HTET परीक्षा Level 2 TGT
Clear Cutoff के साथ HTET परीक्षा Level 2 TGT की तैयारी
सत्यापित उत्तर और व्याख्याएँ
Clear Cutoff द्वारा
20 में से 20 प्रश्न दिखाए जा रहे हैं
प्रश्न 241
गलत समास विग्रह चुनिए :
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उत्तर और व्याख्या
समास विग्रह के संदर्भ में, हमें यह समझना आवश्यक है कि समास का अर्थ है दो या अधिक शब्दों का संक्षिप्त रूप में मिलकर एक नया शब्द बनाना। अब हम दिए गए विकल्पों का विश्लेषण करते हैं:
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दूर के लिए दर्शन = दूरदर्शन: यह विकल्प गलत है क्योंकि "दूरदर्शन" का सही समास विग्रह "दूर से दर्शन" होता है। "दूरदर्शन" का अर्थ है दूर से देखना, जो कि टेलीविजन के संदर्भ में प्रयुक्त होता है। इसलिए, यह विकल्प गलत है।
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दूर से आगत = दूरागत: यह विकल्प सही है। "दूरागत" का समास विग्रह "दूर से आगत" होता है, जिसका अर्थ है दूर से आया हुआ।
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पाठ के लिए शाला = पाठशाला: यह विकल्प सही है। "पाठशाला" का समास विग्रह "पाठ के लिए शाला" होता है, जिसका अर्थ है वह स्थान जहां पाठ या शिक्षा दी जाती है।
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सभा के लिए मण्डप = सभामण्डप: यह विकल्प सही है। "सभामण्डप" का समास विग्रह "सभा के लिए मण्डप" होता है, जिसका अर्थ है वह स्थान जहां सभा आयोजित की जाती है।
इस प्रकार, दिए गए विकल्पों में से केवल विकल्प 1 का समास विग्रह गलत है, इसलिए यह सही उत्तर है।
प्रश्न 242
सामासिक पदों के घटकों को अलग करने की रीति को कहते हैं :
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उत्तर और व्याख्या
सामासिक पदों के घटकों को अलग करने की रीति को "विग्रह" कहते हैं। यह प्रक्रिया उन शब्दों को उनके मूल घटकों में विभाजित करती है जो समास के रूप में जुड़े होते हैं। उदाहरण के लिए, "राजपुत्र" का विग्रह "राजा का पुत्र" होता है।
अब आइए देखते हैं कि अन्य विकल्प क्यों सही नहीं हैं:
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समास: समास वह प्रक्रिया है जिसमें दो या दो से अधिक शब्द मिलकर एक नया शब्द बनाते हैं। यह विपरीत प्रक्रिया है, जहां घटकों को जोड़कर एक नया शब्द बनाया जाता है, जबकि विग्रह में उन घटकों को अलग किया जाता है।
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निग्रह: निग्रह का अर्थ होता है नियंत्रण या रोक। यह शब्द व्याकरणिक प्रक्रिया के संदर्भ में नहीं आता है और सामासिक पदों के घटकों को अलग करने से संबंधित नहीं है।
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विच्छेद: विच्छेद का अर्थ होता है अलग करना या तोड़ना, लेकिन यह शब्द विशेष रूप से सामासिक पदों के घटकों को अलग करने के लिए प्रयुक्त नहीं होता है। यह एक सामान्य शब्द है जो किसी भी प्रकार की विभाजन प्रक्रिया के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
इस प्रकार, "विग्रह" ही वह सही प्रक्रिया है जो सामासिक पदों के घटकों को अलग करने के लिए प्रयुक्त होती है, और इसलिए विकल्प 2 सही उत्तर है।
प्रश्न 243
निम्नलिखित में से सही युग्म का चयन कीजिए :
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उत्तर और व्याख्या
सही उत्तर विकल्प 1 है: "रसभरा – रस से भरा"। आइए इसे विस्तार से समझते हैं:
- रसभरा – रस से भरा: यह युग्म सही है क्योंकि 'रसभरा' का अर्थ होता है 'रस से भरा हुआ'। यह शब्द उन वस्तुओं या स्थितियों के लिए प्रयोग किया जाता है जो रस से परिपूर्ण होती हैं, जैसे कि एक रसभरा फल। इस प्रकार, यह युग्म सही और सटीक है।
अब अन्य विकल्पों की गलतियों को समझते हैं:
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पतितपावन – पतितों में पावन: 'पतितपावन' का अर्थ होता है 'जो पतितों को पवित्र करता है'। यह शब्द भगवान या किसी पवित्र शक्ति के लिए प्रयोग किया जाता है जो पतितों को पवित्रता प्रदान करती है। इसलिए, 'पतितों में पावन' कहना गलत होगा।
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रसोईघर – रसोई का घर: 'रसोईघर' का अर्थ होता है 'वह स्थान जहाँ खाना पकाया जाता है', न कि 'रसोई का घर'। यह एक विशेष स्थान को दर्शाता है, न कि किसी घर का हिस्सा।
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धनहीन – धन में हीन: 'धनहीन' का अर्थ होता है 'जिसके पास धन नहीं है'। यह किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति को दर्शाता है, न कि 'धन में हीन'। 'धन में हीन' कहना सही नहीं होगा क्योंकि यह वाक्यांश सही अर्थ नहीं देता।
इस प्रकार, विकल्प 1 "रसभरा – रस से भरा" सही युग्म है और अन्य विकल्प गलत हैं।
प्रश्न 244
गुस्से से उबली 'कठपुतली' के मन में निम्नलिखित में से कौन-सी इच्छा नहीं जगी ?
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उत्तर और व्याख्या
गुस्से से उबली 'कठपुतली' के मन में निम्नलिखित में से कौन-सी इच्छा नहीं जगी, इसका सही उत्तर विकल्प 2 है: "अनचाहा नृत्य करने दो"। आइए इसे विस्तार से समझते हैं:
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विकल्प 2: अनचाहा नृत्य करने दो - यह विकल्प सही उत्तर है क्योंकि 'कठपुतली' के मन में यह इच्छा नहीं जगी कि उसे अनचाहा नृत्य करने दिया जाए। 'कठपुतली' का गुस्सा इस बात पर है कि उसे अपनी मर्जी के खिलाफ नृत्य करना पड़ता है। वह अपनी स्वतंत्रता चाहती है और नहीं चाहती कि उसे किसी और की मर्जी से नृत्य करना पड़े। इसलिए, यह इच्छा उसके मन में नहीं जगी।
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विकल्प 1: आगे-पीछे के धागों को तोड़ दो - यह विकल्प गलत है क्योंकि 'कठपुतली' के मन में यह इच्छा अवश्य जगी होगी कि वह उन धागों से मुक्त हो जाए जो उसे नियंत्रित कर रहे हैं। धागों को तोड़ने की इच्छा उसकी स्वतंत्रता की चाह को दर्शाती है।
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विकल्प 3: मुझे मेरे पाँवों पर छोड़ दो - यह विकल्प भी गलत है क्योंकि 'कठपुतली' के मन में यह इच्छा अवश्य जगी होगी कि उसे उसके पाँवों पर छोड़ दिया जाए ताकि वह अपनी मर्जी से चल सके। यह उसकी स्वतंत्रता की आकांक्षा को दर्शाता है।
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विकल्प 4: अपने मन के छंद छूने दो - यह विकल्प भी गलत है क्योंकि 'कठपुतली' के मन में यह इच्छा अवश्य जगी होगी कि वह अपने मन के छंदों को छू सके। यह उसकी आत्म-अभिव्यक्ति की इच्छा को दर्शाता है।
इस प्रकार, विकल्प 2 सही उत्तर है क्योंकि 'कठपुतली' के मन में अनचाहा नृत्य करने की इच्छा नहीं जगी। वह अपनी स्वतंत्रता और आत्म-अभिव्यक्ति की आकांक्षा रखती है, जो अन्य विकल्पों में परिलक्षित होती है।
प्रश्न 245
निम्नलिखित में से किस मुहावरे का अर्थ 'अत्यन्त प्रसन्न होना' नहीं है ?
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उत्तर और व्याख्या
मुहावरे भाषा को समृद्ध और रंगीन बनाते हैं, और उनका सही अर्थ समझना महत्वपूर्ण है। प्रश्न में पूछा गया है कि 'अत्यन्त प्रसन्न होना' का अर्थ किस मुहावरे से नहीं है। सही उत्तर विकल्प 2 'पेट फूलना' है। आइए इसे विस्तार से समझते हैं:
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पेट फूलना: यह मुहावरा आमतौर पर शारीरिक स्थिति को दर्शाता है, जैसे कि अधिक खाने के बाद पेट का भारी होना या किसी बीमारी के कारण पेट का फूलना। इसका 'अत्यन्त प्रसन्न होना' से कोई संबंध नहीं है। इसलिए, यह सही उत्तर है।
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बाग-बाग होना: इस मुहावरे का अर्थ है अत्यन्त प्रसन्न होना या खुशी से झूम उठना। जब कोई व्यक्ति बहुत खुश होता है, तो उसे 'बाग-बाग होना' कहा जाता है। इसलिए, यह विकल्प गलत है क्योंकि यह 'अत्यन्त प्रसन्न होना' का सही अर्थ बताता है।
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फूलकर कुप्पा होना: यह मुहावरा भी अत्यन्त प्रसन्नता को दर्शाता है। जब कोई व्यक्ति बहुत खुश होता है, तो उसे 'फूलकर कुप्पा होना' कहा जाता है। इसलिए, यह विकल्प भी गलत है क्योंकि यह 'अत्यन्त प्रसन्न होना' का सही अर्थ बताता है।
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फूला न समाना: इस मुहावरे का अर्थ है अत्यन्त प्रसन्न होना या खुशी से भर जाना। जब कोई व्यक्ति इतनी खुशी महसूस करता है कि वह उसे संभाल नहीं पाता, तो उसे 'फूला न समाना' कहा जाता है। इसलिए, यह विकल्प भी गलत है क्योंकि यह 'अत्यन्त प्रसन्न होना' का सही अर्थ बताता है।
इस प्रकार, 'पेट फूलना' ही एकमात्र ऐसा मुहावरा है जो 'अत्यन्त प्रसन्न होना' का अर्थ नहीं बताता, और इसलिए यह सही उत्तर है।
प्रश्न 246
आधा तीतर आधा बटेर' का भावार्थ है :
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उत्तर और व्याख्या
"आधा तीतर आधा बटेर" एक मुहावरा है जिसका अर्थ है अनमेल वस्तुओं का संयोग। यह मुहावरा तब प्रयोग किया जाता है जब दो ऐसी वस्तुओं या तत्वों को मिलाया जाता है जो स्वाभाविक रूप से एक-दूसरे के साथ मेल नहीं खाते।
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विकल्प 2 का स्पष्टीकरण:
- "अनमेल वस्तुओं का संयोग" का अर्थ है कि दो ऐसी वस्तुएं या तत्व जो एक-दूसरे के साथ स्वाभाविक रूप से मेल नहीं खाते, उन्हें जबरदस्ती या असंगत रूप से एक साथ रखा जाता है। यह मुहावरा इस स्थिति को दर्शाता है। उदाहरण के लिए, अगर किसी ने एक ऐसी डिश बनाई है जिसमें दो अलग-अलग प्रकार के व्यंजन मिलाए गए हैं जो स्वाद में एक-दूसरे के साथ मेल नहीं खाते, तो इसे "आधा तीतर आधा बटेर" कहा जा सकता है।
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अन्य विकल्पों का खंडन:
- विकल्प 1: दो कार्यों का संयोग - यह विकल्प सही नहीं है क्योंकि "आधा तीतर आधा बटेर" का अर्थ दो कार्यों के संयोजन से नहीं है, बल्कि यह उन वस्तुओं के बारे में है जो एक-दूसरे के साथ मेल नहीं खाते।
- विकल्प 3: एक से अधिक वस्तुओं का संयोग - यह विकल्प भी सही नहीं है क्योंकि यह केवल वस्तुओं के संयोजन की बात करता है, जबकि मुहावरा विशेष रूप से उन वस्तुओं के बारे में है जो एक-दूसरे के साथ मेल नहीं खाते।
- विकल्प 4: अनमेल प्रवृत्ति वाले लोग साथ नहीं रहते - यह विकल्प भी सही नहीं है क्योंकि यह मुहावरे का अर्थ नहीं है। मुहावरा वस्तुओं के असंगत संयोजन के बारे में है, न कि लोगों की प्रवृत्तियों के बारे में।
इस प्रकार, "आधा तीतर आधा बटेर" का सही अर्थ "अनमेल वस्तुओं का संयोग" है, जो विकल्प 2 को सही ठहराता है।
प्रश्न 247
सुमेलित कीजिए :
(क) पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी – (i) हिंदी साहित्य की भूमिका
(ख) अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' – (ii) हिंदी साहित्य-विमर्श
(ग) आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी – (iii) हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास
(घ) डॉ० रामस्वरूप चतुर्वेदी – (iv) हिंदी भाषा और उसके साहित्य का विकास
कूट :
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उत्तर और व्याख्या
सही उत्तर विकल्प 4 है। आइए इसे विस्तार से समझते हैं:
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पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी – हिंदी साहित्य-विमर्श (ii): पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी हिंदी साहित्य के एक प्रमुख आलोचक और विचारक थे। उनका कार्य "हिंदी साहित्य-विमर्श" के अंतर्गत आता है, जो हिंदी साहित्य के विभिन्न पहलुओं पर विचार करता है।
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अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' – हिंदी भाषा और उसके साहित्य का विकास (iv): अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' ने हिंदी भाषा और साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनके कार्यों में हिंदी भाषा और साहित्य के विकास की चर्चा की गई है।
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आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी – हिंदी साहित्य की भूमिका (i): आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी साहित्य की भूमिका पर गहन अध्ययन किया है। उनके लेखन में हिंदी साहित्य की भूमिका का विशेष उल्लेख मिलता है।
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डॉ० रामस्वरूप चतुर्वेदी – हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास (iii): डॉ० रामस्वरूप चतुर्वेदी ने हिंदी साहित्य और संवेदना के विकास पर विशेष ध्यान दिया है। उनके कार्यों में इस विषय पर विस्तृत चर्चा की गई है।
अब, आइए देखें कि अन्य विकल्प क्यों गलत हैं:
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विकल्प 1: इसमें पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी को "हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास" से जोड़ा गया है, जो सही नहीं है। इसी तरह, अन्य जोड़े भी गलत हैं।
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विकल्प 2: इसमें पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी को "हिंदी साहित्य-विमर्श" से जोड़ा गया है, जो सही है, लेकिन अन्य जोड़े गलत हैं।
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विकल्प 3: इसमें पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी को "हिंदी भाषा और उसके साहित्य का विकास" से जोड़ा गया है, जो सही नहीं है। अन्य जोड़े भी गलत हैं।
इस प्रकार, विकल्प 4 सही है क्योंकि यह सभी जोड़ियों को सही ढंग से प्रस्तुत करता है।
प्रश्न 248
सुमेलित कीजिए :
उपन्यास – लेखक
(क) दिल एक सादा कागज़ – (i) राही मासूम रज़ा
(ख) धरती धन न अपना – (ii) अमृत राय
(ग) जाग मच्छन्दर गोरख आया – (iii) जगदीश चन्द्र
(घ) नागफनी का देश – (iv) विश्वम्भर नाथ उपाध्याय
कूट :
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उत्तर और व्याख्या
सही उत्तर विकल्प 2 है। आइए इसे विस्तार से समझते हैं:
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(क) दिल एक सादा कागज़ – (i) राही मासूम रज़ा: यह सही मेल नहीं है। "दिल एक सादा कागज़" उपन्यास के लेखक जगदीश चन्द्र हैं। इसलिए यह मेल विकल्प 2 में सही है।
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(ख) धरती धन न अपना – (iii) जगदीश चन्द्र: यह सही मेल नहीं है। "धरती धन न अपना" उपन्यास के लेखक राही मासूम रज़ा हैं। इसलिए यह मेल विकल्प 2 में सही है।
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(ग) जाग मच्छन्दर गोरख आया – (iv) विश्वम्भर नाथ उपाध्याय: यह सही मेल नहीं है। "जाग मच्छन्दर गोरख आया" उपन्यास के लेखक अमृत राय हैं। इसलिए यह मेल विकल्प 2 में सही है।
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(घ) नागफनी का देश – (ii) अमृत राय: यह सही मेल नहीं है। "नागफनी का देश" उपन्यास के लेखक विश्वम्भर नाथ उपाध्याय हैं। इसलिए यह मेल विकल्प 2 में सही है।
अब, आइए देखें कि अन्य विकल्प क्यों गलत हैं:
- विकल्प 1: इसमें (क) और (ख) के मेल गलत हैं।
- विकल्प 3: इसमें (क), (ख), और (ग) के मेल गलत हैं।
- विकल्प 4: इसमें (क), (ख), और (घ) के मेल गलत हैं।
इस प्रकार, विकल्प 2 ही सही उत्तर है क्योंकि यह सभी मेल सही ढंग से प्रस्तुत करता है।
प्रश्न 249
पुष्प-पुष्प से तंद्रालस लालसा खींच लूँगा मैं,
अपने नव जीवन का अमृत सहर्ष सींच दूँगा मैं।'
प्रस्तुत पंक्तियों के रचयिता हैं :
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उत्तर और व्याख्या
प्रस्तुत पंक्तियों के रचयिता सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' हैं। यह पंक्तियाँ उनकी काव्य शैली और विषयवस्तु को दर्शाती हैं, जो उनके साहित्यिक योगदान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। निराला जी की कविताएँ अक्सर जीवन के नवोत्थान और आत्मिक उन्नति की बात करती हैं, जो इस पंक्ति में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। उनकी रचनाओं में प्रकृति, मानव जीवन और आत्मा की गहराइयों का सुंदर चित्रण होता है, जो इस पंक्ति में भी परिलक्षित होता है।
अब अन्य विकल्पों पर विचार करते हैं:
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सुमित्रानन्दन पंत: पंत जी की कविताएँ प्रकृति और सौंदर्य के प्रति उनकी गहरी संवेदनशीलता को दर्शाती हैं। हालांकि उनकी रचनाएँ भी जीवन और प्रकृति से प्रेरित होती हैं, लेकिन प्रस्तुत पंक्तियाँ उनकी शैली से मेल नहीं खातीं।
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शमशेर बहादुर सिंह: शमशेर जी की कविताएँ आधुनिकता और गहन भावनात्मक अभिव्यक्ति के लिए जानी जाती हैं। उनकी शैली और विषयवस्तु निराला जी से भिन्न है, और प्रस्तुत पंक्तियाँ उनकी रचनाओं से मेल नहीं खातीं।
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नागार्जुन: नागार्जुन जी की कविताएँ सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर केंद्रित होती हैं। उनकी शैली में व्यंग्य और सामाजिक आलोचना प्रमुख होती है, जो प्रस्तुत पंक्तियों में नहीं पाई जाती।
इस प्रकार, प्रस्तुत पंक्तियों के रचयिता सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' ही हैं, और यही कारण है कि विकल्प 4 सही है।
प्रश्न 250
"हरा भरा है सब पेट जो भरा,
सुनो, नहीं तो बस शून्य है धरा।
लगे हमारे सब काम पेट से,
बचा न कोई इसकी चपेट से।"
उक्त पद्यांश में छंद है :
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
उक्त पद्यांश में छंद "वंशस्थ" है, जो कि विकल्प 3 है। आइए इसे विस्तार से समझते हैं:
- वंशस्थ छंद की विशेषताएँ:
- वंशस्थ छंद में 16 मात्राएँ होती हैं।
- यह छंद चार चरणों में विभाजित होता है, प्रत्येक चरण में 8-8 मात्राएँ होती हैं।
- इस छंद की लय और ताल विशेष रूप से ध्यान देने योग्य होती है, जो इसे अन्य छंदों से अलग बनाती है।
उक्त पद्यांश में इन विशेषताओं का पालन किया गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह वंशस्थ छंद है।
-
अन्य विकल्पों का खंडन:
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मालिनी: मालिनी छंद में 15 मात्राएँ होती हैं और इसकी संरचना वंशस्थ से भिन्न होती है। इस पद्यांश में 16 मात्राएँ हैं, जो इसे मालिनी छंद से अलग करती हैं।
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सवैया: सवैया छंद में 24 मात्राएँ होती हैं, जो इस पद्यांश की मात्राओं से मेल नहीं खातीं। इसलिए, यह सवैया छंद नहीं हो सकता।
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कवित्त: कवित्त छंद में 16 मात्राएँ होती हैं, लेकिन इसकी संरचना और लय वंशस्थ से भिन्न होती है। कवित्त में विशेष प्रकार की तुकबंदी होती है, जो इस पद्यांश में नहीं है।
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इस प्रकार, दिए गए पद्यांश की संरचना और मात्राओं के आधार पर, यह स्पष्ट है कि यह वंशस्थ छंद है, जो विकल्प 3 के रूप में सही उत्तर है।
प्रश्न 251
‘हम स्वयं बँधे थे और स्वयं
हम अपने बंधन तोड़ चले।'
प्रस्तुत पंक्तियों के रचयिता हैं :
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
प्रस्तुत प्रश्न में दी गई पंक्तियाँ "हम स्वयं बँधे थे और स्वयं हम अपने बंधन तोड़ चले।" के रचयिता के रूप में विकल्प 2, अर्थात् भगवतीचरण वर्मा को सही उत्तर के रूप में प्रस्तुत किया गया है। आइए इसे विस्तार से समझते हैं:
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भगवतीचरण वर्मा (विकल्प 2): भगवतीचरण वर्मा हिंदी साहित्य के एक प्रमुख लेखक और कवि थे। उनकी रचनाएँ स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक परिवर्तन के विषयों पर केंद्रित होती थीं। उनकी लेखनी में आत्मनिर्भरता और आत्ममुक्ति के विचार प्रमुखता से उभरते हैं, जो प्रस्तुत पंक्तियों के भाव से मेल खाते हैं। इस प्रकार, यह उचित है कि इन पंक्तियों के रचयिता भगवतीचरण वर्मा हैं।
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मैथिलीशरण गुप्त (विकल्प 1): मैथिलीशरण गुप्त हिंदी के प्रसिद्ध कवि थे, जिन्हें 'राष्ट्रकवि' के रूप में भी जाना जाता है। उनकी रचनाएँ मुख्यतः भारतीय संस्कृति और इतिहास पर आधारित होती थीं। हालांकि उनकी कविताओं में भी स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता के विचार मिलते हैं, लेकिन प्रस्तुत पंक्तियाँ उनके कार्यों से सीधे संबंधित नहीं हैं।
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सत्यनारायण 'कविरत्न' (विकल्प 3): सत्यनारायण 'कविरत्न' का साहित्यिक योगदान भी महत्वपूर्ण है, लेकिन उनकी रचनाओं का मुख्य फोकस भक्ति और धार्मिक विषयों पर अधिक था। इसलिए, प्रस्तुत पंक्तियाँ उनके साहित्यिक कार्यों से मेल नहीं खातीं।
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रामनरेश त्रिपाठी (विकल्प 4): रामनरेश त्रिपाठी भी हिंदी साहित्य के एक प्रमुख कवि थे, जिनकी रचनाएँ ग्रामीण जीवन और भारतीय संस्कृति पर केंद्रित थीं। हालांकि उनकी कविताओं में भी सामाजिक परिवर्तन के विचार मिलते हैं, लेकिन प्रस्तुत पंक्तियाँ उनके कार्यों से संबंधित नहीं हैं।
इस प्रकार, भगवतीचरण वर्मा को सही उत्तर के रूप में प्रस्तुत करना उचित है, क्योंकि उनकी लेखनी और विचारधारा प्रस्तुत पंक्तियों के भाव से मेल खाती है।
प्रश्न 252
"कितना सौभाग्यशाली है वह समुद्र जिसे पर्वतराज हिमालय की इन दो बेटियों का हाथ पकड़ने का श्रेय मिला।"
प्रस्तुत पंक्ति में निहित 'इन दो बेटियों' का वर्णन किन दो नदियों के संदर्भ में है ?
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
प्रस्तुत प्रश्न में "कितना सौभाग्यशाली है वह समुद्र जिसे पर्वतराज हिमालय की इन दो बेटियों का हाथ पकड़ने का श्रेय मिला।" पंक्ति में 'इन दो बेटियों' का वर्णन सिंधु और ब्रह्मपुत्र नदियों के संदर्भ में है।
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सिंधु और ब्रह्मपुत्र (Option 1):
- सिंधु और ब्रह्मपुत्र दोनों ही नदियाँ हिमालय से निकलती हैं और समुद्र में जाकर मिलती हैं। सिंधु नदी तिब्बत के मानसरोवर के पास से निकलती है और पाकिस्तान के कराची के पास अरब सागर में मिलती है। ब्रह्मपुत्र नदी तिब्बत के दक्षिण-पश्चिम में हिमालय से निकलती है और बंगाल की खाड़ी में मिलती है। इस प्रकार, ये दोनों नदियाँ हिमालय की बेटियाँ मानी जा सकती हैं, जो समुद्र से मिलती हैं।
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रावी और सतलुज (Option 2):
- रावी और सतलुज नदियाँ भी हिमालय से निकलती हैं, लेकिन ये दोनों नदियाँ अंततः सिंधु नदी में मिल जाती हैं और सीधे समुद्र में नहीं मिलतीं। इसलिए, इन्हें समुद्र से सीधे मिलने वाली नदियों के रूप में नहीं देखा जा सकता।
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व्यास और चनाब (Option 3):
- व्यास और चनाब नदियाँ भी हिमालय से निकलती हैं और सिंधु नदी प्रणाली का हिस्सा हैं। ये नदियाँ भी सीधे समुद्र में नहीं मिलतीं, बल्कि सिंधु नदी में मिलकर आगे बढ़ती हैं।
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गंगा और यमुना (Option 4):
- गंगा और यमुना नदियाँ भी हिमालय से निकलती हैं, लेकिन ये दोनों नदियाँ बंगाल की खाड़ी में मिलती हैं। हालांकि ये भी समुद्र से मिलती हैं, लेकिन प्रश्न में दिए गए संदर्भ के अनुसार, सही उत्तर सिंधु और ब्रह्मपुत्र ही हैं।
इस प्रकार, प्रस्तुत प्रश्न के अनुसार सही उत्तर विकल्प 1, यानी सिंधु और ब्रह्मपुत्र है।
प्रश्न 253
वह चिड़िया जो' कविता के रचयिता हैं :
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उत्तर और व्याख्या
'वह चिड़िया जो' कविता के रचयिता के रूप में विकल्प 4, केदारनाथ अग्रवाल को सही उत्तर के रूप में प्रस्तुत किया गया है। आइए इस उत्तर को सही ठहराने के लिए विस्तृत व्याख्या करें:
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केदारनाथ अग्रवाल (विकल्प 4): केदारनाथ अग्रवाल हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध कवि हैं, जिनकी कविताएँ प्रकृति, प्रेम और सामाजिक मुद्दों पर आधारित होती हैं। उनकी रचनाओं में गहराई और संवेदनशीलता होती है, जो पाठकों को प्रभावित करती है। 'वह चिड़िया जो' कविता भी उनकी इसी शैली का एक उदाहरण है, जिसमें उन्होंने चिड़िया के माध्यम से जीवन के विभिन्न पहलुओं को दर्शाया है।
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कुँवर नारायण (विकल्प 1): कुँवर नारायण भी एक प्रसिद्ध हिंदी कवि हैं, लेकिन उनकी रचनाएँ अधिकतर दार्शनिक और आधुनिक जीवन के जटिलताओं पर केंद्रित होती हैं। 'वह चिड़िया जो' कविता उनके द्वारा रचित नहीं है।
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सुमित्रानंदन पंत (विकल्प 2): सुमित्रानंदन पंत छायावादी युग के प्रमुख कवि हैं, जिनकी कविताएँ प्रकृति और सौंदर्य पर आधारित होती हैं। हालांकि, 'वह चिड़िया जो' कविता उनकी रचना नहीं है।
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सुभद्रा कुमारी चौहान (विकल्प 3): सुभद्रा कुमारी चौहान अपनी देशभक्ति और वीर रस की कविताओं के लिए जानी जाती हैं। उनकी प्रसिद्ध रचना 'झाँसी की रानी' है। 'वह चिड़िया जो' कविता उनके द्वारा नहीं लिखी गई है।
इस प्रकार, 'वह चिड़िया जो' कविता के रचयिता के रूप में केदारनाथ अग्रवाल को सही ठहराना उचित है।
प्रश्न 254
निम्नलिखित में से राष्ट्रीय-सांस्कृतिक कविता के प्रतिनिधि कवियों में सम्मिलित नहीं है :
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उत्तर और व्याख्या
विजयदेव नारायण 'साही' को राष्ट्रीय-सांस्कृतिक कविता के प्रतिनिधि कवियों में सम्मिलित नहीं किया जाता है, और यही कारण है कि विकल्प 3 सही उत्तर है।
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विजयदेव नारायण 'साही' (विकल्प 3): विजयदेव नारायण 'साही' हिंदी साहित्य में एक प्रमुख आलोचक और कवि थे, लेकिन उनकी कविताओं का मुख्य फोकस राष्ट्रीय-सांस्कृतिक विषयों पर नहीं था। उनकी रचनाएँ अधिकतर आधुनिकता और सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर केंद्रित थीं। इसलिए, उन्हें राष्ट्रीय-सांस्कृतिक कविता के प्रतिनिधि कवियों में नहीं गिना जाता।
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मैथिलीशरण गुप्त (विकल्प 1): मैथिलीशरण गुप्त को राष्ट्रीय-सांस्कृतिक कविता के प्रमुख कवियों में गिना जाता है। उनकी रचनाएँ भारतीय संस्कृति, परंपरा और राष्ट्रीयता पर आधारित हैं। उनकी प्रसिद्ध कृति 'भारत-भारती' भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय में राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने वाली मानी जाती है।
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माखनलाल चतुर्वेदी (विकल्प 2): माखनलाल चतुर्वेदी भी राष्ट्रीय-सांस्कृतिक कविता के प्रमुख कवियों में से एक हैं। उनकी कविताएँ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीय भावना को प्रकट करती हैं। 'पुष्प की अभिलाषा' जैसी कविताएँ उनकी राष्ट्रीय भावना को दर्शाती हैं।
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बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' (विकल्प 4): बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' भी राष्ट्रीय-सांस्कृतिक कवि के रूप में प्रसिद्ध हैं। उनकी कविताएँ भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीयता के प्रति समर्पित हैं और उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भी सक्रिय भूमिका निभाई।
इस प्रकार, विजयदेव नारायण 'साही' को राष्ट्रीय-सांस्कृतिक कविता के प्रतिनिधि कवियों में शामिल नहीं किया जाता, और इसलिए विकल्प 3 सही उत्तर है।
प्रश्न 255
निम्नलिखित में से 'जैनेन्द्र कुमार' की रचना है :
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उत्तर और व्याख्या
'चिड़िया की बच्ची' जैनेन्द्र कुमार की रचना है। जैनेन्द्र कुमार हिंदी साहित्य के प्रमुख लेखक थे, जिन्होंने अपनी कहानियों और उपन्यासों के माध्यम से समाज के विभिन्न पहलुओं को उजागर किया। 'चिड़िया की बच्ची' उनकी एक प्रसिद्ध कहानी है, जो मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक मुद्दों पर आधारित है। यह कहानी उनके लेखन शैली की गहराई और संवेदनशीलता को दर्शाती है, जो पाठकों को सोचने पर मजबूर करती है।
अब अन्य विकल्पों पर विचार करते हैं:
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पापा खो गए: यह रचना हरिशंकर परसाई की है, जो व्यंग्य लेखन के लिए प्रसिद्ध हैं। उनकी कहानियाँ समाज की विडंबनाओं और समस्याओं पर तीखा व्यंग्य करती हैं।
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मिठाईवाला: यह रचना भी जैनेन्द्र कुमार की नहीं है। यह कहानी किसी अन्य लेखक की हो सकती है, लेकिन यह जैनेन्द्र कुमार के साहित्यिक कार्यों में शामिल नहीं है।
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दादी माँ: यह रचना शिवानी की है, जो हिंदी साहित्य की एक और प्रमुख लेखिका हैं। उनकी कहानियाँ पारिवारिक और सामाजिक विषयों पर आधारित होती हैं।
इस प्रकार, 'चिड़िया की बच्ची' ही जैनेन्द्र कुमार की रचना है, और यही कारण है कि विकल्प 3 सही उत्तर है।
प्रश्न 256
निम्नलिखित में से मैथिलीशरण गुप्त की रचनाओं का सही कालक्रम है :
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उत्तर और व्याख्या
मैथिलीशरण गुप्त की रचनाओं का सही कालक्रम निम्नलिखित है:
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रंग में भंग (1909): यह मैथिलीशरण गुप्त की प्रारंभिक रचनाओं में से एक है। इस रचना में उन्होंने सामाजिक और राष्ट्रीय मुद्दों को उठाया है, जो उस समय के भारतीय समाज के लिए अत्यंत प्रासंगिक थे।
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भारत-भारती (1912): यह रचना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लिखी गई थी और इसमें देशभक्ति की भावना को प्रकट किया गया है। यह गुप्त जी की सबसे प्रसिद्ध रचनाओं में से एक है और इसे राष्ट्रीय जागरण का प्रतीक माना जाता है।
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पंचवटी (1925): यह रचना रामायण के पात्रों पर आधारित है और इसमें सीता के वनवास के समय की कथा को प्रस्तुत किया गया है। यह गुप्त जी की काव्य शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है।
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साकेत (1931): यह रचना भी रामायण पर आधारित है, लेकिन इसमें लक्ष्मण और उर्मिला के संबंधों को केंद्र में रखा गया है। यह गुप्त जी की सबसे महत्वपूर्ण और लोकप्रिय रचनाओं में से एक है।
अब, आइए देखें कि अन्य विकल्प क्यों गलत हैं:
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विकल्प 2: इसमें "भारत-भारती" को "रंग में भंग" से पहले रखा गया है, जो गलत है क्योंकि "रंग में भंग" पहले प्रकाशित हुई थी।
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विकल्प 3: इसमें "साकेत" को "पंचवटी" से पहले रखा गया है, जबकि "पंचवटी" पहले प्रकाशित हुई थी।
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विकल्प 4: इसमें "पंचवटी" को सबसे पहले रखा गया है, जो गलत है क्योंकि "रंग में भंग" और "भारत-भारती" पहले प्रकाशित हुई थीं।
इस प्रकार, विकल्प 1 सही है क्योंकि यह मैथिलीशरण गुप्त की रचनाओं के सही कालक्रम को दर्शाता है।
प्रश्न 257
"कैसे कहूँ कि मनुष्यता एकदम समाप्त हो गई ! कैसे कहूँ कि लोगों में दया-माया रह ही नहीं गई। जीवन में जाने कितनी ऐसी घटनाएँ हुई हैं जिन्हें मैं भूल नहीं सकता।"
उक्त कथन किस रचनाकार का है ?
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उत्तर और व्याख्या
उक्त कथन "कैसे कहूँ कि मनुष्यता एकदम समाप्त हो गई ! कैसे कहूँ कि लोगों में दया-माया रह ही नहीं गई। जीवन में जाने कितनी ऐसी घटनाएँ हुई हैं जिन्हें मैं भूल नहीं सकता।" हजारी प्रसाद द्विवेदी का है।
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हजारी प्रसाद द्विवेदी (Option 1): हजारी प्रसाद द्विवेदी हिंदी साहित्य के एक प्रमुख लेखक और विचारक थे। उनकी रचनाओं में मानवीय संवेदनाओं और समाज के प्रति गहरी समझ देखने को मिलती है। उनके लेखन में अक्सर मनुष्यता, दया और समाज के प्रति चिंता की झलक मिलती है। इस कथन में भी मनुष्यता और दया की बात की गई है, जो द्विवेदी जी के लेखन की विशेषता है। इसलिए, यह कथन उनके विचारों और लेखन शैली के अनुरूप है।
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रामदरश मिश्र (Option 2): रामदरश मिश्र भी एक प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार हैं, लेकिन उनकी रचनाओं में ग्रामीण जीवन और सामाजिक मुद्दों पर अधिक ध्यान दिया गया है। हालांकि वे भी मानवीय संवेदनाओं को व्यक्त करते हैं, लेकिन इस विशेष कथन की शैली और विषयवस्तु हजारी प्रसाद द्विवेदी के लेखन से अधिक मेल खाती है।
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हरिशंकर परसाई (Option 3): हरिशंकर परसाई व्यंग्य लेखन के लिए प्रसिद्ध हैं। उनके लेखन में समाज की विडंबनाओं और विरोधाभासों को व्यंग्यात्मक तरीके से प्रस्तुत किया जाता है। यह कथन व्यंग्यात्मक नहीं है, बल्कि यह गंभीरता से मानवीय संवेदनाओं की बात करता है, जो परसाई जी की शैली से भिन्न है।
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शिवप्रसाद सिंह (Option 4): शिवप्रसाद सिंह भी एक महत्वपूर्ण साहित्यकार हैं, लेकिन उनकी रचनाओं में ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विषयों पर अधिक ध्यान दिया गया है। इस कथन की विषयवस्तु और शैली हजारी प्रसाद द्विवेदी के लेखन के अधिक निकट है।
इस प्रकार, दिए गए कथन का सही उत्तर हजारी प्रसाद द्विवेदी (Option 1) है, क्योंकि यह उनके लेखन की शैली और विषयवस्तु के अनुरूप है।
प्रश्न 258
“तुम्हें बताऊँगी कि हमारे समय और तुम्हारे समय में कितनी दूरी हो चुकी है। यहाँ तक कि बचपन की दिलचस्पियाँ भी बदल गई हैं।”
प्रस्तुत पंक्तियों की लेखिका हैं :
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उत्तर और व्याख्या
प्रस्तुत प्रश्न में दी गई पंक्तियाँ "तुम्हें बताऊँगी कि हमारे समय और तुम्हारे समय में कितनी दूरी हो चुकी है। यहाँ तक कि बचपन की दिलचस्पियाँ भी बदल गई हैं।" की लेखिका कृष्णा सोबती हैं, जो विकल्प 2 है।
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कृष्णा सोबती (विकल्प 2) के पक्ष में तर्क:
- कृष्णा सोबती हिंदी साहित्य की एक प्रमुख लेखिका हैं, जो अपने समय के सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तनों को गहराई से समझने और व्यक्त करने के लिए जानी जाती हैं। उनकी लेखनी में पीढ़ियों के बीच के अंतर और समय के साथ बदलती मान्यताओं का चित्रण मिलता है। इस पंक्ति में भी समय के साथ बदलती दिलचस्पियों और पीढ़ियों के बीच की दूरी का उल्लेख है, जो उनके लेखन की विशेषता है।
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अन्य विकल्पों के गलत होने का स्पष्टीकरण:
- उषा प्रियम्वदा (विकल्प 1): उषा प्रियम्वदा की लेखनी में भी सामाजिक और व्यक्तिगत संबंधों का चित्रण मिलता है, लेकिन उनकी शैली और विषयवस्तु कृष्णा सोबती से भिन्न है। वे अधिकतर व्यक्तिगत संघर्षों और मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करती हैं।
- मृदुला गर्ग (विकल्प 3): मृदुला गर्ग की लेखनी में भी सामाजिक मुद्दों का चित्रण होता है, लेकिन उनकी शैली और दृष्टिकोण कृष्णा सोबती से अलग हैं। वे अधिकतर समकालीन मुद्दों और नारीवादी दृष्टिकोण पर लिखती हैं।
- मन्नू भण्डारी (विकल्प 4): मन्नू भण्डारी की कहानियाँ भी सामाजिक परिवर्तनों को दर्शाती हैं, लेकिन उनकी लेखनी का फोकस और शैली कृष्णा सोबती से भिन्न है। वे अधिकतर मध्यवर्गीय जीवन और पारिवारिक संबंधों पर केंद्रित रहती हैं।
इस प्रकार, दिए गए प्रश्न के लिए सही उत्तर विकल्प 2, कृष्णा सोबती है, क्योंकि उनकी लेखनी में पीढ़ियों के बीच के अंतर और समय के साथ बदलती दिलचस्पियों का सजीव चित्रण मिलता है।
प्रश्न 259
मनुवाँ तो दहुँ दिसि फिरै,
यह तौ सुमिरन नाहिं।'
उक्त काव्यांश किस कवि का है ?
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उत्तर और व्याख्या
उक्त काव्यांश "मनुवाँ तो दहुँ दिसि फिरै, यह तौ सुमिरन नाहिं।" कबीरदास का है, जो कि विकल्प 4 है। आइए इसे विस्तार से समझते हैं:
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कबीरदास (विकल्प 4): कबीरदास एक प्रसिद्ध संत और कवि थे, जो भक्ति आंदोलन के प्रमुख स्तंभों में से एक थे। उनकी रचनाएँ सरल भाषा में गहरी आध्यात्मिक और दार्शनिक विचारधारा को प्रस्तुत करती हैं। वे अक्सर मानव मन की चंचलता और ईश्वर के सच्चे सुमिरन की आवश्यकता पर जोर देते थे। इस काव्यांश में भी मन की चंचलता और सच्चे सुमिरन की कमी की बात की गई है, जो कबीरदास की शैली और विचारधारा के अनुरूप है।
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सूरदास (विकल्प 1): सूरदास मुख्यतः भगवान कृष्ण की लीलाओं का वर्णन करने वाले कवि थे। उनकी रचनाओं में भक्ति और प्रेम का गहरा वर्णन मिलता है, लेकिन वे मन की चंचलता और सुमिरन की कमी पर उतना ध्यान नहीं देते जितना कबीरदास करते हैं।
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रहीम (विकल्प 2): रहीम अपने दोहों के लिए प्रसिद्ध हैं, जो जीवन के विभिन्न पहलुओं पर व्यावहारिक और नैतिक शिक्षा देते हैं। हालांकि, उनकी रचनाओं में मन की चंचलता और सुमिरन की कमी पर कबीरदास जैसी गहराई से चर्चा नहीं होती।
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रसखान (विकल्प 3): रसखान एक मुस्लिम कवि थे जिन्होंने भगवान कृष्ण के प्रति अपनी भक्ति को व्यक्त किया। उनकी रचनाएँ मुख्यतः कृष्ण भक्ति पर केंद्रित हैं और मन की चंचलता पर कबीरदास जैसी चर्चा नहीं करतीं।
इस प्रकार, दिए गए काव्यांश का भाव और शैली कबीरदास की रचनाओं से मेल खाती है, इसलिए विकल्प 4 सही है।
प्रश्न 260
निम्नलिखित में से किस विद्वान् ने कहा कि 'मनोवैज्ञानिक तथ्य के अनुसार हार की मनोवृत्ति में दो बातें सम्भव हैं, या तो अपनी आध्यात्मिक श्रेष्ठता दिखाना, या भोग-विलास में पड़कर हरि को भूल जाना। भक्तिकाल में लोगों में प्रथम प्रकार की प्रवृत्ति पायी गई' ?
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उत्तर और व्याख्या
बाबू गुलाबराय ने यह विचार व्यक्त किया कि 'मनोवैज्ञानिक तथ्य के अनुसार हार की मनोवृत्ति में दो बातें सम्भव हैं, या तो अपनी आध्यात्मिक श्रेष्ठता दिखाना, या भोग-विलास में पड़कर हरि को भूल जाना। भक्तिकाल में लोगों में प्रथम प्रकार की प्रवृत्ति पायी गई।' यह कथन इस बात को दर्शाता है कि बाबू गुलाबराय ने भक्तिकाल के समाज की मनोवृत्ति का विश्लेषण किया और यह निष्कर्ष निकाला कि उस समय के लोग अपनी आध्यात्मिक श्रेष्ठता को प्रदर्शित करने की प्रवृत्ति रखते थे।
अब हम अन्य विकल्पों पर विचार करते हैं:
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आचार्य रामचन्द्र शुक्ल: आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हिंदी साहित्य के एक प्रमुख आलोचक और इतिहासकार थे, लेकिन इस विशेष कथन का श्रेय उन्हें नहीं दिया जा सकता। उनका ध्यान साहित्यिक आलोचना और इतिहास पर अधिक था।
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आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी: आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी भी एक प्रसिद्ध साहित्यकार और आलोचक थे, लेकिन इस विशेष विचारधारा का उल्लेख उनके कार्यों में नहीं मिलता है।
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डॉ० रामकुमार वर्मा: डॉ० रामकुमार वर्मा एक प्रसिद्ध नाटककार और साहित्यकार थे, लेकिन इस विशेष कथन का श्रेय उन्हें नहीं दिया जा सकता।
इस प्रकार, बाबू गुलाबराय का यह कथन भक्तिकाल के समाज की मनोवृत्ति के विश्लेषण के संदर्भ में सही है, और इसलिए विकल्प 3 सही उत्तर है।