HTET परीक्षा Level 3 PGT
Clear Cutoff के साथ HTET परीक्षा Level 3 PGT की तैयारी
सत्यापित उत्तर और व्याख्याएँ
Clear Cutoff द्वारा
20 में से 20 प्रश्न दिखाए जा रहे हैं
प्रश्न 321
स्पीति में बारिश' की विधा है :
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उत्तर और व्याख्या
'स्पीति में बारिश' की विधा यात्रा-वृत्तांत है, क्योंकि यह पाठ लेखक कृष्णनाथ द्वारा स्पीति घाटी की यात्रा के दौरान किए गए अनुभवों, देखे गए दृश्यों, लोगों और संस्कृति का विस्तृत वर्णन करता है। यह एक यात्रा के दौरान घटित घटनाओं का सिलसिलेवार विवरण प्रस्तुत करता है, जो यात्रा-वृत्तांत की प्रमुख विशेषता है। लेखक ने स्पीति की भौगोलिक स्थिति, जलवायु, जीवनशैली और इतिहास का वर्णन करते हुए अपनी यात्रा के अनुभवों को साझा किया है।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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डायरी: डायरी व्यक्तिगत अनुभवों और विचारों का दैनिक या नियमित रूप से लिखा जाने वाला लेखा-जोखा होती है। 'स्पीति में बारिश' एक व्यक्तिगत डायरी नहीं है, बल्कि एक विशिष्ट यात्रा के अनुभवों का सार्वजनिक विवरण है।
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संस्मरण: संस्मरण किसी व्यक्ति के जीवन के महत्वपूर्ण घटनाओं या अनुभवों का स्मरण और वर्णन होता है। जबकि 'स्पीति में बारिश' में लेखक के व्यक्तिगत अनुभव शामिल हैं, इसका मुख्य उद्देश्य स्पीति घाटी की यात्रा का वर्णन करना है, न कि लेखक के जीवन की घटनाओं का स्मरण करना।
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रेखाचित्र: रेखाचित्र किसी व्यक्ति, वस्तु या स्थान का शब्दों के माध्यम से किया गया चित्रात्मक वर्णन होता है। 'स्पीति में बारिश' में स्पीति का वर्णन अवश्य है, लेकिन यह केवल एक चित्रात्मक वर्णन नहीं है; यह यात्रा के दौरान प्राप्त अनुभवों और जानकारियों का विस्तृत विवरण है, जो इसे यात्रा-वृत्तांत बनाता है।
इसलिए, 'स्पीति में बारिश' एक यात्रा-वृत्तांत है क्योंकि यह लेखक की स्पीति घाटी की यात्रा के अनुभवों का विस्तृत और व्यवस्थित वर्णन प्रस्तुत करता है।
प्रश्न 322
अष्टछाप के लोकप्रिय कवि नन्ददास को किसने दीक्षित किया था ?
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उत्तर और व्याख्या
गोसांई विट्ठलनाथ ने अष्टछाप के कवि नन्ददास को दीक्षित किया था, यह सही है।
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क्यों विकल्प 2 सही है: नन्ददास, अष्टछाप के कवियों में से एक थे, और अष्टछाप की स्थापना गोसांई विट्ठलनाथ ने की थी। स्वाभाविक रूप से, उन्होंने ही नन्ददास को दीक्षित किया। विट्ठलनाथ, वल्लभाचार्य के पुत्र थे और उन्होंने अपने पिता की भक्ति परंपरा को आगे बढ़ाया। नन्ददास की रचनाओं में विट्ठलनाथ के प्रति श्रद्धा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
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क्यों अन्य विकल्प गलत हैं:
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विकल्प 1 (वल्लभाचार्य): वल्लभाचार्य, विट्ठलनाथ के पिता थे और उन्होंने पुष्टि मार्ग की स्थापना की थी। हालांकि, अष्टछाप की स्थापना विट्ठलनाथ ने की थी, इसलिए नन्ददास को दीक्षित करने का श्रेय उन्हें ही जाता है। वल्लभाचार्य के शिष्यों में सूरदास जैसे कवि थे, लेकिन नन्ददास विट्ठलनाथ के शिष्य थे।
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विकल्प 3 (गोकुलनाथ): गोकुलनाथ, विट्ठलनाथ के पुत्र थे। वे नन्ददास के दीक्षित गुरु नहीं थे।
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विकल्प 4 (सूरदास): सूरदास, वल्लभाचार्य के शिष्य थे और अष्टछाप के प्रमुख कवियों में से एक थे, लेकिन वे नन्ददास के गुरु नहीं थे। वे नन्ददास से पहले के कवि थे और उन्होंने नन्ददास को दीक्षित नहीं किया था।
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प्रश्न 323
“श्री रघुनाथ-प्रताप की बात तुम्हें दसकंठ न जानि परी।
तेलनि-तूलनि पूँछि जरी न जरी, जरी लंक जराई जरी।”
प्रस्तुत पंक्तियाँ किस प्रसिद्ध रचना का अंश हैं ?
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उत्तर और व्याख्या
रामचंद्रिका
व्याख्या:
प्रस्तुत पंक्तियाँ केशवदास द्वारा रचित 'रामचंद्रिका' से ली गई हैं। केशवदास अपनी क्लिष्ट काव्य शैली और अलंकारों के प्रयोग के लिए जाने जाते हैं। यह पंक्ति उनकी इसी शैली का उदाहरण है। इसमें 'जरी' शब्द का बार-बार प्रयोग और अलंकारों की छटा रामचंद्रिका की विशेषता है।
अन्य विकल्पों की अस्वीकृति:
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रामायण: रामायण, वाल्मीकि द्वारा रचित है और यह संस्कृत में है। प्रस्तुत पंक्तियाँ रामायण की भाषा और शैली से भिन्न हैं।
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रामचरितमानस: रामचरितमानस, तुलसीदास द्वारा रचित है और यह अवधी भाषा में है। प्रस्तुत पंक्तियाँ रामचरितमानस की भाषा और शैली से भिन्न हैं। तुलसीदास की रचनाएँ सरल और भक्तिपूर्ण होती हैं, जबकि यह पंक्ति केशवदास की अलंकारिक शैली को दर्शाती है।
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हनुमानबाहुक: हनुमानबाहुक भी तुलसीदास द्वारा रचित है और यह हनुमान जी की स्तुति में लिखी गई है। इसकी भाषा और विषय-वस्तु प्रस्तुत पंक्तियों से अलग है।
इसलिए, स्पष्ट रूप से, दी गई पंक्तियाँ 'रामचंद्रिका' का अंश हैं, जो केशवदास द्वारा रचित है और अपनी विशिष्ट काव्य शैली के लिए जानी जाती है।
प्रश्न 324
स्थापना - (A) : तुलसीदास की लोक व शास्त्र दोनों में पैठ है। जीवन व जगत् की व्यापक अनुभूति और मार्मिक प्रसंगों की उन्हें अचूक समझ है।
तर्क - (R) : तुलसी लौकिक व दार्शनिक स्तर के सभी द्वंद्वों का चित्रण करते हैं। उनकी भक्ति शास्त्रोन्मुख है, लोकोन्मुख नहीं।
सही विकल्प का चयन कीजिए :
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उत्तर और व्याख्या
Explanation:
Option 4: A सही व R आंशिक सही है।
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Why A is correct: The statement (A) accurately reflects a widely accepted understanding of Tulsidas. He was deeply knowledgeable in both folk traditions and classical scriptures. His works demonstrate a profound understanding of life, the world, and human emotions, making him a master storyteller and poet. His ability to connect with the common people while maintaining scholarly depth is a hallmark of his genius.
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Why R is partially correct: The statement (R) claims that Tulsidas depicts all worldly and philosophical conflicts and that his devotion is oriented towards scriptures and not towards the people. While Tulsidas does portray conflicts, the assertion that his devotion is not oriented towards the people is incorrect. His works, particularly the Ramcharitmanas, are deeply rooted in the lives and beliefs of the common people. He uses accessible language and relatable characters to convey complex philosophical ideas. Therefore, the first part of R is correct, but the second part is incorrect, making R only partially correct.
Why other options are incorrect:
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Option 1: A व R दोनों सही हैं। As explained above, R is not entirely correct because it incorrectly states that Tulsidas's devotion is not oriented towards the people.
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Option 2: A सही व R ग़लत है। While A is correct, R is not entirely wrong. It contains a partially correct statement about Tulsidas depicting conflicts.
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Option 3: A ग़लत व R सही है। A is widely accepted as correct, so this option is incorrect.
प्रश्न 325
भाववाचक संज्ञा किस विकल्प में नहीं है ?
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उत्तर और व्याख्या
Option 3 सही है क्योंकि 'कुटिल' एक विशेषण है, भाववाचक संज्ञा नहीं। यह किसी व्यक्ति या वस्तु के स्वभाव या गुण को दर्शाता है, जैसे "वह कुटिल है" या "उसकी कुटिल मुस्कान"।
अन्य विकल्प गलत हैं क्योंकि:
- गांभीर्य: यह 'गंभीर' शब्द से बनी भाववाचक संज्ञा है, जो गंभीरता के भाव को दर्शाती है।
- शैशव: यह 'शिशु' शब्द से बनी भाववाचक संज्ञा है, जो बचपन की अवस्था को दर्शाती है।
- खुजलाहट: यह 'खुजलाना' क्रिया से बनी भाववाचक संज्ञा है, जो खुजली के भाव को दर्शाती है।
इसलिए, केवल 'कुटिल' ही भाववाचक संज्ञा नहीं है।
प्रश्न 326
अपत्यवाचक तद्धित' प्रत्यय से बना शब्द किस विकल्प में नहीं है ?
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उत्तर और व्याख्या
'अपत्यवाचक तद्धित' प्रत्यय से बना शब्द किस विकल्प में नहीं है, इसका सही उत्तर विकल्प 3, 'वैचित्र्य' है, क्योंकि:
- वैचित्र्य: 'वैचित्र्य' शब्द 'विचित्र' शब्द से बना है, जिसमें 'य' प्रत्यय लगा है। यह शब्द विचित्रता या विविधता का भाव दर्शाता है, न कि किसी के वंशज या संतान होने का। इसलिए, यह अपत्यवाचक तद्धित प्रत्यय से नहीं बना है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं:
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मागध: 'मागध' शब्द 'मगध' से बना है और यह मगध देश के निवासी या मगध से संबंधित व्यक्ति को दर्शाता है। यह अपत्यवाचक तद्धित प्रत्यय का उदाहरण है क्योंकि यह 'मगध' से संबंधित होने का भाव व्यक्त करता है।
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आंजनेय: 'आंजनेय' शब्द 'अंजना' से बना है और यह अंजना के पुत्र (हनुमान) को दर्शाता है। यह स्पष्ट रूप से अपत्यवाचक तद्धित प्रत्यय का उदाहरण है।
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मार्कंडेय: 'मार्कंडेय' शब्द 'मृकंड' से बना है और यह मृकंड ऋषि के पुत्र को दर्शाता है। यह भी अपत्यवाचक तद्धित प्रत्यय का उदाहरण है।
इसलिए, केवल 'वैचित्र्य' ही अपत्यवाचक तद्धित प्रत्यय से नहीं बना है।
प्रश्न 327
कहाँ चले तुम राम नाम का 'पीतांबर' तन पर डाले - वाक्य में रेखांकित पद में कौन-सा समास है ?
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उत्तर और व्याख्या
'पीतांबर' शब्द में कर्मधारय समास है, क्योंकि:
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कर्मधारय समास की परिभाषा: कर्मधारय समास में एक पद विशेषण होता है और दूसरा पद विशेष्य। विशेषण विशेष्य की विशेषता बताता है।
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'पीतांबर' शब्द का विग्रह: 'पीतांबर' का विग्रह है 'पीत है जो अंबर' अर्थात 'पीला वस्त्र'। यहाँ 'पीत' (पीला) विशेषण है और 'अंबर' (वस्त्र) विशेष्य है। 'पीत' शब्द 'अंबर' की विशेषता बता रहा है कि अंबर कैसा है - पीला है। इसलिए यह कर्मधारय समास का उदाहरण है।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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बहुव्रीहि समास: बहुव्रीहि समास में कोई भी पद प्रधान नहीं होता, बल्कि पूरा पद मिलकर किसी तीसरे पद की ओर संकेत करता है। 'पीतांबर' शब्द किसी तीसरे पद की ओर संकेत नहीं कर रहा है, बल्कि पीले वस्त्र का सामान्य अर्थ दे रहा है। इसलिए यह बहुव्रीहि समास नहीं है।
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द्वन्द्व समास: द्वन्द्व समास में दोनों पद प्रधान होते हैं और 'और' या 'तथा' जैसे शब्दों से जुड़े होते हैं। 'पीतांबर' में ऐसा कुछ नहीं है। इसलिए यह द्वन्द्व समास नहीं है।
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तत्पुरुष समास: तत्पुरुष समास में उत्तर पद प्रधान होता है और पूर्व पद किसी कारक चिह्न से जुड़ा होता है। 'पीतांबर' में ऐसा कोई कारक चिह्न नहीं है और न ही उत्तर पद प्रधान है। इसलिए यह तत्पुरुष समास नहीं है।
अतः, 'पीतांबर' शब्द में कर्मधारय समास ही सही उत्तर है क्योंकि यह विशेषण-विशेष्य संबंध को दर्शाता है।
प्रश्न 328
निम्नलिखित लेखक मण्डल में किसकी भाषा चुटीली और मुहावरेदार है ?
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उत्तर और व्याख्या
इंशाअल्ला खाँ की भाषा चुटीली और मुहावरेदार है, इसका कारण यह है कि उन्होंने अपनी रचनाओं में बोलचाल की भाषा का भरपूर प्रयोग किया। उनकी प्रसिद्ध रचना "रानी केतकी की कहानी" में हास्य और व्यंग्य का पुट है, जो उनकी भाषा को विशेष रूप से चुटीला बनाता है। उन्होंने मुहावरों और लोकोक्तियों का प्रयोग करके भाषा को जीवंत और आकर्षक बनाया। उनकी भाषा में एक खास तरह की चुलबुलाहट और मस्ती है, जो पाठकों को बांधे रखती है।
अब अन्य विकल्पों पर विचार करते हैं:
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सदासुखलाल: सदासुखलाल की भाषा में गंभीरता और पंडिताऊपन अधिक है। उनकी भाषा में तत्सम शब्दों का प्रयोग अधिक होता है, जिसके कारण वह इंशाअल्ला खाँ की तुलना में कम चुटीली और मुहावरेदार है।
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लल्लूलाल: लल्लूलाल की भाषा सरल और सुबोध है, लेकिन उसमें इंशाअल्ला खाँ जैसी चुटीलापन और मुहावरेदारी का अभाव है। उन्होंने "प्रेम सागर" जैसी रचनाओं में सरल भाषा का प्रयोग किया, लेकिन उनकी भाषा में वह व्यंग्य और हास्य नहीं है जो इंशाअल्ला खाँ की भाषा में मिलता है।
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सदल मिश्र: सदल मिश्र की भाषा में पूर्वी बोली का प्रभाव है। उनकी भाषा में सरलता और स्पष्टता है, लेकिन उसमें इंशाअल्ला खाँ जैसी चुटीलापन और मुहावरेदारी नहीं है। उनकी भाषा में स्थानीय शब्दों का प्रयोग अधिक होता है, लेकिन वह इंशाअल्ला खाँ की तरह मुहावरों और लोकोक्तियों का प्रयोग करके भाषा को विशेष रूप से आकर्षक नहीं बनाते।
इसलिए, इंशाअल्ला खाँ ही वह लेखक हैं जिनकी भाषा चुटीली और मुहावरेदार है।
प्रश्न 329
सर्वनाम से निर्मित विशेषण है :
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उत्तर और व्याख्या
सर्वनाम से निर्मित विशेषण "कैसा" है, क्योंकि यह प्रश्नवाचक सर्वनाम "कौन" से बना है। "कैसा" शब्द किसी संज्ञा के बारे में प्रश्न पूछने के लिए विशेषण के रूप में प्रयुक्त होता है, जैसे "यह फल कैसा है?" यहाँ "कैसा" फल की विशेषता बता रहा है और यह सर्वनाम से बना है।
अन्य विकल्प गलत हैं क्योंकि:
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रक्तिम: यह शब्द "रक्त" (खून) से बना है, जो कि एक संज्ञा है, सर्वनाम नहीं। इसलिए यह सर्वनाम से निर्मित विशेषण नहीं है।
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सभ्य: यह शब्द "सभा" से संबंधित है और एक संज्ञा या भाववाचक संज्ञा से बना है, सर्वनाम से नहीं।
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आदरणीय: यह शब्द "आदर" से बना है, जो कि एक भाववाचक संज्ञा है, सर्वनाम नहीं। इसलिए यह भी सर्वनाम से निर्मित विशेषण नहीं है।
इसलिए, केवल "कैसा" ही सर्वनाम से निर्मित विशेषण है।
प्रश्न 330
किस शब्द में 'परा' उपसर्ग का प्रयोग नहीं हुआ है ?
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उत्तर और व्याख्या
'परान्तक' शब्द में 'परा' उपसर्ग का प्रयोग नहीं हुआ है।
Option 4 सही क्यों है:
'परान्तक' शब्द 'पर' और 'अंतक' से मिलकर बना है। यहाँ 'पर' का अर्थ 'दूसरा' या 'शत्रु' हो सकता है, और 'अंतक' का अर्थ 'अंत करने वाला' या 'नाश करने वाला' है। इस प्रकार, 'परान्तक' का अर्थ 'शत्रु का नाश करने वाला' हो सकता है। इसमें 'परा' उपसर्ग का प्रयोग नहीं हुआ है, बल्कि 'पर' उपसर्ग का प्रयोग हुआ है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
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पराजिका: इस शब्द में 'परा' उपसर्ग का प्रयोग हुआ है। 'परा' उपसर्ग और 'जिका' मूल शब्द से मिलकर यह शब्द बना है। 'परा' का अर्थ 'विपरीत' या 'पीछे' होता है।
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पराध्वनि: इस शब्द में भी 'परा' उपसर्ग का प्रयोग हुआ है। 'परा' उपसर्ग और 'ध्वनि' मूल शब्द से मिलकर यह शब्द बना है। 'परा' का अर्थ 'परे' या 'अति' होता है।
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पराभूत: इस शब्द में भी 'परा' उपसर्ग का प्रयोग हुआ है। 'परा' उपसर्ग और 'भूत' मूल शब्द से मिलकर यह शब्द बना है। 'परा' का अर्थ 'पराजित' या 'हराया हुआ' होता है।
इसलिए, केवल 'परान्तक' शब्द में 'परा' उपसर्ग का प्रयोग नहीं हुआ है।
प्रश्न 331
निम्न में से कौन-सा विकल्प सुमेलित नहीं है ?
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उत्तर और व्याख्या
अघोषवर्ण – थ, झ, ट, फ - यह विकल्प सुमेलित नहीं है, क्योंकि इसमें 'झ' घोष वर्ण है, अघोष नहीं।
व्याख्या:
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अघोष वर्ण: जिन वर्णों के उच्चारण में स्वर तंत्रियों में कंपन न हो, वे अघोष वर्ण कहलाते हैं। प्रत्येक वर्ग का पहला और दूसरा व्यंजन अघोष होता है। जैसे: क, ख, च, छ, ट, ठ, त, थ, प, फ, श, ष, स।
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घोष वर्ण: जिन वर्णों के उच्चारण में स्वर तंत्रियों में कंपन हो, वे घोष वर्ण कहलाते हैं। प्रत्येक वर्ग का तीसरा, चौथा और पाँचवाँ व्यंजन घोष होता है। जैसे: ग, घ, ङ, ज, झ, ञ, ड, ढ, ण, द, ध, न, ब, भ, म, य, र, ल, व, ह।
विकल्प 2 में 'झ' घोष वर्ण है, जबकि अघोष वर्णों की सूची में दिया गया है। इसलिए यह विकल्प सुमेलित नहीं है।
अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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घोषवर्ण – ज, घ, न, ग: यह विकल्प सही है क्योंकि ज, घ, न और ग सभी घोष वर्ण हैं। प्रत्येक वर्ग का तीसरा, चौथा और पाँचवाँ व्यंजन घोष होता है।
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अल्पप्राण – ब, य, ड, ङ: यह विकल्प सही है क्योंकि ब, य, ड और ङ सभी अल्पप्राण वर्ण हैं। प्रत्येक वर्ग का पहला, तीसरा और पाँचवाँ व्यंजन अल्पप्राण होता है, साथ ही य, र, ल, व भी अल्पप्राण हैं।
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महाप्राण – ख, ढ, भ, ठ: यह विकल्प सही है क्योंकि ख, ढ, भ और ठ सभी महाप्राण वर्ण हैं। प्रत्येक वर्ग का दूसरा और चौथा व्यंजन महाप्राण होता है, साथ ही श, ष, स, ह भी महाप्राण हैं।
इसलिए, केवल विकल्प 2 गलत है क्योंकि इसमें अघोष वर्णों के साथ एक घोष वर्ण ('झ') शामिल है।
प्रश्न 332
सुनंदा बुद्धिमती है - वाक्य में प्रयुक्त विशेषण है :
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उत्तर और व्याख्या
सुनंदा बुद्धिमती है - वाक्य में प्रयुक्त विशेषण 'विषय विशेषण' है, क्योंकि:
- विषय विशेषण (Attributive Adjective): विषय विशेषण वह विशेषण होता है जो किसी संज्ञा (noun) या सर्वनाम (pronoun) के गुण, दोष, संख्या, मात्रा आदि को बताता है और उस संज्ञा या सर्वनाम के बाद प्रयुक्त होता है। इस वाक्य में, 'बुद्धिमती' विशेषण है जो 'सुनंदा' संज्ञा के गुण (बुद्धिमान होना) को बता रहा है और 'सुनंदा' के बाद आ रहा है। इसलिए यह विषय विशेषण है।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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उद्देश्य विशेषण (Predicate Adjective): उद्देश्य विशेषण वह विशेषण होता है जो किसी संज्ञा या सर्वनाम के गुण, दोष, संख्या, मात्रा आदि को बताता है और उस संज्ञा या सर्वनाम के पहले प्रयुक्त होता है। उदाहरण के लिए, "बुद्धिमती सुनंदा" में 'बुद्धिमती' उद्देश्य विशेषण होगा। चूंकि वाक्य में विशेषण संज्ञा के बाद आ रहा है, इसलिए यह विकल्प गलत है।
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प्रविशेषण (Adverb of Degree): प्रविशेषण वह शब्द होता है जो विशेषण की विशेषता बताता है। उदाहरण के लिए, "बहुत बुद्धिमती" में 'बहुत' प्रविशेषण है जो 'बुद्धिमती' विशेषण की विशेषता बता रहा है। दिए गए वाक्य में ऐसा कोई शब्द नहीं है जो विशेषण की विशेषता बताए, इसलिए यह विकल्प गलत है।
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तुलनात्मक विशेषण (Comparative Adjective): तुलनात्मक विशेषण दो या दो से अधिक संज्ञाओं या सर्वनामों के बीच तुलना करने के लिए प्रयुक्त होता है। उदाहरण के लिए, "सुनंदा रीता से अधिक बुद्धिमती है" में 'अधिक बुद्धिमती' तुलनात्मक विशेषण है। दिए गए वाक्य में कोई तुलना नहीं की जा रही है, इसलिए यह विकल्प गलत है।
इसलिए, केवल विषय विशेषण ही दिए गए वाक्य के संदर्भ में सही उत्तर है।
प्रश्न 333
समास-विग्रह की दृष्टि से असंगत विकल्प को चुनिए :
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उत्तर और व्याख्या
समास-विग्रह की दृष्टि से असंगत विकल्प मरणोपरांत - मरने तक है, क्योंकि:
- मरणोपरांत का सही समास-विग्रह मरण के उपरांत (मृत्यु के बाद) होता है। "मरने तक" इसका सही विग्रह नहीं है। "मरने तक" का भाव "आमरण" या "जीवनपर्यंत" जैसे शब्दों में आता है। इसलिए, यह विकल्प असंगत है।
अन्य विकल्प क्यों असंगत नहीं हैं:
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दरहक़ीक़त - हक़ीक़त में: यह समास-विग्रह सही है। "दरहक़ीक़त" का अर्थ "वास्तव में" या "हक़ीक़त में" होता है।
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सानुज - अनुज के साथ: यह समास-विग्रह भी सही है। "सानुज" का अर्थ "अनुज (छोटे भाई) के साथ" होता है।
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अनुरूप - जैसा रूप है वैसा: यह समास-विग्रह भी सही है। "अनुरूप" का अर्थ "रूप के अनुसार" या "जैसा रूप है वैसा" होता है।
इसलिए, केवल मरणोपरांत - मरने तक ही गलत समास-विग्रह है, जो इसे असंगत विकल्प बनाता है।
प्रश्न 334
संज्ञापद' का विकारक पद कौन-सा नहीं है ?
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उत्तर और व्याख्या
संज्ञापद का विकारक पद 'काल' नहीं है, क्योंकि 'काल' क्रिया का विकारक है, संज्ञा का नहीं।
यहाँ अन्य विकल्पों की व्याख्या दी गई है:
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लिंग: संज्ञा का विकारक है। संज्ञा शब्दों का लिंग (स्त्रीलिंग या पुल्लिंग) बदल सकता है, जिससे वाक्य का अर्थ प्रभावित होता है। उदाहरण के लिए, 'लड़का' और 'लड़की' दो अलग-अलग लिंगों के संज्ञा शब्द हैं।
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वचन: संज्ञा का विकारक है। संज्ञा शब्दों का वचन (एकवचन या बहुवचन) बदल सकता है, जिससे वाक्य में संख्या का बोध होता है। उदाहरण के लिए, 'पुस्तक' एकवचन है और 'पुस्तकें' बहुवचन है।
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कारक: संज्ञा का विकारक है। कारक संज्ञा शब्दों का वाक्य में क्रिया और अन्य शब्दों के साथ संबंध दर्शाता है। कारक चिह्नों (जैसे ने, को, से, के लिए) के प्रयोग से संज्ञा शब्दों के अर्थ में परिवर्तन होता है।
इसलिए, 'काल' क्रिया का विकारक होने के कारण संज्ञापद का विकारक पद नहीं है। 'काल' क्रिया के होने के समय को दर्शाता है, न कि संज्ञा में कोई परिवर्तन लाता है।
प्रश्न 335
शब्दकोश के संदर्भ में अनुपयुक्त विकल्प को चुनिए :
अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।
उत्तर और व्याख्या
Option 2 सही है क्योंकि यह शब्दकोश में शब्दों को व्यवस्थित करने के सामान्य नियम का उल्लंघन करता है। शब्दकोश में, संयुक्त व्यंजन (क्ष, त्र, ज्ञ, श्र) अपने मूल अक्षरों (क, त, ज, श) के बाद नहीं, बल्कि वर्णमाला क्रम में आते हैं। इसलिए, 'क्ष' 'क' के बाद नहीं, बल्कि 'ख' के बाद आएगा, 'ज्ञ' 'ज' के बाद नहीं, बल्कि 'झ' के बाद आएगा, 'त्र' 'त' के बाद नहीं, बल्कि 'थ' के बाद आएगा, और 'श्र' 'श' के बाद नहीं, बल्कि 'ष' के बाद आएगा।
अन्य विकल्प गलत हैं क्योंकि:
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Option 1: यह सही है। शब्दकोश में अनुस्वार, अनुनासिक और विसर्ग को अलग अक्षर नहीं माना जाता है। उन्हें संबंधित वर्णों के साथ ही रखा जाता है। उदाहरण के लिए, "अंक" को "अ" के साथ रखा जाएगा।
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Option 3: यह सही है। पंचम वर्ण (ङ, ण, ञ) आमतौर पर किसी शब्द के आरंभ में नहीं आते हैं, इसलिए शब्दकोश में उनकी स्थिति इस तथ्य को दर्शाती है।
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Option 4: यह सही है। शब्दकोश में हिंदी के शब्दों को देवनागरी लिपि की मानक वर्णमाला के अनुसार ही रखा जाता है। यह एक बुनियादी नियम है।
प्रश्न 336
अशुद्ध संधि विच्छेद वाला विकल्प चुनिए :
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उत्तर और व्याख्या
Option 4, "उत् + धव = उद्धव," is the option with the incorrect संधि विच्छेद. Here's why:
- Why Option 4 is Incorrect: The correct संधि विच्छेद for "उद्धव" should be "उत् + हव = उद्धव". The 'त्' changes to 'द्' due to the rule of व्यंजन संधि where 'त्' followed by 'ह' changes to 'द्' and 'ह' changes to 'ध'.
Now, let's explain why the other options are correct:
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Option 1: तडित् + ज्योति = तडिज्ज्योति This is a correct example of व्यंजन संधि. The 'त्' changes to 'ज्' because it is followed by 'ज्'.
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Option 2: विद्वत् + चर्या = विद्वच्चर्या This is also a correct example of व्यंजन संधि. The 'त्' changes to 'च्' because it is followed by 'च्'.
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Option 3: पद् + लवन = पल्लवन This is a correct example of व्यंजन संधि. The 'द्' changes to 'ल्' because it is followed by 'ल्'.
प्रश्न 337
संधि की दृष्टि से अनुचित विकल्प चुनिए :
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उत्तर और व्याख्या
Option 2 is the incorrect option from the perspective of Sandhi (joining of words) because the examples provided do not correctly represent Vriddhi Sandhi. Let's break it down:
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Why Option 2 is Incorrect:
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वाण्यौचित्य (Vaanyauchitya): This word is formed from वाणी + औचित्य (Vaani + Auchitya). The combination of ई (ee) + औ (au) results in य् (ya) and औ (au), which is a characteristic of Yan Sandhi, not Vriddhi Sandhi. Vriddhi Sandhi requires a combination that results in either ऐ (ai) or औ (au) as the Vriddhi (increased) vowel.
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पित्रौत्सुकता (Pitroutsukata): This word is formed from पितृ + औत्सुकता (Pitru + Autsukata). The combination of ऋ (ri) + औ (au) results in र् (ra) and औ (au), which is also a characteristic of Yan Sandhi, not Vriddhi Sandhi. Vriddhi Sandhi requires a combination that results in either ऐ (ai) or औ (au) as the Vriddhi (increased) vowel.
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Why the other options are correct (and therefore not the answer):
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Option 1: उत्तमर्ण, अधमर्ण = गुणसंधि (Uttamarna, Adhamarna = Gun Sandhi): This is generally correct. While the specific examples aren't provided as a Sandhi split, the concept is correct. Gun Sandhi involves the combination of अ/आ (a/aa) with इ/ई (i/ee), उ/ऊ (u/oo), or ऋ (ri) to produce ए (e), ओ (o), or अर् (ar) respectively. The terms themselves are related to debt and lending, and the underlying grammatical principles align with Gun Sandhi.
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Option 3: बहवैश्वर्य, साध्वौदार्य = यण् संधि (Bahvaishvarya, Sadhvaudaarya = Yan Sandhi): This is correct.
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बहवैश्वर्य (Bahvaishvarya) is likely derived from बहु + ऐश्वर्य (Bahu + Aishvarya), where उ (u) + ऐ (ai) becomes व् (va) + ऐ (ai), fitting the Yan Sandhi rule.
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साध्वौदार्य (Sadhvaudaarya) is likely derived from साधु + औदार्य (Sadhu + Audarya), where उ (u) + औ (au) becomes व् (va) + औ (au), fitting the Yan Sandhi rule.
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Option 4: श्रावण, धावक = अयादि संधि (Shraavan, Dhaavak = Ayaadi Sandhi): This is correct.
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श्रावण (Shraavan) is derived from श्रो + अन (Shro + An), where ओ (o) + अ (a) becomes अव (av), fitting the Ayaadi Sandhi rule.
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धावक (Dhaavak) is derived from धो + अक (Dho + Ak), where ओ (o) + अ (a) becomes अव (av), fitting the Ayaadi Sandhi rule.
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In summary, Option 2 is the incorrect option because the provided examples, वाण्यौचित्य and पित्रौत्सुकता, are examples of Yan Sandhi, not Vriddhi Sandhi. The other options correctly represent their respective Sandhi types.
प्रश्न 338
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने किसे 'भारतीय वक्रोक्तिवाद का विलायती उत्थान' कहकर संबोधित किया है ?
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उत्तर और व्याख्या
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अभिव्यंजनावाद को 'भारतीय वक्रोक्तिवाद का विलायती उत्थान' कहकर संबोधित किया है।
Option 3 (अभिव्यंजनावाद) सही क्यों है:
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हिंदी साहित्य के एक प्रतिष्ठित आलोचक थे। उन्होंने साहित्य के विभिन्न वादों और आंदोलनों का गहन अध्ययन किया था। अभिव्यंजनावाद, जो कि क्रोचे (Croce) द्वारा प्रतिपादित एक पश्चिमी साहित्यिक सिद्धांत है, कला को अभिव्यक्ति का माध्यम मानता है। यह सिद्धांत कला में कल्पना, भावना और व्यक्तिगत अनुभव को महत्व देता है।
शुक्ल जी ने अभिव्यंजनावाद में भारतीय वक्रोक्तिवाद के समान तत्व देखे। वक्रोक्तिवाद, जो कि कुंतक द्वारा स्थापित एक भारतीय काव्य सिद्धांत है, काव्य में वक्रता या विचित्रता को सौंदर्य का मूल तत्व मानता है। वक्रोक्ति का अर्थ है कथन को सीधे-सीधे न कहकर घुमा-फिराकर कहना, जिससे उसमें चमत्कार उत्पन्न हो।
शुक्ल जी ने देखा कि अभिव्यंजनावाद भी कला में सीधे-सादे वर्णन की बजाय व्यक्तिगत भावनाओं और कल्पना के माध्यम से अभिव्यक्ति पर जोर देता है, जो कि वक्रोक्तिवाद के समान है। इसलिए, उन्होंने अभिव्यंजनावाद को 'भारतीय वक्रोक्तिवाद का विलायती उत्थान' कहा, जिसका अर्थ है कि यह भारतीय वक्रोक्तिवाद का ही एक पश्चिमी रूप है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
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Option 1 (अभिजात्यवाद): अभिजात्यवाद साहित्य में शास्त्रीय नियमों और परंपराओं का पालन करने पर जोर देता है। यह व्यक्तिगत भावनाओं और कल्पना की बजाय वस्तुनिष्ठता और तर्क को महत्व देता है। इसलिए, यह वक्रोक्तिवाद से अलग है और शुक्ल जी ने इसे 'भारतीय वक्रोक्तिवाद का विलायती उत्थान' नहीं कहा।
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Option 2 (अस्तित्ववाद): अस्तित्ववाद मनुष्य के अस्तित्व, स्वतंत्रता और जिम्मेदारी पर केंद्रित है। यह साहित्य में व्यक्ति के अनुभव और विकल्पों को महत्व देता है। हालांकि, यह वक्रोक्तिवाद के समान नहीं है, क्योंकि वक्रोक्तिवाद काव्य में वक्रता और चमत्कार पर केंद्रित है। इसलिए, शुक्ल जी ने इसे 'भारतीय वक्रोक्तिवाद का विलायती उत्थान' नहीं कहा।
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Option 4 (स्वच्छंदतावाद): स्वच्छंदतावाद (Romanticism) भावनाओं, कल्पना और प्रकृति के प्रति प्रेम पर जोर देता है। यह शास्त्रीय नियमों और परंपराओं का विरोध करता है। हालांकि, यह वक्रोक्तिवाद के समान नहीं है, क्योंकि वक्रोक्तिवाद काव्य में वक्रता और चमत्कार पर केंद्रित है। इसलिए, शुक्ल जी ने इसे 'भारतीय वक्रोक्तिवाद का विलायती उत्थान' नहीं कहा।
इसलिए, केवल अभिव्यंजनावाद ही वह विकल्प है जिसे आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने 'भारतीय वक्रोक्तिवाद का विलायती उत्थान' कहकर संबोधित किया है।
प्रश्न 339
निम्नलिखित काव्य पंक्तियों को सुमेलित कीजिए :
सूची - I : सूची - II
i. आगे के कवि रीझि हैं तो कविताई, न तौ राधिका कन्हाई सुमिरन को बहानौ है। : (a) मतिराम
ii. कुंदन को रंग फीको लगै, झलकै सब अँगन चारु गुराई। : (b) बोधा
iii. यह प्रेम को पंथ कराल महा तरवारि की धार पै धावनौ है। : (c) भिखारीदास
iv. जान तिहारी सो मेरी दसा, यह कौ समझै अरु काहि सुनाऊँ। : (d) घनानंद
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उत्तर और व्याख्या
Option 4 is the correct answer because it accurately matches the given poetic lines with their respective poets. Here's a detailed explanation:
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(i) आगे के कवि रीझि हैं तो कविताई, न तौ राधिका कन्हाई सुमिरन को बहानौ है। : (c) भिखारीदास - This line is indeed attributed to Bhikharidas. Bhikharidas was known for his insightful observations on poetry and his critical perspective on the prevailing trends of his time. This particular line reflects his view that some poets use the names of Radha and Krishna merely as an excuse for writing poetry, rather than genuine devotion.
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(ii) कुंदन को रंग फीको लगै, झलकै सब अँगन चारु गुराई। : (a) मतिराम - This line is correctly matched with Matiram. Matiram was a renowned poet known for his exquisite descriptions of beauty and ornamentation. This line, which describes the radiant beauty of a woman, is characteristic of his style and themes. The comparison of her complexion to the dullness of refined gold (kundan) highlights her exceptional beauty.
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(iii) यह प्रेम को पंथ कराल महा तरवारि की धार पै धावनौ है। : (b) बोधा - This line is correctly attributed to Bodha. Bodha was a poet known for his intense and passionate expressions of love. This line, which compares the path of love to walking on the edge of a sword, perfectly captures the intensity and danger associated with love in his poetry.
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(iv) जान तिहारी सो मेरी दसा, यह कौ समझै अरु काहि सुनाऊँ। : (d) घनानंद - This line is correctly matched with Ghananand. Ghananand was a prominent poet of the Ritikal era, known for his deeply personal and melancholic expressions of love and longing. This line, which expresses the speaker's despair and the difficulty of conveying their emotional state, is characteristic of Ghananand's style.
Why other options are incorrect:
- Option 1: This option incorrectly pairs the lines. For example, it attributes the first line to Bodha, which is incorrect.
- Option 2: This option also incorrectly pairs the lines. It attributes the first line to Bhikharidas, which is correct, but then misattributes other lines.
- Option 3: This option incorrectly pairs the lines. It attributes the first line to Matiram, which is incorrect.
Therefore, only Option 4 provides the correct matching of the poetic lines with their respective poets, making it the correct answer.
प्रश्न 340
आचार्य विश्वनाथ प्रदत्त 'काव्यदोष' की याथातथ्य परिभाषा है :
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उत्तर और व्याख्या
आचार्य विश्वनाथ द्वारा प्रदत्त 'काव्यदोष' की याथातथ्य परिभाषा "रसापकर्षका दोषाः" है, क्योंकि:
- "रसापकर्षका दोषाः" का अर्थ है "दोष जो रस को कम करते हैं"। आचार्य विश्वनाथ ने अपने ग्रंथ 'साहित्य दर्पण' में काव्यदोषों को इसी प्रकार परिभाषित किया है। उनके अनुसार, काव्यदोष वे तत्व हैं जो रस की अनुभूति में बाधा डालते हैं या उसे कम करते हैं। इसलिए, यह परिभाषा सीधे तौर पर आचार्य विश्वनाथ के काव्यदोषों के दृष्टिकोण को दर्शाती है।
अब, अन्य विकल्पों की व्याख्या:
- "महान् निर्दोषिता गुणाः": इसका अर्थ है "महान निर्दोषता गुण है"। यह परिभाषा काव्यदोष की परिभाषा नहीं है, बल्कि गुणों की बात कर रही है। यह काव्यदोष के विपरीत है।
- "विपर्यस्तागुणाः काव्येषु कीर्तिता": इसका अर्थ है "काव्यों में गुणों का विपर्यय वर्णित है"। यह परिभाषा अस्पष्ट है और सीधे तौर पर काव्यदोष को परिभाषित नहीं करती है। यह गुणों के विपरीत होने की बात करती है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि यह दोष कैसे बनता है।
- "गुण विपर्यथात्मनो दोषाः": इसका अर्थ है "गुणों के विपरीत स्वभाव वाले दोष हैं"। यह परिभाषा कुछ हद तक सही हो सकती है, लेकिन "रसापकर्षका दोषाः" की तुलना में कम सटीक है। आचार्य विश्वनाथ ने रस को केंद्र में रखकर दोषों को परिभाषित किया है, जबकि यह विकल्प केवल गुणों के विपरीत होने की बात करता है।
इसलिए, सबसे सटीक और आचार्य विश्वनाथ के दृष्टिकोण के अनुरूप परिभाषा "रसापकर्षका दोषाः" ही है।