HTET Exam Level 3 PGT
HTET exam Level 3 PGT preparation with Clear Cutoff
Verified Answers and Explanations
by Clear Cutoff
Showing 20 of 20 questions
Question 301
Select the correct option :
'She was so happy, her smile was a mile wide' is an example of :
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Answer & Explanation
'She was so happy, her smile was a mile wide' is an example of:
Option 3: Hyperbole is the correct answer because the sentence uses extreme exaggeration to emphasize the woman's happiness. A smile literally being a mile wide is impossible, making it a clear example of hyperbole. The statement is not meant to be taken literally but to create a vivid image of her immense joy.
Here's why the other options are incorrect:
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Option 1: Oxymoron: An oxymoron combines two contradictory terms (e.g., "bitter sweet," "living dead"). The given sentence does not contain any contradictory terms.
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Option 2: Personification: Personification gives human qualities to inanimate objects or abstract ideas (e.g., "The wind whispered secrets"). The sentence describes a human's smile, not attributing human qualities to something non-human.
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Option 4: Paradox: A paradox is a statement that appears self-contradictory but contains a deeper truth (e.g., "Less is more"). The sentence is an exaggeration, not a statement that contradicts itself to reveal a hidden meaning.
Question 302
The words that suggest that the literary device 'Onomatopoeia' is used in these lines are :
"Small feet were pattering, wooden shoes clattering,
Little hands clapping and little tongues chattering."
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Answer & Explanation
The correct answer is Option 4: Both (2) & (3). Here's why:
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Why Option 4 is correct: Onomatopoeia is a literary device where words imitate or resemble the sounds they describe. In the given lines, "pattering" and "clattering" directly mimic the sounds of small feet and wooden shoes, respectively. Similarly, "clapping" and "chattering" imitate the sounds of hands clapping and tongues moving quickly in conversation. Therefore, both options (2) and (3) contain words that exemplify onomatopoeia, making Option 4 the correct choice.
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Why Option 1 is incorrect: "Small feet" and "wooden shoes" are descriptive words, but they do not imitate any sound. They simply describe the objects making the sounds. Therefore, they do not represent onomatopoeia.
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Why Option 2 is partially correct but not the best answer: "Pattering" and "clattering" are indeed examples of onomatopoeia. However, Option 4 is a better answer because it includes all the words in the given lines that demonstrate onomatopoeia.
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Why Option 3 is partially correct but not the best answer: "Clapping" and "chattering" are also examples of onomatopoeia. However, Option 4 is a better answer because it includes all the words in the given lines that demonstrate onomatopoeia.
Question 303
अतीत में दबे पाँव' पाठ के अनुसार निम्नलिखित में से कौन-सी विशेषता मुअनजो-दड़ो शहर की विशेषताओं से सुमेलित नहीं है ?
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Answer & Explanation
घरों के दरवाजे मुख्य सड़कों पर खुलते थे - यह विशेषता मुअनजो-दड़ो शहर की विशेषताओं से सुमेलित नहीं है। मुअनजो-दड़ो में घरों के दरवाजे मुख्य सड़कों पर नहीं, बल्कि गलियों में खुलते थे। इसका कारण यह था कि मुख्य सड़कों पर यातायात और शोरगुल से घरों में रहने वालों को परेशानी न हो। यह गोपनीयता और सुरक्षा के लिहाज से भी बेहतर था।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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यह छोटे-मोटे कृत्रिम टीलों पर नियोजित ढंग से बसा था: यह मुअनजो-दड़ो की एक विशेषता है। शहर को बाढ़ से बचाने और एक समान ऊंचाई प्रदान करने के लिए कृत्रिम टीलों का उपयोग किया गया था। इसलिए यह विकल्प गलत है।
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यहाँ सड़कों और गलियों का पूर्ण विस्तार था: मुअनजो-दड़ो में सड़कों और गलियों का एक सुव्यवस्थित जाल था, जो शहर की योजनाबद्ध संरचना को दर्शाता है। इसलिए यह विकल्प भी गलत है।
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जल-निकास के लिए शहर भर में नालियों का विस्तार था: मुअनजो-दड़ो अपनी उन्नत जल-निकास प्रणाली के लिए प्रसिद्ध था। शहर में नालियों का एक जटिल नेटवर्क था जो घरों से अपशिष्ट जल को बाहर निकालता था। इसलिए यह विकल्प भी गलत है।
इसलिए, केवल विकल्प 4 ही मुअनजो-दड़ो की विशेषताओं से मेल नहीं खाता है, क्योंकि वहाँ घरों के दरवाजे मुख्य सड़कों पर नहीं खुलते थे।
Question 304
‘नमक का दारोगा' किस प्रकार की कहानी है ?
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Answer & Explanation
'नमक का दारोगा' एक आदर्शोन्मुख यथार्थवादी कहानी है, क्योंकि:
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आदर्शोन्मुख: कहानी में वंशीधर का चरित्र आदर्शों का प्रतिनिधित्व करता है। वह ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और सत्यनिष्ठा जैसे मूल्यों को प्राथमिकता देता है, भले ही उसे इसके लिए कठिनाइयों का सामना करना पड़े। अंत में, उसकी ईमानदारी को पुरस्कृत किया जाता है, जो आदर्श की जीत को दर्शाता है।
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यथार्थवादी: कहानी तत्कालीन समाज की वास्तविकता को दर्शाती है, जिसमें भ्रष्टाचार, लालच और नैतिक मूल्यों का पतन व्याप्त था। कहानी में रिश्वतखोरी, अधिकारियों की मिलीभगत और धन के प्रभाव का चित्रण यथार्थवादी है।
इसलिए, 'नमक का दारोगा' आदर्श और यथार्थ के मिश्रण को प्रस्तुत करती है। यह कहानी आदर्शों की स्थापना करते हुए भी समाज की कठोर वास्तविकताओं को उजागर करती है।
अब, अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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यथार्थवादी: केवल यथार्थवादी कहना कहानी के आदर्शवादी पहलू को अनदेखा कर देता है। वंशीधर का चरित्र और अंत में उसकी जीत, कहानी को केवल यथार्थवादी होने से ऊपर उठाती है।
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आदर्शवादी: केवल आदर्शवादी कहना कहानी में मौजूद भ्रष्टाचार और सामाजिक बुराइयों की वास्तविकता को नकारना होगा। कहानी केवल आदर्शों की बात नहीं करती, बल्कि यह दिखाती है कि आदर्शों का पालन करने में कितनी कठिनाइयाँ आती हैं।
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मनोविश्लेषणवादी: कहानी पात्रों के मन की गहराई में जाकर उनके विचारों और भावनाओं का विश्लेषण नहीं करती। यह सामाजिक और नैतिक मुद्दों पर अधिक केंद्रित है, न कि व्यक्तिगत मनोविज्ञान पर। इसलिए, यह मनोविश्लेषणवादी कहानी नहीं है।
अतः, आदर्शोन्मुख यथार्थवादी ही सबसे सटीक विकल्प है, क्योंकि यह कहानी के आदर्शवादी और यथार्थवादी दोनों पहलुओं को समाहित करता है।
Question 305
हिंदी कविता में राष्ट्रीय चेतना की दृष्टि से कौन-सा कथन सही नहीं है ?
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Answer & Explanation
भूषण की राष्ट्रीय भावना में अखंड भारत के निर्माण का स्वर प्रमुख है - यह कथन सही नहीं है।
क्यों विकल्प 2 सही है:
भूषण की कविता में राष्ट्रीय चेतना अवश्य है, लेकिन यह मुख्य रूप से शिवाजी और छत्रसाल जैसे हिंदू राजाओं की वीरता के वर्णन और मुगल साम्राज्य के खिलाफ उनके संघर्षों के चित्रण पर केंद्रित है। उनकी कविता का उद्देश्य हिंदू धर्म और संस्कृति की रक्षा करना और मुगल शासन के अत्याचारों का विरोध करना था। जबकि उनकी कविता में वीरता और देशभक्ति का भाव है, लेकिन "अखंड भारत" (अविभाजित भारत) के निर्माण का स्वर उनकी कविता का प्रमुख विषय नहीं है। उनकी कविता तत्कालीन राजनीतिक और धार्मिक परिस्थितियों के संदर्भ में हिंदू प्रतिरोध और वीरता को उजागर करती है, न कि एक एकीकृत, आधुनिक राष्ट्र की परिकल्पना को।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं:
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विकल्प 1: आश्रयदाता की स्तुति में रचित आदिकालीन वीरगाथात्मक काव्य राष्ट्रीय कविता का संकुचित और विकृत रूप है। यह कथन सही है क्योंकि आदिकालीन वीरगाथात्मक काव्य मुख्य रूप से अपने आश्रयदाताओं (राजाओं) की प्रशंसा में लिखा गया था। इसमें राष्ट्रीय भावना संकुचित रूप में थी, क्योंकि यह किसी विशेष राज्य या राजा के प्रति वफादारी तक सीमित थी, न कि पूरे राष्ट्र के प्रति।
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विकल्प 3: द्विवेदी युग के कवियों की राष्ट्रीय भावना आदर्शवादी है और उसमें सुधार की प्रवृत्ति है। यह कथन भी सही है। द्विवेदी युग के कवियों ने राष्ट्रीय भावना को आदर्शवादी रूप से प्रस्तुत किया और समाज सुधार, शिक्षा के प्रसार और स्वदेशी आंदोलन को बढ़ावा देने पर जोर दिया। उनकी कविता में राष्ट्र के उत्थान और सामाजिक बुराइयों को दूर करने की प्रबल इच्छा थी।
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विकल्प 4: छायावादी कवियों ने अपनी देशभक्ति को एक सांस्कृतिक आवरण से मंडित किया है। यह कथन भी सही है। छायावादी कवियों ने अपनी देशभक्ति को सीधे-सीधे राजनीतिक नारों के रूप में व्यक्त करने के बजाय, प्रकृति, प्रेम और सौंदर्य के माध्यम से व्यक्त किया। उन्होंने भारतीय संस्कृति, इतिहास और दर्शन को अपनी कविताओं में शामिल करके देशभक्ति को एक सांस्कृतिक आवरण प्रदान किया। उनकी कविता में राष्ट्र के प्रति प्रेम और गौरव की भावना सूक्ष्म रूप से व्यक्त हुई है।
Question 306
एक कहानी यह भी' पाठ के अनुसार मन्नू भंडारी को साहित्य की दुनिया में प्रवेश किसने करवाया ?
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Answer & Explanation
प्राध्यापिका शीला अग्रवाल ने ही मन्नू भंडारी को साहित्य की दुनिया में प्रवेश करवाया। 'एक कहानी यह भी' पाठ में मन्नू भंडारी स्पष्ट रूप से बताती हैं कि शीला अग्रवाल ने उन्हें साहित्य पढ़ने और उस पर विचार करने के लिए प्रेरित किया। शीला अग्रवाल ने मन्नू भंडारी को घर पर होने वाली सामान्य गतिविधियों से बाहर निकालकर देश में हो रही राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों के बारे में जागरूक किया। उन्होंने मन्नू भंडारी को साहित्यिक पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया और उनके साथ उन पर चर्चा की, जिससे मन्नू भंडारी की साहित्य में रुचि बढ़ी और वे लेखन की ओर अग्रसर हुईं।
अन्य विकल्प गलत हैं क्योंकि:
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कॉलेज प्रिंसिपल: पाठ में कॉलेज प्रिंसिपल का उल्लेख है, लेकिन उनका मन्नू भंडारी को साहित्य की दुनिया में प्रवेश करवाने में कोई सीधा योगदान नहीं था।
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राजेंद्र यादव: राजेंद्र यादव मन्नू भंडारी के पति थे और एक प्रसिद्ध लेखक भी थे। हालांकि, उनका मन्नू भंडारी के जीवन में बाद में प्रवेश हुआ। शीला अग्रवाल ने मन्नू भंडारी को साहित्य की दुनिया में उनसे पहले ही प्रवेश करवा दिया था।
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डॉ० अंबालाल: पाठ में डॉ० अंबालाल का कोई उल्लेख नहीं है, इसलिए यह विकल्प गलत है।
इसलिए, प्राध्यापिका शीला अग्रवाल ही सही उत्तर हैं क्योंकि पाठ में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि उन्होंने मन्नू भंडारी को साहित्य की दुनिया में प्रवेश करवाया।
Question 307
"संतो देखत जग बौराना।
X X X
टोपी पहिरे माला पहिरे, छाप तिलक अनुमाना।"
- कबीर के उक्त पद का केन्द्रीय भाव है :
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Answer & Explanation
बाह्याडंबरों की निरर्थकता ही कबीर के उक्त पद का केन्द्रीय भाव है। कबीर इस पद में संसार के लोगों की मूर्खता पर व्यंग्य करते हैं। वे कहते हैं कि लोग बाहरी दिखावे में फंसे हुए हैं और सच्चे ज्ञान से दूर हैं। "टोपी पहिरे माला पहिरे, छाप तिलक अनुमाना" पंक्ति दिखाती है कि लोग धार्मिक प्रतीकों और बाहरी वेशभूषा को ही धर्म समझ बैठे हैं, जबकि आंतरिक शुद्धता और सच्चे ज्ञान की कोई परवाह नहीं है। कबीर का मानना है कि ये बाहरी दिखावे व्यर्थ हैं और इनसे ईश्वर की प्राप्ति नहीं हो सकती।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
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संसार की असारता: हालांकि कबीर संसार की नश्वरता की बात करते हैं, लेकिन इस पद का मुख्य जोर संसार की असारता पर नहीं, बल्कि लोगों के दिखावे पर है। पद में संसार की असारता का सीधा वर्णन नहीं है, बल्कि लोगों के कर्मों की निरर्थकता पर प्रकाश डाला गया है।
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योगसाधना की जटिलता: पद में योगसाधना की जटिलता का कोई उल्लेख नहीं है। कबीर बाहरी आडंबरों की आलोचना कर रहे हैं, न कि योग साधना की कठिनाइयों का वर्णन कर रहे हैं।
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धर्मग्रंथों की उपादेयता: कबीर धर्मग्रंथों की आलोचना नहीं कर रहे हैं, बल्कि धर्म के नाम पर किए जाने वाले दिखावे की आलोचना कर रहे हैं। वे धर्मग्रंथों की उपयोगिता पर सवाल नहीं उठा रहे, बल्कि उनके गलत इस्तेमाल पर सवाल उठा रहे हैं।
इसलिए, "बाह्याडंबरों की निरर्थकता" ही इस पद का सही केन्द्रीय भाव है, क्योंकि यह कबीर के संदेश को सटीक रूप से दर्शाता है कि बाहरी दिखावे व्यर्थ हैं और सच्चे ज्ञान का कोई विकल्प नहीं है।
Question 308
तुलसीदास ने अपनी किस रचना में (अन्य रचनाओं की अपेक्षा) चातक की निष्ठा को भक्त की अनन्यता के रूप में विस्तारपूर्वक चित्रित किया है ?
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तुलसीदास ने अपनी दोहावली रचना में (अन्य रचनाओं की अपेक्षा) चातक की निष्ठा को भक्त की अनन्यता के रूप में विस्तारपूर्वक चित्रित किया है।
व्याख्या:
दोहावली में तुलसीदास ने चातक के उदाहरण का प्रयोग भक्त की अनन्य भक्ति और एकनिष्ठ प्रेम को दर्शाने के लिए कई दोहों में किया है। चातक पक्षी, जो केवल स्वाति नक्षत्र की बूंद का ही पान करता है, उसी प्रकार भक्त भी केवल भगवान के प्रति ही समर्पित रहता है। दोहावली में चातक के माध्यम से तुलसीदास ने यह संदेश दिया है कि सच्चा भक्त सांसारिक सुखों की परवाह किए बिना केवल भगवान की भक्ति में लीन रहता है। दोहावली में चातक की निष्ठा का वर्णन अन्य रचनाओं की तुलना में अधिक विस्तार से मिलता है।
अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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विनयपत्रिका: विनयपत्रिका तुलसीदास की एक प्रार्थनापरक रचना है जिसमें उन्होंने भगवान राम से अपनी भक्ति और शरणागति का निवेदन किया है। इसमें भक्ति के विभिन्न पहलुओं का वर्णन है, लेकिन चातक की निष्ठा का इतना विस्तारपूर्वक चित्रण नहीं है जितना दोहावली में है।
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रामचरितमानस: रामचरितमानस तुलसीदास का एक महाकाव्य है जिसमें राम के जीवन की कथा का वर्णन है। इसमें भक्ति के कई उदाहरण मिलते हैं, लेकिन चातक की निष्ठा को विशेष रूप से विस्तार से नहीं दर्शाया गया है।
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कवितावली: कवितावली में राम के जीवन से संबंधित विभिन्न घटनाओं और प्रसंगों का वर्णन है। इसमें भी भक्ति के भाव हैं, लेकिन चातक की निष्ठा का उतना विस्तृत वर्णन नहीं है जितना दोहावली में मिलता है।
इसलिए, दोहावली ही वह रचना है जिसमें तुलसीदास ने चातक की निष्ठा को भक्त की अनन्यता के रूप में विस्तारपूर्वक चित्रित किया है।
Question 309
क्रिया शब्दों के विषय में कौन-सा कथन सही नहीं है ?
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Answer & Explanation
क्रिया शब्दों के विषय में कथन 4 सही नहीं है, क्योंकि सभी प्रेरणार्थक क्रियाएँ अकर्मक नहीं होती हैं। प्रेरणार्थक क्रियाएँ वे होती हैं जिनमें कर्ता स्वयं कार्य न करके किसी और को कार्य करने के लिए प्रेरित करता है।
कथन 4 सही क्यों है:
प्रेरणार्थक क्रियाएँ सकर्मक और अकर्मक दोनों हो सकती हैं। यह इस बात पर निर्भर करता है कि मूल क्रिया सकर्मक है या अकर्मक। यदि मूल क्रिया सकर्मक है, तो प्रेरणार्थक क्रिया भी सकर्मक होगी। उदाहरण के लिए:
- मूल क्रिया (सकर्मक): खाना (राम खाना खाता है)
- प्रेरणार्थक क्रिया (सकर्मक): खिलाना (माँ राम को खाना खिलाती है)
यहाँ 'खिलाना' प्रेरणार्थक क्रिया है और यह सकर्मक है क्योंकि इसमें कर्म (खाना) मौजूद है।
यदि मूल क्रिया अकर्मक है, तो प्रेरणार्थक क्रिया भी अकर्मक हो सकती है, लेकिन यह आवश्यक नहीं है। उदाहरण के लिए:
- मूल क्रिया (अकर्मक): उठना (राम उठता है)
- प्रेरणार्थक क्रिया (सकर्मक): उठाना (माँ राम को उठाती है)
यहाँ 'उठाना' प्रेरणार्थक क्रिया है और यह सकर्मक है क्योंकि इसमें कर्म (राम) मौजूद है।
इसलिए, यह कहना गलत है कि सभी प्रेरणार्थक क्रियाएँ अकर्मक होती हैं।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
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विकल्प 1: कर्म के आधार पर, क्रियाएँ मुख्यतः दो प्रकार की होती हैं - सकर्मक और अकर्मक। यह कथन सही है। सकर्मक क्रियाओं में कर्म होता है, जबकि अकर्मक क्रियाओं में कर्म नहीं होता।
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विकल्प 2: प्रयोग के आधार पर कुछ क्रिया शब्द सकर्मक और अकर्मक दोनों तरह से प्रयुक्त होते हैं। यह कथन भी सही है। कुछ क्रियाएँ वाक्य में प्रयोग के आधार पर सकर्मक या अकर्मक हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, 'पढ़ना' क्रिया सकर्मक (राम किताब पढ़ता है) और अकर्मक (राम पढ़ता है) दोनों हो सकती है।
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विकल्प 3: द्विकर्मक क्रियाओं में एक कर्म प्राणिबोधक और दूसरा कर्म पदार्थबोधक होता है। यह कथन भी सही है। द्विकर्मक क्रियाओं में दो कर्म होते हैं - एक प्रत्यक्ष कर्म (पदार्थबोधक) और एक अप्रत्यक्ष कर्म (प्राणिबोधक)। उदाहरण के लिए, "शिक्षक ने छात्रों को पुस्तक दी" में 'पुस्तक' पदार्थबोधक है और 'छात्रों' प्राणिबोधक है।
Question 310
काव्य हेतु' विषयक कौन-सी विचार-सरणी सही नहीं है ?
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Answer & Explanation
भामह के अनुसार प्रतिभा काव्य का अनिवार्य हेतु नहीं है। प्रतिभा के अभाव में भी अध्ययन और अभ्यास के द्वारा काव्य रचना संभव है - यह विचार-सरणी सही नहीं है।
क्यों विकल्प 4 सही है:
भामह, जो कि एक प्रमुख अलंकारवादी आचार्य हैं, प्रतिभा को काव्य का अनिवार्य हेतु मानते हैं। उनका मानना है कि प्रतिभा (नैसर्गिक प्रतिभा) काव्य रचना का मूल आधार है। उनके अनुसार, प्रतिभा के बिना काव्य रचना संभव नहीं है, भले ही अध्ययन और अभ्यास कितना भी किया जाए। इसलिए, यह कहना कि प्रतिभा अनिवार्य हेतु नहीं है, भामह के विचारों के विपरीत है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं:
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काव्य के मुख्यतः तीन हेतु माने गए हैं - प्रतिभा, व्युत्पत्ति (निपुणता) और अभ्यास । यह कथन सामान्यतः स्वीकृत है और काव्य हेतुओं के संबंध में एक मान्य विचार है। कई आचार्यों ने इन तीनों को काव्य हेतु माना है।
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कवि की नवनवोन्मेषशालिनी बुद्धि को प्रतिभा कहते हैं। यह प्रतिभा की एक सटीक परिभाषा है। 'नवनवोन्मेषशालिनी बुद्धि' का अर्थ है नई-नई कल्पनाओं को जन्म देने वाली बुद्धि, जो कि प्रतिभा का सार है।
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मम्मट शक्ति (प्रतिभा), निपुणता और अभ्यास तीनों को सम्मिलित रूप से काव्य का हेतु मानते हैं। मम्मट ने 'शक्ति' (जो कि प्रतिभा का ही पर्याय है), निपुणता और अभ्यास तीनों को काव्य हेतु माना है। यह कथन मम्मट के काव्य हेतु संबंधी विचारों को सही ढंग से प्रस्तुत करता है।
इसलिए, केवल विकल्प 4 भामह के विचारों के विपरीत होने के कारण गलत है और इस प्रश्न का सही उत्तर है।
Question 311
काव्य गुणों के विषय में कौन-सा कथन सही नहीं है ?
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काव्य गुणों के विषय में कथन 3 सही नहीं है, क्योंकि भरतमुनि ने गुणों को दस शब्दगुणों और दस अर्थगुणों में विभाजित नहीं किया है। भरतमुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में दस गुणों का उल्लेख तो किया है, लेकिन उन्होंने उन्हें शब्दगुणों और अर्थगुणों में विभाजित नहीं किया। उन्होंने केवल दस गुणों की चर्चा की है जो काव्य में होने चाहिए।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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आचार्य वामन गुण को शब्दार्थ का धर्म मानते हैं: यह कथन सही है। आचार्य वामन ने गुणों को शब्द और अर्थ दोनों का धर्म माना है, और उन्होंने 'रीतिरात्मा काव्यस्य' कहकर रीति को काव्य की आत्मा माना है, और रीति गुणों पर आश्रित होती है।
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आनंदवर्धनाचार्य गुण को रस का धर्म मानते हैं: यह कथन भी सही है। आनंदवर्धनाचार्य ने गुणों को रस से संबंधित माना है और उन्हें रस के उत्कर्ष में सहायक माना है। उन्होंने ध्वनि सिद्धांत का प्रतिपादन किया और रस को काव्य की आत्मा माना।
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मम्मट ने तीन ही गुण माने हैं – माधुर्य, ओज और प्रसाद: यह कथन भी सही है। मम्मट ने अपने काव्यप्रकाश में तीन गुणों - माधुर्य, ओज और प्रसाद - का ही उल्लेख किया है और उन्हें काव्य के आवश्यक तत्व माना है।
इसलिए, केवल विकल्प 3 गलत है क्योंकि भरतमुनि ने गुणों को शब्दगुणों और अर्थगुणों में विभाजित नहीं किया था।
Question 312
किस विकल्प में छंद का लक्षण सही नहीं है ?
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Answer & Explanation
Option 4 सही है क्योंकि सोरठा एक मात्रिक अर्धसम छंद है, जिसमें विषम चरणों (पहले और तीसरे) में 11 मात्राएँ और सम चरणों (दूसरे और चौथे) में 13 मात्राएँ होती हैं। इसमें सम चरणों में तुकांत होना अनिवार्य नहीं है, जबकि प्रश्न में कहा गया है कि "सम चरण तुकांत होते हैं।" इसलिए, यह लक्षण सोरठा छंद के लिए हमेशा सही नहीं होता।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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द्रुतविलंबित वर्णिक समवृत्त छंद है, जो नगण, दो भगण और रगण के योग से बनता है। यह विकल्प गलत है क्योंकि द्रुतविलंबित छंद नगण (---), भगण (ऽऽ।), भगण (ऽऽ।), और रगण (।ऽ।) के क्रम से बनता है।
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वंशस्थ वर्णिक समवृत्त छंद है, जो जगण, तगण, जगण और रगण के योग से बनता है। यह विकल्प सही है। वंशस्थ छंद में जगण (।ऽ।), तगण (ऽऽ।), जगण (।ऽ।), और रगण (।ऽ।) का क्रम होता है।
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चौपाई मात्रिक सम छंद है, जिसके अंत में गुरु-लघु (ऽ1) वर्जित माना गया है। यह विकल्प सही है। चौपाई के प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ होती हैं और अंत में गुरु-लघु का प्रयोग सामान्यतः वर्जित माना जाता है।
इसलिए, केवल Option 4 ही गलत लक्षण प्रस्तुत करता है, जो इसे सही उत्तर बनाता है।
Question 313
निम्नलिखित में शुद्ध वाक्य है :
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Answer & Explanation
Option 3, "बालक खाना खाकर और दूध पीकर सो गया," शुद्ध वाक्य है क्योंकि यह व्याकरणिक रूप से सही है और इसका अर्थ स्पष्ट है। क्रियाओं का क्रम सही है - खाना खाना, फिर दूध पीना, और अंत में सोना। वाक्य में कोई अनावश्यक शब्द या दोहराव नहीं है।
अब अन्य विकल्पों की अशुद्धता का कारण:
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हमें सदैव ही सत्य बोलना चाहिए। इस वाक्य में "सदैव" और "ही" दोनों का प्रयोग अनावश्यक है। "सदैव" का अर्थ ही हमेशा होता है, इसलिए "ही" का प्रयोग दोहराव है। शुद्ध वाक्य होगा: "हमें सदैव सत्य बोलना चाहिए" या "हमें सत्य ही बोलना चाहिए।"
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तुम्हारी बात सुनते-सुनते मैं उकता गया हूँ। इस वाक्य में "उकता गया हूँ" की जगह "ऊब गया हूँ" अधिक उपयुक्त होगा। "उकता गया हूँ" गलत नहीं है, लेकिन "ऊब गया हूँ" अधिक सामान्य और स्वाभाविक लगता है। हालांकि, यह अशुद्धि इतनी गंभीर नहीं है कि वाक्य को पूरी तरह से गलत ठहराया जा सके, लेकिन Option 3 की तुलना में यह कम शुद्ध है।
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हमें समस्त प्राणिमात्र का हित सोचना चाहिए। इस वाक्य में "समस्त" और "प्राणिमात्र" दोनों का अर्थ लगभग एक ही है। "प्राणिमात्र" का अर्थ ही सभी प्राणी होता है, इसलिए "समस्त" का प्रयोग अनावश्यक है। शुद्ध वाक्य होगा: "हमें प्राणिमात्र का हित सोचना चाहिए" या "हमें समस्त प्राणियों का हित सोचना चाहिए।"
इसलिए, Option 3 सबसे शुद्ध वाक्य है क्योंकि इसमें कोई व्याकरणिक त्रुटि या अनावश्यक शब्द नहीं हैं।
Question 314
निम्नलिखित में विशेषणयुक्त वाक्य कौन-सा है ?
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Option 1 सही है क्योंकि इसमें विशेषण का प्रयोग हुआ है। वाक्य "मोहन अनेक कलाओं में पारंगत है" में, "अनेक" शब्द "कलाओं" की विशेषता बता रहा है। "अनेक" एक संख्यावाचक विशेषण है जो कलाओं की संख्या को निर्दिष्ट करता है। इसलिए, यह वाक्य विशेषणयुक्त है।
अन्य विकल्प गलत हैं क्योंकि:
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Option 2: हमें बुराई से बचना चाहिए। इस वाक्य में कोई भी शब्द किसी संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता नहीं बता रहा है। "बुराई" एक भाववाचक संज्ञा है, लेकिन वाक्य में कोई विशेषण नहीं है जो इसकी विशेषता बताए।
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Option 3: बच्चों की सफलता से माता-पिता को प्रसन्नता होती है। इस वाक्य में "सफलता" एक संज्ञा है और "प्रसन्नता" एक भाव है, लेकिन कोई भी शब्द किसी संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता नहीं बता रहा है।
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Option 4: वह बिना बताए अचानक चला गया। इस वाक्य में "अचानक" एक क्रियाविशेषण है, जो क्रिया "चला गया" की विशेषता बता रहा है, न कि किसी संज्ञा या सर्वनाम की। इसलिए, यह वाक्य विशेषणयुक्त नहीं है।
इसलिए, केवल Option 1 ही विशेषणयुक्त वाक्य है।
Question 315
वाक्य-रचना से संबंधित कौन-सा विवरण सही नहीं है ?
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Answer & Explanation
वाक्य-रचना से संबंधित विवरणों में से विकल्प 2 सही नहीं है, क्योंकि द्विकर्मक क्रियाओं वाले वाक्यों में मुख्य कर्म पहले और गौण कर्म बाद में आता है, यह हमेशा सत्य नहीं है। अक्सर गौण कर्म (जिसे दिया जाता है) मुख्य कर्म से पहले आता है, खासकर जब गौण कर्म प्राणीवाचक हो।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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वाक्य में पदक्रम का सामान्य नियम है कि पहले कर्ता, फिर कर्म और अंत में क्रिया रखते हैं। यह कथन सामान्यतः सही है। हिंदी वाक्य रचना में कर्ता-कर्म-क्रिया का क्रम अक्सर देखा जाता है। इसलिए यह विकल्प गलत है क्योंकि प्रश्न में गलत विवरण पूछा गया है।
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जिस वाक्य में मुख्य उद्देश्य और मुख्य विधेय के अतिरिक्त एक या अधिक समापिका क्रियाएँ रहती हैं, उसे मिश्र वाक्य कहते हैं। यह कथन मिश्र वाक्य की सही परिभाषा है। मिश्र वाक्य में एक मुख्य उपवाक्य और एक या अधिक आश्रित उपवाक्य होते हैं, जिनमें समापिका क्रियाएँ होती हैं। इसलिए यह विकल्प भी गलत है।
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संयुक्त वाक्य के मुख्य वाक्यों को समानाधिकरण उपवाक्य कहते हैं। यह कथन भी सही है। संयुक्त वाक्य दो या दो से अधिक स्वतंत्र उपवाक्यों से मिलकर बनता है, जिन्हें समानाधिकरण उपवाक्य कहा जाता है। इसलिए यह विकल्प भी गलत है।
इसलिए, केवल विकल्प 2 ही गलत है, क्योंकि द्विकर्मक वाक्यों में कर्मों का क्रम हमेशा निश्चित नहीं होता और गौण कर्म मुख्य कर्म से पहले आ सकता है।
Question 316
कौन-सा कथन संगत नहीं है ?
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Answer & Explanation
भक्तिकालीन कृष्ण काव्य प्रबंध और मुक्तक दोनों रूपों में समान रूप से रचा गया है - यह कथन संगत नहीं है, क्योंकि:
Option 1 सही क्यों है:
भक्तिकालीन कृष्ण काव्य में मुक्तक काव्य का प्रभुत्व था। सूरदास, मीराबाई, रसखान, और अन्य प्रमुख कृष्ण भक्त कवियों ने अधिकतर मुक्तक शैली में ही रचनाएँ की हैं। प्रबंध काव्य (महाकाव्य) की तुलना में मुक्तक काव्य की रचनाएँ बहुत अधिक संख्या में मिलती हैं। प्रबंध काव्य के उदाहरण अपेक्षाकृत कम हैं। इसलिए, यह कहना कि दोनों रूपों में समान रूप से रचना हुई, सही नहीं है। मुक्तक काव्य कृष्ण भक्ति साहित्य का एक महत्वपूर्ण और व्यापक रूप से प्रचलित रूप था, जबकि प्रबंध काव्य अपेक्षाकृत कम प्रचलित था।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
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Option 2: अष्टछाप के कवियों में नन्ददास को छोड़कर प्रायः सभी कवियों ने सूरदास का अनुकरण किया है। यह कथन काफी हद तक सही है। सूरदास अष्टछाप के सबसे प्रमुख कवि थे, और उनकी शैली और विषयों का प्रभाव अन्य कवियों पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। नन्ददास की अपनी विशिष्ट शैली थी, लेकिन फिर भी सूरदास का प्रभाव उन पर भी था।
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Option 3: पुष्टिमार्गीय कृष्ण काव्य में गोपालकृष्ण की बाल लीलाओं को विशेष महत्व दिया गया है। यह कथन बिल्कुल सही है। पुष्टिमार्ग में भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, और इसे भक्ति का एक महत्वपूर्ण अंग माना जाता है।
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Option 4: गुसाईं हितहरिवंश तथा उनके अनुयायी भक्त और स्वामी हरिदास तथा उनके अनुयायी भक्त कवि सभी लगभग एकांत रूप से राधा और गोपियों के साथ कृष्ण की प्रेम लीलाओं के वर्णन में ही अधिक मन दिखाई देते हैं। यह कथन भी सही है। हितहरिवंश और स्वामी हरिदास दोनों ही राधा-कृष्ण की प्रेम लीलाओं के वर्णन में विशेष रूप से रुचि रखते थे, और उनकी रचनाओं में यह स्पष्ट रूप से झलकता है।
इसलिए, केवल Option 1 ही असंगत है क्योंकि भक्तिकालीन कृष्ण काव्य में मुक्तक काव्य का प्रभुत्व था, प्रबंध काव्य का नहीं।
Question 317
निम्नलिखित में विलोम शब्द युग्म नहीं है :
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Answer & Explanation
Option 3 सही उत्तर है क्योंकि 'अनिमेष' और 'निर्निमेष' दोनों ही शब्द एक ही अर्थ को व्यक्त करते हैं - बिना पलक झपकाए। ये दोनों शब्द पर्यायवाची हैं, विलोम नहीं।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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विरल - सघन: 'विरल' का अर्थ है 'कम घना' या 'छितरा हुआ', जबकि 'सघन' का अर्थ है 'घना'। इसलिए, ये दोनों शब्द एक दूसरे के विपरीत अर्थ वाले हैं, और यह एक विलोम शब्द युग्म है।
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संलिप्त - निर्लिप्त: 'संलिप्त' का अर्थ है 'शामिल' या 'लिप्त', जबकि 'निर्लिप्त' का अर्थ है 'अलिप्त' या 'अलग'। इसलिए, ये दोनों शब्द भी एक दूसरे के विपरीत अर्थ वाले हैं, और यह एक विलोम शब्द युग्म है।
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निषिद्ध - विहित: 'निषिद्ध' का अर्थ है 'मना किया हुआ' या 'वर्जित', जबकि 'विहित' का अर्थ है 'अनुमत' या 'उचित'। इसलिए, ये दोनों शब्द भी एक दूसरे के विपरीत अर्थ वाले हैं, और यह एक विलोम शब्द युग्म है।
इसलिए, केवल विकल्प 3, 'अनिमेष - निर्निमेष', विलोम शब्द युग्म नहीं है।
Question 318
"इसमें कवियों की संख्या की अपेक्षा कवियों के महत्त्व पर अधिक ध्यान दिया गया है।......काव्यधाराओं का विवेचन जैसा इस इतिहास में है वैसा अन्यत्र नहीं ।"
शुक्ल जी के ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ के संबंध में उक्त कथन किसका है ?
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Answer & Explanation
शुक्ल जी के ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ के संबंध में उक्त कथन डॉ० रामकुमार वर्मा का है।
Option 3 सही क्यों है:
डॉ० रामकुमार वर्मा ने शुक्ल जी के ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ की आलोचनात्मक समीक्षा करते हुए यह बात कही थी। वर्मा जी ने शुक्ल जी के इतिहास में कवियों की संख्या की अपेक्षा कवियों के महत्त्व पर अधिक ध्यान देने और काव्यधाराओं के विवेचन की गहराई की सराहना की थी। उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि शुक्ल जी ने जिस प्रकार काव्यधाराओं का विवेचन किया है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। रामकुमार वर्मा की आलोचनात्मक दृष्टि शुक्ल जी के इतिहास के गुणों को उजागर करती है, और यह कथन उनके द्वारा शुक्ल जी के कार्य के मूल्यांकन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
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बाबू श्यामसुंदर दास: बाबू श्यामसुंदर दास हिंदी साहित्य के एक महत्वपूर्ण विद्वान थे, लेकिन शुक्ल जी के इतिहास के संबंध में यह विशिष्ट कथन उनसे संबंधित नहीं है। उनके विचार और लेखन शुक्ल जी के इतिहास पर केंद्रित इस विशेष टिप्पणी से अलग हैं।
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डॉ० बच्चन सिंह: डॉ० बच्चन सिंह एक प्रसिद्ध साहित्य इतिहासकार थे, लेकिन यह कथन विशेष रूप से उनके द्वारा शुक्ल जी के इतिहास के बारे में नहीं कहा गया है। बच्चन सिंह की आलोचनात्मक शैली और शुक्ल जी के इतिहास पर उनकी टिप्पणियाँ इस विशिष्ट उद्धरण से भिन्न हैं।
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डॉ० गणपति चंद्र गुप्त: डॉ० गणपति चंद्र गुप्त भी हिंदी साहित्य के इतिहासकार थे, लेकिन यह कथन उनके द्वारा शुक्ल जी के इतिहास के बारे में नहीं कहा गया है। गुप्त जी का दृष्टिकोण और शुक्ल जी के इतिहास पर उनकी टिप्पणियाँ इस विशिष्ट उद्धरण से अलग हैं।
इसलिए, दिए गए विकल्पों में से, डॉ० रामकुमार वर्मा ही वह व्यक्ति हैं जिन्होंने शुक्ल जी के ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ के संबंध में उक्त कथन कहा था।
Question 319
निम्नलिखित में से कौन-सा तत्त्व संत काव्यधारा में परिलक्षित नहीं होता है ?
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Answer & Explanation
वैष्णवों की नवधा भक्ति का परंपरा समर्थित रूप का समर्थन करना, संत काव्यधारा में परिलक्षित नहीं होता है। इसका कारण यह है कि संत काव्यधारा, भक्ति के बाह्य आडंबरों और कर्मकांडों का विरोध करती है। वैष्णवों की नवधा भक्ति में पूजा-पाठ, मूर्ति पूजा, तीर्थ यात्रा आदि कर्मकांडों पर जोर दिया जाता है, जबकि संत कवि इन सब से ऊपर उठकर आंतरिक साधना, नाम-स्मरण और गुरु के मार्गदर्शन को महत्व देते हैं।
अब अन्य विकल्पों पर विचार करते हैं:
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नाम-जप को साधना का मूलाधार मानना: यह संत काव्यधारा का एक महत्वपूर्ण अंग है। संत कबीर, नानक, रैदास आदि सभी ने नाम-स्मरण को मुक्ति का मार्ग बताया है।
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गुरु को ब्रह्म से भी महान मानना: संत काव्यधारा में गुरु को अत्यधिक महत्व दिया गया है। गुरु को ज्ञान का स्रोत और ईश्वर तक पहुंचने का मार्गदर्शक माना जाता है। कई संतों ने गुरु को ब्रह्म से भी ऊपर माना है क्योंकि गुरु ही ब्रह्म का ज्ञान कराते हैं।
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साधना का द्वार सबके लिए उन्मुक्त मानना: संत काव्यधारा जाति, धर्म, लिंग आदि के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव का विरोध करती है। संत कवि मानते थे कि ईश्वर की भक्ति का अधिकार सभी को है, चाहे वे किसी भी जाति या धर्म के हों।
इसलिए, केवल वैष्णवों की नवधा भक्ति का परंपरा समर्थित रूप का समर्थन करना ही संत काव्यधारा में परिलक्षित नहीं होता है, क्योंकि यह कर्मकांडों और बाह्य आडंबरों पर आधारित है, जबकि संत काव्यधारा आंतरिक साधना और नाम-स्मरण पर जोर देती है।
Question 320
निम्नलिखित में से कौन-सी कृति साहित्य अकादमी से पुरस्कृत नहीं हुई है ?
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सूरज का सातवाँ घोड़ा साहित्य अकादमी से पुरस्कृत नहीं हुई है, इसलिए विकल्प 3 सही है। इसका कारण यह है कि यह कृति साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त करने वाली कृतियों की सूची में शामिल नहीं है।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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कलिकथा : वाया बाइपास: यह कृति अलका सरावगी द्वारा रचित है और इसे 2001 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इसलिए यह विकल्प गलत है।
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पो० बॉक्स नं० २०३ - नालासोपारा: यह चित्रा मुद्गल द्वारा रचित है और इसे 2018 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इसलिए यह विकल्प भी गलत है।
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मुझे चाँद चाहिए: यह सुरेंद्र वर्मा द्वारा रचित है और इसे 1996 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इसलिए यह विकल्प भी गलत है।
अतः, केवल "सूरज का सातवाँ घोड़ा" ही साहित्य अकादमी से पुरस्कृत नहीं है, इसलिए विकल्प 3 सही उत्तर है।