HTET परीक्षा - Level 3 PGT - हिंदी

Clear Cutoff के साथ HTET परीक्षा Level 3 PGT की तैयारी

Question Details
Exam: HTET
Level: Level 3 PGT
State: Haryana
Subject: Hindi
Questions: 761
विषय-वार प्रश्न

Clear Cutoff द्वारा

20 में से 20 प्रश्न दिखाए जा रहे हैं

प्रश्न 701

रचना कौशल

‘हिमालय की बेटियाँ’ अध्याय में काका कालेलकर ने नदियों को किस नाम से पुकारा है ?

अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।

प्रश्न 702

रचना कौशल

लाख की चूड़ियाँ' में लेखक 'बदलू' को क्या कहकर पुकारता है ?

अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।

प्रश्न 703

रचना कौशल

निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर दिये गये प्रश्नों के उत्तर सबसे उचित विकल्प चुनकर दीजिए :

बुद्धिजीवी वह है, जो विचार के माध्यम से सत्य का अन्वेषण करता है। सत्य की अवधारणा सुन्दर है, किन्तु बहुत अमूर्त और द्वेधात्मक भी है ... शायद समस्त सार्वभौमिक अवधारणाओं की तरह वह थोड़ा अस्पष्ट होती है। बुद्धिजीवी यदि अन्य दार्शनिकों और तत्त्ववेत्ताओं से थोड़ा अलग होता है, तो मेरे विचार में इसलिए कि वह सार्वभौमिक और विशिष्ट के बीच नाजुक और मूल्यवान सन्तुलन बनाने का प्रयास करता है...... समाज की हर विशिष्ट समस्या पर विचार करते समय उसके सामने कुछ ऐसे 'मूल्य' होते हैं, जो 'परम और शाश्वत' होते हैं ...... जरूरी नहीं, वह उन्हें परिभाषित करे - किन्तु उनके आलोक में वह अच्छे और बुरे, नैतिक और अनैतिक, सही और गलत का विवेक अर्जित करता है। वह जो है, उसके यथार्थ का तटस्थ ढंग से यथावत् विश्लेषण करता है...... पूर्ण रूप से वस्तुपरक होना उसकी प्राथमिक शर्त है ...... किन्तु यह ही काफी नहीं है। वस्तुपरक तो वैज्ञानिक, समाजशास्त्री, गणितज्ञ भी होते हैं......... यदि बुद्धिजीवी उनसे अलग है, तो इसलिए कि वह जो है, उसका अवलोकन करते समय, जो 'होना चाहिए' उसके बारे में विचार करता है

........और इस तरह एक नैतिक आयाम स्वतः ही उसके बौद्धिक कार्य-कलाप के साथ जुड़ जाता है। बुद्धि के माध्यम से वह आलोचनात्मक चेतना का संवाहक बन जाता है।
चेतना का यह तत्व ही है, जो भारतीय परम्परा में बुद्धिजीवी को एक मनीषी का गौरव प्रदान करता है। एक ऐसा व्यक्ति ही मनीषी की मर्यादा को प्राप्त करता है - जिसका विचार तन्त्र मनुष्य का समूचा अस्तित्व हो ..... और यह तभी सम्भव हो सकता है, जब वह अपनी बुद्धि को प्रज्ञा में परिलक्षित कर सकने के योग्य हो - प्रज्ञा वह समझदारी है, जहाँ मनुष्य अपने आत्म में रहकर भी समूची सृष्टि से ...... जिसमें चराचर सब शामिल है, एकात्म स्थापित कर लेता है।

सत्य की अवधारणा होती है

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प्रश्न 704

रचना कौशल

निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर दिये गये प्रश्नों के उत्तर सबसे उचित विकल्प चुनकर दीजिए :

बुद्धिजीवी वह है, जो विचार के माध्यम से सत्य का अन्वेषण करता है। सत्य की अवधारणा सुन्दर है, किन्तु बहुत अमूर्त और द्वेधात्मक भी है ... शायद समस्त सार्वभौमिक अवधारणाओं की तरह वह थोड़ा अस्पष्ट होती है। बुद्धिजीवी यदि अन्य दार्शनिकों और तत्त्ववेत्ताओं से थोड़ा अलग होता है, तो मेरे विचार में इसलिए कि वह सार्वभौमिक और विशिष्ट के बीच नाजुक और मूल्यवान सन्तुलन बनाने का प्रयास करता है...... समाज की हर विशिष्ट समस्या पर विचार करते समय उसके सामने कुछ ऐसे 'मूल्य' होते हैं, जो 'परम और शाश्वत' होते हैं ...... जरूरी नहीं, वह उन्हें परिभाषित करे - किन्तु उनके आलोक में वह अच्छे और बुरे, नैतिक और अनैतिक, सही और गलत का विवेक अर्जित करता है। वह जो है, उसके यथार्थ का तटस्थ ढंग से यथावत् विश्लेषण करता है...... पूर्ण रूप से वस्तुपरक होना उसकी प्राथमिक शर्त है ...... किन्तु यह ही काफी नहीं है। वस्तुपरक तो वैज्ञानिक, समाजशास्त्री, गणितज्ञ भी होते हैं......... यदि बुद्धिजीवी उनसे अलग है, तो इसलिए कि वह जो है, उसका अवलोकन करते समय, जो 'होना चाहिए' उसके बारे में विचार करता है

........और इस तरह एक नैतिक आयाम स्वतः ही उसके बौद्धिक कार्य-कलाप के साथ जुड़ जाता है। बुद्धि के माध्यम से वह आलोचनात्मक चेतना का संवाहक बन जाता है।
चेतना का यह तत्व ही है, जो भारतीय परम्परा में बुद्धिजीवी को एक मनीषी का गौरव प्रदान करता है। एक ऐसा व्यक्ति ही मनीषी की मर्यादा को प्राप्त करता है - जिसका विचार तन्त्र मनुष्य का समूचा अस्तित्व हो ..... और यह तभी सम्भव हो सकता है, जब वह अपनी बुद्धि को प्रज्ञा में परिलक्षित कर सकने के योग्य हो - प्रज्ञा वह समझदारी है, जहाँ मनुष्य अपने आत्म में रहकर भी समूची सृष्टि से ...... जिसमें चराचर सब शामिल है, एकात्म स्थापित कर लेता है।

बुद्धिजीवी के कार्य-कलापों में नैतिक आयाम कब जुड़ता है ?

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प्रश्न 705

रचना कौशल

निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर दिये गये प्रश्नों के उत्तर सबसे उचित विकल्प चुनकर दीजिए :

बुद्धिजीवी वह है, जो विचार के माध्यम से सत्य का अन्वेषण करता है। सत्य की अवधारणा सुन्दर है, किन्तु बहुत अमूर्त और द्वेधात्मक भी है ... शायद समस्त सार्वभौमिक अवधारणाओं की तरह वह थोड़ा अस्पष्ट होती है। बुद्धिजीवी यदि अन्य दार्शनिकों और तत्त्ववेत्ताओं से थोड़ा अलग होता है, तो मेरे विचार में इसलिए कि वह सार्वभौमिक और विशिष्ट के बीच नाजुक और मूल्यवान सन्तुलन बनाने का प्रयास करता है...... समाज की हर विशिष्ट समस्या पर विचार करते समय उसके सामने कुछ ऐसे 'मूल्य' होते हैं, जो 'परम और शाश्वत' होते हैं ...... जरूरी नहीं, वह उन्हें परिभाषित करे - किन्तु उनके आलोक में वह अच्छे और बुरे, नैतिक और अनैतिक, सही और गलत का विवेक अर्जित करता है। वह जो है, उसके यथार्थ का तटस्थ ढंग से यथावत् विश्लेषण करता है...... पूर्ण रूप से वस्तुपरक होना उसकी प्राथमिक शर्त है ...... किन्तु यह ही काफी नहीं है। वस्तुपरक तो वैज्ञानिक, समाजशास्त्री, गणितज्ञ भी होते हैं......... यदि बुद्धिजीवी उनसे अलग है, तो इसलिए कि वह जो है, उसका अवलोकन करते समय, जो 'होना चाहिए' उसके बारे में विचार करता है

........और इस तरह एक नैतिक आयाम स्वतः ही उसके बौद्धिक कार्य-कलाप के साथ जुड़ जाता है। बुद्धि के माध्यम से वह आलोचनात्मक चेतना का संवाहक बन जाता है।
चेतना का यह तत्व ही है, जो भारतीय परम्परा में बुद्धिजीवी को एक मनीषी का गौरव प्रदान करता है। एक ऐसा व्यक्ति ही मनीषी की मर्यादा को प्राप्त करता है - जिसका विचार तन्त्र मनुष्य का समूचा अस्तित्व हो ..... और यह तभी सम्भव हो सकता है, जब वह अपनी बुद्धि को प्रज्ञा में परिलक्षित कर सकने के योग्य हो - प्रज्ञा वह समझदारी है, जहाँ मनुष्य अपने आत्म में रहकर भी समूची सृष्टि से ...... जिसमें चराचर सब शामिल है, एकात्म स्थापित कर लेता है।

वस्तुपरक ज्ञान होता है

अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।

प्रश्न 706

रचना कौशल

निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर दिये गये प्रश्नों के उत्तर सबसे उचित विकल्प चुनकर दीजिए :

बुद्धिजीवी वह है, जो विचार के माध्यम से सत्य का अन्वेषण करता है। सत्य की अवधारणा सुन्दर है, किन्तु बहुत अमूर्त और द्वेधात्मक भी है ... शायद समस्त सार्वभौमिक अवधारणाओं की तरह वह थोड़ा अस्पष्ट होती है। बुद्धिजीवी यदि अन्य दार्शनिकों और तत्त्ववेत्ताओं से थोड़ा अलग होता है, तो मेरे विचार में इसलिए कि वह सार्वभौमिक और विशिष्ट के बीच नाजुक और मूल्यवान सन्तुलन बनाने का प्रयास करता है...... समाज की हर विशिष्ट समस्या पर विचार करते समय उसके सामने कुछ ऐसे 'मूल्य' होते हैं, जो 'परम और शाश्वत' होते हैं ...... जरूरी नहीं, वह उन्हें परिभाषित करे - किन्तु उनके आलोक में वह अच्छे और बुरे, नैतिक और अनैतिक, सही और गलत का विवेक अर्जित करता है। वह जो है, उसके यथार्थ का तटस्थ ढंग से यथावत् विश्लेषण करता है...... पूर्ण रूप से वस्तुपरक होना उसकी प्राथमिक शर्त है ...... किन्तु यह ही काफी नहीं है। वस्तुपरक तो वैज्ञानिक, समाजशास्त्री, गणितज्ञ भी होते हैं......... यदि बुद्धिजीवी उनसे अलग है, तो इसलिए कि वह जो है, उसका अवलोकन करते समय, जो 'होना चाहिए' उसके बारे में विचार करता है

........और इस तरह एक नैतिक आयाम स्वतः ही उसके बौद्धिक कार्य-कलाप के साथ जुड़ जाता है। बुद्धि के माध्यम से वह आलोचनात्मक चेतना का संवाहक बन जाता है।
चेतना का यह तत्व ही है, जो भारतीय परम्परा में बुद्धिजीवी को एक मनीषी का गौरव प्रदान करता है। एक ऐसा व्यक्ति ही मनीषी की मर्यादा को प्राप्त करता है - जिसका विचार तन्त्र मनुष्य का समूचा अस्तित्व हो ..... और यह तभी सम्भव हो सकता है, जब वह अपनी बुद्धि को प्रज्ञा में परिलक्षित कर सकने के योग्य हो - प्रज्ञा वह समझदारी है, जहाँ मनुष्य अपने आत्म में रहकर भी समूची सृष्टि से ...... जिसमें चराचर सब शामिल है, एकात्म स्थापित कर लेता है।

भारतीय परंपरा में 'मनीषी' कहलाता है

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प्रश्न 707

रचना कौशल

निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर दिये गये प्रश्नों के उत्तर सबसे उचित विकल्प चुनकर दीजिए :

बुद्धिजीवी वह है, जो विचार के माध्यम से सत्य का अन्वेषण करता है। सत्य की अवधारणा सुन्दर है, किन्तु बहुत अमूर्त और द्वेधात्मक भी है ... शायद समस्त सार्वभौमिक अवधारणाओं की तरह वह थोड़ा अस्पष्ट होती है। बुद्धिजीवी यदि अन्य दार्शनिकों और तत्त्ववेत्ताओं से थोड़ा अलग होता है, तो मेरे विचार में इसलिए कि वह सार्वभौमिक और विशिष्ट के बीच नाजुक और मूल्यवान सन्तुलन बनाने का प्रयास करता है...... समाज की हर विशिष्ट समस्या पर विचार करते समय उसके सामने कुछ ऐसे 'मूल्य' होते हैं, जो 'परम और शाश्वत' होते हैं ...... जरूरी नहीं, वह उन्हें परिभाषित करे - किन्तु उनके आलोक में वह अच्छे और बुरे, नैतिक और अनैतिक, सही और गलत का विवेक अर्जित करता है। वह जो है, उसके यथार्थ का तटस्थ ढंग से यथावत् विश्लेषण करता है...... पूर्ण रूप से वस्तुपरक होना उसकी प्राथमिक शर्त है ...... किन्तु यह ही काफी नहीं है। वस्तुपरक तो वैज्ञानिक, समाजशास्त्री, गणितज्ञ भी होते हैं......... यदि बुद्धिजीवी उनसे अलग है, तो इसलिए कि वह जो है, उसका अवलोकन करते समय, जो 'होना चाहिए' उसके बारे में विचार करता है

........और इस तरह एक नैतिक आयाम स्वतः ही उसके बौद्धिक कार्य-कलाप के साथ जुड़ जाता है। बुद्धि के माध्यम से वह आलोचनात्मक चेतना का संवाहक बन जाता है।
चेतना का यह तत्व ही है, जो भारतीय परम्परा में बुद्धिजीवी को एक मनीषी का गौरव प्रदान करता है। एक ऐसा व्यक्ति ही मनीषी की मर्यादा को प्राप्त करता है - जिसका विचार तन्त्र मनुष्य का समूचा अस्तित्व हो ..... और यह तभी सम्भव हो सकता है, जब वह अपनी बुद्धि को प्रज्ञा में परिलक्षित कर सकने के योग्य हो - प्रज्ञा वह समझदारी है, जहाँ मनुष्य अपने आत्म में रहकर भी समूची सृष्टि से ...... जिसमें चराचर सब शामिल है, एकात्म स्थापित कर लेता है।

बुद्धिजीवी अन्य तत्त्ववेत्ताओं से किस प्रकार अलग है ?

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प्रश्न 708

रचना कौशल

निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर दिये गये प्रश्नों के उत्तर सबसे उचित विकल्प चुनकर दीजिए :

बुद्धिजीवी वह है, जो विचार के माध्यम से सत्य का अन्वेषण करता है। सत्य की अवधारणा सुन्दर है, किन्तु बहुत अमूर्त और द्वेधात्मक भी है ... शायद समस्त सार्वभौमिक अवधारणाओं की तरह वह थोड़ा अस्पष्ट होती है। बुद्धिजीवी यदि अन्य दार्शनिकों और तत्त्ववेत्ताओं से थोड़ा अलग होता है, तो मेरे विचार में इसलिए कि वह सार्वभौमिक और विशिष्ट के बीच नाजुक और मूल्यवान सन्तुलन बनाने का प्रयास करता है...... समाज की हर विशिष्ट समस्या पर विचार करते समय उसके सामने कुछ ऐसे 'मूल्य' होते हैं, जो 'परम और शाश्वत' होते हैं ...... जरूरी नहीं, वह उन्हें परिभाषित करे - किन्तु उनके आलोक में वह अच्छे और बुरे, नैतिक और अनैतिक, सही और गलत का विवेक अर्जित करता है। वह जो है, उसके यथार्थ का तटस्थ ढंग से यथावत् विश्लेषण करता है...... पूर्ण रूप से वस्तुपरक होना उसकी प्राथमिक शर्त है ...... किन्तु यह ही काफी नहीं है। वस्तुपरक तो वैज्ञानिक, समाजशास्त्री, गणितज्ञ भी होते हैं......... यदि बुद्धिजीवी उनसे अलग है, तो इसलिए कि वह जो है, उसका अवलोकन करते समय, जो 'होना चाहिए' उसके बारे में विचार करता है

........और इस तरह एक नैतिक आयाम स्वतः ही उसके बौद्धिक कार्य-कलाप के साथ जुड़ जाता है। बुद्धि के माध्यम से वह आलोचनात्मक चेतना का संवाहक बन जाता है।
चेतना का यह तत्व ही है, जो भारतीय परम्परा में बुद्धिजीवी को एक मनीषी का गौरव प्रदान करता है। एक ऐसा व्यक्ति ही मनीषी की मर्यादा को प्राप्त करता है - जिसका विचार तन्त्र मनुष्य का समूचा अस्तित्व हो ..... और यह तभी सम्भव हो सकता है, जब वह अपनी बुद्धि को प्रज्ञा में परिलक्षित कर सकने के योग्य हो - प्रज्ञा वह समझदारी है, जहाँ मनुष्य अपने आत्म में रहकर भी समूची सृष्टि से ...... जिसमें चराचर सब शामिल है, एकात्म स्थापित कर लेता है।

बुद्धि 'प्रज्ञा' में कब रूपान्तरित होती है ?

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प्रश्न 709

रचना कौशल

निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर दिये गये प्रश्नों के उत्तर सबसे उचित विकल्प चुनकर दीजिए :

बुद्धिजीवी वह है, जो विचार के माध्यम से सत्य का अन्वेषण करता है। सत्य की अवधारणा सुन्दर है, किन्तु बहुत अमूर्त और द्वेधात्मक भी है ... शायद समस्त सार्वभौमिक अवधारणाओं की तरह वह थोड़ा अस्पष्ट होती है। बुद्धिजीवी यदि अन्य दार्शनिकों और तत्त्ववेत्ताओं से थोड़ा अलग होता है, तो मेरे विचार में इसलिए कि वह सार्वभौमिक और विशिष्ट के बीच नाजुक और मूल्यवान सन्तुलन बनाने का प्रयास करता है...... समाज की हर विशिष्ट समस्या पर विचार करते समय उसके सामने कुछ ऐसे 'मूल्य' होते हैं, जो 'परम और शाश्वत' होते हैं ...... जरूरी नहीं, वह उन्हें परिभाषित करे - किन्तु उनके आलोक में वह अच्छे और बुरे, नैतिक और अनैतिक, सही और गलत का विवेक अर्जित करता है। वह जो है, उसके यथार्थ का तटस्थ ढंग से यथावत् विश्लेषण करता है...... पूर्ण रूप से वस्तुपरक होना उसकी प्राथमिक शर्त है ...... किन्तु यह ही काफी नहीं है। वस्तुपरक तो वैज्ञानिक, समाजशास्त्री, गणितज्ञ भी होते हैं......... यदि बुद्धिजीवी उनसे अलग है, तो इसलिए कि वह जो है, उसका अवलोकन करते समय, जो 'होना चाहिए' उसके बारे में विचार करता है

........और इस तरह एक नैतिक आयाम स्वतः ही उसके बौद्धिक कार्य-कलाप के साथ जुड़ जाता है। बुद्धि के माध्यम से वह आलोचनात्मक चेतना का संवाहक बन जाता है।
चेतना का यह तत्व ही है, जो भारतीय परम्परा में बुद्धिजीवी को एक मनीषी का गौरव प्रदान करता है। एक ऐसा व्यक्ति ही मनीषी की मर्यादा को प्राप्त करता है - जिसका विचार तन्त्र मनुष्य का समूचा अस्तित्व हो ..... और यह तभी सम्भव हो सकता है, जब वह अपनी बुद्धि को प्रज्ञा में परिलक्षित कर सकने के योग्य हो - प्रज्ञा वह समझदारी है, जहाँ मनुष्य अपने आत्म में रहकर भी समूची सृष्टि से ...... जिसमें चराचर सब शामिल है, एकात्म स्थापित कर लेता है।

'संवाहक' शब्द का अर्थ है

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प्रश्न 710

रचना कौशल

निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर दिये गये प्रश्नों के उत्तर सबसे उचित विकल्प चुनकर दीजिए :

बुद्धिजीवी वह है, जो विचार के माध्यम से सत्य का अन्वेषण करता है। सत्य की अवधारणा सुन्दर है, किन्तु बहुत अमूर्त और द्वेधात्मक भी है ... शायद समस्त सार्वभौमिक अवधारणाओं की तरह वह थोड़ा अस्पष्ट होती है। बुद्धिजीवी यदि अन्य दार्शनिकों और तत्त्ववेत्ताओं से थोड़ा अलग होता है, तो मेरे विचार में इसलिए कि वह सार्वभौमिक और विशिष्ट के बीच नाजुक और मूल्यवान सन्तुलन बनाने का प्रयास करता है...... समाज की हर विशिष्ट समस्या पर विचार करते समय उसके सामने कुछ ऐसे 'मूल्य' होते हैं, जो 'परम और शाश्वत' होते हैं ...... जरूरी नहीं, वह उन्हें परिभाषित करे - किन्तु उनके आलोक में वह अच्छे और बुरे, नैतिक और अनैतिक, सही और गलत का विवेक अर्जित करता है। वह जो है, उसके यथार्थ का तटस्थ ढंग से यथावत् विश्लेषण करता है...... पूर्ण रूप से वस्तुपरक होना उसकी प्राथमिक शर्त है ...... किन्तु यह ही काफी नहीं है। वस्तुपरक तो वैज्ञानिक, समाजशास्त्री, गणितज्ञ भी होते हैं......... यदि बुद्धिजीवी उनसे अलग है, तो इसलिए कि वह जो है, उसका अवलोकन करते समय, जो 'होना चाहिए' उसके बारे में विचार करता है

........और इस तरह एक नैतिक आयाम स्वतः ही उसके बौद्धिक कार्य-कलाप के साथ जुड़ जाता है। बुद्धि के माध्यम से वह आलोचनात्मक चेतना का संवाहक बन जाता है।
चेतना का यह तत्व ही है, जो भारतीय परम्परा में बुद्धिजीवी को एक मनीषी का गौरव प्रदान करता है। एक ऐसा व्यक्ति ही मनीषी की मर्यादा को प्राप्त करता है - जिसका विचार तन्त्र मनुष्य का समूचा अस्तित्व हो ..... और यह तभी सम्भव हो सकता है, जब वह अपनी बुद्धि को प्रज्ञा में परिलक्षित कर सकने के योग्य हो - प्रज्ञा वह समझदारी है, जहाँ मनुष्य अपने आत्म में रहकर भी समूची सृष्टि से ...... जिसमें चराचर सब शामिल है, एकात्म स्थापित कर लेता है।

'चराचर' का आशय है

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प्रश्न 711

रचना कौशल

निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर दिये गये प्रश्नों के उत्तर सबसे उचित विकल्प चुनकर दीजिए :

बुद्धिजीवी वह है, जो विचार के माध्यम से सत्य का अन्वेषण करता है। सत्य की अवधारणा सुन्दर है, किन्तु बहुत अमूर्त और द्वेधात्मक भी है ... शायद समस्त सार्वभौमिक अवधारणाओं की तरह वह थोड़ा अस्पष्ट होती है। बुद्धिजीवी यदि अन्य दार्शनिकों और तत्त्ववेत्ताओं से थोड़ा अलग होता है, तो मेरे विचार में इसलिए कि वह सार्वभौमिक और विशिष्ट के बीच नाजुक और मूल्यवान सन्तुलन बनाने का प्रयास करता है...... समाज की हर विशिष्ट समस्या पर विचार करते समय उसके सामने कुछ ऐसे 'मूल्य' होते हैं, जो 'परम और शाश्वत' होते हैं ...... जरूरी नहीं, वह उन्हें परिभाषित करे - किन्तु उनके आलोक में वह अच्छे और बुरे, नैतिक और अनैतिक, सही और गलत का विवेक अर्जित करता है। वह जो है, उसके यथार्थ का तटस्थ ढंग से यथावत् विश्लेषण करता है...... पूर्ण रूप से वस्तुपरक होना उसकी प्राथमिक शर्त है ...... किन्तु यह ही काफी नहीं है। वस्तुपरक तो वैज्ञानिक, समाजशास्त्री, गणितज्ञ भी होते हैं......... यदि बुद्धिजीवी उनसे अलग है, तो इसलिए कि वह जो है, उसका अवलोकन करते समय, जो 'होना चाहिए' उसके बारे में विचार करता है

........और इस तरह एक नैतिक आयाम स्वतः ही उसके बौद्धिक कार्य-कलाप के साथ जुड़ जाता है। बुद्धि के माध्यम से वह आलोचनात्मक चेतना का संवाहक बन जाता है।
चेतना का यह तत्व ही है, जो भारतीय परम्परा में बुद्धिजीवी को एक मनीषी का गौरव प्रदान करता है। एक ऐसा व्यक्ति ही मनीषी की मर्यादा को प्राप्त करता है - जिसका विचार तन्त्र मनुष्य का समूचा अस्तित्व हो ..... और यह तभी सम्भव हो सकता है, जब वह अपनी बुद्धि को प्रज्ञा में परिलक्षित कर सकने के योग्य हो - प्रज्ञा वह समझदारी है, जहाँ मनुष्य अपने आत्म में रहकर भी समूची सृष्टि से ...... जिसमें चराचर सब शामिल है, एकात्म स्थापित कर लेता है।

अवतरण के आधार पर 'प्रज्ञा' का पर्याय चुनिए

अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।

प्रश्न 712

रचना कौशल

निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर दिये गये प्रश्नों के सबसे उचित विकल्प चुनिए :

महाभारत में कृष्ण से संबद्ध आख्यान भी हैं और प्रसिद्ध काव्य भगवद्गीता भी। गीता के दर्शन के अलावा, इस ग्रंथ में शासन कला और सामान्य रूप से जीवन के नैतिक और आचार संबंधी सिद्धांतों पर जोर दिया गया है। धर्म की इस बुनियाद के बिना न सच्चा सुख मिल सकता है और न समाज में एका रह सकता है। इसका लक्ष्य है लोकमंगल, किसी विशेष वर्ग का नहीं बल्कि पूरे विश्व का। लेकिन धर्म स्वयं सापेक्ष है और सत्य-निष्ठा, अहिंसा आदि जैसे कुछ बुनियादी सिद्धांतों को छोड़कर खुद समय और मौजूदा परिस्थितियों पर निर्भर करता है। ये सिद्धांत टिकाऊ हैं और अपरिवर्तनशील भी, परंतु इसके अलावा धर्म, जो कर्तव्यों और जिम्मेदारियों का सम्मिश्रण है, समय के साथ बदलता है। अहिंसा पर यहाँ और दूसरी जगहों पर भी जो बल दिया गया है, वह दिलचस्प है क्योंकि अहिंसा और किसी अच्छे मकसद के लिए संघर्ष करने में प्रत्यक्ष रूप से कोई विरोध नहीं दिखाई पड़ता। पूरे महाकाव्य का केंद्र एक विराट् युद्ध है।

आख्यान का पर्याय है

अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।

प्रश्न 713

रचना कौशल

निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर दिये गये प्रश्नों के सबसे उचित विकल्प चुनिए :

महाभारत में कृष्ण से संबद्ध आख्यान भी हैं और प्रसिद्ध काव्य भगवद्गीता भी। गीता के दर्शन के अलावा, इस ग्रंथ में शासन कला और सामान्य रूप से जीवन के नैतिक और आचार संबंधी सिद्धांतों पर जोर दिया गया है। धर्म की इस बुनियाद के बिना न सच्चा सुख मिल सकता है और न समाज में एका रह सकता है। इसका लक्ष्य है लोकमंगल, किसी विशेष वर्ग का नहीं बल्कि पूरे विश्व का। लेकिन धर्म स्वयं सापेक्ष है और सत्य-निष्ठा, अहिंसा आदि जैसे कुछ बुनियादी सिद्धांतों को छोड़कर खुद समय और मौजूदा परिस्थितियों पर निर्भर करता है। ये सिद्धांत टिकाऊ हैं और अपरिवर्तनशील भी, परंतु इसके अलावा धर्म, जो कर्तव्यों और जिम्मेदारियों का सम्मिश्रण है, समय के साथ बदलता है। अहिंसा पर यहाँ और दूसरी जगहों पर भी जो बल दिया गया है, वह दिलचस्प है क्योंकि अहिंसा और किसी अच्छे मकसद के लिए संघर्ष करने में प्रत्यक्ष रूप से कोई विरोध नहीं दिखाई पड़ता। पूरे महाकाव्य का केंद्र एक विराट् युद्ध है।

धर्म का बुनियादी सिद्धान्त है

अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।

प्रश्न 714

रचना कौशल

निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर दिये गये प्रश्नों के सबसे उचित विकल्प चुनिए :

महाभारत में कृष्ण से संबद्ध आख्यान भी हैं और प्रसिद्ध काव्य भगवद्गीता भी। गीता के दर्शन के अलावा, इस ग्रंथ में शासन कला और सामान्य रूप से जीवन के नैतिक और आचार संबंधी सिद्धांतों पर जोर दिया गया है। धर्म की इस बुनियाद के बिना न सच्चा सुख मिल सकता है और न समाज में एका रह सकता है। इसका लक्ष्य है लोकमंगल, किसी विशेष वर्ग का नहीं बल्कि पूरे विश्व का। लेकिन धर्म स्वयं सापेक्ष है और सत्य-निष्ठा, अहिंसा आदि जैसे कुछ बुनियादी सिद्धांतों को छोड़कर खुद समय और मौजूदा परिस्थितियों पर निर्भर करता है। ये सिद्धांत टिकाऊ हैं और अपरिवर्तनशील भी, परंतु इसके अलावा धर्म, जो कर्तव्यों और जिम्मेदारियों का सम्मिश्रण है, समय के साथ बदलता है। अहिंसा पर यहाँ और दूसरी जगहों पर भी जो बल दिया गया है, वह दिलचस्प है क्योंकि अहिंसा और किसी अच्छे मकसद के लिए संघर्ष करने में प्रत्यक्ष रूप से कोई विरोध नहीं दिखाई पड़ता। पूरे महाकाव्य का केंद्र एक विराट् युद्ध है।

धर्म किस प्रकार सापेक्ष है ?

अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।

प्रश्न 715

रचना कौशल

निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर दिये गये प्रश्नों के सबसे उचित विकल्प चुनिए :

महाभारत में कृष्ण से संबद्ध आख्यान भी हैं और प्रसिद्ध काव्य भगवद्गीता भी। गीता के दर्शन के अलावा, इस ग्रंथ में शासन कला और सामान्य रूप से जीवन के नैतिक और आचार संबंधी सिद्धांतों पर जोर दिया गया है। धर्म की इस बुनियाद के बिना न सच्चा सुख मिल सकता है और न समाज में एका रह सकता है। इसका लक्ष्य है लोकमंगल, किसी विशेष वर्ग का नहीं बल्कि पूरे विश्व का। लेकिन धर्म स्वयं सापेक्ष है और सत्य-निष्ठा, अहिंसा आदि जैसे कुछ बुनियादी सिद्धांतों को छोड़कर खुद समय और मौजूदा परिस्थितियों पर निर्भर करता है। ये सिद्धांत टिकाऊ हैं और अपरिवर्तनशील भी, परंतु इसके अलावा धर्म, जो कर्तव्यों और जिम्मेदारियों का सम्मिश्रण है, समय के साथ बदलता है। अहिंसा पर यहाँ और दूसरी जगहों पर भी जो बल दिया गया है, वह दिलचस्प है क्योंकि अहिंसा और किसी अच्छे मकसद के लिए संघर्ष करने में प्रत्यक्ष रूप से कोई विरोध नहीं दिखाई पड़ता। पूरे महाकाव्य का केंद्र एक विराट् युद्ध है।

महाभारत है

अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।

प्रश्न 716

रचना कौशल

निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर दिये गये प्रश्नों के सबसे उचित विकल्प चुनिए :

महाभारत में कृष्ण से संबद्ध आख्यान भी हैं और प्रसिद्ध काव्य भगवद्गीता भी। गीता के दर्शन के अलावा, इस ग्रंथ में शासन कला और सामान्य रूप से जीवन के नैतिक और आचार संबंधी सिद्धांतों पर जोर दिया गया है। धर्म की इस बुनियाद के बिना न सच्चा सुख मिल सकता है और न समाज में एका रह सकता है। इसका लक्ष्य है लोकमंगल, किसी विशेष वर्ग का नहीं बल्कि पूरे विश्व का। लेकिन धर्म स्वयं सापेक्ष है और सत्य-निष्ठा, अहिंसा आदि जैसे कुछ बुनियादी सिद्धांतों को छोड़कर खुद समय और मौजूदा परिस्थितियों पर निर्भर करता है। ये सिद्धांत टिकाऊ हैं और अपरिवर्तनशील भी, परंतु इसके अलावा धर्म, जो कर्तव्यों और जिम्मेदारियों का सम्मिश्रण है, समय के साथ बदलता है। अहिंसा पर यहाँ और दूसरी जगहों पर भी जो बल दिया गया है, वह दिलचस्प है क्योंकि अहिंसा और किसी अच्छे मकसद के लिए संघर्ष करने में प्रत्यक्ष रूप से कोई विरोध नहीं दिखाई पड़ता। पूरे महाकाव्य का केंद्र एक विराट् युद्ध है।

महाभारत में सम्मिलित है

अपना परिणाम और व्याख्या देखने के लिए एक उत्तर चुनें।

प्रश्न 717

रचना कौशल

निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के सबसे उचित विकल्प को चुनिए :

काव्य में एक पथ के पान्थ हैं तुलसीदास और दूसरे के कालिदास। तुलसी शील की छाँह में छाँहाते चलते हैं, और कालिदास बिजलियों की कौंध से आँखें मिलाते चलते हैं। तुलसी में मलयज की तरह ताप-निवारण की क्षमता है, कालिदास में लोहित चन्दन की तरह उन्मादन राग-विवर्धन की शक्ति है। एक तीसरा भी पन्थ है, केशर या हल्दी के रंग में मलयज को संसक्त करके तिलक देने वालों का। रागात्मिका भक्ति के द्वारा दक्षिण और वाम पथ के बीच सहज समाधान प्राप्त करने वालों का। इनके तिलक में बंकिमा और सादगी दोनों होती है। सूरदास, हितहरिवंश, व्यास आदि इसी पन्थ के प्रणेता हैं। और एक चौथा चन्दन भी है, जिसको वैष्णव जन गोपी-चन्दन कहते हैं। मेरी एक परम वैष्णव चाची हैं, वे बतलाती हैं कि जिस सरोवर में गोपियों ने स्नान करके अपने प्रेष्ठ भगवान् का साक्षात्कार पाया, उस सरोवर की मिट्टी ही समर्पित गोपी के अंग से लगकर चन्दन बन गयी है। सम्भवतः जितने भी दुराव, आवरण और आत्मसंकोच आदि कृपणभाव हो सकते हैं, उन सबसे मुक्त होकर अपने को निश्शेष भाव से जो अपने सर्वश्रेष्ठ काम्य के लिए अर्पण करते हैं, तो मलयाचल की तरह अपने आश्रय-मात्र को चन्दन बनाने में समर्थ हो ही जाते हैं। हाँ, यह गोपी-चन्दन बहुत ही उच्चतर भूमिका वाले सिद्ध भक्तों के लिए ही है।
पर मैं तो यह मानता हूँ कि चन्दन जो भी हो, किसी रंग में भी सना हो, वह हमारी विश्वभावना का ही एक शुष्कप्राय खण्ड है, जिसे रस-सिक्त करना हमारा सतत कर्त्तव्य है। जिस किसी भी शिला का हम होरसा बनवाएँ, वह धरती पर टिकी हो, संघर्षण में वह डगमगाने वाली न हो। हम जो कोई भी जल सींच-सींचकर चन्दन को आर्द्र करें; वह शुचि हो, स्वच्छ हो और अभिमन्त्रित हो। हम तिलक जो भी लगाएँ, वह अर्पित चन्दन का तिलक हो, स्वार्थ संघृष्ट न हो, सुविस्तृत विश्व को सुरभित करने से जो बचा हो, वही हम अपने सिर-आँखों लें, इसी में हमारी भव्य परम्परा की अभिवृद्धि और हम सभी के अन्तःकरणों का सौमनस्य सन्निहित है। तत्त्वतः हमीं चन्दन हैं, हमीं पानी हैं, हमीं होरसा हैं, हमीं कटोरी हैं जिसमें चन्दन रखा जाता है। हमीं अर्चनीय देवता हैं और हमीं अर्चक भक्त हैं; पर यह हमारा विस्तार बोध भी तभी जगता है, जब हम प्रभु को चन्दन और अपने को पानी मानकर चलते हैं। उदात्त रूपों का आकार सामने रखकर उनसे उनका सार ग्रहण करते हुए जीवन में उतारना है, यह ध्येय सामने रखकर चलते हैं और जो भी उदात्त गुण हम अर्जित करते हैं, उनको विश्वहित में विनियोजित करने का संकल्प लेकर चलते हैं।

'मलयज' का अर्थ है

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प्रश्न 718

रचना कौशल

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काव्य में एक पथ के पान्थ हैं तुलसीदास और दूसरे के कालिदास। तुलसी शील की छाँह में छाँहाते चलते हैं, और कालिदास बिजलियों की कौंध से आँखें मिलाते चलते हैं। तुलसी में मलयज की तरह ताप-निवारण की क्षमता है, कालिदास में लोहित चन्दन की तरह उन्मादन राग-विवर्धन की शक्ति है। एक तीसरा भी पन्थ है, केशर या हल्दी के रंग में मलयज को संसक्त करके तिलक देने वालों का। रागात्मिका भक्ति के द्वारा दक्षिण और वाम पथ के बीच सहज समाधान प्राप्त करने वालों का। इनके तिलक में बंकिमा और सादगी दोनों होती है। सूरदास, हितहरिवंश, व्यास आदि इसी पन्थ के प्रणेता हैं। और एक चौथा चन्दन भी है, जिसको वैष्णव जन गोपी-चन्दन कहते हैं। मेरी एक परम वैष्णव चाची हैं, वे बतलाती हैं कि जिस सरोवर में गोपियों ने स्नान करके अपने प्रेष्ठ भगवान् का साक्षात्कार पाया, उस सरोवर की मिट्टी ही समर्पित गोपी के अंग से लगकर चन्दन बन गयी है। सम्भवतः जितने भी दुराव, आवरण और आत्मसंकोच आदि कृपणभाव हो सकते हैं, उन सबसे मुक्त होकर अपने को निश्शेष भाव से जो अपने सर्वश्रेष्ठ काम्य के लिए अर्पण करते हैं, तो मलयाचल की तरह अपने आश्रय-मात्र को चन्दन बनाने में समर्थ हो ही जाते हैं। हाँ, यह गोपी-चन्दन बहुत ही उच्चतर भूमिका वाले सिद्ध भक्तों के लिए ही है।
पर मैं तो यह मानता हूँ कि चन्दन जो भी हो, किसी रंग में भी सना हो, वह हमारी विश्वभावना का ही एक शुष्कप्राय खण्ड है, जिसे रस-सिक्त करना हमारा सतत कर्त्तव्य है। जिस किसी भी शिला का हम होरसा बनवाएँ, वह धरती पर टिकी हो, संघर्षण में वह डगमगाने वाली न हो। हम जो कोई भी जल सींच-सींचकर चन्दन को आर्द्र करें; वह शुचि हो, स्वच्छ हो और अभिमन्त्रित हो। हम तिलक जो भी लगाएँ, वह अर्पित चन्दन का तिलक हो, स्वार्थ संघृष्ट न हो, सुविस्तृत विश्व को सुरभित करने से जो बचा हो, वही हम अपने सिर-आँखों लें, इसी में हमारी भव्य परम्परा की अभिवृद्धि और हम सभी के अन्तःकरणों का सौमनस्य सन्निहित है। तत्त्वतः हमीं चन्दन हैं, हमीं पानी हैं, हमीं होरसा हैं, हमीं कटोरी हैं जिसमें चन्दन रखा जाता है। हमीं अर्चनीय देवता हैं और हमीं अर्चक भक्त हैं; पर यह हमारा विस्तार बोध भी तभी जगता है, जब हम प्रभु को चन्दन और अपने को पानी मानकर चलते हैं। उदात्त रूपों का आकार सामने रखकर उनसे उनका सार ग्रहण करते हुए जीवन में उतारना है, यह ध्येय सामने रखकर चलते हैं और जो भी उदात्त गुण हम अर्जित करते हैं, उनको विश्वहित में विनियोजित करने का संकल्प लेकर चलते हैं।

कालिदास की काव्य-क्षमता तुलनीय है

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प्रश्न 719

रचना कौशल

निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के सबसे उचित विकल्प को चुनिए :

काव्य में एक पथ के पान्थ हैं तुलसीदास और दूसरे के कालिदास। तुलसी शील की छाँह में छाँहाते चलते हैं, और कालिदास बिजलियों की कौंध से आँखें मिलाते चलते हैं। तुलसी में मलयज की तरह ताप-निवारण की क्षमता है, कालिदास में लोहित चन्दन की तरह उन्मादन राग-विवर्धन की शक्ति है। एक तीसरा भी पन्थ है, केशर या हल्दी के रंग में मलयज को संसक्त करके तिलक देने वालों का। रागात्मिका भक्ति के द्वारा दक्षिण और वाम पथ के बीच सहज समाधान प्राप्त करने वालों का। इनके तिलक में बंकिमा और सादगी दोनों होती है। सूरदास, हितहरिवंश, व्यास आदि इसी पन्थ के प्रणेता हैं। और एक चौथा चन्दन भी है, जिसको वैष्णव जन गोपी-चन्दन कहते हैं। मेरी एक परम वैष्णव चाची हैं, वे बतलाती हैं कि जिस सरोवर में गोपियों ने स्नान करके अपने प्रेष्ठ भगवान् का साक्षात्कार पाया, उस सरोवर की मिट्टी ही समर्पित गोपी के अंग से लगकर चन्दन बन गयी है। सम्भवतः जितने भी दुराव, आवरण और आत्मसंकोच आदि कृपणभाव हो सकते हैं, उन सबसे मुक्त होकर अपने को निश्शेष भाव से जो अपने सर्वश्रेष्ठ काम्य के लिए अर्पण करते हैं, तो मलयाचल की तरह अपने आश्रय-मात्र को चन्दन बनाने में समर्थ हो ही जाते हैं। हाँ, यह गोपी-चन्दन बहुत ही उच्चतर भूमिका वाले सिद्ध भक्तों के लिए ही है।
पर मैं तो यह मानता हूँ कि चन्दन जो भी हो, किसी रंग में भी सना हो, वह हमारी विश्वभावना का ही एक शुष्कप्राय खण्ड है, जिसे रस-सिक्त करना हमारा सतत कर्त्तव्य है। जिस किसी भी शिला का हम होरसा बनवाएँ, वह धरती पर टिकी हो, संघर्षण में वह डगमगाने वाली न हो। हम जो कोई भी जल सींच-सींचकर चन्दन को आर्द्र करें; वह शुचि हो, स्वच्छ हो और अभिमन्त्रित हो। हम तिलक जो भी लगाएँ, वह अर्पित चन्दन का तिलक हो, स्वार्थ संघृष्ट न हो, सुविस्तृत विश्व को सुरभित करने से जो बचा हो, वही हम अपने सिर-आँखों लें, इसी में हमारी भव्य परम्परा की अभिवृद्धि और हम सभी के अन्तःकरणों का सौमनस्य सन्निहित है। तत्त्वतः हमीं चन्दन हैं, हमीं पानी हैं, हमीं होरसा हैं, हमीं कटोरी हैं जिसमें चन्दन रखा जाता है। हमीं अर्चनीय देवता हैं और हमीं अर्चक भक्त हैं; पर यह हमारा विस्तार बोध भी तभी जगता है, जब हम प्रभु को चन्दन और अपने को पानी मानकर चलते हैं। उदात्त रूपों का आकार सामने रखकर उनसे उनका सार ग्रहण करते हुए जीवन में उतारना है, यह ध्येय सामने रखकर चलते हैं और जो भी उदात्त गुण हम अर्जित करते हैं, उनको विश्वहित में विनियोजित करने का संकल्प लेकर चलते हैं।

सूरदास के साहित्य की विशेषता है

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प्रश्न 720

रचना कौशल

निर्देश : निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के सबसे उचित विकल्प को चुनिए :

काव्य में एक पथ के पान्थ हैं तुलसीदास और दूसरे के कालिदास। तुलसी शील की छाँह में छाँहाते चलते हैं, और कालिदास बिजलियों की कौंध से आँखें मिलाते चलते हैं। तुलसी में मलयज की तरह ताप-निवारण की क्षमता है, कालिदास में लोहित चन्दन की तरह उन्मादन राग-विवर्धन की शक्ति है। एक तीसरा भी पन्थ है, केशर या हल्दी के रंग में मलयज को संसक्त करके तिलक देने वालों का। रागात्मिका भक्ति के द्वारा दक्षिण और वाम पथ के बीच सहज समाधान प्राप्त करने वालों का। इनके तिलक में बंकिमा और सादगी दोनों होती है। सूरदास, हितहरिवंश, व्यास आदि इसी पन्थ के प्रणेता हैं। और एक चौथा चन्दन भी है, जिसको वैष्णव जन गोपी-चन्दन कहते हैं। मेरी एक परम वैष्णव चाची हैं, वे बतलाती हैं कि जिस सरोवर में गोपियों ने स्नान करके अपने प्रेष्ठ भगवान् का साक्षात्कार पाया, उस सरोवर की मिट्टी ही समर्पित गोपी के अंग से लगकर चन्दन बन गयी है। सम्भवतः जितने भी दुराव, आवरण और आत्मसंकोच आदि कृपणभाव हो सकते हैं, उन सबसे मुक्त होकर अपने को निश्शेष भाव से जो अपने सर्वश्रेष्ठ काम्य के लिए अर्पण करते हैं, तो मलयाचल की तरह अपने आश्रय-मात्र को चन्दन बनाने में समर्थ हो ही जाते हैं। हाँ, यह गोपी-चन्दन बहुत ही उच्चतर भूमिका वाले सिद्ध भक्तों के लिए ही है।
पर मैं तो यह मानता हूँ कि चन्दन जो भी हो, किसी रंग में भी सना हो, वह हमारी विश्वभावना का ही एक शुष्कप्राय खण्ड है, जिसे रस-सिक्त करना हमारा सतत कर्त्तव्य है। जिस किसी भी शिला का हम होरसा बनवाएँ, वह धरती पर टिकी हो, संघर्षण में वह डगमगाने वाली न हो। हम जो कोई भी जल सींच-सींचकर चन्दन को आर्द्र करें; वह शुचि हो, स्वच्छ हो और अभिमन्त्रित हो। हम तिलक जो भी लगाएँ, वह अर्पित चन्दन का तिलक हो, स्वार्थ संघृष्ट न हो, सुविस्तृत विश्व को सुरभित करने से जो बचा हो, वही हम अपने सिर-आँखों लें, इसी में हमारी भव्य परम्परा की अभिवृद्धि और हम सभी के अन्तःकरणों का सौमनस्य सन्निहित है। तत्त्वतः हमीं चन्दन हैं, हमीं पानी हैं, हमीं होरसा हैं, हमीं कटोरी हैं जिसमें चन्दन रखा जाता है। हमीं अर्चनीय देवता हैं और हमीं अर्चक भक्त हैं; पर यह हमारा विस्तार बोध भी तभी जगता है, जब हम प्रभु को चन्दन और अपने को पानी मानकर चलते हैं। उदात्त रूपों का आकार सामने रखकर उनसे उनका सार ग्रहण करते हुए जीवन में उतारना है, यह ध्येय सामने रखकर चलते हैं और जो भी उदात्त गुण हम अर्जित करते हैं, उनको विश्वहित में विनियोजित करने का संकल्प लेकर चलते हैं।

मलयाचल की तुलना की गई है

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