HTET Exam Level 3 PGT
HTET exam Level 3 PGT preparation with Clear Cutoff
Verified Answers and Explanations
by Clear Cutoff
Showing 20 of 20 questions
Question 321
विकल्प द्वारा निम्नलिखित रचनाओं और रचनाकारों को सुमेलित कीजिए :
रचना : रचनाकार
(अ) पहाड़ पर लालटेन : (i) सुदामा पांडेय 'धूमिल'
(ब) कल सुनना मुझे : (ii) मंगलेश डबराल
(स) खूँटियों पर टँगे लोग : (iii) शमशेर बहादुर सिंह
(द) चुका भी हूँ मैं नहीं : (iv) सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
विकल्प :
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Answer & Explanation
Option 3 is the correct answer because it accurately matches the literary works with their respective authors:
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(अ) पहाड़ पर लालटेन : (ii) मंगलेश डबराल: The poem "पहाड़ पर लालटेन" (Pahar Par Lalten) is indeed written by Manglesh Dabral. This is a well-known fact in Hindi literature.
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(ब) कल सुनना मुझे : (i) सुदामा पांडेय 'धूमिल': The collection of poems "कल सुनना मुझे" (Kal Sunna Mujhe) is a significant work by Sudama Pandey 'Dhoomil'. This is a widely recognized association.
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(स) खूँटियों पर टँगे लोग : (iv) सर्वेश्वरदयाल सक्सेना: "खूँटियों पर टँगे लोग" (Khuntiyon Par Tange Log) is a famous work by Sarveshwar Dayal Saxena. This pairing is accurate.
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(द) चुका भी हूँ मैं नहीं : (iii) शमशेर बहादुर सिंह: "चुका भी हूँ मैं नहीं" (Chuka Bhi Hun Main Nahin) is a notable collection of poems by Shamsher Bahadur Singh. This is a correct match.
Now, let's explain why the other options are incorrect:
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Option 1: This option incorrectly pairs "पहाड़ पर लालटेन" with Shamsher Bahadur Singh, "कल सुनना मुझे" with Manglesh Dabral, "खूँटियों पर टँगे लोग" with Sudama Pandey 'Dhoomil', and "चुका भी हूँ मैं नहीं" with Sarveshwar Dayal Saxena. None of these pairings are accurate.
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Option 2: This option incorrectly pairs "पहाड़ पर लालटेन" with Shamsher Bahadur Singh, "कल सुनना मुझे" with Manglesh Dabral, "खूँटियों पर टँगे लोग" with Sudama Pandey 'Dhoomil', and "चुका भी हूँ मैं नहीं" with Sarveshwar Dayal Saxena. None of these pairings are accurate.
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Option 4: This option incorrectly pairs "पहाड़ पर लालटेन" with Sudama Pandey 'Dhoomil', "कल सुनना मुझे" with Sarveshwar Dayal Saxena, "खूँटियों पर टँगे लोग" with Manglesh Dabral, and "चुका भी हूँ मैं नहीं" with Shamsher Bahadur Singh. Only the last pairing is correct, making the entire option incorrect.
Therefore, Option 3 is the only option that provides the correct pairings of the literary works and their authors.
Question 322
"जब कि प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है तब यह निश्चित है कि जनता की चित्तवृत्ति के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता चला जाता है।"
- उक्त विचार किसका है ?
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Answer & Explanation
आचार्य रामचंद्र शुक्ल
आचार्य रामचंद्र शुक्ल सही उत्तर क्यों है:
आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिंदी साहित्य के एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रभावशाली आलोचक थे। उनकी आलोचना पद्धति में समाज और साहित्य के बीच के संबंध को बहुत महत्व दिया जाता था। दिया गया कथन, जिसमें साहित्य को जनता की चित्तवृत्ति का प्रतिबिंब बताया गया है और यह कहा गया है कि चित्तवृत्ति में परिवर्तन के साथ साहित्य में भी परिवर्तन होता है, शुक्ल जी के विचारों के अनुरूप है। शुक्ल जी ने अपने इतिहास ग्रंथ 'हिंदी साहित्य का इतिहास' में भी इस बात पर जोर दिया है कि साहित्य तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों से प्रभावित होता है। उनका मानना था कि साहित्य समाज का दर्पण होता है और उसमें समाज की भावनाएं और विचार प्रतिबिंबित होते हैं। इसलिए, यह कथन आचार्य रामचंद्र शुक्ल का होना सबसे अधिक संभावित है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
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बाबू गुलाबराय: बाबू गुलाबराय एक प्रसिद्ध निबंधकार और आलोचक थे, लेकिन उनकी आलोचना शैली शुक्ल जी की तुलना में अधिक व्यक्तिगत और भावनात्मक थी। वे साहित्य और समाज के बीच के संबंध पर उतना जोर नहीं देते थे जितना शुक्ल जी देते थे।
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आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी: आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी एक महान विद्वान और आलोचक थे, लेकिन उनकी आलोचना शैली शुक्ल जी से भिन्न थी। द्विवेदी जी भारतीय संस्कृति और दर्शन पर अधिक ध्यान केंद्रित करते थे और उनकी आलोचना में मानवतावादी दृष्टिकोण प्रमुख होता था। जबकि दिया गया कथन साहित्य और समाज के बीच के संबंध पर अधिक केंद्रित है, जो शुक्ल जी की आलोचना शैली के अधिक अनुरूप है।
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डॉ. नगेंद्र: डॉ. नगेंद्र एक प्रसिद्ध आलोचक थे, लेकिन उनकी आलोचना शैली आधुनिकतावादी थी और वे साहित्य के मनोवैज्ञानिक और सौंदर्यशास्त्रीय पहलुओं पर अधिक ध्यान केंद्रित करते थे। दिया गया कथन साहित्य और समाज के बीच के संबंध पर अधिक केंद्रित है, जो शुक्ल जी की आलोचना शैली के अधिक अनुरूप है।
इसलिए, उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि दिया गया कथन आचार्य रामचंद्र शुक्ल के विचारों के सबसे अधिक अनुरूप है।
Question 323
एक कुत्ता और एक मैना' पाठ के अनुसार किस रचनाकार की कविताओं में पशु-पक्षियों के संवेदनशील जीवन का बहुत सूक्ष्म निरीक्षण है ?
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Answer & Explanation
रवींद्रनाथ टैगोर।
व्याख्या:
'एक कुत्ता और एक मैना' पाठ में रवींद्रनाथ टैगोर के पशु-पक्षियों के प्रति प्रेम और संवेदनशीलता का स्पष्ट चित्रण है। पाठ में टैगोर के आश्रम, शांतिनिकेतन, और वहां के पशु-पक्षियों के साथ उनके गहरे संबंध का वर्णन है। टैगोर न केवल पशु-पक्षियों को पालते थे, बल्कि उनकी भावनाओं को समझते थे और अपनी कविताओं में उन्हें स्थान देते थे। उनकी रचनाओं में प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति एक विशेष प्रकार का अनुराग दिखाई देता है। 'एक कुत्ता और एक मैना' पाठ स्वयं इस बात का प्रमाण है कि टैगोर ने पशु-पक्षियों के संवेदनशील जीवन का बहुत सूक्ष्म निरीक्षण किया और उसे अपनी रचनाओं में व्यक्त किया।
अन्य विकल्पों की अस्वीकृति:
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हजारीप्रसाद द्विवेदी: हजारीप्रसाद द्विवेदी एक महान निबंधकार और आलोचक थे। उनकी रचनाओं में भारतीय संस्कृति, दर्शन और साहित्य का गहरा अध्ययन दिखाई देता है। हालांकि उन्होंने प्रकृति और जीवन के विभिन्न पहलुओं पर लिखा है, लेकिन उनकी रचनाओं में पशु-पक्षियों के संवेदनशील जीवन का उतना सूक्ष्म निरीक्षण नहीं मिलता जितना रवींद्रनाथ टैगोर की रचनाओं में।
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महादेवी वर्मा: महादेवी वर्मा एक प्रसिद्ध कवयित्री थीं और उनकी कविताओं में प्रकृति का चित्रण मिलता है, लेकिन उनकी रचनाओं में मुख्य रूप से मानवीय भावनाओं और दर्शन का प्रभाव अधिक होता है। उन्होंने पशु-पक्षियों पर भी लिखा है, लेकिन रवींद्रनाथ टैगोर की तरह उनके जीवन का सूक्ष्म निरीक्षण उनकी रचनाओं में उतना प्रमुख नहीं है।
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सुमित्रानंदन पंत: सुमित्रानंदन पंत प्रकृति के कवि के रूप में जाने जाते हैं और उनकी कविताओं में प्रकृति का सुंदर वर्णन मिलता है। उन्होंने भी पशु-पक्षियों पर लिखा है, लेकिन रवींद्रनाथ टैगोर की तरह उनके जीवन के सूक्ष्म निरीक्षण और संवेदनशीलता का स्तर उनकी रचनाओं में उतना स्पष्ट नहीं है।
इसलिए, 'एक कुत्ता और एक मैना' पाठ के अनुसार, रवींद्रनाथ टैगोर ही वह रचनाकार हैं जिनकी कविताओं में पशु-पक्षियों के संवेदनशील जीवन का बहुत सूक्ष्म निरीक्षण है।
Question 324
कौन-सा कथन सही नहीं है ?
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Answer & Explanation
कथन 1 सही नहीं है क्योंकि सभी विद्वानों ने क्रियाविशेषणों के केवल दो भेद (रीतिवाचक और कालवाचक) नहीं माने हैं। क्रियाविशेषणों के मुख्यतः चार भेद माने जाते हैं: रीतिवाचक, कालवाचक, स्थानवाचक और परिमाणवाचक। कुछ विद्वान इन्हें और भी उपभेदों में विभाजित करते हैं, लेकिन मूल रूप से चार भेद सर्वमान्य हैं। इसलिए, यह कहना कि सभी विद्वानों ने केवल दो भेद माने हैं, गलत है।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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विकल्प 2: प्रयोग के अनुसार संबंधसूचक अव्यय दो प्रकार के होते हैं - संबद्ध और अनुबद्ध या असंबद्ध। यह कथन सही है। संबंधसूचक अव्यय वाक्य में संज्ञा या सर्वनाम के साथ संबंध दर्शाते हैं और प्रयोग के आधार पर इन्हें संबद्ध (जो संज्ञा के साथ आते हैं) और अनुबद्ध (जो संज्ञा से अलग आते हैं) में वर्गीकृत किया जा सकता है।
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विकल्प 3: समुच्चयबोधक अव्ययों के मुख्यतः दो भेद हैं – समानाधिकरण और व्यधिकरण। यह कथन भी सही है। समुच्चयबोधक अव्यय दो शब्दों, वाक्यांशों या वाक्यों को जोड़ने का काम करते हैं और इन्हें समानाधिकरण (समान स्तर के वाक्यों को जोड़ने वाले) और व्यधिकरण (आश्रित वाक्यों को जोड़ने वाले) में विभाजित किया जाता है।
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विकल्प 4: विस्मयादिबोधक शब्द वाक्य से स्वतंत्र होते हैं। यह कथन भी सही है। विस्मयादिबोधक शब्द आश्चर्य, हर्ष, शोक आदि भावों को व्यक्त करते हैं और इनका वाक्य की संरचना पर सीधा प्रभाव नहीं होता; ये स्वतंत्र रूप से प्रयुक्त होते हैं।
इसलिए, केवल विकल्प 1 गलत है क्योंकि यह क्रियाविशेषणों के भेदों की संख्या को गलत बताता है।
Question 325
कौन-सा कथन असंगत है ?
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Answer & Explanation
Option 2 असंगत है क्योंकि अभिधा शक्ति शब्द के मुख्य या प्राथमिक अर्थ का बोध कराती है, न कि प्रसंग प्राप्त अन्य अर्थों का। प्रसंग प्राप्त अन्य अर्थों का बोध लक्षणा या व्यंजना शक्तियों द्वारा होता है। अभिधा शक्ति केवल शब्द का सीधा, शाब्दिक अर्थ बताती है।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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अभिधा को आचार्यों ने 'शब्द की प्रथमा शक्ति' कहा है। यह कथन सत्य है। अभिधा को शब्द की पहली और सबसे महत्वपूर्ण शक्ति माना जाता है क्योंकि यह शब्द का मूल अर्थ बताती है।
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शब्दकोष में शब्द का जो अर्थ दिया जाता है, उसका आधार अभिधा शक्ति ही है। यह कथन भी सत्य है। शब्दकोष में किसी शब्द का जो अर्थ दिया जाता है, वह उसका अभिधात्मक अर्थ होता है, यानी उसका सीधा और प्राथमिक अर्थ।
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अभिधा शक्ति के द्वारा तीन प्रकार के शब्दों – रूढ़ि, यौगिक और योगरूढ़ि का अर्थबोध होता है। यह कथन भी सत्य है। अभिधा शक्ति इन तीनों प्रकार के शब्दों का अर्थ स्पष्ट करती है। रूढ़ि शब्द (जैसे 'हाथ') अपने आप में एक अर्थ रखते हैं, यौगिक शब्द (जैसे 'विद्यालय') दो या दो से अधिक शब्दों के मेल से बनते हैं और उनका अर्थ उनके घटकों से समझा जा सकता है, और योगरूढ़ि शब्द (जैसे 'पंकज') यौगिक होते हुए भी एक विशेष अर्थ में रूढ़ हो जाते हैं, और इन सभी का अर्थबोध अभिधा शक्ति से होता है।
इसलिए, केवल Option 2 ही असंगत है क्योंकि यह अभिधा शक्ति के कार्य को गलत तरीके से प्रस्तुत करता है।
Question 326
संधि की दृष्टि से असंगत विकल्प का चयन कीजिए :
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Answer & Explanation
संधि की दृष्टि से असंगत विकल्प वाणी + औचित्य = वाण्योचित्य है, क्योंकि यह गुण संधि का सही उदाहरण नहीं है।
विस्तृत स्पष्टीकरण:
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विकल्प 4 सही क्यों है: "वाणी + औचित्य = वाण्योचित्य" में संधि गलत है। यहाँ 'इ' और 'औ' मिलकर 'यौ' नहीं बनाते। सही संधि "वाणी + औचित्य = वाणौचित्य" होगी, जो कि यण संधि का उदाहरण है। 'इ' के बाद असमान स्वर आने पर 'इ' का 'य्' हो जाता है।
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अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
- विकल्प 1: षट् + आत्मा = षडात्मा: यह व्यंजन संधि का सही उदाहरण है। 'ट्' के बाद स्वर आने पर 'ट्' का 'ड्' हो जाता है।
- विकल्प 2: उद् + श्वसन = उच्छ्वसन: यह व्यंजन संधि का सही उदाहरण है। 'द्' के बाद 'श्' आने पर 'द्' का 'च्' और 'श्' का 'छ' हो जाता है।
- विकल्प 3: सु + अल्प = स्वल्प: यह यण संधि का सही उदाहरण है। 'उ' के बाद असमान स्वर आने पर 'उ' का 'व्' हो जाता है।
इसलिए, केवल विकल्प 4 में संधि गलत है, जो इसे असंगत बनाता है।
Question 327
किस शब्द का संधि विच्छेद सही नहीं है ?
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Answer & Explanation
घटाटोप = घटा + अटोप इस शब्द का संधि विच्छेद सही नहीं है, क्योंकि 'घटाटोप' शब्द में वृद्धि संधि है और इसका सही संधि विच्छेद 'घटा + अटोप' नहीं, बल्कि 'घटा + ओघ' होना चाहिए। 'ओघ' का अर्थ है समूह या ढेर, और 'घटाटोप' का अर्थ है बादलों का समूह या बादलों का घेरा। 'अटोप' का कोई सार्थक अर्थ इस संदर्भ में नहीं है। इसलिए, घटा + अटोप संधि विच्छेद व्याकरणिक रूप से सही नहीं है।
अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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शरासन = शर + आसन: यह संधि विच्छेद सही है। 'शर' का अर्थ है बाण और 'आसन' का अर्थ है बैठने का स्थान। शरासन का अर्थ है बाण रखने का आसन या धनुष।
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पर्यंक = परि + अंक: यह संधि विच्छेद भी सही है। 'परि' का अर्थ है चारों ओर और 'अंक' का अर्थ है गोद या स्थान। पर्यंक का अर्थ है पलंग या बिस्तर, जो चारों ओर से घिरा हुआ होता है।
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सदाशय = सत् + आशय: यह संधि विच्छेद भी सही है। 'सत्' का अर्थ है अच्छा या सत्य और 'आशय' का अर्थ है इरादा या विचार। सदाशय का अर्थ है अच्छा इरादा रखने वाला।
इसलिए, केवल घटाटोप = घटा + अटोप ही गलत संधि विच्छेद है।
Question 328
"या अनुरागी चित्त की, गति समुझै नहिं कोय।
ज्यों-ज्यों बूड़ै स्याम रंग, त्यों-त्यों उज्ज्वल होय।"
- उक्त दोहे में प्रयुक्त अलंकार हैं :
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Answer & Explanation
विरोधाभास और श्लेष
व्याख्या:
यह दोहा विरोधाभास और श्लेष अलंकारों का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
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विरोधाभास: दोहे में स्पष्ट रूप से विरोधाभास दिखाई देता है। "ज्यों-ज्यों बूड़ै स्याम रंग, त्यों-त्यों उज्ज्वल होय" पंक्ति में, श्याम रंग (काला रंग) में डूबने पर उज्ज्वल (सफेद/चमकदार) होने की बात कही गई है, जो कि सामान्य अनुभव के विपरीत है। काला रंग किसी वस्तु को और गहरा करता है, न कि उज्ज्वल। यह विरोधाभास अलंकार का स्पष्ट उदाहरण है।
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श्लेष: "स्याम रंग" शब्द में श्लेष अलंकार है। "स्याम रंग" का एक अर्थ है काला रंग, और दूसरा अर्थ है भगवान कृष्ण का रंग (जो श्याम वर्ण के हैं)। जब कोई व्यक्ति कृष्ण के प्रेम में डूबता है, तो वह और अधिक उज्ज्वल (पवित्र, निर्मल) हो जाता है। इस प्रकार, "स्याम रंग" शब्द एक ही समय में दो अलग-अलग अर्थों को व्यक्त करता है, जिससे श्लेष अलंकार उत्पन्न होता है।
अन्य विकल्पों की अस्वीकृति:
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श्लेष और दीपक: श्लेष अलंकार तो है, लेकिन दीपक अलंकार इस दोहे में नहीं है। दीपक अलंकार में किसी एक स्थान पर धर्म (गुण) का उल्लेख करके उसे अन्य स्थानों पर भी लागू किया जाता है, जो इस दोहे में नहीं है।
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विरोधाभास और उत्प्रेक्षा: विरोधाभास अलंकार तो है, लेकिन उत्प्रेक्षा अलंकार नहीं है। उत्प्रेक्षा अलंकार में उपमेय में उपमान की संभावना व्यक्त की जाती है (जैसे 'मानो', 'जनु', 'मनु' आदि शब्दों का प्रयोग होता है), जो इस दोहे में नहीं है।
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श्लेष और भ्रांतिमान: श्लेष अलंकार तो है, लेकिन भ्रांतिमान अलंकार नहीं है। भ्रांतिमान अलंकार में किसी वस्तु को किसी अन्य वस्तु के रूप में भ्रमित किया जाता है, जो इस दोहे में नहीं है।
इसलिए, विरोधाभास और श्लेष अलंकारों की उपस्थिति के कारण विकल्प 4 सही है।
Question 329
"एत एव विपर्यस्ता गुणाः काव्येषु कीर्तिताः।" गुण विषयक उक्त मत किस आचार्य का है ?
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Answer & Explanation
"एत एव विपर्यस्ता गुणाः काव्येषु कीर्तिताः।" गुण विषयक उक्त मत भरतमुनि का है।
Option 1 (भरतमुनि) सही क्यों है:
भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में गुणों और दोषों का विवेचन किया गया है। भरतमुनि ने गुणों के विपर्यय (विपरीत) को दोष माना है। "एत एव विपर्यस्ता गुणाः काव्येषु कीर्तिताः।" इस कथन का तात्पर्य है कि गुणों के विपरीत होने पर वे दोष बन जाते हैं। भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में दस गुणों का उल्लेख किया है, और उनके विपरीत दस दोषों का भी। यह कथन सीधे तौर पर भरतमुनि के गुणों और दोषों के विवेचन से संबंधित है, जहाँ गुणों के अभाव या विपरीतता को दोष के रूप में देखा जाता है। इसलिए, यह कथन भरतमुनि के गुण विषयक मत को दर्शाता है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
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Option 2 (वामन): वामन ने काव्य में गुणों को 'काव्य शोभायाः कर्तारो धर्मा गुणाः' कहकर परिभाषित किया है और गुणों को काव्य की शोभा बढ़ाने वाले धर्म माना है। वामन ने गुणों को शब्द और अर्थ दोनों के धर्म के रूप में स्वीकार किया है। हालांकि, "एत एव विपर्यस्ता गुणाः काव्येषु कीर्तिताः।" यह विशिष्ट कथन वामन के सिद्धांतों से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ नहीं है। वामन ने गुणों के विपर्यय को दोष के रूप में स्पष्ट रूप से नहीं बताया, जैसा कि भरतमुनि ने किया है।
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Option 3 (भामह): भामह ने काव्य में गुणों का उल्लेख किया है, लेकिन उनका ध्यान मुख्य रूप से अलंकारों पर केंद्रित था। भामह ने गुणों को अलंकारों के सहायक के रूप में देखा। "एत एव विपर्यस्ता गुणाः काव्येषु कीर्तिताः।" यह कथन भामह के सिद्धांतों से सीधे तौर पर संबंधित नहीं है, क्योंकि भामह ने गुणों के विपर्यय को दोष के रूप में उतनी स्पष्टता से नहीं बताया जितना भरतमुनि ने।
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Option 4 (आनंदवर्धन): आनंदवर्धन ध्वनि सिद्धांत के प्रवर्तक हैं और उनका ध्यान काव्य में ध्वनि के महत्व पर केंद्रित था। आनंदवर्धन ने गुणों को रस के अनुरूप माना है। "एत एव विपर्यस्ता गुणाः काव्येषु कीर्तिताः।" यह कथन आनंदवर्धन के सिद्धांतों से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ नहीं है, क्योंकि आनंदवर्धन ने गुणों के विपर्यय को दोष के रूप में उतनी स्पष्टता से नहीं बताया जितना भरतमुनि ने।
इसलिए, सबसे उपयुक्त उत्तर भरतमुनि (Option 1) है, क्योंकि यह कथन उनके गुणों और दोषों के विवेचन से सीधे तौर पर संबंधित है।
Question 330
किस शब्द में अपत्यवाचक 'अ' प्रत्यय का प्रयोग हुआ है ?
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Answer & Explanation
दिए गए विकल्पों में से, 'दौहित्र' शब्द में अपत्यवाचक 'अ' प्रत्यय का प्रयोग हुआ है। इसका स्पष्टीकरण इस प्रकार है:
- दौहित्र: 'दौहित्र' शब्द 'दुहिता' (बेटी) से बना है। 'दुहिता' में 'अ' प्रत्यय लगने से 'दौहित्र' बनता है, जिसका अर्थ होता है 'बेटी का पुत्र' या 'नाती'। इस प्रकार, 'दौहित्र' शब्द अपत्यवाचक है, क्योंकि यह संतान या वंश को दर्शाता है।
अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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आदित्य: 'आदित्य' शब्द 'अदिति' से बना है, जो एक देवी का नाम है। 'आदित्य' का अर्थ है 'अदिति के पुत्र' या 'सूर्य'। हालाँकि यह भी किसी रूप में संबंध दर्शाता है, लेकिन यह सीधे तौर पर अपत्यवाचक 'अ' प्रत्यय के प्रयोग से नहीं बना है, बल्कि 'य' प्रत्यय के प्रयोग से बना है।
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वात्स्यायन: 'वात्स्यायन' शब्द 'वत्स' से संबंधित है, जो एक गोत्र या ऋषि का नाम हो सकता है। 'वात्स्यायन' का अर्थ है 'वत्स के वंशज'। इसमें 'अयन' प्रत्यय का प्रयोग हुआ है, जो गोत्र या वंश को दर्शाता है, लेकिन यह अपत्यवाचक 'अ' प्रत्यय नहीं है।
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पाथेय: 'पाथेय' शब्द 'पथ' (रास्ता) से बना है। 'पाथेय' का अर्थ है 'रास्ते में ले जाने योग्य' या 'यात्रा के लिए भोजन'। यह शब्द किसी संतान या वंश को नहीं दर्शाता है, इसलिए यह अपत्यवाचक नहीं है। इसमें 'एय' प्रत्यय का प्रयोग हुआ है।
इसलिए, केवल 'दौहित्र' शब्द ही अपत्यवाचक 'अ' प्रत्यय का सही उदाहरण है।
Question 331
विदेशी भाषा के उपसर्गों से निर्मित शब्द पहचानिए :
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Answer & Explanation
दरअसल, बेचारा
व्याख्या:
विदेशी भाषा के उपसर्गों से निर्मित शब्द पहचानने हैं।
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दरअसल: यह शब्द 'दर' (फ़ारसी उपसर्ग) + 'असल' से मिलकर बना है। 'दर' का अर्थ है 'में' या 'के भीतर'। इसलिए, 'दरअसल' एक विदेशी उपसर्ग से बना शब्द है।
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बेचारा: यह शब्द 'बे' (फ़ारसी उपसर्ग) + 'चारा' से मिलकर बना है। 'बे' का अर्थ है 'बिना' या 'रहित'। इसलिए, 'बेचारा' भी एक विदेशी उपसर्ग से बना शब्द है।
इसलिए, विकल्प 4 सही है क्योंकि इसमें दोनों शब्द विदेशी उपसर्गों से बने हैं।
अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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कापथ, कुसंग: 'का' और 'कु' दोनों हिंदी के उपसर्ग हैं। इसलिए यह विकल्प गलत है।
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औतार, दुबला: 'औ' और 'दु' दोनों हिंदी के उपसर्ग हैं। इसलिए यह विकल्प गलत है।
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कुलक्षणी, निराकार: 'कु' और 'नि' दोनों हिंदी के उपसर्ग हैं। इसलिए यह विकल्प गलत है।
अतः, केवल विकल्प 4 में दिए गए शब्द विदेशी भाषा के उपसर्गों से निर्मित हैं।
Question 332
किस विद्वान ने कनौजी और बुंदेली का अलग-अलग अस्तित्व न मानकर उन्हें ब्रजभाषा के ही उपरूप माना है ?
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Answer & Explanation
Explanation:
Option 2: धीरेंद्र वर्मा (Dhirendra Verma) - Correct
धीरेंद्र वर्मा ने कनौजी और बुंदेली को ब्रजभाषा के ही उपरूप माना है। उनकी भाषावैज्ञानिक दृष्टि ब्रजभाषा के क्षेत्र को व्यापक मानती है और कनौजी तथा बुंदेली को ब्रजभाषा के अंतर्गत ही समाहित करती है। उन्होंने इन दोनों बोलियों की संरचना और शब्दावली में ब्रजभाषा के साथ समानताएं देखीं, जिसके आधार पर उन्होंने यह मत प्रस्तुत किया कि ये ब्रजभाषा से अलग स्वतंत्र भाषाएँ नहीं हैं, बल्कि उसी की उपभाषाएँ हैं। उनके इस मत का समर्थन उनके भाषा संबंधी अध्ययनों और विश्लेषणों से होता है।
Why other options are incorrect:
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Option 1: भोलानाथ तिवारी (Bholanath Tiwari): भोलानाथ तिवारी एक प्रतिष्ठित भाषावैज्ञानिक थे, लेकिन उनका दृष्टिकोण कनौजी और बुंदेली के संबंध में धीरेंद्र वर्मा से भिन्न था। उन्होंने इन बोलियों को ब्रजभाषा के उपरूप के रूप में नहीं देखा।
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Option 3: जॉर्ज ग्रियर्सन (George Grierson): जॉर्ज ग्रियर्सन ने 'लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया' में भारतीय भाषाओं और बोलियों का विस्तृत सर्वेक्षण किया, लेकिन उनका वर्गीकरण और विश्लेषण धीरेंद्र वर्मा के मत से अलग था। ग्रियर्सन ने कनौजी और बुंदेली को अलग-अलग बोलियों के रूप में मान्यता दी थी, न कि ब्रजभाषा के उपरूप के रूप में।
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Option 4: सुनीतिकुमार चटर्जी (Suniti Kumar Chatterji): सुनीतिकुमार चटर्जी एक प्रसिद्ध भाषाविद थे, जिन्होंने भारतीय भाषाओं के विकास और वर्गीकरण पर महत्वपूर्ण कार्य किया। हालाँकि, कनौजी और बुंदेली को ब्रजभाषा के उपरूप मानने का मत उनसे संबंधित नहीं है। उनका ध्यान मुख्य रूप से भाषाओं के ऐतिहासिक विकास और उनके पारस्परिक संबंधों पर केंद्रित था, न कि इस विशिष्ट वर्गीकरण पर।
Therefore, based on the provided information and the given correct answer, धीरेंद्र वर्मा (Dhirendra Verma) is the most appropriate answer.
Question 333
छाया मत छूना' कविता में 'छाया' शब्द से कवि का क्या अभिप्राय है ?
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Answer & Explanation
विगत की सुखद काल्पनिकता।
व्याख्या:
'छाया मत छूना' कविता में 'छाया' शब्द से कवि का अभिप्राय 'विगत की सुखद काल्पनिकता' है। कविता में कवि अतीत के सुखद पलों को याद करने से मना करते हैं क्योंकि वे वर्तमान के दुखों को और बढ़ा देते हैं। 'छाया' यहाँ उन बीते हुए सुखद अनुभवों और स्मृतियों का प्रतीक है जो अब केवल कल्पना मात्र हैं और वास्तविकता से दूर हैं। इन स्मृतियों को छूने का अर्थ है, उनमें खो जाना और वर्तमान की चुनौतियों से मुँह मोड़ना, जो कि कवि के अनुसार उचित नहीं है।
अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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भविष्य की चुनौतियाँ: भविष्य की चुनौतियों को 'छाया' कहना उचित नहीं है क्योंकि कविता में अतीत पर ध्यान केंद्रित किया गया है, न कि भविष्य पर।
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जीवन की कठोर वास्तविकता: जीवन की कठोर वास्तविकता 'छाया' नहीं है, बल्कि वह वर्तमान है जिससे कवि मुँह मोड़ने के बजाय सामना करने की बात करते हैं।
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छल-कपट और दुर्विचार: छल-कपट और दुर्विचार नकारात्मक भावनाएँ हैं, जबकि 'छाया' शब्द का प्रयोग कविता में सुखद स्मृतियों के संदर्भ में किया गया है, भले ही वे अब केवल कल्पना मात्र हों। इसलिए यह विकल्प भी सही नहीं है।
अतः, 'छाया' शब्द का सही अभिप्राय 'विगत की सुखद काल्पनिकता' ही है, क्योंकि यह कविता के मूल भाव और संदेश के अनुरूप है।
Question 334
"भक्ति आंदोलन के पूर्व सबसे शक्तिशाली धार्मिक आंदोलन गोरखनाथ का योगमार्ग ही था।"
- उक्त कथन किसका है ?
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Answer & Explanation
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी।
व्याख्या:
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने भक्ति आंदोलन के पूर्व गोरखनाथ के योगमार्ग को सबसे शक्तिशाली धार्मिक आंदोलन माना था। द्विवेदी जी ने नाथ संप्रदाय और गोरखनाथ के साहित्य का गहन अध्ययन किया और उनके प्रभाव को भक्ति आंदोलन की पृष्ठभूमि के रूप में स्थापित किया। उन्होंने अपनी रचनाओं में गोरखनाथ के योगमार्ग की व्यापकता और समाज पर उसके गहरे प्रभाव का उल्लेख किया है। द्विवेदी जी का मानना था कि गोरखनाथ के योगमार्ग ने तत्कालीन धार्मिक और सामाजिक परिवेश में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसने बाद में भक्ति आंदोलन के लिए एक मजबूत आधार तैयार किया।
अन्य विकल्पों की अस्वीकृति:
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डॉ० पीतांबरदत्त बड़थ्वाल: डॉ० पीतांबरदत्त बड़थ्वाल ने गोरखनाथ के साहित्य पर महत्वपूर्ण कार्य किया है, विशेष रूप से 'गोरखबानी' का संपादन। हालांकि, इस विशिष्ट कथन के लिए उन्हें श्रेय नहीं दिया जाता है।
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आचार्य रामचंद्र शुक्ल: आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिंदी साहित्य के इतिहास के एक प्रमुख विद्वान हैं, लेकिन यह कथन विशेष रूप से उनके विचारों से संबंधित नहीं है। शुक्ल जी का ध्यान भक्ति आंदोलन के साहित्यिक और दार्शनिक पहलुओं पर अधिक केंद्रित था।
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डॉ० रामकुमार वर्मा: डॉ० रामकुमार वर्मा ने हिंदी साहित्य के आलोचनात्मक इतिहास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, लेकिन यह कथन विशेष रूप से उनके द्वारा प्रतिपादित नहीं किया गया है।
इसलिए, दिए गए विकल्पों में से, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ही वह विद्वान हैं जिन्होंने भक्ति आंदोलन के पूर्व गोरखनाथ के योगमार्ग को सबसे शक्तिशाली धार्मिक आंदोलन माना था।
Question 335
किस विद्वान ने केवल पश्चिमी हिंदी और पूर्वी हिंदी को ही वास्तविक हिंदी माना है ?
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Answer & Explanation
जॉर्ज ग्रियर्सन ने ही केवल पश्चिमी हिंदी और पूर्वी हिंदी को वास्तविक हिंदी माना है, इस बात का समर्थन इस प्रकार है:
जॉर्ज ग्रियर्सन ने अपने भाषा सर्वेक्षण, 'लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया' में हिंदी को परिभाषित करते समय पश्चिमी हिंदी और पूर्वी हिंदी को ही महत्वपूर्ण माना। उन्होंने इन दोनों बोलियों को ही 'हिंदी' के अंतर्गत शामिल किया और अन्य बोलियों को, जैसे कि बिहारी बोलियों को, हिंदी से अलग माना। ग्रियर्सन का वर्गीकरण भाषा विज्ञान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान है, और उनके द्वारा हिंदी की परिभाषा में पश्चिमी और पूर्वी हिंदी पर जोर देना ऐतिहासिक रूप से दर्ज है। इसलिए, यह कहना उचित है कि जॉर्ज ग्रियर्सन ने केवल पश्चिमी हिंदी और पूर्वी हिंदी को ही वास्तविक हिंदी माना।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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उदयनारायण तिवारी: उदयनारायण तिवारी एक प्रतिष्ठित भाषाविद थे, लेकिन उनकी हिंदी भाषा की परिभाषा ग्रियर्सन से भिन्न थी। उन्होंने हिंदी के विभिन्न रूपों को मान्यता दी, केवल पश्चिमी और पूर्वी हिंदी तक सीमित नहीं रहे।
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सुनीतिकुमार चटर्जी: सुनीतिकुमार चटर्जी भी एक जाने-माने भाषाविद थे, और उन्होंने भारतीय भाषाओं के विकास पर महत्वपूर्ण कार्य किया है। उनकी हिंदी की परिभाषा में विभिन्न बोलियों को शामिल किया गया, और वे केवल पश्चिमी और पूर्वी हिंदी तक सीमित नहीं थे।
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भोलानाथ तिवारी: भोलानाथ तिवारी एक प्रसिद्ध हिंदी भाषाविद थे, और उन्होंने हिंदी व्याकरण और भाषा विज्ञान पर महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनकी हिंदी की परिभाषा भी व्यापक थी और उन्होंने विभिन्न बोलियों को हिंदी के अंतर्गत माना, केवल पश्चिमी और पूर्वी हिंदी तक सीमित नहीं।
इसलिए, दिए गए विकल्पों में से, जॉर्ज ग्रियर्सन ही वह विद्वान हैं जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से केवल पश्चिमी हिंदी और पूर्वी हिंदी को वास्तविक हिंदी माना।
Question 336
निम्नलिखित में से कौन-सा विचार अम्बेडकर के विचारों के अनुरूप नहीं है?
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Answer & Explanation
Option 1 सही है क्योंकि अम्बेडकर जातिप्रथा को श्रम विभाजन की दोषमुक्त व्यवस्था नहीं मानते थे। वास्तव में, उन्होंने जातिप्रथा को एक अत्यंत अन्यायपूर्ण और शोषणकारी व्यवस्था माना जो जन्म के आधार पर लोगों को विभाजित करती है और उन्हें समान अवसर से वंचित करती है। अम्बेडकर ने जातिप्रथा को भारतीय समाज के लिए एक अभिशाप माना और इसे पूरी तरह से समाप्त करने के लिए संघर्ष किया। उनके अनुसार, जातिप्रथा न केवल श्रम विभाजन है, बल्कि श्रमिकों का विभाजन भी है, जो सामाजिक और आर्थिक असमानता को बढ़ाता है।
अब, अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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Option 2 गलत है क्योंकि: अम्बेडकर नागरिकों को समान अवसर और समान व्यवहार उपलब्ध कराकर समता स्थापित करने के विचार से सहमत थे। उन्होंने सामाजिक न्याय और समानता के लिए संघर्ष किया, और उनका मानना था कि सभी नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के समान अवसर मिलने चाहिए।
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Option 3 गलत है क्योंकि: अम्बेडकर मनुष्य को शक्ति के सक्षम और प्रभावशाली प्रयोग की स्वतंत्रता के पक्षधर थे, लेकिन इस शक्ति का उपयोग सामाजिक न्याय और समानता को बढ़ावा देने के लिए किया जाना चाहिए। उन्होंने हमेशा दबे-कुचले वर्गों को सशक्त बनाने और उन्हें अपने अधिकारों के लिए लड़ने के लिए प्रोत्साहित किया।
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Option 4 गलत है क्योंकि: अम्बेडकर भाईचारे को लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण पहलू मानते थे। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं है, बल्कि सामाजिक और आर्थिक समानता पर भी आधारित होना चाहिए, जो भाईचारे के बिना संभव नहीं है। उन्होंने भाईचारे को लोकतंत्र का दूसरा नाम माना।
इसलिए, केवल Option 1 ही अम्बेडकर के विचारों के अनुरूप नहीं है।
Question 337
"प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भय बानर निकर।
आई गयउ हनुमान जिमि................।।"
- लक्ष्मण मूर्च्छा से संबंधित उक्त काव्यांश में हनुमान के अवतरण को किस रूप में चित्रित किया गया है ?
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Answer & Explanation
करुण रस के बीच वीर रस का प्रस्फुटन - यह विकल्प सही है क्योंकि दिए गए काव्यांश में लक्ष्मण की मूर्च्छा के कारण वानर सेना में करुणा और व्याकुलता का माहौल है। हनुमान का आगमन इस करुणापूर्ण वातावरण में वीर रस का संचार करता है। हनुमान का आना एक आशा की किरण है, जो लक्ष्मण को बचाने और संकट को दूर करने की शक्ति का प्रतीक है। यह एक वीर रस का प्रस्फुटन है क्योंकि हनुमान संकटमोचन बनकर आते हैं और वानर सेना में उत्साह का संचार करते हैं।
अन्य विकल्प गलत हैं क्योंकि:
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करुण रस के बीच शांत रस का आविर्भाव: शांत रस वैराग्य और शांति की भावना को दर्शाता है, जो कि हनुमान के आगमन के समय वानर सेना की स्थिति के विपरीत है। हनुमान का आगमन निष्क्रियता नहीं, बल्कि सक्रियता और वीरता का प्रतीक है।
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शृंगार रस के बीच रौद्र रस की विकरालता: शृंगार रस प्रेम और सौंदर्य से संबंधित है, जो कि इस परिस्थिति में अनुपयुक्त है। रौद्र रस क्रोध और भयानक भावनाओं को दर्शाता है, जबकि हनुमान का आगमन क्रोधित नहीं, बल्कि सहायक और वीर है।
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भयानक रस के बीच हास्य रस की फुहार: भयानक रस डर और भय को दर्शाता है, जबकि हास्य रस हंसी और मनोरंजन को। हनुमान का आगमन डर को कम करता है और आशा का संचार करता है, लेकिन यह हास्यपूर्ण नहीं है।
Question 338
किस विकल्प में परस्पर पर्यायवाची शब्द नहीं हैं ?
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Answer & Explanation
गिरि, कानन विकल्प में परस्पर पर्यायवाची शब्द नहीं हैं, इसलिए यह सही उत्तर है। इसका कारण इस प्रकार है:
- गिरि: गिरि का अर्थ होता है पर्वत या पहाड़।
- कानन: कानन का अर्थ होता है वन या जंगल।
स्पष्ट रूप से, "गिरि" (पर्वत) और "कानन" (जंगल) दोनों अलग-अलग अर्थ रखते हैं और एक दूसरे के पर्यायवाची नहीं हैं। इसलिए, विकल्प 1 में पर्यायवाची शब्द नहीं हैं।
अब अन्य विकल्पों की व्याख्या:
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तालाब, तड़ाग: तालाब और तड़ाग दोनों ही जलाशय या पोखर के पर्यायवाची हैं। इसलिए यह विकल्प गलत है क्योंकि इसमें पर्यायवाची शब्द हैं।
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पुरंदर, इंद्र: पुरंदर और इंद्र दोनों ही देवताओं के राजा के नाम हैं और पर्यायवाची हैं। इसलिए यह विकल्प भी गलत है।
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यमुना, कालिंदी: यमुना और कालिंदी दोनों ही एक ही नदी के नाम हैं और पर्यायवाची हैं। इसलिए यह विकल्प भी गलत है।
अतः, केवल विकल्प 1 ("गिरि, कानन") में पर्यायवाची शब्द नहीं हैं। इसलिए यही सही उत्तर है।
Question 339
“एते वैदर्भमार्गस्य प्राणः दश गुणाः स्मृताः।”
- उक्त मत किस आचार्य का है ?
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Answer & Explanation
दिए गए प्रश्न के अनुसार, सही उत्तर विकल्प 1, दंडी है। इसका विस्तृत स्पष्टीकरण इस प्रकार है:
दंडी क्यों सही उत्तर हैं:
दंडी, 7वीं शताब्दी के एक प्रसिद्ध संस्कृत कवि और आचार्य थे। वे अपने ग्रंथ 'काव्यादर्श' के लिए जाने जाते हैं। 'काव्यादर्श' में, दंडी ने वैदर्भ मार्ग (शैली) के दस गुणों का उल्लेख किया है। यह पंक्ति, "एते वैदर्भमार्गस्य प्राणः दश गुणाः स्मृताः," सीधे तौर पर दंडी के वैदर्भ मार्ग के दस गुणों के वर्णन से संबंधित है। दंडी ने इन दस गुणों को वैदर्भ मार्ग की आत्मा माना है, जो उनकी शैली की विशिष्टता को दर्शाता है। इसलिए, यह कथन दंडी के मत को दर्शाता है।
अन्य विकल्प क्यों गलत हैं:
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वामन: वामन 8वीं शताब्दी के आचार्य थे और वे अपने ग्रंथ 'काव्यालंकारसूत्रवृत्ति' के लिए जाने जाते हैं। वामन ने रीति सिद्धांत का प्रतिपादन किया, लेकिन वैदर्भ मार्ग के दस गुणों का उल्लेख उस विशिष्ट तरीके से नहीं किया जिस तरह से दंडी ने किया है।
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भरतमुनि: भरतमुनि नाट्यशास्त्र के रचयिता हैं, जो नाट्यकला और प्रदर्शन कलाओं से संबंधित है। उनका ध्यान रस, भाव और अभिनय पर अधिक था, न कि काव्य शैलियों के विशिष्ट गुणों पर।
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भामह: भामह 7वीं शताब्दी के आचार्य थे और 'काव्यालंकार' के लेखक हैं। भामह ने काव्य लक्षणों और दोषों पर विचार किया, लेकिन वैदर्भ मार्ग के दस गुणों का उल्लेख उस विशिष्ट तरीके से नहीं किया जिस तरह से दंडी ने किया है।
इसलिए, केवल दंडी ही ऐसे आचार्य हैं जिन्होंने वैदर्भ मार्ग के दस गुणों को विशेष रूप से परिभाषित किया और उन्हें उस शैली की आत्मा माना। इसलिए, विकल्प 1, दंडी, सही उत्तर है।
Question 340
शृंगार रस विषयक कौन-सा कथन गलत है ?
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Answer & Explanation
शृंगार रस विषयक कथन 4 गलत है, क्योंकि इसमें समस्त सात्विक भावों और संचारी भावों का समावेश नहीं होता।
Option 4 सही क्यों है:
शृंगार रस में सभी सात्विक और संचारी भावों का समावेश होना आवश्यक नहीं है। कुछ सात्विक भाव जैसे कि रोमांच, स्वेद (पसीना), कम्प (काँपना) आदि शृंगार रस में स्वाभाविक रूप से पाए जा सकते हैं, लेकिन सभी सात्विक भाव (जैसे स्तम्भ, वैवर्ण्य, अश्रु, प्रलय) और सभी संचारी भाव (जैसे निर्वेद, ग्लानि, शंका, असूया, मद, श्रम, आलस्य, दैन्य, चिंता, मोह, स्मृति, धृति, व्रीड़ा, चपलता, हर्ष, आवेग, जड़ता, गर्व, विषाद, औत्सुक्य, निद्रा, अपस्मार, स्वप्न, विबोध, अमर्ष, अवहित्था, उग्रता, मति, व्याधि, उन्माद, मरण, त्रास, वितर्क, श्रम) अनिवार्य रूप से उपस्थित नहीं होते। शृंगार रस की अनुभूति विशिष्ट भावों के संयोजन से होती है, न कि सभी भावों के अनिवार्य मिश्रण से। इसलिए, यह कहना कि इसमें समस्त सात्विक और संचारी भावों का समावेश हो जाता है, गलत है।
अन्य विकल्प गलत क्यों हैं:
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भरतमुनि इसे उज्ज्वल, पवित्र और उत्तम मानकर इसका रसराजत्व सिद्ध करते हैं। यह कथन सही है। भरतमुनि ने शृंगार रस को महत्वपूर्ण माना है और इसे 'रसराज' के रूप में प्रतिष्ठित किया है।
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इसके उद्दीपक विभावों के अन्तर्गत मानव, मानवेतर प्रकृति, देवता, जड़, चेतन सभी आ जाते हैं। यह कथन भी सही है। शृंगार रस के उद्दीपक विभावों में नायक-नायिका, प्रकृति, और अन्य परिस्थितियाँ शामिल हो सकती हैं जो प्रेम और आकर्षण को बढ़ाती हैं।
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नायक-नायिका के संबंधों की कल्पना के आधार पर इसके दो भेद किए गए हैं। यह कथन भी सही है। शृंगार रस के दो मुख्य भेद हैं - संयोग शृंगार (मिलन की अवस्था) और वियोग शृंगार (विरह की अवस्था)। ये भेद नायक-नायिका के संबंधों पर आधारित हैं।