HTET परीक्षा Level 3 PGT
Clear Cutoff के साथ HTET परीक्षा Level 3 PGT की तैयारी
सत्यापित उत्तर और व्याख्याएँ
Clear Cutoff द्वारा
20 में से 20 प्रश्न दिखाए जा रहे हैं
प्रश्न 301
Choose the word that is the antonym of the underlined word :
'People tend to avoid loquacious people.'
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उत्तर और व्याख्या
The correct answer is Option 2: Reticent. Here's why:
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Loquacious means tending to talk a great deal; talkative. The antonym of this word would be someone who is not talkative, or who is reserved in speech.
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Reticent means not revealing one's thoughts or feelings readily; reserved or taciturn. This is the direct opposite of loquacious, making it the correct antonym.
Now, let's examine why the other options are incorrect:
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Garrulous: This word means excessively talkative, especially on trivial matters. It is a synonym of loquacious, not an antonym.
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Fluent: This word means able to express oneself easily and articulately. While a fluent person might talk a lot, fluency itself doesn't necessarily imply excessive talkativeness. It focuses on the ease of speaking, not the quantity. Therefore, it's not an antonym of loquacious.
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Glib: This word means fluent and voluble but insincere and shallow. While a glib person might be talkative, the emphasis is on the insincerity and superficiality of their speech, not simply the amount they talk. It's not a direct antonym of loquacious, which simply refers to being talkative.
प्रश्न 302
In his extract from Heaven Lake, a travelogue, Vikram Seth recounts his visit to two sacred places in Kathmandu. They are :
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उत्तर और व्याख्या
In Vikram Seth's extract from Heaven Lake, he recounts his visit to Kathmandu and specifically mentions visiting two sacred places: Pashupatinath and Baudhnath.
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Why Option 2 (Pashupatinath and Baudhnath) is correct: The text explicitly describes Seth's experiences and observations at both Pashupatinath, a significant Hindu temple, and Baudhnath, a large Buddhist stupa. He details the atmosphere, rituals, and the people he encountered at these locations, making them central to his narrative of Kathmandu.
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Why Option 1 (Sarnath and Sanchi) is incorrect: Sarnath and Sanchi are important Buddhist sites, but they are located in India, not Kathmandu, Nepal. Vikram Seth's extract focuses on his experiences in Kathmandu.
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Why Option 3 (Swayambhunath and Kopan) is incorrect: While Swayambhunath is a significant Buddhist stupa in Kathmandu and a possible contender, Kopan Monastery, while also in the Kathmandu Valley, is not as prominently featured in the extract from Heaven Lake as Baudhnath is. The text emphasizes Pashupatinath and Baudhnath.
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Why Option 4 (Nagarkot and Narayanhiti) is incorrect: Nagarkot is known for its views of the Himalayas, and Narayanhiti was the former royal palace. While they are places of interest in Nepal, they are not the two sacred places that Vikram Seth specifically recounts visiting in his extract from Heaven Lake. The extract focuses on religious sites, and neither Nagarkot nor Narayanhiti fit that description as prominently as Pashupatinath and Baudhnath.
प्रश्न 303
Which one among the following industries is the maximum consumer of water in India?
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उत्तर और व्याख्या
Thermal Power plants are the maximum consumer of water in India primarily because they use vast quantities of water for cooling purposes. The process of generating electricity in thermal power plants involves burning fuel (coal, natural gas, etc.) to produce heat, which then converts water into steam. This high-pressure steam drives turbines connected to generators, producing electricity. After passing through the turbines, the steam needs to be cooled and condensed back into water to be reused in the cycle. This cooling process requires a massive amount of water.
Here's why the other options are incorrect:
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Iron and steel: While the iron and steel industry does consume a significant amount of water for various processes like cooling, cleaning, and processing raw materials, the sheer volume of water required for cooling in thermal power plants surpasses the water needs of iron and steel production.
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Paper and pulp: The paper and pulp industry is also a water-intensive industry, using water for pulping, bleaching, and washing processes. However, the water consumption is less than that of thermal power plants because the cooling requirements are not as extensive.
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Textiles: The textile industry uses water for dyeing, washing, and finishing processes. While these processes require a considerable amount of water, the overall consumption is less than that of thermal power plants, which need water continuously for cooling to maintain efficient electricity generation.
Therefore, due to the immense cooling requirements for steam condensation, Thermal Power is the industry that consumes the maximum amount of water in India.
भारत में, निम्नलिखित उद्योगों में से कौन-सा उद्योग पानी का सर्वाधिक उपभोक्ता है ?
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उत्तर और व्याख्या
तापीय ऊर्जा उद्योग भारत में पानी का सर्वाधिक उपभोक्ता है क्योंकि:
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तापीय ऊर्जा उत्पादन में पानी की भारी मात्रा में आवश्यकता: तापीय ऊर्जा संयंत्रों (Thermal Power Plants) में कोयला, गैस या परमाणु ईंधन जलाकर पानी को भाप में बदला जाता है। यह भाप टर्बाइनों को चलाती है, जिससे बिजली उत्पन्न होती है। इस प्रक्रिया में, पानी का उपयोग शीतलक (Coolant) के रूप में भी किया जाता है ताकि संयंत्र के उपकरणों को ठंडा रखा जा सके। भाप बनाने और शीतलन दोनों प्रक्रियाओं में पानी की बहुत अधिक मात्रा की आवश्यकता होती है।
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अन्य उद्योगों की तुलना में अधिक पानी की खपत: लौह एवं इस्पात, कागज एवं लुग्दी, और वस्त्र उद्योग भी पानी का उपयोग करते हैं, लेकिन तापीय ऊर्जा उद्योग की तुलना में उनकी पानी की खपत काफी कम होती है।
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शीतलन प्रक्रिया में पानी का वाष्पीकरण: तापीय ऊर्जा संयंत्रों में शीतलन प्रक्रिया के दौरान बड़ी मात्रा में पानी वाष्पीकृत हो जाता है, जिससे पानी की खपत और बढ़ जाती है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
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लौह एवं इस्पात: लौह एवं इस्पात उद्योग में पानी का उपयोग इस्पात बनाने की प्रक्रिया में होता है, लेकिन यह तापीय ऊर्जा उद्योग की तुलना में कम होता है।
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कागज एवं लुग्दी: कागज एवं लुग्दी उद्योग में पानी का उपयोग लुग्दी बनाने और कागज बनाने की प्रक्रिया में होता है, लेकिन यह तापीय ऊर्जा उद्योग की तुलना में कम होता है।
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वस्त्र: वस्त्र उद्योग में पानी का उपयोग रंगाई और धुलाई जैसी प्रक्रियाओं में होता है, लेकिन यह तापीय ऊर्जा उद्योग की तुलना में बहुत कम होता है।
इसलिए, तापीय ऊर्जा उद्योग भारत में पानी का सर्वाधिक उपभोक्ता है।
प्रश्न 304
तेरे दिमाग में तो लोहा भरा है! विद्या का ताप कहाँ लगेगा इसमें ।' त्रिलोक सिंह के इस कथन को लेखक ने क्या कहा है ?
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उत्तर और व्याख्या
'जबान का चाबुक' त्रिलोक सिंह के कथन को लेखक द्वारा कहे जाने का सबसे उपयुक्त कारण यह है कि यह कथन कठोर और व्यंग्यात्मक है। "तेरे दिमाग में तो लोहा भरा है! विद्या का ताप कहाँ लगेगा इसमें" यह वाक्य सीधे तौर पर बच्चे की बुद्धि को कम आंक रहा है और उसे ताना मार रहा है। 'जबान का चाबुक' एक ऐसा मुहावरा है जो कठोर और चुभने वाली बातों को दर्शाता है, जो किसी को मानसिक रूप से आहत कर सकती हैं। त्रिलोक सिंह का कथन ठीक इसी प्रकार का है, इसलिए लेखक ने इसे 'जबान का चाबुक' कहा।
अब अन्य विकल्पों पर विचार करते हैं:
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सर्जन की चमक: 'सर्जन की चमक' का अर्थ है किसी कार्य को कुशलतापूर्वक और निपुणता से करना। त्रिलोक सिंह के कथन में ऐसी कोई कुशलता या निपुणता नहीं है; यह केवल एक कठोर टिप्पणी है। इसलिए यह विकल्प गलत है।
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जबान की धार: 'जबान की धार' का अर्थ है बोलने में तेज होना या वाक्पटु होना। त्रिलोक सिंह का कथन तेज तो है, लेकिन इसका उद्देश्य वाक्पटुता दिखाना नहीं, बल्कि बच्चे को नीचा दिखाना है। इसलिए यह विकल्प भी गलत है।
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जबान की तलवार: 'जबान की तलवार' का अर्थ है ऐसी बातें जो बहुत तीखी और हानिकारक हों। जबकि त्रिलोक सिंह का कथन हानिकारक तो है, 'जबान का चाबुक' अधिक सटीक रूप से उस कठोरता और व्यंग्य को दर्शाता है जो इस कथन में निहित है। 'तलवार' की तुलना में 'चाबुक' अधिक व्यक्तिगत और सीधा प्रहार करता है, जो इस कथन के भाव को बेहतर ढंग से व्यक्त करता है। इसलिए यह विकल्प भी गलत है।
अतः, 'जबान का चाबुक' ही त्रिलोक सिंह के कथन के लिए सबसे उपयुक्त वर्णन है।
प्रश्न 305
तंग आ गया हूँ/बड़ों की अल्पता से/जी रहा हूँ देख कर छोटों की बड़ाई, प्रसिद्ध काव्य पंक्तियों के रचयिता कवि हैं :
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उत्तर और व्याख्या
उमाशंकर जोशी ही इन काव्य पंक्तियों के रचयिता हैं, इसलिए विकल्प 4 सही है।
विकल्प 4 (उमाशंकर जोशी) सही क्यों है:
उमाशंकर जोशी गुजराती साहित्य के एक प्रतिष्ठित कवि और लेखक थे। उनकी रचनाओं में सामाजिक और मानवीय मूल्यों पर गहरा चिंतन मिलता है। दी गई काव्य पंक्तियाँ, "तंग आ गया हूँ/बड़ों की अल्पता से/जी रहा हूँ देख कर छोटों की बड़ाई," उनके काव्य दर्शन को दर्शाती हैं। ये पंक्तियाँ समाज में मूल्यों के पतन और छोटे लोगों द्वारा बड़े लोगों को पछाड़ देने की स्थिति पर निराशा व्यक्त करती हैं, जो उमाशंकर जोशी की रचनाओं में अक्सर पाया जाता है। उनकी लेखन शैली और विषय-वस्तु इन पंक्तियों के भावों से मेल खाती है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
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विकल्प 1 (कुँवर नारायण): कुँवर नारायण हिंदी साहित्य के एक महत्वपूर्ण कवि हैं, लेकिन उनकी रचनाएँ आमतौर पर आधुनिकता, दर्शन और मानवीय संबंधों की जटिलताओं पर केंद्रित होती हैं। दी गई काव्य पंक्तियों का विषय और शैली उनकी रचनाओं से मेल नहीं खाते।
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विकल्प 2 (राजेश जोशी): राजेश जोशी समकालीन हिंदी कविता के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। उनकी कविताएँ सामाजिक अन्याय, बाल श्रम और राजनीतिक मुद्दों पर केंद्रित होती हैं। दी गई काव्य पंक्तियों का विषय उनकी रचनाओं से थोड़ा अलग है।
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विकल्प 3 (आलोक धन्वा): आलोक धन्वा अपनी लंबी कविताओं और सामाजिक चेतना के लिए जाने जाते हैं। उनकी कविताएँ युवा पीढ़ी और सामाजिक बदलावों पर केंद्रित होती हैं। दी गई काव्य पंक्तियों का विषय उनकी रचनाओं से पूरी तरह मेल नहीं खाता।
इसलिए, उमाशंकर जोशी ही इन काव्य पंक्तियों के रचयिता हैं, यह सबसे उपयुक्त और सही उत्तर है।
प्रश्न 306
मियाँ नसीरुद्दीन' शब्द-चित्र किस संग्रह में संकलित है ?
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उत्तर और व्याख्या
'मियाँ नसीरुद्दीन' शब्द-चित्र 'हम-हशमत' संग्रह में संकलित है।
Option 1 सही क्यों है:
कृष्णा सोबती द्वारा रचित 'मियाँ नसीरुद्दीन' नामक शब्द-चित्र उनके प्रसिद्ध संग्रह 'हम-हशमत' में प्रकाशित हुआ है। यह संग्रह विभिन्न व्यक्तियों के रेखाचित्रों का संकलन है, जिनमें मियाँ नसीरुद्दीन का चरित्र भी शामिल है। 'हम-हशमत' कृष्णा सोबती की एक महत्वपूर्ण कृति है और 'मियाँ नसीरुद्दीन' इसी का एक अभिन्न हिस्सा है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
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ज़िंदगीनामा: यह कृष्णा सोबती का एक उपन्यास है, न कि शब्द-चित्रों का संग्रह। इसमें मियाँ नसीरुद्दीन का शब्द-चित्र शामिल नहीं है।
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शब्दों के आलोक में: यह एक अलग कृति है और इसमें 'मियाँ नसीरुद्दीन' शब्द-चित्र संकलित नहीं है।
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दिलोदानिश: यह भी कृष्णा सोबती का एक उपन्यास है, शब्द-चित्रों का संग्रह नहीं। इसलिए, इसमें 'मियाँ नसीरुद्दीन' का शब्द-चित्र नहीं पाया जाता।
इसलिए, 'हम-हशमत' ही एकमात्र ऐसा विकल्प है जो 'मियाँ नसीरुद्दीन' शब्द-चित्र के संग्रह के रूप में सही है।
प्रश्न 307
हरिनी के नैंनानु तें हरिनी के ये नैन'
- उक्त काव्य पंक्ति में किन अलंकारों का प्रयोग हुआ है ?
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उत्तर और व्याख्या
'हरिनी के नैंनानु तें हरिनी के ये नैन' पंक्ति में यमक और प्रतीप अलंकार हैं। इसलिए विकल्प 4 सही है।
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यमक: यहाँ 'हरिनी' शब्द दो बार आया है। पहले 'हरिनी' का अर्थ हिरण है, जबकि दूसरे 'हरिनी' का अर्थ हिरणी के समान सुंदर नेत्रों वाली नायिका है। जब एक शब्द दो या दो से अधिक बार आए और हर बार उसका अर्थ भिन्न हो, तो यमक अलंकार होता है।
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प्रतीप: प्रतीप अलंकार में उपमान को उपमेय बना दिया जाता है। यहाँ हिरणी के नेत्रों को नायिका के नेत्रों के समान न बताकर, नायिका के नेत्रों को हिरणी के नेत्रों के समान बताया जा रहा है। अर्थात उपमान (हिरणी के नेत्र) को उपमेय (नायिका के नेत्र) के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसलिए यहाँ प्रतीप अलंकार है।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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विकल्प 1 (यमक - श्लेष): यमक तो है, लेकिन श्लेष नहीं है। श्लेष अलंकार में एक शब्द के कई अर्थ होते हैं, जो यहाँ नहीं है।
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विकल्प 2 (यमक - उपमा): यमक तो है, लेकिन उपमा नहीं है। उपमा अलंकार में दो वस्तुओं की समानता बताई जाती है, जबकि यहाँ उपमान को उपमेय बना दिया गया है, जो प्रतीप अलंकार का लक्षण है।
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विकल्प 3 (यमक - वक्रोक्ति): यमक तो है, लेकिन वक्रोक्ति नहीं है। वक्रोक्ति अलंकार में कहने वाला कुछ और अर्थ समझता है और सुनने वाला कुछ और, जो यहाँ नहीं है।
अतः, 'हरिनी के नैंनानु तें हरिनी के ये नैन' पंक्ति में यमक और प्रतीप अलंकार हैं, इसलिए विकल्प 4 (यमक - प्रतीप) सही उत्तर है।
प्रश्न 308
"प्रभु प्रलाप सुनि कान, बिकल भए बानर निकर।
आइ गयउ हनुमान जिमि करुना मुँह बीर रस ।।"
उक्त छंद का प्रकार है :
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उत्तर और व्याख्या
सोरठा
व्याख्या:
यह छंद सोरठा है, इसका कारण यह है कि सोरठा दोहे का उल्टा होता है। दोहे के पहले और तीसरे चरण में 13-13 मात्राएँ होती हैं, जबकि दूसरे और चौथे चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं। सोरठा में, पहले और तीसरे चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं, और दूसरे और चौथे चरण में 13-13 मात्राएँ होती हैं।
दिए गए छंद में:
- पहला चरण: "प्रभु प्रलाप सुनि कान" - 11 मात्राएँ
- दूसरा चरण: "बिकल भए बानर निकर" - 13 मात्राएँ
- तीसरा चरण: "आइ गयउ हनुमान" - 11 मात्राएँ
- चौथा चरण: "जिमि करुना मुँह बीर रस" - 13 मात्राएँ
मात्राओं का यह क्रम सोरठा छंद की परिभाषा के अनुरूप है।
अन्य विकल्पों की अस्वीकृति:
- दोहा: दोहे में पहले और तीसरे चरण में 13 मात्राएँ और दूसरे और चौथे चरण में 11 मात्राएँ होती हैं, जो कि दिए गए छंद में नहीं है।
- रोला: रोला एक सम मात्रिक छंद है जिसमें प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं, जो कि दिए गए छंद में नहीं है।
- उल्लाला: उल्लाला एक विषम मात्रिक छंद है जिसमें पहले और तीसरे चरण में 15 मात्राएँ और दूसरे और चौथे चरण में 13 मात्राएँ होती हैं, जो कि दिए गए छंद में नहीं है।
इसलिए, मात्राओं की गणना और छंद की परिभाषा के आधार पर, यह स्पष्ट है कि दिया गया छंद सोरठा है।
प्रश्न 309
जकी' उपनाम से हिन्दी के कौन-से कवि उर्दू में लिखते थे ?
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उत्तर और व्याख्या
जगन्नाथ दास 'रत्नाकर' 'जकी' उपनाम से हिन्दी के कवि थे जो उर्दू में भी लिखते थे। इसलिए विकल्प 3 सही है।
अन्य विकल्प गलत हैं क्योंकि:
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सत्यनारायण 'कविरत्न' ब्रजभाषा के कवि थे और मुख्य रूप से हिंदी में ही लिखते थे। उनका उर्दू लेखन के लिए 'जकी' उपनाम का प्रयोग ज्ञात नहीं है।
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श्रीधर पाठक खड़ी बोली हिंदी के महत्वपूर्ण कवि थे, लेकिन 'जकी' उपनाम से उर्दू में लिखने का कोई प्रमाण नहीं मिलता।
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राधाचरण गोस्वामी भी हिंदी साहित्यकार थे, लेकिन 'जकी' उपनाम से उर्दू में लिखने के लिए वे प्रसिद्ध नहीं हैं।
अतः, केवल जगन्नाथ दास 'रत्नाकर' ही 'जकी' उपनाम से उर्दू में लिखते थे, इसलिए विकल्प 3 सही है।
प्रश्न 310
निम्न में से कौन-सा कथन असंगत है ?
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उत्तर और व्याख्या
Option 3 असंगत है क्योंकि 'वातायन' और 'नीलम देश की राजकन्या' जैनेंद्र के प्रमुख उपन्यास नहीं हैं। 'वातायन' जैनेंद्र का उपन्यास है, लेकिन 'नीलम देश की राजकन्या' जैनेंद्र कुमार की रचना नहीं है, बल्कि यह जैनेंद्र कुमार की कहानियों का एक संग्रह है। इसलिए, यह कथन असंगत है कि ये दोनों उनके प्रमुख उपन्यास हैं।
अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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जैनेंद्र की पहचान हिंदी साहित्य में एक गंभीर कथाकार एवं चिंतक के रूप में है: यह कथन सत्य है। जैनेंद्र कुमार हिंदी साहित्य में एक गंभीर कथाकार और विचारक के रूप में जाने जाते हैं। उनकी रचनाओं में मानव मन और समाज के गंभीर विषयों पर विचार किया गया है।
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साहित्य का श्रेय और प्रेय इनका विचार प्रधान निबंध संग्रह है: यह कथन भी सत्य है। 'साहित्य का श्रेय और प्रेय' जैनेंद्र कुमार का एक प्रसिद्ध निबंध संग्रह है जिसमें साहित्य के उद्देश्यों और मूल्यों पर विचार किया गया है।
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जैनेंद्र का जन्म सन् 1905 में तथा निधन 1990 में हुआ: यह कथन भी सत्य है। जैनेंद्र कुमार का जन्म 1905 में हुआ था और उनकी मृत्यु 1990 में हुई थी।
इसलिए, केवल Option 3 असंगत है क्योंकि इसमें 'नीलम देश की राजकन्या' को उपन्यास बताया गया है, जबकि यह कहानियों का संग्रह है।
प्रश्न 311
द डायरी ऑफ द यंग गर्ल' शीर्षक से अंग्रेज़ी में 1952 में प्रकाशित ऐन फ्रैंक की डायरी मूलतः किस भाषा में प्रकाशित हुई थी ?
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उत्तर और व्याख्या
डच भाषा में
व्याख्या:
'द डायरी ऑफ द यंग गर्ल' शीर्षक से अंग्रेज़ी में 1952 में प्रकाशित ऐन फ्रैंक की डायरी मूलतः डच भाषा में प्रकाशित हुई थी। ऐन फ्रैंक एक जर्मन-यहूदी लड़की थी जो द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाज़ी उत्पीड़न से बचने के लिए अपने परिवार के साथ नीदरलैंड में छिप गई थी। उसने अपनी डायरी डच भाषा में लिखी थी, जिसमें उसने अपने अनुभवों, विचारों और भावनाओं को व्यक्त किया था। डायरी को युद्ध के बाद उसके पिता, ओटो फ्रैंक द्वारा प्रकाशित किया गया था।
अन्य विकल्प गलत हैं क्योंकि:
- इतालवी भाषा में: ऐन फ्रैंक ने अपनी डायरी इतालवी भाषा में नहीं लिखी थी।
- स्पेनिश भाषा में: ऐन फ्रैंक ने अपनी डायरी स्पेनिश भाषा में नहीं लिखी थी।
- ग्रीक भाषा में: ऐन फ्रैंक ने अपनी डायरी ग्रीक भाषा में नहीं लिखी थी।
इसलिए, सही उत्तर विकल्प 4 है, जो कि डच भाषा है।
प्रश्न 312
असंगत शब्द-युग्म का चयन कीजिए :
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उत्तर और व्याख्या
शृंगार रस मण्डन - नाभादास असंगत शब्द-युग्म है क्योंकि 'शृंगार रस मण्डन' के रचनाकार नाभादास नहीं, बल्कि गोस्वामी विट्ठलनाथ हैं।
अन्य विकल्प इसलिए गलत हैं:
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दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता - गोकुलनाथ: यह युग्म सही है। 'दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता' गोकुलनाथ द्वारा रचित एक महत्वपूर्ण कृति है।
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वैताल पच्चीसी - सुरति मिश्र: यह युग्म भी सही है। 'वैताल पच्चीसी' सुरति मिश्र की प्रसिद्ध रचना है।
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अगहन माहात्म्य - बैकुण्ठमणि शुक्ल: यह युग्म भी सही है। 'अगहन माहात्म्य' बैकुण्ठमणि शुक्ल द्वारा लिखी गई है।
इसलिए, केवल विकल्प 3 गलत है, क्योंकि 'शृंगार रस मण्डन' के लेखक नाभादास नहीं हैं।
प्रश्न 313
ऐ जीवन के पारावार' बादल-राग कविता में उक्त संबोधन किसके लिए किया गया है ?
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उत्तर और व्याख्या
'ऐ जीवन के पारावार' बादल-राग कविता में उक्त संबोधन बादल के लिए किया गया है, इसका विस्तृत स्पष्टीकरण इस प्रकार है:
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ऑप्शन 2 सही क्यों है: कविता 'बादल-राग' में, बादल को 'जीवन के पारावार' कहकर संबोधित किया गया है। 'पारावार' शब्द का अर्थ है 'समुद्र' या 'असीम विस्तार'। बादल को जीवन का पारावार इसलिए कहा गया है क्योंकि बादल ही जीवन के लिए आवश्यक जल का स्रोत है। बादल वर्षा करके धरती को जीवन प्रदान करते हैं, इसलिए वे जीवन के असीम विस्तार के समान हैं। कविता में बादल की शक्ति और जीवनदायी भूमिका को दर्शाने के लिए यह संबोधन उपयुक्त है।
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अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
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ऑप्शन 1 (आशा के लिए): जबकि बादल आशा का प्रतीक हो सकते हैं, 'ऐ जीवन के पारावार' का सीधा संबोधन कविता में आशा के लिए नहीं है। कविता का फोकस बादल की भौतिक उपस्थिति और उसके जीवनदायी प्रभाव पर है, न कि केवल आशा के अमूर्त विचार पर।
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ऑप्शन 3 (जीवन राग के लिए): 'जीवन राग' एक अधिक अमूर्त अवधारणा है। जबकि बादल जीवन के राग को प्रेरित कर सकते हैं, सीधा संबोधन 'ऐ जीवन के पारावार' बादल की भौतिक वास्तविकता और उसकी विशालता को दर्शाता है, न कि केवल जीवन के राग को।
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ऑप्शन 4 (हर्ष के लिए): बादल हर्ष का कारण बन सकते हैं, खासकर जब वे वर्षा लाते हैं। लेकिन, 'ऐ जीवन के पारावार' का संबोधन हर्ष की भावना से अधिक बादल की जीवनदायी शक्ति और विशालता को व्यक्त करता है। हर्ष एक परिणाम हो सकता है, लेकिन बादल ही वह स्रोत है जिसे 'जीवन के पारावार' कहा गया है।
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इसलिए, 'ऐ जीवन के पारावार' बादल-राग कविता में बादल के लिए ही संबोधन है, क्योंकि यह उसकी जीवनदायी शक्ति और असीम विस्तार को दर्शाता है।
प्रश्न 314
सहर्ष स्वीकारा है' मुक्तिबोध की यह कविता किस संकलन में संकलित है ?
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उत्तर और व्याख्या
'सहर्ष स्वीकारा है' मुक्तिबोध की यह कविता 'भूरी-भूरी खाक धूल' संकलन में संकलित है।
Option 3 सही क्यों है:
'सहर्ष स्वीकारा है' कविता गजानन माधव मुक्तिबोध द्वारा रचित एक प्रसिद्ध कविता है। यह कविता उनके काव्य संग्रह 'भूरी-भूरी खाक धूल' में प्रकाशित हुई थी। इस संकलन में मुक्तिबोध की कई अन्य महत्वपूर्ण कविताएँ भी शामिल हैं, जो उनके विचारों, अनुभवों और सामाजिक चेतना को दर्शाती हैं। इसलिए, यह तथ्य सीधे तौर पर स्थापित करता है कि 'सहर्ष स्वीकारा है' कविता 'भूरी-भूरी खाक धूल' में संकलित है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
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चाँद का मुँह टेढ़ा है: यह मुक्तिबोध का एक अन्य महत्वपूर्ण काव्य संग्रह है, लेकिन 'सहर्ष स्वीकारा है' कविता इसमें संकलित नहीं है। इस संग्रह में मुक्तिबोध की अन्य प्रसिद्ध कविताएँ हैं, लेकिन 'सहर्ष स्वीकारा है' 'भूरी-भूरी खाक धूल' का हिस्सा है।
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काठ का सपना: यह मुक्तिबोध की कहानियों का संग्रह है, कविताओं का नहीं। इसलिए, 'सहर्ष स्वीकारा है' कविता इसमें शामिल नहीं हो सकती।
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सतह से उठता हुआ आदमी: यह भी मुक्तिबोध की रचनाओं का एक संग्रह है, लेकिन 'सहर्ष स्वीकारा है' कविता 'भूरी-भूरी खाक धूल' में प्रकाशित हुई थी, न कि इसमें।
प्रश्न 315
असंगत विकल्प का चयन कीजिए :
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उत्तर और व्याख्या
असंगत विकल्प है: 1. शिरीष के फूल - कल्पद्रुम
व्याख्या:
- शिरीष के फूल - कल्पद्रुम: 'शिरीष के फूल' हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित एक निबंध है, जबकि 'कल्पद्रुम' एक संस्कृत ग्रंथ है। इन दोनों के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है। इसलिए, यह विकल्प असंगत है।
अन्य विकल्पों की असंगतता का कारण:
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काले मेघा पानी दे - संस्मरण: 'काले मेघा पानी दे' धर्मवीर भारती द्वारा रचित एक संस्मरण है। यह विकल्प संगत है क्योंकि यह रचना की विधा को सही ढंग से दर्शाता है।
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भक्तिन - स्मृति की रेखाएँ: 'भक्तिन' महादेवी वर्मा द्वारा रचित 'स्मृति की रेखाएँ' नामक संस्मरण संग्रह का एक भाग है। यह विकल्प संगत है क्योंकि 'भक्तिन' 'स्मृति की रेखाएँ' में शामिल है।
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बादल राग - अनामिका: 'बादल राग' सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' द्वारा रचित एक कविता है जो अनामिका नामक संग्रह में संकलित है। यह विकल्प संगत है क्योंकि 'बादल राग' कविता 'अनामिका' में है।
इसलिए, केवल विकल्प 1 असंगत है क्योंकि 'शिरीष के फूल' और 'कल्पद्रुम' के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है। अन्य विकल्प रचना और उसकी विधा या संग्रह के नाम को सही ढंग से दर्शाते हैं।
प्रश्न 316
फिराक़ गोरखपुरी का मूल नाम है :
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उत्तर और व्याख्या
फिराक़ गोरखपुरी का मूल नाम रघुपति सहाय 'फिराक़' है, इसलिए विकल्प 2 सही है।
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विकल्प 2 सही क्यों है: फिराक़ गोरखपुरी एक प्रसिद्ध उर्दू शायर थे, और उनका वास्तविक नाम रघुपति सहाय था। 'फिराक़' उनका तख़ल्लुस (pen name) था, जिसे उन्होंने अपनी शायरी में इस्तेमाल किया।
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अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
- विकल्प 1: रघुवीर सहाय 'फिराक़': रघुवीर सहाय एक प्रसिद्ध हिंदी कवि थे, लेकिन उनका 'फिराक़' से कोई संबंध नहीं था।
- विकल्प 3: रघुपति सराय 'फिराक़': 'सराय' नाम का कोई व्यक्ति फिराक़ गोरखपुरी के नाम से संबंधित नहीं है।
- विकल्प 4: रघुपति सिंह 'फिराक़': फिराक़ गोरखपुरी का नाम रघुपति सहाय था, न कि रघुपति सिंह।
प्रश्न 317
निम्नलिखित भारतेन्दुयुगीन कवियों को उनके जीवनकाल की दृष्टि से आरोही क्रम में व्यवस्थित कीजिए :
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उत्तर और व्याख्या
Option 3 is the correct answer because it accurately represents the ascending order of the given Bharatendu Yug poets based on their lifespans (birth years). Here's a breakdown:
- Pratap Narayan Mishra: (1856-1894)
- Jagmohan Singh: (1857-1899)
- Radhakrishna Das: (1865-1907)
- Navneet Chaturvedi: (Dates not readily available, but known to be later than the others in the Bharatendu Yug)
As you can see, Pratap Narayan Mishra was born first, followed by Jagmohan Singh, then Radhakrishna Das. While the exact birth and death dates for Navneet Chaturvedi are harder to find, his association with the later part of the Bharatendu Yug places him after the others. Therefore, Option 3 correctly orders them from earliest to latest birth year.
Now, let's examine why the other options are incorrect:
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Option 1: प्रताप नारायण मिश्र, राधाकृष्णदास, जगमोहन सिंह, नवनीत चतुर्वेदी: This is incorrect because it places Radhakrishna Das before Jagmohan Singh, which is chronologically inaccurate. Radhakrishna Das was born after Jagmohan Singh.
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Option 2: राधाकृष्णदास, प्रताप नारायण मिश्र, जगमोहन सिंह, नवनीत चतुर्वेदी: This is incorrect because it places Radhakrishna Das first, which is chronologically inaccurate. Pratap Narayan Mishra and Jagmohan Singh were both born before Radhakrishna Das.
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Option 4: जगमोहन सिंह, प्रताप नारायण मिश्र, राधाकृष्णदास, नवनीत चतुर्वेदी: This is incorrect because it places Jagmohan Singh before Pratap Narayan Mishra. Pratap Narayan Mishra was born before Jagmohan Singh.
In conclusion, only Option 3, "प्रताप नारायण मिश्र, जगमोहन सिंह, राधाकृष्णदास, नवनीत चतुर्वेदी," accurately reflects the ascending order of the poets based on their lifespans, making it the correct answer.
प्रश्न 318
"मैं यौवन का उन्माद लिए फिरता हूँ,
उन्मादों में अवसाद लिए फिरता हूँ।"
प्रस्तुत पंक्तियों के रचयिता हैं :
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
हरिवंश राय बच्चन
व्याख्या:
प्रस्तुत पंक्तियाँ "मैं यौवन का उन्माद लिए फिरता हूँ, उन्मादों में अवसाद लिए फिरता हूँ" हरिवंश राय बच्चन द्वारा रचित कविता "आत्म-परिचय" से ली गई हैं। यह कविता बच्चन जी की प्रसिद्ध रचनाओं में से एक है और उनके काव्य संग्रह "निशा निमंत्रण" में संकलित है। इन पंक्तियों में कवि अपने जीवन के विरोधाभासों और भावनाओं को व्यक्त करते हैं। वे यौवन के उत्साह और उमंग के साथ-साथ जीवन में व्याप्त निराशा और अवसाद का भी अनुभव करते हैं।
अन्य विकल्पों की अस्वीकृति:
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कुँवर नारायण: कुँवर नारायण एक प्रतिष्ठित कवि हैं, लेकिन उनकी शैली और विषय-वस्तु हरिवंश राय बच्चन से भिन्न है। उनकी रचनाएँ अधिक दार्शनिक और चिंतनशील होती हैं, जबकि प्रस्तुत पंक्तियाँ अधिक व्यक्तिगत और भावनात्मक हैं।
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आलोक धन्वा: आलोक धन्वा भी एक महत्वपूर्ण कवि हैं, लेकिन उनकी कविताएँ सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर अधिक केंद्रित होती हैं। उनकी शैली में एक अलग प्रकार की तीव्रता और आक्रोश होता है, जो प्रस्तुत पंक्तियों में नहीं है।
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रघुवीर सहाय: रघुवीर सहाय एक प्रसिद्ध कवि और पत्रकार थे, जिनकी रचनाएँ सामाजिक विसंगतियों और राजनीतिक भ्रष्टाचार पर केंद्रित होती हैं। उनकी भाषा और शैली में एक तीखापन और व्यंग्य होता है, जो प्रस्तुत पंक्तियों में नहीं पाया जाता।
इसलिए, स्पष्ट रूप से, प्रस्तुत पंक्तियाँ हरिवंश राय बच्चन की "आत्म-परिचय" कविता से हैं, जो उन्हें सही उत्तर बनाती हैं।
प्रश्न 319
प्रेमाख्यानक काव्य-परम्परा के संबंध में असंगत कथन छाँटिए :
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
Option 2 सही है क्योंकि 'अनुराग बाँसुरी' के रचयिता नंददास नहीं, बल्कि नूर मुहम्मद हैं। नंददास अष्टछाप के कवि हैं और उनकी रचनाएँ भक्ति और श्रृंगार रस से परिपूर्ण हैं, लेकिन 'अनुराग बाँसुरी' उनकी रचना नहीं है।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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Option 1 गलत है क्योंकि: माधवानल कामकंदला मुख्यतः दोहा-चौपाई शैली में रचित है, यह कथन सत्य है। इसलिए यह असंगत नहीं है।
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Option 3 गलत है क्योंकि: 'रूप-मंजरी' में प्रेम के महत्त्व को रेखांकित किया गया है, यह कथन भी सत्य है। रूप मंजरी नंददास की रचना है और इसमें प्रेम के महत्व को दर्शाया गया है। इसलिए यह असंगत नहीं है।
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Option 4 गलत है क्योंकि: युसुफ-जुलेखा के रचनाकार ‘शेख निसार’ हैं, यह कथन भी सही है। इसलिए यह असंगत नहीं है।
इसलिए, केवल Option 2 ही असंगत है क्योंकि 'अनुराग बाँसुरी' के रचयिता नूर मुहम्मद हैं, न कि नंददास।
प्रश्न 320
अज्ञेय द्वारा संपादित ‘दूसरा सप्तक’ में कौन-सा कवि सम्मिलित नहीं है ?
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
हरिनारायण शर्मा 'दूसरा सप्तक' में सम्मिलित नहीं हैं, इसलिए विकल्प 2 सही है।
विस्तृत स्पष्टीकरण:
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विकल्प 2: हरिनारायण शर्मा - सही उत्तर: हरिनारायण शर्मा 'दूसरा सप्तक' के कवियों में शामिल नहीं हैं। 'दूसरा सप्तक' 1951 में अज्ञेय द्वारा संपादित किया गया था, और इसमें सात कवियों को शामिल किया गया था। हरिनारायण शर्मा इन सात कवियों में से नहीं हैं।
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विकल्प 1: नरेश मेहता - गलत उत्तर: नरेश मेहता 'दूसरा सप्तक' के महत्वपूर्ण कवियों में से एक हैं। उनका योगदान इस संकलन में उल्लेखनीय है। इसलिए, यह विकल्प गलत है।
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विकल्प 3: धर्मवीर भारती - गलत उत्तर: धर्मवीर भारती भी 'दूसरा सप्तक' के प्रमुख कवियों में से एक हैं। उनकी कविताएँ इस संकलन में शामिल हैं, और उन्होंने हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसलिए, यह विकल्प गलत है।
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विकल्प 4: रघुवीर सहाय - गलत उत्तर: रघुवीर सहाय 'दूसरा सप्तक' के कवियों में से एक हैं और उनकी रचनाएँ इस संकलन में प्रकाशित हैं। इसलिए, यह विकल्प गलत है।
इसलिए, केवल विकल्प 2, हरिनारायण शर्मा, 'दूसरा सप्तक' में सम्मिलित नहीं हैं।