लेखिका द्वारा लिखी गई है। बंग महिला का असली नाम राजेन्द्रबाला घोष था, और यह कहानी उनके साहित्यिक योगदान का हिस्सा है।
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पंडित पंडितानी : गिरिजादत्त बाजपेई (द)(ii) - 'पंडित पंडितानी' गिरिजादत्त बाजपेई की रचना है। यह कहानी उनके साहित्यिक कार्यों में शामिल है और उनके लेखन शैली को दर्शाती है।
अब, आइए समझते हैं कि अन्य विकल्प क्यों गलत हैं:
- विकल्प 1: इसमें इन्दुमती को रामचंद्र शुक्ल से जोड़ा गया है, जो गलत है। इन्दुमती किशोरी लाल गोस्वामी की रचना है।
- विकल्प 2: इसमें ग्यारह वर्ष का समय को बंग महिला से जोड़ा गया है, जो गलत है। यह रामचंद्र शुक्ल की रचना है।
- विकल्प 3: इसमें ग्यारह वर्ष का समय को गिरिजादत्त बाजपेई से जोड़ा गया है, जो गलत है। यह रामचंद्र शुक्ल की रचना है।
इस प्रकार, विकल्प 4 सही है क्योंकि यह सभी जोड़ियों को सही ढंग से प्रस्तुत करता है।
प्रश्न 236
मेरे संग की औरतें' शीर्षक से युक्त संस्मरणात्मक लेख के लेखक कौन हैं ?
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उत्तर और व्याख्या
संस्मरणात्मक लेख 'मेरे संग की औरतें' के लेखक मृदुला गर्ग हैं, जो विकल्प 2 है। मृदुला गर्ग एक प्रसिद्ध भारतीय लेखिका हैं, जिन्होंने हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनके लेखन में सामाजिक मुद्दों और महिलाओं के जीवन की गहरी समझ देखने को मिलती है। 'मेरे संग की औरतें' उनके द्वारा लिखित एक ऐसा लेख है जो महिलाओं के अनुभवों और उनके संघर्षों को उजागर करता है।
अब हम अन्य विकल्पों पर विचार करते हैं:
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मृदुला सिन्हा: मृदुला सिन्हा एक प्रसिद्ध लेखिका और राजनीतिज्ञ थीं, जिन्होंने कई साहित्यिक कार्य किए हैं, लेकिन 'मेरे संग की औरतें' उनका लेख नहीं है।
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नासिरा शर्मा: नासिरा शर्मा एक जानी-मानी लेखिका हैं, जिन्होंने कई उपन्यास और कहानियाँ लिखी हैं। हालांकि, 'मेरे संग की औरतें' उनके द्वारा नहीं लिखा गया है।
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राजेन्द्र यादव: राजेन्द्र यादव हिंदी साहित्य के एक प्रमुख लेखक और संपादक थे, लेकिन 'मेरे संग की औरतें' उनका लेख नहीं है।
इस प्रकार, मृदुला गर्ग ही 'मेरे संग की औरतें' की सही लेखिका हैं, और विकल्प 2 सही उत्तर है।
प्रश्न 237
निम्न कृतियों में से कौन-सी अरुण कमल कृत काव्य-कृति नहीं है ?
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उत्तर और व्याख्या
अरुण कमल एक प्रसिद्ध हिंदी कवि हैं, जिनकी कई महत्वपूर्ण काव्य-कृतियाँ हैं। दिए गए विकल्पों में से हमें यह पहचानना है कि कौन-सी कृति अरुण कमल की नहीं है।
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अपनी केवल धार: यह अरुण कमल की एक प्रसिद्ध काव्य-कृति है। इस कृति में उनकी कविताओं का संग्रह है जो समाज और जीवन के विभिन्न पहलुओं को दर्शाती हैं।
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सबूत: यह भी अरुण कमल की एक काव्य-कृति है। इस संग्रह में उनकी कविताएँ सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर केंद्रित हैं।
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पुतली में संसार: यह भी अरुण कमल की काव्य-कृति है। इस कृति में उनकी कविताएँ मानवीय संवेदनाओं और अनुभवों को व्यक्त करती हैं।
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कविता और समय: यह अरुण कमल की काव्य-कृति नहीं है। यह एक अन्य लेखक की रचना हो सकती है या यह शीर्षक अरुण कमल के काव्य-संग्रहों में शामिल नहीं है।
इस प्रकार, दिए गए विकल्पों में से "कविता और समय" (विकल्प 4) अरुण कमल की काव्य-कृति नहीं है, और यही कारण है कि यह सही उत्तर है। अन्य सभी विकल्प अरुण कमल की कृतियाँ हैं, इसलिए वे इस प्रश्न के संदर्भ में सही उत्तर नहीं हो सकते।
प्रश्न 238
नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत कूट नग-पग तल में।
पीयूष स्रोत-सी बहा करो, जीवन के सुन्दर समतल में ।।'
प्रस्तुत पंक्तियाँ 'कामायनी' के किस सर्ग से ली गई हैं ?
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उत्तर और व्याख्या
प्रस्तुत पंक्तियाँ 'कामायनी' के 'लज्जा' सर्ग से ली गई हैं। 'कामायनी' जयशंकर प्रसाद की एक प्रसिद्ध महाकाव्यात्मक रचना है, जिसमें विभिन्न सर्गों के माध्यम से मानव जीवन के विभिन्न भावों और अवस्थाओं का चित्रण किया गया है।
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लज्जा (Option 3): 'लज्जा' सर्ग में नारी के गुणों और उसकी आंतरिक शक्ति का वर्णन किया गया है। इस सर्ग में नारी को श्रद्धा और विश्वास के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो जीवन के समतल में पीयूष स्रोत की तरह बहती है। इस प्रकार, यह पंक्तियाँ 'लज्जा' सर्ग से मेल खाती हैं, जहाँ नारी के इन गुणों का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है।
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श्रद्धा (Option 1): 'श्रद्धा' सर्ग में नारी के प्रति श्रद्धा और भक्ति का भाव प्रकट किया गया है, लेकिन प्रस्तुत पंक्तियों में जिस प्रकार से नारी के गुणों का वर्णन किया गया है, वह 'लज्जा' सर्ग के संदर्भ में अधिक उपयुक्त है।
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आशा (Option 2): 'आशा' सर्ग में जीवन में आशा और उम्मीद की भावना का वर्णन है। हालांकि, प्रस्तुत पंक्तियों में नारी के गुणों और उसकी आंतरिक शक्ति का वर्णन है, जो 'लज्जा' सर्ग से अधिक मेल खाता है।
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काम (Option 4): 'काम' सर्ग में प्रेम और कामना का वर्णन है। प्रस्तुत पंक्तियाँ नारी के गुणों और उसकी आंतरिक शक्ति पर केंद्रित हैं, जो 'लज्जा' सर्ग के संदर्भ में अधिक उपयुक्त हैं।
इस प्रकार, 'लज्जा' सर्ग (Option 3) को सही उत्तर के रूप में प्रस्तुत किया गया है, क्योंकि यह पंक्तियाँ नारी के गुणों और उसकी आंतरिक शक्ति का वर्णन करती हैं, जो 'लज्जा' सर्ग के भावों के अनुरूप हैं।
प्रश्न 239
रविन्द्रनाथ ठाकुर की प्रसिद्ध कविता 'आत्मप्राण' का बंगला से हिन्दी में अनुवाद किस प्रसिद्ध आलोचक ने किया है ?
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उत्तर और व्याख्या
रविन्द्रनाथ ठाकुर की प्रसिद्ध कविता 'आत्मप्राण' का बंगला से हिन्दी में अनुवाद आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने किया है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी एक प्रसिद्ध हिन्दी साहित्यकार और आलोचक थे, जिन्होंने बंगला साहित्य का गहन अध्ययन किया था। उनके द्वारा किए गए अनुवाद कार्यों में गहरी साहित्यिक समझ और भाषा पर पकड़ दिखाई देती है। उन्होंने बंगला साहित्य को हिन्दी पाठकों के लिए सुलभ और समझने योग्य बनाया, जिससे उनकी साहित्यिक प्रतिष्ठा और बढ़ी।
अब हम अन्य विकल्पों पर विचार करते हैं:
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डॉ० नगेन्द्र: डॉ० नगेन्द्र एक प्रसिद्ध हिन्दी आलोचक और साहित्यकार थे, लेकिन उनका मुख्य कार्यक्षेत्र हिन्दी साहित्य था, न कि बंगला साहित्य का अनुवाद। इसलिए, 'आत्मप्राण' के अनुवाद से उनका कोई संबंध नहीं है।
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डॉ० रामविलास शर्मा: डॉ० रामविलास शर्मा भी एक प्रमुख हिन्दी साहित्यकार और आलोचक थे, लेकिन उनका कार्यक्षेत्र भी मुख्यतः हिन्दी साहित्य तक ही सीमित था। उन्होंने बंगला से हिन्दी में अनुवाद कार्य नहीं किया।
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आचार्य रामचन्द्र शुक्ल: आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हिन्दी साहित्य के एक महान आलोचक थे, लेकिन उनका कार्यक्षेत्र भी हिन्दी साहित्य के इतिहास और आलोचना तक ही सीमित था। उन्होंने बंगला साहित्य का अनुवाद नहीं किया।
इस प्रकार, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का नाम सही विकल्प है क्योंकि उन्होंने बंगला साहित्य का हिन्दी में अनुवाद किया और 'आत्मप्राण' का अनुवाद भी उन्हीं के द्वारा किया गया है।
प्रश्न 240
हरिऔध' द्वारा रचित 'प्रियप्रवास' कितने सर्गों में विभक्त है ?
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उत्तर और व्याख्या
'प्रियप्रवास' हरिऔध द्वारा रचित एक महाकाव्य है जो हिंदी साहित्य में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह महाकाव्य सत्रह सर्गों में विभक्त है, जो इसे एक विस्तृत और गहन रचना बनाता है।
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विस्तृत व्याख्या:
'प्रियप्रवास' का मुख्य विषय भगवान श्रीकृष्ण का वृंदावन से मथुरा तक का प्रवास है। इस महाकाव्य में हरिऔध ने श्रीकृष्ण के जीवन के विभिन्न पहलुओं को सत्रह सर्गों में विभाजित करके प्रस्तुत किया है। प्रत्येक सर्ग में एक विशेष घटना या प्रसंग का वर्णन किया गया है, जो इस महाकाव्य की गहराई और विस्तार को दर्शाता है। सत्रह सर्गों का विभाजन इस महाकाव्य की संरचना को संतुलित और व्यवस्थित बनाता है, जिससे पाठक को श्रीकृष्ण के जीवन की यात्रा का संपूर्ण अनुभव प्राप्त होता है। -
अन्य विकल्पों की अस्वीकृति:
- विकल्प 1: नौ - 'प्रियप्रवास' नौ सर्गों में विभक्त नहीं है। नौ सर्गों में विभाजन इस महाकाव्य की गहराई और विस्तार को सही ढंग से प्रस्तुत नहीं कर सकता।
- विकल्प 2: सोलह - सोलह सर्गों का विभाजन भी इस महाकाव्य की पूर्णता को नहीं दर्शाता। हरिऔध ने सत्रह सर्गों के माध्यम से श्रीकृष्ण के जीवन की विभिन्न घटनाओं को विस्तार से वर्णित किया है।
- विकल्प 4: अठारह - अठारह सर्गों का विभाजन भी गलत है क्योंकि 'प्रियप्रवास' सत्रह सर्गों में ही विभक्त है। अठारह सर्गों का उल्लेख इस महाकाव्य के लिए सही नहीं है।
इस प्रकार, 'प्रियप्रवास' के सत्रह सर्गों में विभक्त होने का तथ्य इसे एक विशिष्ट और महत्वपूर्ण रचना बनाता है, और यही कारण है कि विकल्प 3 सही उत्तर है।